बरगद के पेड़ का अंत

                           गाँव के उस पुराने रास्ते पर एक विशाल वृक्ष खड़ा था। उसकी जड़ें धरती की छाती में दूर तक फैली थीं और शाखाएँ आकाश को छूने की आकांक्षा में सदियों से उठी हुई थीं। न जाने कितनी ऋतुएँ आईं और चली गईं, कितने लोगों ने उसके नीचे विश्राम किया, कितने प्रेमियों ने अपने मन की बातें उससे छिपाकर कहीं और कितने अकेले मनुष्य उसकी छाया में बैठकर अपने आँसू बहा गए।

                            वृक्ष ने सबको देखा था।

                  उसने किसी से उसका नाम नहीं पूछा, किसी की जाति नहीं जानी और न ही किसी के सुख-दुःख का मूल्य आँका। उसके लिए सब समान थे। जो थका हुआ आया, उसे छाया मिली। जो भूखा आया, उसे फल मिले। जो पक्षी अपना घर खो बैठा, उसे उसकी शाखाओं पर आश्रय मिला।

                          फिर भी मनुष्य अक्सर स्वयं को इस संसार का सबसे समझदार जीव कहता था।

                            वृक्ष को मनुष्य की यह बात समझ नहीं आती थी।

                    वह सोचता था कि यदि समझदारी का अर्थ अपने सुख के लिए दूसरे का जीवन छीन लेना है, तो फिर अज्ञान अधिक सुंदर है।

                 वृक्ष के जीवन में एक छोटा-सा पौधा भी था, जो उसकी जड़ों के निकट उगा था। वह पौधा हर सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ अपनी पत्तियाँ खोल देता और रात होते ही चुपचाप स्थिर हो जाता।

                एक दिन पौधे ने वृक्ष से पूछा, “बाबा, यह जीवन आखिर है क्या? हम जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं, फिर एक दिन सूखकर मिट्टी में मिल जाते हैं। यदि अंत में मिट ही जाना है, तो इस जीवन का अर्थ क्या हुआ?” 

        वृक्ष की पत्तियाँ हवा के साथ हिलीं। उनकी सरसराहट में जैसे कोई पुराना अनुभव बोल उठा।

                         “तुम्हें किसने बताया कि मिट्टी में मिल जाना अंत है?” 

                                    पौधा चकित हुआ। 

                वृक्ष ने कहा, “जिस मिट्टी से तुमने जीवन पाया, उसी में लौट जाना क्या अपने अस्तित्व को खो देना है? देखो, मेरी सूखी पत्तियाँ जब धरती पर गिरती हैं, तो वे मिट्टी का हिस्सा बन जाती हैं। वही मिट्टी किसी दूसरे पौधे को पोषण देती है। मेरे जीवन का एक अंश किसी दूसरे जीवन की शुरुआत बन जाता है। फिर बताओ, मृत्यु कहाँ समाप्त हुई और जीवन कहाँ आरंभ हुआ?”

                                पौधा देर तक मौन रहा। 

            उसने पहली बार अपनी मृत्यु के बारे में सोचते हुए भय के स्थान पर एक विचित्र शांति अनुभव की।

            कुछ दिनों बाद एक चिड़िया उस वृक्ष पर आकर बैठी। उसके पंख अस्त-व्यस्त थे और आँखों में थकान थी। वह दूर किसी जंगल से आई थी, जहाँ मनुष्यों ने पेड़ों को काटकर घर और सड़कें बना दी थीं।

         “मेरा घर छिन गया,” चिड़िया ने कहा। “जिस डाल पर मैंने अपना संसार बनाया था, वह अब वहाँ नहीं है। मेरे अंडे, मेरा घोंसला, मेरे बच्चों की पहली चहचहाहट—सब मिट्टी में दब गए।” 

                                        वृक्ष ने उसे अपनी एक सुरक्षित शाखा पर जगह दे दी।

             चिड़िया ने पूछा, “तुम्हें क्रोध नहीं आता? तुम्हारी भी तो शाखाएँ काटी जाती हैं। तुम्हारी छाल पर घाव किए जाते हैं। तुम्हारे फल तोड़ लिए जाते हैं। फिर भी तुम सबको देते क्यों रहते हो?” 

