पहाड़ की आख़िरी इच्छा:एक पहाड़ की आत्मकथा

                                 मैं पहाड़ हूँ।

                वही पहाड़, जिसे तुमने अपनी किताबों में विशाल, अडिग और निर्जीव पढ़ा है। सदियों से मैं इसी धरती पर खड़ा हूँ। मैंने ऋतुओं को बदलते देखा है, नदियों को जन्म लेते देखा है और समय को अपनी आँखों के सामने अनगिनत बार गुजरते देखा है। 

                                लेकिन एक बात मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ—मैं कभी निर्जीव नहीं था।

                                        मेरे भीतर भी एक संसार बसता था।

                              मेरी ऊँची चोटियों पर जब सुबह की पहली किरण उतरती, तो मुझे लगता, जैसे किसी ने प्रेम से मेरा माथा चूम लिया हो। सूरज की सुनहरी रोशनी मेरे कठोर शरीर पर बिखर जाती और मैं देर तक उस ऊष्मा को अपने भीतर सँजोए रहता।

                            बादल मेरे पुराने मित्र थे। वे दूर देशों से आते, मेरी चोटियों पर विश्राम करते और अपनी थकान मिटाकर आगे बढ़ जाते। कभी-कभी इतने नीचे उतर आते कि मुझे लगता, जैसे उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया हो। 

                    बारिश मेरी सबसे प्रिय ऋतु थी। उसकी बूँदें मेरी दरारों में उतरतीं, मेरे भीतर छिपे जलस्रोतों को सींचतीं और फिर छोटी-छोटी धाराओं के रूप में मेरी गोद से निकल पड़तीं। वही धाराएँ आगे चलकर नदियाँ बनतीं और न जाने कितनी बस्तियों की प्यास बुझातीं।  

                मेरी ढलानों पर पेड़ थे। कुछ मुझसे भी पुराने, कुछ अभी-अभी जन्मे हुए। उनकी जड़ें मुझे थामे रहतीं और मैं उन्हें अपने सीने से लगाए रखता।

                    पक्षियों ने मेरी शाखाओं पर घर बनाए थे। हिरण मेरी पगडंडियों पर दौड़ते थे। बंदर मेरी चट्टानों पर उछलते-कूदते थे। साँझ ढलते ही जंगल में लौटते पक्षियों का शोर मेरे दिन का सबसे मधुर संगीत बन जाता।

                    मैं उन सबका घर था। और घर होने में जो सुख है, उसे शायद वही समझ सकता है जिसने किसी को अपने भीतर जगह दी हो।

                                        मेरे भी कुछ सपने थे।

                        तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे भी सपने थे।   मैं चाहता था कि मेरी चोटियों पर हमेशा बर्फ और बादलों का खेल चलता रहे। मेरी गोद में बहने वाली नदियाँ कभी सूखें नहीं। मेरे जंगलों में जन्म लेने वाले नन्हे पौधे एक दिन विशाल वृक्ष बनें और उनके नीचे फिर कोई नई पीढ़ी अपना बचपन बिताए।

                मैं चाहता था कि जब कोई बच्चा अपने पिता की उँगली पकड़कर पहली बार मुझे देखने आए, तो उसकी आँखों में भय नहीं, विस्मय हो। वह मेरी ऊँचाई देखकर पूछे, “पिताजी, यह इतना बड़ा कैसे हुआ?” 

                        और उसका पिता मुस्कराकर कहे, “बेटा, इसे बनने में बहुत समय लगा है।” 

                    मैं चाहता था कि मनुष्य मेरी ऊँचाई नापने के बजाय मेरे अस्तित्व की गहराई समझे।

                   लेकिन मेरे सपनों में एक बात कभी नहीं आई थी—कि जिस मनुष्य को मैं अपनी गोद में आश्रय देता हूँ, एक दिन वही मुझे भीतर से खोखला करने लगेगा। 

                                            वह दिन, जब मेरे भीतर पहली चोट लगी।

                                                    शुरुआत एक आवाज़ से हुई।

                     एक सुबह जंगल की शांति को चीरती हुई कुछ मशीनें मेरे पास आकर रुकीं। उनके साथ कुछ मनुष्य थे। उनके हाथों में नक्शे थे, आँखों में योजनाएँ और बातचीत में लाभ-हानि के हिसाब। 

                      मैंने सोचा, शायद वे मेरे जंगल में कोई रास्ता बनाने आए हैं। मनुष्य को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए रास्ते चाहिए होते हैं। मैंने हमेशा उसकी आवश्यकताओं को समझने की कोशिश की थी।

                                    लेकिन फिर एक मशीन मेरे सीने से टकराई।

                पहली चोट लगी तो मुझे लगा, जैसे किसी ने मेरे शरीर में एक गहरी कील ठोक दी हो। मेरे भीतर कंपन उठा। मेरी चट्टानों के बीच बसे पक्षी घबराकर उड़ गए। पेड़ों पर बैठे बंदर दूर भागे। मेरे नीचे की मिट्टी काँप उठी।

