प्रकृति का अधूरा पन्ना

                           गाँव के किनारे एक पुराना बरगद का पेड़ था। उसकी जड़ें धरती को इस तरह थामे हुए थीं, मानो वह सदियों से उसे टूटने से बचा रहा हो। उसकी शाखाओं पर न जाने कितनी पीढ़ियों के पक्षियों ने अपने घर बनाए थे। उसकी छाया में चरवाहे विश्राम करते, बच्चे खेलते और दोपहर की धूप से बचने के लिए राहगीर कुछ देर बैठ जाया करते थे।

                         उसी गाँव में पंद्रह वर्ष का एक लड़का रहता था—आरव। उसे पेड़-पौधों से विशेष लगाव तो नहीं था, लेकिन वह अक्सर उस बरगद के नीचे बैठकर अपनी किताबें पढ़ा करता था। उसे लगता था कि पेड़ बस एक ही काम करते हैं—खड़े रहते हैं और छाया देते हैं।

                         एक दिन गाँव में खबर आई कि वहाँ एक बड़ा कारखाना बनने वाला है। गाँव के कई लोग खुश थे। उन्हें लगता था कि कारखाना बनेगा तो रोजगार मिलेगा, सड़कें बनेंगी और गाँव शहर जैसा हो जाएगा। 

                                        आरव के पिता भी इस योजना से बहुत प्रसन्न थे।

                     “देखना बेटा,” उन्होंने एक शाम कहा, “कुछ ही महीनों में हमारा गाँव बदल जाएगा। अब हमें विकास के लिए शहरों की ओर नहीं देखना पड़ेगा।”

                     आरव ने उत्सुकता से पूछा, “तो क्या हमारा बरगद भी रहेगा?”    पिता हँस पड़े। “एक पेड़ के लिए इतना क्यों सोचते हो? उसकी जगह दस नए पौधे लगा देंगे।” 

                     आरव ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे लगा कि पिता की बात सही है। आखिर एक पेड़ की जगह दूसरा पेड़ लगाया जा सकता है। इसमें गलत क्या था?

                     अगले कुछ दिनों में गाँव की तस्वीर बदलने लगी। खेतों के एक हिस्से को समतल किया जाने लगा। छोटे पौधे उखाड़ दिए गए। झाड़ियों को काटकर रास्ता बनाया गया और फिर एक सुबह मजदूर बरगद के पेड़ के पास भी पहुँच गए।

                     पेड़ काटे जाने से एक दिन पहले आरव वहाँ बैठा था। तभी उसकी मुलाकात गाँव के बूढ़े माली, दीनानाथ, से हुई। दीनानाथ वर्षों से उस पेड़ की देखभाल करते आए थे।

           आरव ने पूछा, “बाबा, आप उदास क्यों हैं? पिताजी कहते हैं कि इस पेड़ की जगह हम नए पौधे लगा देंगे।”

         दीनानाथ ने पेड़ की ओर देखा। उसकी एक शाखा पर चिड़िया अपने घोंसले में बच्चों को दाना खिला रही थी।

                 “बेटा, पौधा लगाना आसान है, लेकिन क्या तुम उसके साथ बीते हुए वर्षों को भी लगा सकते हो?” 

                                    आरव उनकी ओर देखने लगा। 

                दीनानाथ ने आगे कहा, “यह पेड़ सिर्फ लकड़ी या छाया नहीं है। इसकी जड़ों ने मिट्टी को थामा है, इसकी शाखाओं ने पक्षियों को घर दिया है। इसकी छाया में कितने लोगों ने राहत पाई है। नया पौधा भी एक दिन पेड़ बनेगा, लेकिन आज यह जो कुछ कर रहा है, वह कल तक नहीं कर पाएगा।”

            आरव ने पहली बार उस बरगद को ध्यान से देखा। उसकी खुरदरी छाल पर समय की अनगिनत रेखाएँ थीं। उसकी शाखाओं में हवा के साथ हिलती पत्तियाँ थीं और जड़ों के बीच छोटी-छोटी घास उगी हुई थी।

                                 अगली सुबह पेड़ काट दिया गया।

                आरी की आवाज के बीच पक्षियों का एक झुंड आसमान में उड़ गया। कुछ देर तक वे आसपास के पेड़ों पर मंडराते रहे, फिर दूर चले गए। आरव उस समय स्कूल में था। जब वह लौटा, तो बरगद की जगह लकड़ियों का ढेर पड़ा था।

                        उस दिन उसे पहली बार अपना गाँव कुछ अजनबी-सा लगा।

                  समय बीतता गया।

                कारखाने की इमारत खड़ी हो गई। सड़क चौड़ी हो गई और गाँव के बाहर बड़े-बड़े वाहन आने लगे। लोग व्यस्त हो गए। आरव भी अपनी पढ़ाई में लग गया।