                वृक्ष ने उत्तर दिया, “देना मेरा स्वभाव है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मेरे घाव नहीं होते। मैं भी जीवन चाहता हूँ। मैं भी आकाश की ओर फैलना चाहता हूँ। मुझे भी वर्षा अच्छी लगती है और तेज आँधियों से भय होता है। किंतु अपने दुःख के कारण यदि मैं तुम्हें आश्रय देना छोड़ दूँ, तो मेरा दुःख किसी दूसरे का दुःख कम कैसे करेगा?”                                                                                                                                                                                                                चिड़िया ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

              शायद उसे पहली बार समझ आया कि प्रेम का अर्थ केवल किसी को अपना बना लेना नहीं होता। कभी-कभी प्रेम किसी को उसके भय, उसकी थकान और उसके टूटे हुए संसार सहित स्वीकार कर लेना भी होता है। 

   वसंत आया। वृक्ष पर नई पत्तियाँ उगने लगीं। पुराने पत्ते झर रहे थे और नई कोंपलें जीवन का उत्सव मना रही थीं।   

          लेकिन उसी समय वृक्ष की एक शाखा पर रहने वाली दो छोटी बेलों के बीच संघर्ष आरंभ हो गया। दोनों सूर्य का अधिक प्रकाश चाहती थीं। दोनों चाहती थीं कि वृक्ष की सबसे ऊँची शाखा पर उनका अधिकार हो।

             एक बेल दूसरी को दबाने लगी। उसने उसकी पत्तियों को ढक लिया, उसकी बढ़ने की जगह छीन ली।

                                    धीरे-धीरे दोनों का विकास रुक गया। 

                     वृक्ष ने उनसे पूछा, “तुम दोनों एक ही धरती से जन्मी हो। तुम्हें जल मिलता है, हवा मिलती है, सूर्य का प्रकाश मिलता है। फिर एक-दूसरे को पीछे धकेलकर तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो?” 

                    एक बेल ने उत्तर दिया, “मैं उससे अधिक बड़ी होना चाहती हूँ।”

                                                वृक्ष ने पूछा, “क्यों?” 

                     “क्योंकि यदि वह मुझसे बड़ी हुई, तो मैं छोटी रह जाऊँगी।” 

              वृक्ष कुछ देर शांत रहा। फिर बोला, “तुम्हारा बढ़ना तुम्हारे भीतर की संभावना है, किसी दूसरे के छोटा होने की शर्त नहीं। तुमने अपनी ऊँचाई को दूसरे की पराजय से क्यों बाँध लिया?” 

बेल के पास कोई उत्तर नहीं था।

             मनुष्य भी तो ऐसा ही करता है। वह अपनी प्रसन्नता को दूसरे की प्रसन्नता से, अपनी सफलता को दूसरे की असफलता से और अपने मूल्य को दूसरे से आगे निकल जाने से जोड़ देता है। वह भूल जाता है कि किसी और के खिलने से उसका अपना फूल मुरझा नहीं जाता।                                                                                                                            प्रकृति में प्रतिस्पर्धा भी है, संघर्ष भी है और जीवन बचाने की जद्दोजहद भी। किंतु हर संघर्ष          ईर्ष्या नहीं होता। हर जीव अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करता है; मनुष्य कभी-कभी दूसरे का अस्तित्व मिटाकर अपने अस्तित्व को बड़ा सिद्ध करना चाहता है।

                                            यही अंतर शायद उसे समझना था। 

                                            वर्ष बीतते गए।

                वह छोटा पौधा अब वृक्ष बन चुका था। उसने भी अपनी शाखाओं पर पक्षियों को आश्रय दिया, राहगीरों को छाया दी और धरती पर अपने पत्ते बिखेरे। 

