जब धरती ने मनुष्य से प्रश्न किया
मनुष्य सदियों से प्रकृति को देखता आया था, लेकिन शायद उसने कभी उसे समझने का प्रयास नहीं किया।
उसने वृक्षों को लकड़ी के रूप में देखा, नदियों को जल के स्रोत के रूप में, पर्वतों को खनिजों के भंडार के रूप में और धरती को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले एक साधन के रूप में। वह यह भूलता गया कि ये सभी केवल उसके उपयोग की वस्तुएँ नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन-चक्र के हिस्से हैं, जिसका वह स्वयं भी एक छोटा-सा भाग है।
एक वृक्ष अपने जीवन में क्या करता है?
वह मिट्टी से पोषण लेता है, सूर्य के प्रकाश से अपना भोजन बनाता है, वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करता है और ऑक्सीजन छोड़ता है। वह पक्षियों को आश्रय देता है, अनेक जीवों को भोजन उपलब्ध कराता है, अपनी जड़ों से मिट्टी को बाँधे रखता है और अपनी सूखी पत्तियों के माध्यम से मिट्टी को पोषण लौटाता है।
वह अपने जीवन के लिए प्रकृति से लेता है, लेकिन उसके जीने की प्रक्रिया में दूसरे जीवों के लिए भी स्थान बना रहता है।
हाँ, प्रकृति में संघर्ष भी है। जीव अपने अस्तित्व के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। एक जीव दूसरे जीव को भोजन बना सकता है। फिर भी यह सब एक व्यापक पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। प्रकृति को समझने के लिए उसके किसी एक दृश्य को नहीं, बल्कि पूरे जीवन-चक्र को देखना आवश्यक है।
लेकिन मनुष्य?
उसने अपनी आवश्यकताओं की सीमाएँ तय करना छोड़ दिया। जहाँ उसे एक वृक्ष की आवश्यकता थी, वहाँ उसने पूरा जंगल काट दिया। जहाँ उसे जल चाहिए था, वहाँ उसने नदियों को प्रदूषित कर दिया। जहाँ उसे रहने के लिए भूमि चाहिए थी, वहाँ उसने यह सोचना छोड़ दिया कि उस भूमि पर पहले से कितने जीवों का घर है।
उसने प्रकृति को बदलने की शक्ति तो प्राप्त कर ली, लेकिन हर बार यह नहीं सोचा कि उस परिवर्तन की कीमत कौन चुकाएगा।
प्रकृति उससे यह नहीं कहती कि तुम विकास मत करो। वह उससे यह भी नहीं कहती कि अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना छोड़ दो।
प्रश्न केवल इतना है—क्या तुम्हारा विकास उस आधार को ही नष्ट कर देगा, जिस पर तुम्हारा जीवन टिका है?
यदि ऐसा हुआ, तो तुम्हारी उपलब्धियों का मूल्य क्या रह जाएगा?
एक दिन मनुष्य को समझना होगा कि धरती पर उसका अधिकार, धरती के अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता। वह इस संसार का उपयोग कर सकता है, उसमें परिवर्तन ला सकता है, लेकिन उसे यह भी सीखना होगा कि कहाँ रुकना है, कितना लेना है और क्या बचाकर रखना है।
क्योंकि प्रकृति के साथ तालमेल का अर्थ स्वयं को समाप्त कर देना नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं को इतना संयमित करना है कि दूसरे जीवन के लिए भी स्थान बचा रहे।
धरती मनुष्य की उपलब्धियों से महान नहीं होती। मनुष्य की सारी उपलब्धियाँ तभी अर्थ रखती हैं, जब धरती पर जीवन बचा रहे।
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