स्वयं की तलाश
राजा मानसिंह अपने राजमहल के विशाल गलियारों में टहल रहे थे। महल की दीवारों पर सजी भव्य चित्रकारी, दरबार की ओर जाने वाले लंबे रास्ते और वर्षों से उनके जीवन का हिस्सा रहे परिचित दृश्य आज उन्हें कुछ अलग ही प्रतीत हो रहे थे। उनके कदम आगे बढ़ रहे थे, किंतु मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। वे सोच रहे थे—आखिर उन्होंने अपने जीवन में किया ही क्या है? उन्होंने अपना जीवन किस प्रकार जिया है? इतने वर्षों में उन्होंने क्या पाया और क्या खोया? प्रश्न अनेक थे, किंतु किसी का उत्तर उनके पास नहीं था। जब से उन्होंने अपने कर्तव्यों को समझना शुरू किया था, तभी से उनका जीवन जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा था। कभी राज्य की चिंता, कभी प्रजा के सुख-दुःख की जिम्मेदारी, कभी परिवार की आवश्यकताएँ और कभी भविष्य की योजनाएँ। जीवन का एक लंबा समय बीत चुका था, पर आज पहली बार उन्हे...