वन की दृष्टि

                        एक विशाल वन था, जहाँ ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, छोटी-छोटी झाड़ियाँ, औषधीय पौधे और रंग-बिरंगे फूल अपनी-अपनी दुनिया में प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। बाहर से देखने पर वह वन जितना सुंदर दिखाई देता था, भीतर से उतना ही विचित्र था। वहाँ प्रकृति की विविधता तो थी, किंतु उस विविधता को स्वीकार करने वाला हृदय नहीं था।

                  वन के मध्य एक विशाल बरगद का वृक्ष खड़ा था। उसकी जटाएँ धरती को छूती थीं, शाखाएँ दूर-दूर तक फैली थीं और उसकी छाया में अनेक छोटे पौधे पनपते थे। उसे अपनी विशालता पर बहुत अभिमान था। 

                  वह प्रायः छोटे पौधों से कहता, “देखो, मेरा विस्तार कितना विशाल है! मेरी छाया में कितने पौधे आश्रय पाते हैं। इस वन में मेरे समान महत्त्वपूर्ण भला कौन हो सकता है?”

                  पास ही पपीते का एक छोटा-सा वृक्ष था। वह अभी युवा था और उस पर कुछ फल भी लगने लगे थे। बरगद की बात सुनकर वह मन ही मन मुस्कराता।

             “विशाल होने मात्र से कोई महान नहीं हो जाता,” पपीता सोचता, “देखो, मेरे फल कितने उपयोगी हैं। मेरे बढ़ने और फल देने में भी अधिक समय नहीं लगता। मैं तो अपने छोटे-से जीवन में ही सबको कुछ न कुछ दे देता हूँ।” 

              पपीते को अपनी शीघ्र सफलता पर गर्व था। वह बरगद की धीमी गति और उसके विशाल होने में लगे लंबे समय को व्यर्थ समझता था।

                उसी वन में एक सागवान का वृक्ष भी था। उसका तना सीधा, मोटा और मजबूत था। वह बरगद की तरह फैला हुआ नहीं था, न ही पपीते की तरह शीघ्र फल देता था। उसकी वृद्धि धीमी थी, किंतु उसकी लकड़ी अत्यंत टिकाऊ और बहुमूल्य मानी जाती थी।

                पपीता उसे देखकर कहता, “तुम्हें इतना बड़ा होने में कितने वर्ष लग जाएँगे! मैं तो तब तक न जाने कितने फल दे चुका होऊँगा। तुम्हारे जीवन में ऐसा क्या है, जो तुम्हें इतना समय चाहिए?”

सागवान मौन रहता। उसे अपनी गति का ज्ञान था, पर वह जानता था कि प्रत्येक जीवन की अपनी एक लय होती है।

              वन में एक गुलाब की झाड़ी भी थी। उसके फूल अपनी सुंदरता और सुगंध के लिए प्रसिद्ध थे। वह खिलती तो आसपास का वातावरण मनमोहक हो उठता। उसे अपनी सुंदरता पर गर्व था।

                वह तुलसी के छोटे-से पौधे को देखकर कहती, “तुम्हारे पास न मेरे जैसे सुंदर फूल हैं, न मेरी जैसी मनमोहक सुगंध। तुम्हें देखकर कौन ठहरना चाहेगा?”

                 तुलसी शांत स्वर में उत्तर देती, “बहन, सुंदरता का अपना आनंद है और उपयोगिता का अपना महत्त्व। मुझे अपनी प्रकृति से संतोष है।”

                गुलाब को उसका उत्तर अच्छा नहीं लगता। वह सोचती कि तुलसी अपने साधारण रूप को महत्त्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए ऐसी बातें करती है।

                इसी वन में कुछ ऐसे पौधे भी थे, जिन पर कभी आकर्षक फूल नहीं खिलते थे। कुछ की सुगंध रात के अँधेरे में फैलती, तो कुछ की जड़ों, पत्तियों और छाल में औषधीय गुण थे। वे चुपचाप अपनी प्रकृति के अनुसार बढ़ते रहते। उन्हें न किसी की प्रशंसा की अपेक्षा थी, न किसी से प्रतिस्पर्धा। 

