आखिरी बीज

     *एक बीज की कीमत*

                 गाँव के उस छोटे-से घर में एक पुराना मिट्टी का घड़ा रखा था। घड़े का मुँह कपड़े से बँधा रहता था और उसके भीतर कुछ मुट्ठी भर बीज सुरक्षित रखे थे।

                                        वे कोई साधारण बीज नहीं थे।

                                    वे रामदीन के पिता की विरासत थे।

                   रामदीन के पिता कहा करते थे, "बेटा, खेत कभी किसी का कर्जदार नहीं होता। हम उसे जितना प्रेम देते हैं, वह उससे कहीं अधिक लौटा देता है। बस, उसके साथ धोखा मत करना।"

                  बचपन में रामदीन को पिता की ये बातें समझ नहीं आती थीं। उसे लगता था कि खेती तो बस मिट्टी में बीज डालने, पानी देने और फसल काटने का नाम है।

            लेकिन पिता जानते थे कि खेती केवल पेट भरने का काम नहीं, पीढ़ियों को जीवित रखने का एक तरीका है।

             समय बीता। पिता चले गए। उनके साथ बहुत कुछ चला गया, लेकिन वह मिट्टी का घड़ा आज भी घर के एक कोने में रखा था।

            रामदीन अब बूढ़ा हो चला था। उसके हाथों की लकीरों में खेतों की मेड़ें बसी थीं और पैरों की दरारों में सूखी धरती की कहानियाँ।

                                                    एक दिन गाँव में कुछ लोग आए।

             उनके हाथों में रंगीन थैले थे। कपड़े साफ थे, जूते चमकदार थे और बातों में भविष्य की चमक थी।

             उन्होंने किसानों को समझाया कि अब खेती बदलने वाली है। नए बीज आएँगे। कम समय में अधिक फसल होगी। कीटों से लड़ने की क्षमता होगी। दुनिया आगे बढ़ रही है और किसान को भी आगे बढ़ना चाहिए।

                        रामदीन का बेटा मोहन उनकी बातें सुनकर उत्साहित हो गया।

          "बाबा, अब पुरानी खेती से कुछ नहीं होगा। ये नए बीज देखिए। कंपनी कहती है, पैदावार बढ़ेगी।"

                   रामदीन ने थैले को हाथ में लिया। उस पर छपी तस्वीर में हरे-भरे खेत थे। तस्वीर इतनी सुंदर थी कि कुछ पल के लिए उसे लगा, जैसे धरती ने सचमुच कोई नया वस्त्र पहन लिया हो।

  उसने बस इतना पूछा, "बेटा, इन बीजों को बोने के बाद क्या हम अपनी अगली फसल के लिए बीज बचा सकेंगे?"

                                                मोहन हँस पड़ा।

                    "बाबा, आप भी न! अब जमाना बदल गया है। हर चीज बाजार से मिलेगी।"

                                            रामदीन चुप हो गया।

             उस वर्ष खेत में अच्छी फसल हुई। घर में खुशहाली आई। मोहन के चेहरे पर संतोष था। उसे लगा कि पिता की पुरानी बातें अब बीते समय की चीजें हैं।

                                        लेकिन अगला मौसम आया।

              बीज फिर खरीदने थे। खाद खरीदनी थी। दवाइयाँ खरीदनी थीं। खर्च बढ़ता गया। बाजार की कीमतें बदलती रहीं। मौसम कभी साथ देता, कभी नहीं।

          कुछ वर्षों बाद रामदीन ने देखा कि मोहन अब खेत में काम करने से पहले बाजार की ओर देखता है।

     पहले वह बादलों को देखकर बारिश का अनुमान लगाता था, अब मोबाइल पर मौसम का संदेश पढ़ता था।

        पहले वह मिट्टी को हाथ में लेकर उसकी नमी पहचानता था, अब बोतलों और पैकेटों के निर्देश पढ़ता था।

            विज्ञान ने उसे बहुत कुछ दिया था, लेकिन बाजार ने उसके जीवन में एक नई मजबूरी भी ला दी थी।

    एक शाम रामदीन अपने पुराने घड़े के पास बैठा था। उसने कपड़ा खोला और एक बीज हथेली पर रख लिया।

                                    उसका पोता पास आकर बैठ गया।

                                              "दादाजी, ये क्या है?"

