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Showing posts from September 30, 2018

बचपन बचाओ

        सूर्य अपने पूरे सबाब पर था। दोपहर कि चिलचिलाती धूप सतीश को कहां रोक पा रही थी। वह तो दोस्तों के साथ दौड़-धूप और बचपन कि मस्ती में मग्न था। तभी अचानक मनू सतीश से – यार भूख लग गई है। मैं घर जा हूं। सतीश को लगता है वह ठिक कह रहा, उसे भी भूख लग गई है। वह दौड़ता हुआ अपने घर कि ओर उन सर्द गलियों में टूटे-फूटे नालो से बचते आगे बढ़ता है। उसके मन मे उमंग है। वह पूरे रास्ते सोचते रहता है एक और दांव मैं मनू को हरा दूंगा। सतीश का पैर अचानक रूक जाता है। उसके कानों में जोर-जोर से चीखें सूनाई देती है। तू मर क्यों नहीं जाता? जब तुम्हारी हड्डियों में ताकत ही नहीं थी कि तू अपनी लुगाई और बच्चों को न खिला सको तो क्यों शादी की थी? सतीश सहम जाता है। उसे समझते देर नही लगता कि मां-बापू झगड़ा कर रहे है। वह सोचने लगता है क्यों न वापस जाकर खेलने लगूं? तभी उसका पिता उसके मां के सर का बाल पकड़ के खिंचता हुआ उस झोपड़ी से बाहर निकलता है और वह अपनी पत्नी से कहता है तू घून है घून जो मुझे धिरे-धिरे खा रही है। जा कुलटा मर जाकर तू डायन है डायन। पहले मेरी मां को खा गई और अब मुझे खाने पर पड़ी है...

रंगीन दुनिया

दुनिया में जितने रंग है हर रंग उसके पास है प्यार के जितने शब्द है हर शब्द में वो खास है हर दिन एक नया रंग उसका सामने आता है उसके हर रंग कि मैं दिवानी हूँ हर रोज़ मुझे उससे प्यार हो जाता है और हर रोज़ मेरा उससे तलाक हो जाता है वो मुझे रेत सा लगता है मैं उसपे खुद को लिखती़ और खुद को मिटाती हूँ वो हर रोज़ मुझको ज़िने कि एक नयी पहचान देता है वह उगता हुआ सुरज है और मैं उसकी पहचान हूँ रूके जीवन में गति दी है उसने ये है मेरी सच्चाई वह सागर है और मैं हूँ उसकी गहराई मैं तोड़ती हूँ हर बंधन को वो जोड़ता है एक नया रिश्ता मुझसे ये आधी-अधुरी ज़िंदगी कब तक हम ज़ियेंगे कब मिलेगा वो किनारा जहाँ हमारा आशियाँ होगा|