                    लेकिन वन के दूसरे वृक्ष उन्हें प्रायः साधारण समझकर अनदेखा कर देते।

                    धीरे-धीरे वन में यह धारणा बन गई कि जिसका आकार बड़ा है, जो जल्दी फल देता है अथवा जो देखने में सुंदर है, वही अधिक महत्त्वपूर्ण है।

                    फिर एक वर्ष ऐसा आया, जब ऋतुओं का संतुलन बिगड़ गया। वर्षा समय पर नहीं हुई। धरती सूखने लगी, नदियों का जल घटने लगा और हवा में नमी के स्थान पर गर्मी भर गई।

                                वन के पौधे व्याकुल होने लगे।

                    पपीते के फल समय से पहले मुरझाने लगे। उसकी पत्तियाँ झुक गईं। वह पहली बार समझ रहा था कि शीघ्र फल देना ही पर्याप्त नहीं, उन फलों को जन्म देने वाले जीवन को बचाए रखना भी आवश्यक है।

                    गुलाब की पंखुड़ियाँ अपनी चमक खोने लगीं। उसकी सुगंध मंद पड़ गई। वह अपनी सुंदरता को बचाने के लिए छटपटाने लगी, किंतु सुंदरता उसे सूखे से बचा नहीं सकी।

                    बरगद अब भी विशाल था, लेकिन उसकी जड़ों तक पहुँचने वाला जल कम होता जा रहा था। उसकी कुछ शाखाएँ सूखने लगीं। उसे पहली बार अपने आकार के साथ जुड़ी असहायता का अनुभव हुआ।

                   सागवान भी कठिनाई सह रहा था। किंतु उसकी गहरी जड़ें मिट्टी के भीतर नमी की खोज में दूर तक फैली थीं। उसके आसपास की मिट्टी को उसकी जड़ों ने मजबूती से थाम रखा था।

                    तभी एक दिन आकाश में काले बादल घिर आए। तेज हवाएँ चलने लगीं। सूखी धरती पर वर्षा की पहली बूँदें पड़ीं, और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश होने लगी।

                    वन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। परंतु लंबे सूखे के बाद धरती की ऊपरी परत कठोर हो चुकी थी। पानी तेजी से ढलानों की ओर बहने लगा। देखते ही देखते वन के निचले भाग में मिट्टी खिसकने लगी।

                    छोटे पौधों की जड़ें उखड़ने लगीं। गुलाब की झाड़ी बहती मिट्टी में झुक गई। पपीते का कोमल तना तेज हवा के सामने काँपने लगा।

                    बरगद ने अपनी विशाल शाखाओं से हवा का दबाव महसूस किया। उसकी एक पुरानी शाखा टूटकर नीचे गिर पड़ी। उसे पहली बार अनुभव हुआ कि विशालता अपने साथ उत्तरदायित्व भी लाती है, और केवल विशाल होना संकट से सुरक्षा की गारंटी नहीं है।

                 उसी ढलान पर सागवान की जड़ों ने मिट्टी को मजबूती से थाम रखा था। उसके आसपास की जमीन अपेक्षाकृत स्थिर बनी रही। वर्षा का जल वहाँ से गुजरते हुए भी सारी मिट्टी को बहाकर नहीं ले जा सका।

                 उसके निकट उगे छोटे-छोटे घास के पौधों ने भी अपनी महीन जड़ों से मिट्टी को बाँध रखा था। वे आकार में नगण्य थे, लेकिन उनकी असंख्य जड़ें मिलकर धरती को सँभाल रही थीं। 

                  बरगद ने पहली बार उन छोटे पौधों की ओर ध्यान से देखा। उसे लगा, जिनकी उपस्थिति को वह कभी महत्त्वहीन समझता था, वे भी इस वन को बचाने में अपना योगदान दे रहे हैं।