                            लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलाव ऐसे हुए, जिन पर किसी का ध्यान नहीं गया।

                 गर्मियों में तालाब का पानी पहले से जल्दी सूखने लगा। बरसात में गाँव की कच्ची सड़क के किनारे की मिट्टी बहने लगी। जिन खेतों में कभी छोटी-छोटी चिड़ियाँ दिखाई देती थीं, वहाँ अब उनका आना कम हो गया था। दोपहर में गलियों की गर्मी इतनी बढ़ जाती कि बच्चे बाहर खेलने से कतराने लगे।

                एक दिन आरव की छोटी बहन, मीरा, स्कूल से लौटी तो उसके हाथ में एक सूखा हुआ पौधा था।

             “भैया, यह हमारे स्कूल के आँगन में लगा था। मैडम कह रही थीं कि इसे बचा लो। लेकिन मैंने जितना पानी डाला, यह फिर भी सूख गया।”

                                आरव ने पौधे को देखा। उसकी मिट्टी बहुत सख्त हो गई थी।

             वह उसे लेकर दीनानाथ बाबा के पास पहुँचा। बाबा अब पहले की तरह बगीचे में कम काम कर पाते थे, लेकिन उन्होंने पौधे को देखते ही मिट्टी को हाथ में लिया।

                                “पानी तो दिया है,” आरव ने कहा, “फिर यह बचा क्यों नहीं?” 

                 बाबा ने मिट्टी को धीरे-धीरे अपनी उँगलियों से झाड़ते हुए कहा, “कभी-कभी हम केवल वही देखते हैं जो सामने होता है। पौधे को पानी चाहिए, लेकिन उसे अच्छी मिट्टी, हवा, धूप और जड़ों के फैलने की जगह भी चाहिए। प्रकृति में कोई चीज अकेली नहीं रहती, बेटा। हर चीज किसी न किसी से जुड़ी होती है।”

                                आरव चुप हो गया।

                उसे बरगद याद आया। वह सोचने लगा कि उस पेड़ के जाने के बाद केवल एक पेड़ कम नहीं हुआ था। उसके साथ कितने घोंसले, कितनी छायाएँ और कितने छोटे-छोटे जीवन भी अपनी जगह से हट गए थे।

              उस शाम वह अपनी बहन के साथ तालाब तक गया। रास्ते में उसने एक चींटी को मिट्टी के छोटे-से टीले पर अनाज का दाना खींचते देखा। पास ही एक मकड़ी अपना जाला बुन रही थी। तालाब के किनारे घास के बीच एक मेंढक बैठा था।

                    आरव कुछ देर उन्हें देखता रहा। 

                उसे लगा कि इन छोटे-छोटे जीवों को न गाँव के विकास की चिंता थी, न किसी से आगे निकलने की। वे बस अपने जीवन के स्वाभाविक क्रम में लगे हुए थे। चींटी अपना भोजन जुटा रही थी, मकड़ी अपना जाल बुन रही थी और मेंढक पानी के किनारे अपने संसार में था। उनके जीवन में संघर्ष था, लेकिन वह संघर्ष उनके अस्तित्व का हिस्सा था; किसी दूसरे के पूरे संसार पर अधिकार करने की योजना नहीं।

                            तभी पीछे से मीरा की आवाज आई, “भैया, तुम क्या देख रहे हो?” 

                                    आरव ने मुस्कराकर कहा, “जीवन।” 

                                    “लेकिन यहाँ तो कुछ भी नहीं हो रहा!”

                        आरव ने उसकी ओर देखा। “तुम्हें नहीं दिख रहा, इसका मतलब यह नहीं कि कुछ हो नहीं रहा।” 

                    उस दिन लौटते हुए उसने पहली बार महसूस किया कि दुनिया केवल मनुष्य के लिए बनी कोई खाली जगह नहीं है, जिस पर वह अपनी इच्छानुसार सब कुछ बना सकता है। यहाँ पहले से असंख्य जीवन मौजूद हैं, और हर जीवन का अपना एक संसार है।

                 कुछ महीनों बाद गाँव में भारी बारिश हुई। कारखाने की ओर जाने वाली नई सड़क के पास मिट्टी बहने लगी। कई जगह पानी भर गया। गाँव के कुछ घरों में भी पानी घुस आया। लोग परेशान थे। सड़क के किनारे जहाँ पहले पेड़ और झाड़ियाँ थीं, वहाँ अब मिट्टी को रोकने वाला प्राकृतिक आवरण बहुत कम बचा था।

