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वह लड़का, जिसकी आँखों में एक दूसरी दुनिया थी

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 बचपन की खिड़की ### अध्याय 1 : एक ऐसा बच्चा, जिसे समझना आसान नहीं था                                 सन् 1955 की बात है।                     अमेरिका के सिएटल शहर में अक्टूबर की एक ठंडी सुबह थी। आसमान में बादल थे। सड़कों पर हल्की बारिश की नमी थी और घरों की खिड़कियों से पीली रोशनी बाहर झाँक रही थी।                                    इसी शहर के एक घर में एक बच्चे ने जन्म लिया।                               उसका नाम रखा गया—विलियम हेनरी गेट्स तृतीय।                                         घर में सब उसे बिल कहकर बुलाते थे। ...

आखिरी बीज

     * एक बीज की कीमत *                      गाँव के उस छोटे-से घर में एक पुराना मिट्टी का घड़ा रखा था। घड़े का मुँह कपड़े से बँधा रहता था और उसके भीतर कुछ मुट्ठी भर बीज सुरक्षित रखे थे।                                                   वे कोई साधारण बीज नहीं थे।                                              वे रामदीन के पिता की विरासत थे।                         रामदीन के पिता कहा करते थे, "बेटा, खेत कभी किसी का कर्जदार नहीं होता। हम उसे जितना प्रेम देते हैं, वह उससे कहीं अधिक लौटा देता है। बस, उसके साथ धोखा मत करना।"            ...

अधूरी नहीं थी ज़िंदगी

                             सुबह के पाँच बजे थे। शहर अभी नींद के आगोश में था, लेकिन सावित्री की आँखें खुल चुकी थीं।                    उसके लिए सुबह का अर्थ सूरज निकलना नहीं था। सुबह का अर्थ था चूल्हे की तैयारी, बच्चों के टिफिन, पति के कपड़े, पानी भरना और उन तमाम कामों की शुरुआत, जिनका कोई अंत नहीं था।                                   कभी-कभी वह सोचती थी कि आखिर उसकी अपनी सुबह कब होगी?                    जब वह छोटी थी, तब उसके भी कुछ सपने थे। वह किताबें पढ़ना चाहती थी, दूर-दूर तक घूमना चाहती थी और कुछ ऐसा लिखना चाहती थी जिसे पढ़कर लोग उसे याद रखें।                  लेकिन वक्त ने उसके सपनों को मारा नहीं था। बस उन्हें घर के किसी पुराने संदूक में बं...

अंतिम प्रश्न

                              रात के लगभग दो बज रहे थे। शहर की अधिकांश बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, लेकिन आरव के कमरे में कंप्यूटर की नीली रोशनी अब भी जाग रही थी।                            वह पिछले छह महीनों से एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली पर काम कर रहा था। उसका नाम उसने 'अनंत' रखा था।                          अनंत केवल सवालों के जवाब नहीं देता था। वह कविताएँ लिखता था, चित्र बनाता था, बीमारियों के लक्षण समझता था, मौसम का अनुमान लगाता था और कुछ ही क्षणों में उन समस्याओं का हल निकाल देता था जिन पर इंसान वर्षों लगा देता था।                                              आरव को अपनी रचना पर गर्व था।      ...

प्रकृति का मौन

                     उस दिन जंगल में कोई आवाज़ नहीं थी।                                            न पत्तों पर हवा की थाप थी, न नदी की कलकल में कोई गीत, न पक्षियों के कलरव में सुबह का उल्लास। ऐसा नहीं था कि जंगल उजड़ गया था या नदी सूख गई थी। सब कुछ वहीं था, जहाँ सदियों से था। बस, प्रकृति ने जैसे अपनी आवाज़ मनुष्य तक पहुँचाना बंद कर दिया था।                                                                                                 हिमालय की एक ऊंची चोटी पर बैठा बुढ़ा पहाड़ दूर तक पहले संसार को देख रहा था। उसके चहरे प...

प्रकृति की हँसी

                             उस रात पहाड़ों पर चाँद कुछ अधिक देर तक ठहरा रहा। जंगल की पत्तियाँ हवा के साथ सरसराती हुई न जाने किस बात पर मुस्करा रही थीं। नदी के पानी में चाँद का प्रतिबिंब बार-बार टूटता और फिर जुड़ जाता। ऐसा लगता था, मानो प्रकृति के समूचे अस्तित्व में कोई गुप्त बातचीत चल रही हो।                          सदियों से मौन खड़ा एक विशाल पहाड़ उस रात कुछ अधिक ही गंभीर था। उसके सामने बहती नदी ने अपनी चंचल धारा को थोड़ा धीमा किया और पूछा, “क्या सोच रहे हो, मित्र? आज तुम्हारी चुप्पी कुछ अलग है।”                              पहाड़ ने अपनी बर्फ से ढकी चोटियों को आकाश की ओर उठाया और धीरे से कहा, “मनुष्य के बारे में सोच रहा हूँ।”                             ...