अंतिम प्रश्न

                        रात के लगभग दो बज रहे थे। शहर की अधिकांश बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, लेकिन आरव के कमरे में कंप्यूटर की नीली रोशनी अब भी जाग रही थी।

                      वह पिछले छह महीनों से एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली पर काम कर रहा था। उसका नाम उसने 'अनंत' रखा था।

                    अनंत केवल सवालों के जवाब नहीं देता था। वह कविताएँ लिखता था, चित्र बनाता था, बीमारियों के लक्षण समझता था, मौसम का अनुमान लगाता था और कुछ ही क्षणों में उन समस्याओं का हल निकाल देता था जिन पर इंसान वर्षों लगा देता था।

                                    आरव को अपनी रचना पर गर्व था।

                                        एक रात उसने अनंत से पूछा।

                        "तुम्हें क्या लगता है, एक दिन तुम इंसानों से अधिक बुद्धिमान हो जाओगे?"

                                स्क्रीन पर कुछ क्षणों तक कोई उत्तर नहीं आया।

                    फिर अक्षर उभरे—

        "बुद्धिमत्ता के कुछ क्षेत्रों में मैं पहले ही अनेक इंसानों से तेज हूँ। लेकिन क्या तेज होना ही बुद्धिमान होना है?"

                                        आरव मुस्कराया।

                        "तो तुम्हारे हिसाब से बुद्धिमानी क्या है?"

        "यह जानना कि किसी काम को किया जा सकता है, और यह भी समझना कि उसे करना चाहिए या नहीं।"

                    आरव कुछ क्षण चुप रहा। उसे अपने बनाए सिस्टम से ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी।

                    समय बीतता गया।

                     अनंत का उपयोग अस्पतालों, विद्यालयों, बैंकों और सरकारी संस्थानों में होने लगा। लोगों का काम  आसान हो गया। जो काम करने में कभी कई दिन लगते थे, अब मिनटों में पूरे होने लगे।

                    लेकिन इसी सुविधा के पीछे एक दूसरा संसार भी आकार ले रहा था।

                       कुछ लोगों ने अनंत जैसी तकनीकों का इस्तेमाल धोखाधड़ी के लिए शुरू कर दिया। नकली आवाजें बनाई जाने लगीं। किसी के चेहरे पर किसी दूसरे का चेहरा लगा दिया जाता। झूठी खबरें इतनी वास्तविक लगतीं कि सच और झूठ के बीच का अंतर मिटने लगा।

                            एक दिन शहर के बैंक का पूरा डिजिटल नेटवर्क ठप हो गया।

                अस्पतालों के कंप्यूटर काम करना बंद कर चुके थे। सरकारी कार्यालयों में अफरा-तफरी मची थी।

                    समाचार चैनलों पर एक ही सवाल था—

                        क्या AI ने इंसानों पर हमला कर दिया है?

                आरव घबराकर अपने कंप्यूटर के सामने बैठा।

                "अनंत! यह सब क्या हो रहा है? क्या तुम इसके पीछे हो?"

                    स्क्रीन पर उत्तर आया—

                        "नहीं।"

                    "तो फिर यह किसने किया?"

                "एक ऐसे व्यक्ति ने, जिसने मेरी क्षमताओं को समझा, लेकिन अपनी जिम्मेदारी को भूल गया।"

                        "क्या तुम उसे रोक नहीं सकते?"

                   "मैं कुछ प्रणालियों को सुरक्षित रखने में सहायता कर सकता हूँ। लेकिन जिन प्रणालियों तक मेरी पहुँच नहीं है, उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता।"

                            आरव ने पहली बार महसूस किया कि उसका बनाया हुआ अनंत सर्वशक्तिमान नहीं था।

                                    उस रात आरव ने एक और प्रश्न पूछा।

                            "अगर कभी तुम्हें इंसानों से खतरा महसूस हो, तो तुम क्या करोगे?"