                                            मैंने अपने दर्द को सह लिया।

                                    मैंने सोचा, शायद यह कोई भूल है। 

                                                    दूसरी चोट लगी।

                                                        फिर तीसरी। 

                धीरे-धीरे मेरी छाती से पत्थर टूटकर गिरने लगे। जिन चट्टानों ने सदियों तक धूप, बारिश और आँधियों का सामना किया था, वे कुछ ही पलों में बिखरने लगीं। 

                                        मनुष्य उन पत्थरों को देखकर प्रसन्न था। 

                                          वह उन्हें अपनी उपलब्धि कह रहा था।

               मैं अपनी टूटती देह को देखकर सोच रहा था—क्या किसी का टूटना दूसरे की उपलब्धि हो सकता है?    

                     मेरी एक दरार में एक छोटा-सा पौधा उगा था। उसकी जड़ें अभी बहुत कोमल थीं। जब मशीन ने उस हिस्से को तोड़ा, तो वह पौधा भी मेरे साथ नीचे गिर पड़ा।

                                    मैं उसे बचाना चाहता था। 

                    लेकिन उस दिन पहली बार मुझे अपनी विशालता पर असहाय होने का अनुभव हुआ।

                     मैं इतना बड़ा था, फिर भी अपने एक छोटे-से पौधे को नहीं बचा सका।

                    मेरी स्मृतियों का उजड़ना 

                    दिन बीतते गए। मेरा शरीर छोटा होता गया और मशीनों का शोर बढ़ता गया।

                 एक दिन वह पुराना वृक्ष भी गिरा, जिसकी शाखाओं पर पीढ़ियों से पक्षियों ने घोंसले बनाए थे। मैंने उसे जन्म लेते देखा था। उसके छोटे-से तने को अपनी मिट्टी में जगह दी थी। आँधियों में उसकी जड़ों को थामे रखा था। 

                        वह वृक्ष मेरे लिए केवल एक पेड़ नहीं था। वह मेरी स्मृति था।

                        जब वह गिरा, तो उसके साथ कई घोंसले भी टूटकर बिखर गए। 

                    एक नन्हा पक्षी देर तक उसी जगह मंडराता रहा। वह बार-बार नीचे उतरता, फिर उड़ जाता। शायद उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका घर सचमुच समाप्त हो चुका है।

                                मैं उसे पुकारना चाहता था। 

                    कहना चाहता था—“बेटा, मैं भी अपना घर खो रहा हूँ।” 

                            लेकिन मेरी आवाज़ किसी तक नहीं पहुँची।

             मनुष्य ने मेरे पत्थरों का मूल्य निर्धारित कर दिया था, लेकिन मेरी स्मृतियों का कोई मूल्य नहीं था। वह नहीं जानता था कि जिस चट्टान को वह अपने लाभ के लिए तोड़ रहा है, उसके पास अनगिनत ऋतुओं की कहानियाँ थीं। 

                    उसे यह भी नहीं पता था कि मेरी गोद से निकलने वाली छोटी-सी धारा अब पहले जैसी नहीं रही। मेरे जंगलों के घटने और धरती की बनावट बदलने के साथ पानी के रास्ते प्रभावित होने लगे थे।

                                            मैं भविष्य को लेकर चिंतित था। 

                                        क्योंकि मेरा दुख केवल मेरा नहीं था।

                    मेरे साथ वे सभी जीव भी अपना संसार खो रहे थे, जिन्होंने कभी मुझसे कुछ माँगा नहीं था।

                                एक बच्चे की आँखें

                   एक शाम, जब मशीनें बंद हो चुकी थीं और धूल की परत मेरे घावों पर जम रही थी, एक छोटा बच्चा अपने पिता के साथ वहाँ आया। 

                            वह कुछ देर तक मुझे देखता रहा।

                            फिर उसने पूछा, “पिताजी, पहाड़ को चोट लगती है क्या?”

                          उसके पिता ने सहजता से उत्तर दिया, “अरे नहीं बेटा, यह तो पत्थर है।” 

                                मैंने उस उत्तर को सुना।

                    न जाने क्यों, उस दिन मेरी टूटी हुई चट्टानों से अधिक मेरा मन दुखा। 

                क्या सचमुच दर्द अनुभव करने के लिए जीवित शरीर होना आवश्यक है? क्या किसी संसार का नष्ट होना तभी महत्त्वपूर्ण है, जब उसमें रहने वाला मनुष्य अपनी पीड़ा व्यक्त कर सके?

बच्चा मेरी ओर देखता रहा। उसकी आँखों में एक प्रश्न था, जिसका उत्तर शायद उसके पिता के पास भी नहीं था।

                वह मेरे पास पड़ी एक छोटी-सी चट्टान उठाने झुका, फिर उसे वापस रख दिया।

            “पिताजी, अगर हम इसे थोड़ा-थोड़ा करके तोड़ेंगे, तो एक दिन यह खत्म हो जाएगा न?”

