वह लड़का, जिसकी आँखों में एक दूसरी दुनिया थी

 बचपन की खिड़की

### अध्याय 1 : एक ऐसा बच्चा, जिसे समझना आसान नहीं था




                         सन् 1955 की बात है।

                अमेरिका के सिएटल शहर में अक्टूबर की एक ठंडी सुबह थी। आसमान में बादल थे। सड़कों पर हल्की बारिश की नमी थी और घरों की खिड़कियों से पीली रोशनी बाहर झाँक रही थी।

                            इसी शहर के एक घर में एक बच्चे ने जन्म लिया।

                        उसका नाम रखा गया—विलियम हेनरी गेट्स तृतीय।

                                घर में सब उसे बिल कहकर बुलाते थे।

             उसके पिता विलियम एच. गेट्स एक वकील थे। उनका व्यक्तित्व गंभीर था। वे चाहते थे कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और जीवन में कुछ अच्छा करें। उसकी माँ मैरी मैक्सवेल गेट्स सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं। घर में अनुशासन था, सुविधाएँ थीं और बच्चों के भविष्य को लेकर बड़े सपने भी थे।

                   बिल के जीवन की शुरुआत किसी अभाव से नहीं हुई थी। उसके पास अच्छा घर था, पढ़ने के लिए किताबें थीं और एक ऐसा परिवार था जो उसकी शिक्षा को महत्व देता था।

                        लेकिन हर बच्चे की अपनी एक दुनिया होती है।

                                बिल की दुनिया थोड़ी अलग थी।

             वह अक्सर किसी किताब में खोया रहता। कभी किसी सवाल का जवाब ढूँढ़ता, तो कभी एक ही विषय को लेकर घंटों सोचता रहता।

             उसे केवल यह जानना पसंद नहीं था कि कोई चीज क्या है। वह यह भी जानना चाहता था कि वह बनी कैसे है और काम कैसे करती है।

                    कभी-कभी उसकी यह आदत घर के लोगों को परेशान कर देती।

                                माँ उसे आवाज लगातीं।

                                  "बिल, खाना तैयार है!"

                        अंदर से कोई जवाब नहीं आता।

                    कुछ देर बाद फिर आवाज लगती।

                        "बिल! सुन रहे हो?"

                                "हाँ माँ!"

                लेकिन वह अपनी किताब से नजर नहीं हटाता।

        मैरी उसके कमरे तक आतीं। उसे देखते हुए मुस्करातीं और कभी-कभी प्यार से डाँट भी देतीं।

                    "तुम्हारी किताबें कभी खत्म नहीं होतीं क्या?"

                            बिल मुस्करा देता।

            उसे शायद खुद भी नहीं मालूम था कि वह क्या खोज रहा है।

                    वह बस पढ़ना चाहता था।

                उम्र बढ़ने के साथ उसकी बुद्धिमत्ता सामने आने लगी, लेकिन उसके स्वभाव की कुछ बातें उसके लिए मुश्किलें भी पैदा करती थीं। वह जिद्दी था। बहस करने से पीछे नहीं हटता था। अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश करता था।

                    कभी-कभी उसके माता-पिता को लगता कि इस बच्चे को समझाना आसान नहीं होगा।

              एक दिन उसके पिता ने उससे कहा कि जीवन केवल किताबों और अपनी पसंद की चीजों में खोए रहने का नाम नहीं है। दुनिया में दूसरे लोगों के साथ रहना और उनकी बात समझना भी जरूरी है।

                            बिल ने शायद उस समय इस बात की गहराई नहीं समझी।

                                    उसकी उम्र ही कितनी थी?

                    उसे तो अभी दुनिया के बारे में बहुत कुछ जानना बाकी था।

                    और दुनिया भी उसके लिए कुछ अनोखा छिपाकर बैठी थी।

### अध्याय 2 : वह कमरा, जहाँ एक नई दुनिया खुली


                    समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था।

                      बिल अब तेरह साल का हो चुका था।

                 वह स्कूल जाने लगा था। उसका दाखिला लेकसाइड स्कूल में हुआ था। यह एक अच्छा स्कूल था, जहाँ पढ़ाई के साथ बच्चों को नई चीजें सीखने के अवसर भी मिलते थे।

                एक दिन स्कूल में उसे कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी।

वह एक कंप्यूटर था।

                आज के बच्चों के लिए कंप्यूटर कोई अनोखी चीज नहीं है। घरों में कंप्यूटर हैं, हाथों में मोबाइल हैं और दुनिया की तमाम जानकारियाँ एक छोटी-सी स्क्रीन पर उपलब्ध हैं।

                         लेकिन उस समय की बात अलग थी।

         कंप्यूटर बड़े होते थे। उन्हें चलाने के लिए विशेष व्यवस्था की जरूरत पड़ती थी। वे आम लोगों के घरों में नहीं होते थे।

                बिल पहली बार उसके सामने खड़ा हुआ तो देर तक उसे देखता रहा।

            उस मशीन में उसे ऐसा कुछ दिखाई दिया जो शायद बाकी बच्चों को नहीं दिख रहा था।

                    उसने सोचा—क्या मैं इस मशीन से अपनी बात मनवा सकता हूँ?

