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पहाड़ की चुप्पी:एक साहित्यिक कहानी

                                पहाड़ के उस पार बसे छोटे-से गाँव में राघव का बचपन बीता था। उसके लिए पहाड़ कोई आश्चर्य नहीं था। वह उसकी सुबहों का हिस्सा था, जैसे आँगन में तुलसी का पौधा, घर के पीछे बहती पतली-सी धारा और शाम को लौटते पक्षियों का शोर।                               बचपन में उसकी माँ कहा करती थी, “बेटा, पहाड़ केवल धरती का ऊँचा हिस्सा नहीं होता। वह अपने भीतर न जाने कितने जीवन सँभालकर रखता है।”                                                राघव उस समय माँ की बात सुनकर हँस देता।                                              ...

पहाड़ की आख़िरी इच्छा:एक पहाड़ की आत्मकथा

                                        मैं पहाड़ हूँ।                     वही पहाड़, जिसे तुमने अपनी किताबों में विशाल, अडिग और निर्जीव पढ़ा है। सदियों से मैं इसी धरती पर खड़ा हूँ। मैंने ऋतुओं को बदलते देखा है, नदियों को जन्म लेते देखा है और समय को अपनी आँखों के सामने अनगिनत बार गुजरते देखा है।                                           लेकिन एक बात मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ—मैं कभी निर्जीव नहीं था।                                                   मेरे भीतर भी एक संसार बसता था।                ...

वन की दृष्टि

                              एक विशाल वन था, जहाँ ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, छोटी-छोटी झाड़ियाँ, औषधीय पौधे और रंग-बिरंगे फूल अपनी-अपनी दुनिया में प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। बाहर से देखने पर वह वन जितना सुंदर दिखाई देता था, भीतर से उतना ही विचित्र था। वहाँ प्रकृति की विविधता तो थी, किंतु उस विविधता को स्वीकार करने वाला हृदय नहीं था।                       वन के मध्य एक विशाल बरगद का वृक्ष खड़ा था। उसकी जटाएँ धरती को छूती थीं, शाखाएँ दूर-दूर तक फैली थीं और उसकी छाया में अनेक छोटे पौधे पनपते थे। उसे अपनी विशालता पर बहुत अभिमान था।                        वह प्रायः छोटे पौधों से कहता, “देखो, मेरा विस्तार कितना विशाल है! मेरी छाया में कितने पौधे आश्रय पाते हैं। इस वन में मेरे समान महत्त्वपूर्ण भला कौन हो सकता है?”                 ...

बरगद के पेड़ का अंत

                                 गाँव के उस पुराने रास्ते पर एक विशाल वृक्ष खड़ा था। उसकी जड़ें धरती की छाती में दूर तक फैली थीं और शाखाएँ आकाश को छूने की आकांक्षा में सदियों से उठी हुई थीं। न जाने कितनी ऋतुएँ आईं और चली गईं, कितने लोगों ने उसके नीचे विश्राम किया, कितने प्रेमियों ने अपने मन की बातें उससे छिपाकर कहीं और कितने अकेले मनुष्य उसकी छाया में बैठकर अपने आँसू बहा गए।                                    वृक्ष ने सबको देखा था।                       उसने किसी से उसका नाम नहीं पूछा, किसी की जाति नहीं जानी और न ही किसी के सुख-दुःख का मूल्य आँका। उसके लिए सब समान थे। जो थका हुआ आया, उसे छाया मिली। जो भूखा आया, उसे फल मिले। जो पक्षी अपना घर खो बैठा, उसे उसकी शाखाओं पर आश्रय मिला।             ...

जब धरती ने मनुष्य से प्रश्न किया

                              मनुष्य सदियों से प्रकृति को देखता आया था, लेकिन शायद उसने कभी उसे समझने का प्रयास नहीं किया।                            उसने वृक्षों को लकड़ी के रूप में देखा, नदियों को जल के स्रोत के रूप में, पर्वतों को खनिजों के भंडार के रूप में और धरती को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले एक साधन के रूप में। वह यह भूलता गया कि ये सभी केवल उसके उपयोग की वस्तुएँ नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन-चक्र के हिस्से हैं, जिसका वह स्वयं भी एक छोटा-सा भाग है।                                                    एक वृक्ष अपने जीवन में क्या करता है?                                ...

प्रकृति का अधूरा पन्ना

                           गाँव के किनारे एक पुराना बरगद का पेड़ था। उसकी जड़ें धरती को इस तरह थामे हुए थीं, मानो वह सदियों से उसे टूटने से बचा रहा हो। उसकी शाखाओं पर न जाने कितनी पीढ़ियों के पक्षियों ने अपने घर बनाए थे। उसकी छाया में चरवाहे विश्राम करते, बच्चे खेलते और दोपहर की धूप से बचने के लिए राहगीर कुछ देर बैठ जाया करते थे।                                उसी गाँव में पंद्रह वर्ष का एक लड़का रहता था—आरव। उसे पेड़-पौधों से विशेष लगाव तो नहीं था, लेकिन वह अक्सर उस बरगद के नीचे बैठकर अपनी किताबें पढ़ा करता था। उसे लगता था कि पेड़ बस एक ही काम करते हैं—खड़े रहते हैं और छाया देते हैं।                                एक दिन गाँव में खबर आई कि वहाँ एक बड़ा कारखाना बनने वाला है। गाँव के कई लोग खुश थे। उन्हें लगता था कि कारखाना बनेगा तो रोजगार मि...