            एक दिन उसने अपने बूढ़े साथी से पूछा, “बाबा, क्या तुम्हें कभी अकेलापन नहीं सताता? इतने जीव तुम्हारे पास आते हैं, फिर चले जाते हैं। कोई सदैव तुम्हारे साथ नहीं रहता।”

                                    वृद्ध वृक्ष की कुछ शाखाएँ अब सूखने लगी थीं।

                उसने उत्तर दिया, “अकेलापन केवल किसी के न होने का नाम नहीं है। कभी-कभी चारों ओर भीड़ होती है, फिर भी मनुष्य अकेला होता है। और कभी कोई एकांत में खड़ा होकर भी संसार से जुड़ा होता है।” 

                            “तो फिर अकेलेपन से मुक्ति कैसे मिलती है?” 

                “शायद स्वयं को समझने से। जब तक तुम अपने अस्तित्व का अर्थ दूसरों की उपस्थिति में खोजते रहोगे, उनके चले जाने पर स्वयं को अधूरा पाओगे। लेकिन यदि तुम यह समझ लो कि तुम्हारा होना भी अपने आप में एक अर्थ रखता है, तब किसी का साथ तुम्हारे जीवन को सुंदर तो बनाएगा, पर तुम्हारे अस्तित्व की एकमात्र शर्त नहीं रहेगा।” 

                                    पौधे ने अपने चारों ओर देखा। 

               उसकी जड़ों के पास चींटियाँ चल रही थीं। पत्तियों के बीच एक तितली बैठी थी। दूर घास में कोई छोटा जीव भोजन खोज रहा था। हवा में बीज उड़ रहे थे, जिनसे आने वाले समय में नए पौधे जन्म लेने वाले थे।

                                        वह अकेला कहाँ था? 

                        वह तो जीवन की एक विशाल शृंखला का हिस्सा था। 

                    फिर एक दिन मनुष्य वहाँ आया।उसके हाथ में कुल्हाड़ी थी। 

                उसने वृक्ष को देखा और उसकी लकड़ी का मूल्य आँकने लगा। उसे वहाँ छाया नहीं दिखी, पक्षियों के घर नहीं दिखे, मिट्टी को थामे जड़ें नहीं दिखीं। उसे केवल लकड़ी दिखाई दी—ऐसी लकड़ी जिसे काटकर बेचा जा सकता था, जिससे कोई वस्तु बनाई जा सकती थी। 

                                कुल्हाड़ी का पहला प्रहार हुआ। 

                    वृक्ष की छाल पर एक गहरा घाव उभर आया।

                    उसके भीतर से रस बह निकला। शाखाओं पर बैठे पक्षी घबराकर उड़ गए। पत्तियाँ काँप उठीं। धरती में रहने वाले छोटे जीव अपने ठिकानों से बाहर निकल आए।

                                वृक्ष ने मनुष्य से कुछ नहीं कहा। 

                   शायद वह जानता था कि जिस मनुष्य ने अपने भीतर के मौन को सुनना छोड़ दिया हो, उसे किसी दूसरे की आवाज़ सुनाई नहीं देती। 

                                कुल्हड़ी का दूसरा प्रहार हुआ। 

                                        फिर तीसरा।

                        वृक्ष की शाखाओं में बसे संसार का अंत निकट था। 

             लेकिन उसी क्षण एक छोटी-सी कोंपल उसकी जड़ के पास से बाहर निकली। उसे न कुल्हाड़ी का ज्ञान था, न मनुष्य की लालसा का। उसे केवल इतना मालूम था कि मिट्टी में नमी है, हवा में जीवन है और सूर्य की दिशा में बढ़ना उसके स्वभाव का हिस्सा है। 