                 आरव और उसके पिता भी पानी निकालने में लोगों की मदद कर रहे थे। काम करते-करते पिता ने थकी हुई आवाज में कहा, “पहले इतनी बारिश में हमारे यहाँ पानी इस तरह नहीं भरता था।” 

                            आरव ने उनकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।

                 उसे नहीं लगता था कि प्रकृति किसी से बदला ले रही है। बारिश तो अपने समय पर आई थी। पानी तो हमेशा की तरह नीचे की ओर बहा था। फर्क शायद यह था कि मनुष्य ने अपने रास्ते में बहुत कुछ बदल दिया था, पर यह नहीं सोचा था कि उन बदलावों के बाद पानी जाएगा कहाँ।

             अगले दिन आरव अपने पिता को लेकर दीनानाथ बाबा के पास गया। उसने उनसे गाँव के पुराने पेड़ों और तालाब के बारे में पूछा। बाबा ने उन्हें बताया कि किस जगह कभी पीपल था, कहाँ बरसाती पानी ठहरता था और किस रास्ते से होकर तालाब तक पहुँचता था।

                                        पिता ध्यान से सुनते रहे।

                   कुछ देर बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “हमने सोचा था कि हम प्रकृति को बदलकर अपना जीवन बेहतर बना लेंगे। शायद हमने यह सोचा ही नहीं कि वह पहले से हमारे जीवन को सँभाल रही थी।”

        दीनानाथ बाबा ने कोई उपदेश नहीं दिया। उन्होंने बस आँगन में रखे एक छोटे गमले की ओर इशारा किया।

     “यह आम का पौधा है,” उन्होंने कहा। “इसे मैंने पिछले साल लगाया था। इसे फल देने में अभी कई वर्ष लगेंगे।”

                                पिता ने पौधे को देखा। “और तब तक इसकी देखभाल करनी होगी।”

             “हाँ,” बाबा मुस्कराए, “देखभाल करनी होगी। केवल लगा देने से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता।” 

              उसके बाद गाँव में सब कुछ एक दिन में नहीं बदला। कारखाना बंद नहीं हुआ, सड़कें वापस कच्ची नहीं हुईं और काटा गया बरगद भी लौटकर नहीं आया। लेकिन कुछ लोगों ने तालाब के किनारों पर स्थानीय पेड़ लगाने शुरू किए। स्कूल में बच्चों ने पौधे लगाए और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी बाँटी। आरव और मीरा ने अपने घर के पीछे एक छोटा-सा बगीचा बनाया।

          आरव अब भी उस बरगद को याद करता था। कभी-कभी उसे लगता कि काश, उस समय उसने भी अपने पिता से कुछ सवाल पूछे होते। फिर वह सोचता कि शायद सवाल पूछने का समय अब भी बीता नहीं है।

                                 एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा— 

             “मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझने लगा है, जबकि वह भी उसी जीवन-चक्र का एक हिस्सा है। पेड़ अपने लिए छाया नहीं बनाते, नदियाँ अपना पानी केवल अपने लिए नहीं बहातीं और मिट्टी बीजों को इसलिए नहीं सँभालती कि उनसे कोई पुरस्कार मिलेगा। वे बस अपने स्वभाव के अनुसार जीवन को आगे बढ़ाती हैं।

              लेकिन मनुष्य अपनी सुविधा के लिए जब इस क्रम को तोड़ता है, तो वह भूल जाता है कि वह जिस संसार को बदल रहा है, उसी संसार के सहारे उसका अपना जीवन भी चलता है।

               शायद प्रकृति को बचाने का अर्थ उसे अपने अनुकूल बनाना नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व के लिए उतनी जगह छोड़ देना है, जितनी जगह हमें अपने लिए चाहिए।”

            डायरी बंद करके आरव खिड़की के पास आ गया। बाहर बारिश के बाद की मिट्टी से एक छोटी-सी कोंपल निकल रही थी।

                            वह उसे कुछ देर देखता रहा।

                उस नन्ही कोंपल को यह नहीं मालूम था कि मनुष्य ने अपनी दुनिया में क्या-क्या बदल दिया है। उसे न किसी से शिकायत थी, न किसी से अपेक्षा। वह बस मिट्टी से बाहर निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ रही थी।

                                    आरव को लगा कि जीवन शायद हमेशा इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा।

                 प्रश्न केवल इतना है कि मनुष्य उस जीवन के साथ चलना सीखेगा, या अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को हटाते-हटाते एक दिन यह भूल जाएगा कि उसका अपना रास्ता भी उसी धरती से होकर गुजरता है।                                  

Comments

Popular posts from this blog

खुद में संपूर्ण

मैं और मेरा प्यारा रिश्ता

No Definition of love