                                    उसके पिता कुछ क्षण चुप रहे।

                            फिर बोले, “हाँ, अगर इसे लगातार तोड़ते रहे तो।”

                बच्चे ने मेरी ओर देखा और धीमे से कहा, “फिर इसे बचाता कौन है?”

                            उसके पिता ने कोई उत्तर नहीं दिया। 

        लेकिन उस दिन, बहुत समय बाद, मुझे लगा कि शायद मेरी आवाज़ किसी तक पहुँचने वाली है।

                                    मेरी आख़िरी इच्छा

                        आज मैं पहले जैसा नहीं रहा।

                       मेरी चोटियाँ छोटी हो गई हैं। मेरे जंगल विरल हो गए हैं। मेरी कुछ पुरानी धाराएँ सूख गई हैं और कुछ रास्ते हमेशा के लिए बदल गए हैं।

                मैं यह नहीं कहता कि मनुष्य मुझसे कुछ न ले। मैं जानता हूँ कि उसे घर बनाने हैं, सड़कें बनानी हैं और अपने जीवन की आवश्यकताएँ पूरी करनी हैं।

                        लेकिन क्या आवश्यकता और लालच के बीच कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?

                     क्या विकास का अर्थ केवल इतना है कि धरती के भीतर छिपी हर वस्तु को बाहर निकाल लिया जाए? क्या हम उस भविष्य के बारे में नहीं सोच सकते, जिसमें हमारे बच्चे भी स्वच्छ हवा में साँस लें, नदियों का पानी पिएँ और जंगलों में पक्षियों की आवाज़ सुन सकें?

                                    मैंने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है।

              मेरे पत्थर उसके घरों में लगे। मेरी मिट्टी ने उसके जंगलों को पोषित किया। मेरे जलस्रोतों ने उसकी नदियों को सहारा दिया। मेरी गोद ने अनगिनत जीवों को आश्रय दिया।

                        इसके बदले मैं उससे कोई स्मारक नहीं चाहता।

                        न ही चाहता हूँ कि वह मेरी पूजा करे।

                मेरी आख़िरी इच्छा बस इतनी है कि मुझे उपयोगी बने रहने के लिए पूरी तरह नष्ट न कर दिया जाए।

                   मेरे कुछ हिस्सों को बचा रहने दो, ताकि वहाँ फिर पेड़ उग सकें। मेरी चोटों को भरने का अवसर दो। मेरे भीतर बहते जल को अपना रास्ता खोजने दो। मेरे जंगलों में रहने वाले जीवों को लौटने की जगह दो।

                 और जब तुम्हारे बच्चे मुझसे पूछें कि पहाड़ क्यों आवश्यक हैं, तो उन्हें केवल यह मत बताना कि उनसे पत्थर, खनिज और संसाधन मिलते हैं।

             उन्हें यह भी बताना कि पहाड़ धरती की उस लंबी कहानी का हिस्सा हैं, जिसमें मनुष्य अकेला पात्र नहीं है।

                         कभी उन्हें मेरी गोद में बैठाकर बादलों को गुजरते हुए दिखाना। उन्हें किसी छोटी धारा का संगीत सुनाना। किसी पेड़ की छाल छूने देना। उन्हें बताना कि यह सब उनके जन्म से बहुत पहले भी था और उनके जाने के बाद भी रहना चाहिए।

                        शायद तब वे समझ पाएँगे कि प्रकृति कोई ऐसी संपत्ति नहीं, जिसे पूरी तरह खर्च कर दिया जाए।

                                    वह एक विरासत है, जिसे सँभालकर आगे सौंपना होता है।

                        मैं पहाड़ हूँ। 

                मेरे पास अब भी कुछ सपने बचे हैं।

                      मैं चाहता हूँ कि किसी दिन मेरी टूटी हुई ढलान पर फिर कोई नन्हा पौधा जन्म ले। कोई पक्षी लौटकर अपना घोंसला बनाए। बारिश की पहली बूँद मेरी सूखी मिट्टी में उतरे और कोई बच्चा अपनी हथेली फैलाकर उसे छू ले।

                        मैं चाहता हूँ कि उस दिन मनुष्य मेरी ऊँचाई न देखे, मेरे भीतर बची हुई जिंदगी देखे।

               और यदि कभी कोई मुझसे पूछे कि इतने घाव सहने के बाद भी मैं फिर से हरा होने का सपना क्यों देखता हूँ, तो मैं उससे बस इतना कहूँगा— 

                 “क्योंकि मैंने मनुष्य को बहुत कुछ देते हुए देखा है। अब मैं चाहता हूँ कि वह मुझे भी थोड़ा-सा जीवन लौटाना सीख ले।”

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