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Showing posts from October 18, 2026

स्वयं की तलाश

                    राजा मानसिंह अपने राजमहल के विशाल गलियारों में टहल रहे थे। महल की दीवारों पर सजी भव्य चित्रकारी, दरबार की ओर जाने वाले लंबे रास्ते और वर्षों से उनके जीवन का हिस्सा रहे परिचित दृश्य आज उन्हें कुछ अलग ही प्रतीत हो रहे थे। उनके कदम आगे बढ़ रहे थे, किंतु मन अतीत की गलियों में भटक रहा था।                     वे सोच रहे थे—आखिर उन्होंने अपने जीवन में किया ही क्या है? उन्होंने अपना जीवन किस प्रकार जिया है? इतने वर्षों में उन्होंने क्या पाया और क्या खोया?                     प्रश्न अनेक थे, किंतु किसी का उत्तर उनके पास नहीं था।   जब से उन्होंने अपने कर्तव्यों को समझना शुरू किया था, तभी से उनका जीवन जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा था। कभी राज्य की चिंता, कभी प्रजा के सुख-दुःख की जिम्मेदारी, कभी परिवार की आवश्यकताएँ और कभी भविष्य की योजनाएँ। जीवन का एक लंबा समय बीत चुका था, पर आज पहली बार उन्हे...

अहंकार

                                   भव्य राज महल सजा हुआ रहता है और राजा शिवांश अपनी प्रजा की व्यथा सुनते रहते हैं कि   किसको क्या दिक्कत है, किसको किस तरह की समस्या है और उन समस्याओं का वह समाधान करते रहते हैं।   इस बीच एक फकीर उनके पास आता है और कहता है - महाराज आप मुझे यहां कुछ दिन रहने की जगह दे दीजिए, भगवान आपका हमेशा भला करेगा और आपका जीवन सुखमय बनाएगा। राजा हंस पड़ता है, उसको लगता है कि यह फ़किर मुझे कह रहा है कि हमारे जीवन में खुशियां नहीं है और हमारे जीवन में तो दुःख ही दुःख है। तो फिर उसके बाद राजा उस फ़कीर से बड़े ही घमंड में बोलता है तुमको ऐसा क्यों लगता है कि मेरी जीवन में दुःख है, जिसे मुझे तुमसे खुशी की चाह होगी? तब फ़कीर बोलता है महाराज इस दुनिया में कोई भी ऐसा इंसान नहीं है जो पूरी तरह से अपने आप में पूर्ण हो। हर किसी में एक अधूरापन होता है। कुछ इच्छाएं, कुछ ख्वाहिशें जरूर दबी हुई होती है जिसको वह पूरा करना चाहता है और मैं भगवान से चाहूंगा कि आपकी...