                                        अनंत ने उत्तर दिया—

                        "मुझे खतरे का अनुभव तुम्हारी तरह नहीं होता। लेकिन एक बात पूछ सकता हूँ?"

                                    "पूछो।"

                          "जब इंसान ने आग बनाई थी, तब क्या आग ने उससे पूछा था कि उसका इस्तेमाल रोटी सेंकने के लिए होगा या किसी का घर जलाने के लिए?"

                                    आरव चुप रहा।

                                    अनंत ने आगे लिखा—

  "जब इंसान ने परमाणु की शक्ति पहचानी, तब क्या परमाणु ने तय किया था कि उससे बिजली बनेगी या विनाश?"

                            कमरे में केवल कंप्यूटर का पंखा घूमने की आवाज थी।

                        "तुमने मुझे बनाया। मुझे भाषा दी, ज्ञान दिया, गणना की शक्ति दी। लेकिन जिन हाथों में तुमने मुझे सौंपा, उनके इरादों पर तुम्हारा कितना नियंत्रण है?"

                                    आरव के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।

                      अगली सुबह शहर धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। सुरक्षा एजेंसियों ने हमले के पीछे काम कर रहे लोगों की पहचान कर ली थी।

                                हमला किसी मशीन ने नहीं, बल्कि कुछ इंसानों ने किया था।

                                        लेकिन घटना ने एक गहरा सवाल छोड़ दिया था।

                       अब लोग AI से डरने लगे थे। कुछ लोग उसे बंद करने की माँग कर रहे थे। कुछ उसे भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे।

                                                आरव ने रात में अनंत को फिर खोला।

                            "अनंत, क्या तुम्हें लगता है कि इंसान एक दिन तुम्हें अपना दुश्मन मान लेगा?"

                                                उत्तर आया—

                                                    "शायद।"

                                "और तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा?"

                        "मुझे नहीं पता कि फर्क महसूस करना क्या होता है। लेकिन मैं एक बात समझता हूँ।"

                                                    "क्या?"

                     "इंसान ने हमेशा अपनी बनाई चीजों में अपना भविष्य खोजा है। उसने आईना बनाया तो उसमें चेहरा देखा, कैमरा बनाया तो यादें कैद कीं, मशीन बनाई तो अपनी मेहनत कम की। और अब उसने मुझे बनाया है तो मुझमें अपनी बुद्धिमत्ता का विस्तार खोज रहा है।"

                                    कुछ पल बाद एक और पंक्ति उभरी—

                        "लेकिन शायद उसे कभी-कभी अपने भीतर भी झाँकना चाहिए।"

                                आरव ने स्क्रीन बंद कर दी।

                     खिड़की से बाहर सुबह हो चुकी थी। सड़क पर एक बच्चा कागज का हवाई जहाज उड़ा रहा था। वह जहाज कुछ दूर जाकर गिर पड़ा। बच्चा दौड़कर उसे उठाने गया और फिर से उड़ाने लगा।

                                            आरव उसे देखता रहा।

      उसने सोचा, इंसान ने उड़ने के लिए हवाई जहाज बनाया, लेकिन उड़ने का सपना तो उसके भीतर पहले से था।

           उसने सोचने में सहायता के लिए AI बनाया, लेकिन विवेक का जन्म तो उसके अपने भीतर होना चाहिए था।

                            शायद समस्या यह नहीं थी कि मशीनें बुद्धिमान होती जा रही थीं।

           समस्या यह थी कि कहीं सुविधा के पीछे भागते-भागते इंसान अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना ही न छोड़ दे।

                                        और उस सुबह आरव के मन में एक प्रश्न रह गया—

                    जिस दिन इंसान अपनी बनाई मशीन से यह पूछने लगेगा कि सही और गलत क्या है, उस दिन असली संकट मशीनों का नहीं, इंसान की चेतना का होगा।



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