अधूरी नहीं थी ज़िंदगी

                        सुबह के पाँच बजे थे। शहर अभी नींद के आगोश में था, लेकिन सावित्री की आँखें खुल चुकी थीं।

                उसके लिए सुबह का अर्थ सूरज निकलना नहीं था। सुबह का अर्थ था चूल्हे की तैयारी, बच्चों के टिफिन, पति के कपड़े, पानी भरना और उन तमाम कामों की शुरुआत, जिनका कोई अंत नहीं था।

                            कभी-कभी वह सोचती थी कि आखिर उसकी अपनी सुबह कब होगी?

                जब वह छोटी थी, तब उसके भी कुछ सपने थे। वह किताबें पढ़ना चाहती थी, दूर-दूर तक घूमना चाहती थी और कुछ ऐसा लिखना चाहती थी जिसे पढ़कर लोग उसे याद रखें।

              लेकिन वक्त ने उसके सपनों को मारा नहीं था। बस उन्हें घर के किसी पुराने संदूक में बंद कर दिया था।

                 शादी हुई। जिम्मेदारियाँ आईं। बच्चे हुए। घर बदला, शहर बदला, परिस्थितियाँ बदलीं। मगर सावित्री के हिस्से में जो नहीं बदला, वह था खुद को हर दिन थोड़ा-थोड़ा भूलते जाना।

                            एक दिन उसका बेटा स्कूल से लौटा और बोला, "माँ, बड़े होकर मैं डॉक्टर बनूँगा।"

                                                सावित्री मुस्कराई।

                                         "बहुत अच्छा बेटा! खूब पढ़ना।"

                             बेटे ने अचानक पूछा, "माँ, तुम बड़ी होकर क्या बनोगी?"

                                            वह कुछ क्षण उसे देखती रही।

            सवाल बहुत छोटा था, लेकिन उसके भीतर जैसे किसी ने वर्षों से बंद पड़े कमरे का दरवाजा खोल दिया था।

                                उसने हँसकर कहा, "मैं तो माँ बन गई हूँ।"

                                    बेटा संतुष्ट होकर खेलने चला गया।

                                    लेकिन सावित्री की हँसी वहीं रह गई।

                   उस रात जब सब सो गए, उसने संदूक खोला। पुराने कागजों के बीच उसे अपनी लिखी कुछ कहानियाँ मिलीं। पीले पड़ चुके पन्नों पर उसकी लिखावट अब भी वैसी ही थी, जैसी कभी उसके सपने हुआ करते थे।

                            उसने एक पन्ना उठाया और पढ़ना शुरू किया।

                        शब्दों के बीच उसे एक ऐसी लड़की मिली, जो कभी बहुत खुश थी। जो छोटी-छोटी बातों पर हँसती थी। जिसे बारिश में भीगना पसंद था। जो दुनिया को बदलने के सपने देखती थी।

                                        सावित्री की आँखें भर आईं।

                      उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह अपनी जिंदगी से नाराज नहीं थी। उसे अपने बच्चों से शिकायत नहीं थी, अपने परिवार से भी कोई शिकायत नहीं थी।

                    उसे बस इस बात का दुख था कि इस पूरी जिंदगी में उसने अपने लिए कोई जगह नहीं बचाई थी।

                अगली सुबह उसने घर के सारे काम वैसे ही किए। बच्चों को स्कूल भेजा, पति को नाश्ता दिया और फिर एक कप चाय लेकर खिड़की के पास बैठ गई।

                                कई वर्षों बाद उसने अपने लिए आधा घंटा निकाला।

                                 उसने एक खाली पन्ना लिया और लिखा—

                  "जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होती, जैसी हम चाहते हैं। कभी-कभी वह हमें ऐसे रास्तों पर ले जाती है, जहाँ हमारे सपने पीछे छूट जाते हैं। लेकिन सपनों का पीछे छूट जाना उनका मर जाना नहीं होता। कुछ सपने बस हमारी प्रतीक्षा करते हैं।"

                                                उसने कलम रख दी।

                                        बाहर सूरज निकल आया था।

 उस दिन भी उसकी जिंदगी में कोई चमत्कार नहीं हुआ था। न परिस्थितियाँ बदली थीं, न जिम्मेदारियाँ कम हुई थीं।

                                   लेकिन एक छोटी-सी बात बदल गई थी।

                      अब सावित्री अपनी जिंदगी में सिर्फ दूसरों की जरूरतों को नहीं देखती थी। उसने अपने लिए भी एक छोटी-सी जगह बना ली थी।

                   और शायद जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष यही है—दुनिया के लिए जीते-जीते खुद को खोने न देना।

                    क्योंकि जिंदगी अधूरी तब नहीं होती जब हमारे सपने पूरे नहीं होते, जिंदगी अधूरी तब होती है जब हम सपने देखना ही छोड़ देते हैं।

                     मुझे लगता है इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है: क्या एक इंसान अपने परिवार से प्रेम करते हुए भी अपने लिए जीने का अधिकार रखता है?

                                यही प्रश्न पाठक को कहानी खत्म होने के बाद भी सोचने पर मजबूर कर सकता है।

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