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Showing posts from September 23, 2018

एक नया आग़ाज

हम तो उनसे अपने दिल का हाल बयां कर रहे थे उन्होंने कलम उठाई और कविता लिख डाली यूं कह दो कि दिल के जख़्मों को एक साथ उन्होंने रख दिया हम भूल जाना चाहते हैं सबकुछ उन्होंने हर जख़्म को हरा कर दिया सूना था लोग कहते है सपने टूटते है, दिल टूटते है, ख्वाब टूटते है आज तो रिश्ता भी टूट गया देखा है बहुत कुछ बिखरते मैंने सबकुछ समेटने कि चाह में कहीं सूना था मैंने सबके मन से चलो तो रिश्ते में मिठास रहती है सबके साथ चलके देखा तो आज मेरे ही जीवन में कड़वाहट भर गई है पिछे मुड़ के देखने कि चाह नहीं आगे बढ़ने कि हिम्मत नहीं मुझमें शायद बसंत आयी, फुल खिले और झड़ गए  कुछ नहीं है बाकी, खत्म होने के लिए सब कुछ खत्म हो गया है लेकिन मरने के बाद ही दूसरा जीवन मिलता है अब जीऊंगी अपनी इच्छाओं से बहुत बन लिए लकिर का फकीर अब लकिर भी मेरी और क़िस्मत भी मेरी जीवन भी मेरा और फैसला भी मेरा ये ज़ीदगी एक बार मिलती है बहुत जी लिया दूसरो की शर्तों पे अब जीना है अपने शर्तों पे अब नहीं रोकेगा कोई बंधन मुझे ना ही रिश्तों में उलझेंगे सपने मेरे बहुत रह लिया घूँघट में अब घूँघट उतार के जाना ह...

नारी का सम्मान

मैं खामोश खड़ी एक तूफान है मेरे अंदर जी चाहता है तोड़ दूं सारे बंधन को मैं तोड़ती नही बंधन तोड़ रहा है वह मुझे मैं ज़िंदा हूं मैं सच में ज़िंदा हूं या चलती है सिर्फ सांसे मेरी मैं क्या हूं इस दुनिया में और क्यों आयी हूं यह सवाल मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कभी झिलमीलाती थी मेरी आँखें कभी कीमत थी मेरे आँसूओं की सब कुछ छीन लिया इस यौवन ने मेरा मेरा मान, सम्मान मेरे होने का अस्तित्व अब बार-बार हर बातों में रोकना-टोकना कोई कीमत नहीं मेरे आँसूओं की मेरे मन में है इक सवाल उठता है बार-बार लड़की होने का मतलब क्या है सिर्फ भोग-भोग और कुछ नहीं तो क्यों दिए नाम दुनिया ने इतने सारे माँ-बहन-बेटी-देवी क्यूँ है ये समाज का दोहरा चलन कोई मुझे बता दे क्यूँ अस्तित्व खत्म करती है दुनिया मेरी क्यूँ भूल जाती है दुनिया कि मैं ही हूं सृष्टि की रचना करनेवाली मैं गंगा हूं दुनिया के पापों को धो रही हूं क्यूँ भूल जाती है दुनिया कि मैं सूनामी भी हूं जो मिटा सकती है सबकुछ मेरे अस्तित्व को ऐसे खत्म न करो नहीं तो खत्म हो जाएगी ये दुनिया।