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Showing posts from November 11, 2018

अपने अंदर का घूटन जो रिश्ते को तार-तार कर दे

           तान्या सुमन से – सुमन इन दिनों तुम दिखाई नहीं दे रहे थे? कहीं गए थे क्या? सुमन – नहीं यार कहीं नहीं। बस यूं ही थोड़ा बीमार था, इसलिए नहीं आ रहा था। ओ, तो कैसे हो अब? हां ठीक हूं, लेकिन क्या कहूं? ठीक हूं, क्या कहूं? मतलब क्या है तुम्हारा? ठीक नहीं लग रहा है? सुमन सब कुछ ठीक होते हुए चीजें खराब हो जाती हैं। यही जिंदगी का दस्तूर है तान्या। मैं तुम्हें क्या कहूं? तान्या थोड़ा आश्चर्य से क्या बात करते हो? मैं ठीक से समझ नहीं पा रही हूं। सब कुछ ठीक है फिर चीजें कैसे खराब हो जाती है? यह तो एक अजीब-सा द्वंवाद है। तुम्हें क्या लगता है? सुमन – अरे यार मैं तुम्हें क्या बताऊं? मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि चीजें क्यों ठीक है या सब गड़बड़ है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं, इसलिए इस बात को तुम्हें भी समझा नहीं सकता। तान्या सुमन कि बात बीच में ही काटते हुए – क्यों तुम इतनी उलझन में क्यों हो? जो बात है साफ-साफ कह सकते हो, आखिर मैं तुम्हारी दोस्त हूं। सुमन – हां तुम दोस्त हो इसलिए यह बातें नहीं समझ सकती और शायद मैं तुम्हें इतना खुलकर भी नहीं बता सकता। मैं नहीं...

खुद पर यकीन

         वह उदास खड़ी कुछ देर तक अपने बारे में सोचते रहती है। वह सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए पर मुझे कुछ हासिल ना हुआ। आज इन दीवारों के बीच खड़ी होकर क्या पाया है मैंने कुछ खास नहीं शायद कुछ भी नहीं। इस छोटे से घर जिसमें वह अकेली पड़ी हुई रहती है और खुद को कोसते रहती है। दूर कहीं बहुत दूर शायद ओझल होते हुए आंखों से उसके सपने देख रही थी फिर वह को कोसती हुई आकर बिस्तर पर लेट जाती है और सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए लेकिन उसका परिणाम कभी कुछ सही ना निकल सका। जितने लोगों के साथ मैंने काम किया या जितने लोगों के लिए मैंने बहुत कुछ किया आज उन लोगों में से कोई एक आदमी भी मेरे साथ आज खड़ा नजर नहीं आता और हर आदमी मुझे कंपीटीटर ही समझता है। मैं हताश बेसहारा इन दीवारों में अपना सर रगड़ रही हूं। तभी वह दुःखी होकर सोचती है - क्या मिला मुझे क्या मैं चाहती थी कुछ भी तो नहीं हुआ वैसा जैसा वह चाहती थी तभी उसके दिमाग में कुछ ख्याल ऐसे आते हैं कि वह अपनी डायरी उठा कर देखने लगती है।            डायरी के पन्ने पलटते-पलटते उसकी ...