                 वर्षा कुछ समय बाद थम गई। वन की धरती पर नई नमी लौट आई। लेकिन संकट ने सबके भीतर कुछ बदल दिया था।

                 पपीते ने देखा कि उसके गिरे हुए फलों से निकले बीज मिट्टी में दब गए थे। उनमें से कुछ बीजों को अंकुरित होने के लिए अनुकूल स्थान मिला, लेकिन कुछ तेज बहाव में दूर चले गए। उसे समझ आया कि जीवन की शुरुआत जल्दी कर लेना और जीवन को स्थायित्व देना दो अलग बातें हैं।

                 गुलाब ने तुलसी की ओर देखा। वर्षा के बाद तुलसी की पत्तियाँ फिर से ताजगी से भर उठी थीं। उसकी उपस्थिति ने गुलाब को अपने रूप से परे देखने के लिए प्रेरित किया।

             “तुम्हारे पास मेरे जैसे फूल नहीं हैं,” गुलाब ने धीरे से कहा, “फिर भी तुम्हारा महत्त्व कम नहीं है। तुम्हारे पत्तों में औषधीय गुण हैं। तुम्हें पूजनीय भी माना जाता है। शायद मैं अब तक केवल अपनी सुंदरता को ही अपना परिचय समझती रही।” 

                     तुलसी ने उत्तर दिया, “तुम्हारी सुंदरता भी प्रकृति का उपहार है। किसी एक गुण का होना दूसरे गुण को छोटा नहीं कर देता।” 

                     बरगद ने सागवान से कहा, “मैंने अपने विस्तार को ही अपनी महानता समझ लिया था। आज मैंने जाना कि धरती को थामने वाली जड़ें और समय के साथ मजबूत होने वाला तना भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। तुमने मुझे धैर्य का अर्थ समझाया है।” 

                      सागवान ने शांत भाव से कहा, “हम दोनों की प्रकृति अलग है, बरगद। तुम अपनी छाया से जीवन को सहारा देते हो, और मैं अपनी मजबूती से मिट्टी को थामने में योगदान देता हूँ। यदि हम एक-दूसरे की जगह लेने की चेष्टा करें, तो अपनी-अपनी विशेषता खो बैठेंगे।” 

                     कुछ दूरी पर खड़ा एक छोटा-सा औषधीय पौधा यह सब सुन रहा था। वह अब तक सोचता था कि उसकी उपस्थिति का किसी को ज्ञान नहीं। उस दिन पहली बार उसे लगा कि किसी का महत्त्व दूसरों की दृष्टि से निर्धारित नहीं होता।

                    वन में फिर से हरियाली लौटने लगी। पपीते पर नए फल आने लगे। गुलाब फिर खिल उठा। बरगद ने अपनी सूखी शाखाओं के बीच नई कोंपलों को जन्म दिया। सागौन अपनी धीमी गति से बढ़ता रहा, और छोटे पौधे मिट्टी को थामे जीवन का आधार बनाते रहे।

अब वन में कोई किसी को केवल उसके आकार, सुंदरता अथवा शीघ्र मिलने वाले परिणामों से नहीं आँकता था। 

                       वे समझ चुके थे कि प्रकृति में कोई भी जीवन केवल अपने लिए नहीं जीता। किसी का योगदान तुरंत दिखाई देता है, किसी का धीरे-धीरे प्रकट होता है, और किसी का महत्त्व तब समझ में आता है, जब उसके अभाव से जीवन का संतुलन बिगड़ने लगता है। 

           उस दिन के बाद वन में एक नई शांति थी। यह शांति किसी एक के श्रेष्ठ होने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने से जन्मी थी।

                क्योंकि प्रकृति में महानता का अर्थ सबसे बड़ा, सबसे सुंदर अथवा सबसे उपयोगी दिखाई देना नहीं है। महानता उस संतुलन में है, जिसमें प्रत्येक जीवन अपनी प्रकृति के अनुसार योगदान देता है और दूसरों के अस्तित्व के लिए स्थान छोड़ता है।

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