प्रकृति का मौन
उस दिन जंगल में कोई आवाज़ नहीं थी। न पत्तों पर हवा की थाप थी, न नदी की कलकल में कोई गीत, न पक्षियों के कलरव में सुबह का उल्लास। ऐसा नहीं था कि जंगल उजड़ गया था या नदी सूख गई थी। सब कुछ वहीं था, जहाँ सदियों से था। बस, प्रकृति ने जैसे अपनी आवाज़ मनुष्य तक पहुँचाना बंद कर दिया था। हिमालय की एक ऊंची चोटी पर बैठा बुढ़ा पहाड़ दूर तक पहले संसार को देख रहा था। उसके चहरे प...