                        क्या मैं इसे कोई आदेश दूँ और यह वैसा ही काम करे?

                        उसके भीतर सवालों की एक नई दुनिया खुल गई थी।

            स्कूल में उसे कंप्यूटर इस्तेमाल करने का अवसर मिला। वह धीरे-धीरे उसे समझने लगा।

             उसे पहली बार लगा कि यहाँ उसकी कल्पनाएँ केवल कल्पनाएँ नहीं रहेंगी। वह उन्हें कुछ हद तक सच भी बना सकता है।

                उसने टिक-टैक-टो जैसा एक छोटा खेल बनाने का प्रोग्राम लिखा।

    जब मशीन ने उसके लिखे निर्देशों के अनुसार काम किया, तो उसके लिए वह एक अलग ही अनुभव था।

            सोचिए, एक तेरह साल का बच्चा अपनी बनाई हुई चीज को पहली बार काम करते देख रहा था।

                                उसके चेहरे पर कैसी खुशी रही होगी!

             शायद वह उस समय नहीं जानता था कि यही छोटी-सी खुशी आगे चलकर उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा जुनून बनने वाली है।

                        अब स्कूल की छुट्टियाँ भी उसे लंबी लगने लगी थीं।

            कभी वह कंप्यूटर के पास बैठा होता, कभी अपनी नोटबुक में कुछ लिख रहा होता।

          और इसी कंप्यूटर कक्ष में उसकी मुलाकात एक ऐसे लड़के से होने वाली थी, जो आगे चलकर उसकी जिंदगी का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

                    उसका नाम था—पॉल एलन।

### अध्याय 3 : एक दोस्त, जो उसके सपने को समझता था


                        पॉल एलन उम्र में बिल से बड़ा था।

            दोनों की मुलाकात कंप्यूटर के कारण हुई और धीरे-धीरे उनके बीच दोस्ती हो गई।

            दोस्ती अक्सर किसी बड़ी वजह से नहीं होती। कभी दो लोग एक जैसी बातें सोचते हैं, कभी उनकी पसंद मिलती है और कभी उन्हें लगता है कि सामने वाला उनकी बात समझ सकता है।

                        बिल और पॉल के बीच भी कुछ ऐसा ही था।

                                वे कंप्यूटर के बारे में घंटों बातें करते।

              कभी कोई नया विचार आता तो उसे आजमाने लगते। कभी कोई प्रोग्राम खराब हो जाता तो दोनों मिलकर उसे ठीक करने की कोशिश करते।

                                    कई बार असफलता मिलती।

                        कभी कंप्यूटर का समय खत्म हो जाता, कभी कोई तकनीकी समस्या सामने आ जाती।

               एक बार कंप्यूटर के उपयोग से जुड़ी समस्याओं के कारण स्कूल ने कुछ समय के लिए उन्हें कंप्यूटर इस्तेमाल करने से रोक दिया।

                            यह उनके लिए बहुत निराशाजनक था।

                                      लेकिन दोनों ने हार नहीं मानी।

             उन्होंने कंप्यूटर की समस्याएँ समझने और उन्हें ठीक करने में अपनी क्षमता दिखाई। बाद में उन्हें फिर से कंप्यूटर पर काम करने का अवसर मिला।

                            बिल और पॉल अब केवल दो दोस्त नहीं थे।

                    वे एक-दूसरे के विचारों को आगे बढ़ाने वाले साथी बन चुके थे।

            उनके पास कोई बड़ा कार्यालय नहीं था। कोई विशाल कंपनी नहीं थी। कोई बड़ी संपत्ति नहीं थी।

                   लेकिन उनके पास एक चीज थी, जो उस उम्र में शायद किसी भी धन से ज्यादा मूल्यवान थी।

                एक सपना

                            उन्हें लगता था कि आने वाले समय में कंप्यूटर की दुनिया बहुत बड़ी होने वाली है।

                                वे नहीं जानते थे कि उस दुनिया में उनका कितना बड़ा स्थान होगा।

                           उन्हें यह भी नहीं पता था कि भविष्य में उनके रास्ते कभी-कभी अलग हो जाएँगे।

                            फिलहाल उनके सामने एक ही चीज थी—कंप्यूटर और उसे समझने की बेचैनी।

           और फिर एक दिन जिंदगी ने उनके सामने ऐसा अवसर रखा, जिसे देखकर दोनों के लिए शांत बैठना मुश्किल हो गया।

                            वह एक पत्रिका थी।

                उसके एक पन्ने पर छपी एक तस्वीर ने उनके भविष्य का रास्ता बदल दिया।

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