                            वह कोंपल धीरे-धीरे मिट्टी से बाहर आने लगी।

                            मनुष्य ने उसे देखा तक नहीं।

                    कुछ वर्षों बाद उस स्थान पर एक सड़क बन चुकी थी। पुराने वृक्ष की जगह अब पत्थर और धूल थी। चिड़ियों का पुराना रास्ता बदल गया था। गर्मियों में धरती पहले से अधिक तपने लगी थी और वर्षा का पानी वहाँ ठहरने के बजाय तेजी से बह जाता था।

                        मनुष्य ने विकास का एक नया अध्याय लिख लिया था।

                    लेकिन उस सड़क के किनारे, पत्थरों के बीच, वही छोटी कोंपल अब एक नन्हा पौधा बन चुकी थी।

                        उसके पास न कोई शिकायत थी, न कोई प्रतिशोध।

                        वह बस बढ़ रहा था।

            उसकी जड़ों को मिट्टी की तलाश थी, पत्तियों को प्रकाश की और जीवन को अपने स्वाभाविक विस्तार की। 

                   एक सुबह एक बच्चा वहाँ से गुजरा। उसने पौधे को देखा और उसके पास बैठ गया। उसने अपनी छोटी हथेलियों से उसके आसपास की मिट्टी ठीक की और पास की बोतल में बचा थोड़ा-सा पानी उसकी जड़ों में डाल दिया।

               फिर उसने अपनी माँ से पूछा, “माँ, पेड़ हमारे लिए इतने सारे काम करते हैं, तो हम इन्हें काटते क्यों हैं?” 

                                    माँ के पास तुरंत कोई उत्तर नहीं था।

                        वह अपने बच्चे को देखती रही। शायद उस प्रश्न का उत्तर उसके भीतर भी कहीं खो गया था।

                                हवा चली। 

                         पौधे की कोमल पत्तियाँ हिलीं।  

                  और उस क्षण ऐसा लगा, मानो प्रकृति मनुष्य से कोई प्रतिज्ञा नहीं माँग रही हो। वह केवल चाहती हो कि मनुष्य अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश में उस संसार का अस्तित्व न मिटा दे, जिसका वह स्वयं एक हिस्सा है।

             क्योंकि प्रकृति को मनुष्य की आवश्यकता नहीं हो सकती, लेकिन मनुष्य को प्रकृति की आवश्यकता है।

              जीवन का चक्र किसी एक जीव के लिए नहीं रुकता। जन्म मृत्यु को जन्म देता है, मृत्यु नए जीवन के लिए स्थान बनाती है, और हर अंत अपने भीतर किसी आरंभ की संभावना रखता है।

                                    प्रकृति अपने नियमों में पूर्ण है।

                अपूर्णता शायद वहाँ जन्म लेती है, जहाँ मनुष्य स्वयं को उस पूर्णता से अलग समझने लगता है।

            उसने पेड़ों को काटकर अपनी आवश्यकताएँ तो पूरी कर लीं, पर यह भूल गया कि उसकी आवश्यकताओं की भी एक सीमा है और प्रकृति की सहनशीलता की भी।

                                    पौधा हवा में झूमता रहा।

                 उसे नहीं मालूम था कि वह कभी विशाल वृक्ष बन पाएगा या नहीं। उसे यह भी नहीं मालूम था कि कोई फिर उसे काट देगा। 

             वह केवल आज की धूप को स्वीकार कर रहा था, धरती से अपना पोषण ले रहा था और अपने भीतर मौजूद जीवन को जी रहा था।

                शायद जीवन का सबसे गहरा अर्थ भी यही था—अपने होने को समझना, दूसरे के होने का सम्मान करना और उस चक्र को चलने देना, जिसका आरंभ हमसे पहले हुआ था और जिसका अंत हमारे बाद भी नहीं होगा। 

           प्रकृति को बचाना केवल पेड़ों को बचाना नहीं है। यह उस संसार को बचाना है, जिसमें जीवन अपने हर रूप में जीने का अधिकार रखता है।

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