                                                रामदीन मुस्कराया।

                                                    "ये बीज है बेटा।"

                                                "इसमें क्या होता है?"

                                           रामदीन ने उसे गौर से देखा।

             "इसमें खेत होता है, बारिश होती है, तुम्हारे दादा की मेहनत होती है, तुम्हारे पिता का बचपन होता है और तुम्हारे आने वाले कल की उम्मीद होती है।"

                                        बच्चा कुछ समझा, कुछ नहीं।

                उसने फिर पूछा, "दादाजी, क्या ये बीज भी किसी दुकान से खरीदना पड़ता है?"

                          रामदीन की आँखें कुछ पल के लिए स्थिर हो गईं।

                     उसने खिड़की से बाहर देखा। खेतों पर शाम उतर रही थी।

          "कभी नहीं बेटा। कभी-कभी बीज किसान के पास होता था और वह उसे अपने पड़ोसी को दे देता था। बदले में पैसे नहीं माँगता था। बस कहता था, फसल अच्छी हो तो अगले साल किसी और को दे देना।"

                                    "फिर अब ऐसा क्यों नहीं होता?"

                        रामदीन के पास इस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं था।

                 वह जानता था कि हर नया बीज बुरा नहीं होता। विज्ञान ने कई किसानों को नई उम्मीदें भी दी हैं। कीटों से लड़ने की नई तकनीकें आई हैं। पैदावार बढ़ाने के रास्ते खुले हैं।

                 लेकिन वह यह भी जानता था कि जब खेती का हर रास्ता किसी दूसरे की मुट्ठी में चला जाए, तो किसान के हाथों में केवल मिट्टी नहीं, मजबूरी भी रह जाती है।

                            उसी रात रामदीन ने अपने पोते को वह पुराना घड़ा दे दिया।

                                                "इसे संभालकर रखना।"

                                                "क्यों दादाजी?"

                 "क्योंकि एक दिन दुनिया तुम्हें बहुत सारी चीजें बेचेगी। उनमें से कुछ अच्छी होंगी, कुछ जरूरी होंगी और कुछ तुम्हें उन पर निर्भर बना देंगी। लेकिन इतना याद रखना, अपने भविष्य का सारा अधिकार कभी किसी एक के हाथ में मत देना।"

                                    कुछ दिनों बाद रामदीन नहीं रहा।

                 उसके जाने के बाद मोहन ने घर की सफाई की। पुराने घड़े को उठाया तो उसमें कुछ बीज बचे हुए थे।

                    उसने उन्हें फेंकने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन तभी उसका बेटा दौड़ता हुआ आया।

                            "पापा, दादाजी ने कहा था इन्हें संभालकर रखना।"

                                मोहन ने घड़े को वापस रख दिया।

                    अगली सुबह उसने खेत के एक छोटे-से हिस्से में वे बीज बो दिए।

                 वह नहीं जानता था कि उनसे कैसी फसल निकलेगी। न उसे किसी बड़ी पैदावार की उम्मीद थी, न किसी बाजार में बेचने का इरादा।

                            वह बस अपने पिता की एक बात को जीवित रखना चाहता था।

                            कुछ सप्ताह बाद मिट्टी से एक नन्हा अंकुर बाहर आया।

                                            मोहन देर तक उसे देखता रहा।

                    उसे लगा, जैसे उसके पिता की झुकी हुई पीठ फिर से खेत की मेड़ पर दिखाई दे रही हो।

                                            हवा चली। अंकुर थोड़ा-सा हिला।

                     और उस दिन मोहन को पहली बार समझ आया कि बीज केवल फसल पैदा नहीं करता, वह स्मृतियाँ भी बचाकर रखता है।

         "कहते हैं, दुनिया में सबसे महँगी चीज सोना नहीं, बल्कि वह अधिकार है जिसे खो देने के बाद मनुष्य अपनी ही जरूरतों के लिए दूसरों का मोहताज हो जाता है।"

                        बीज छोटा होता है, लेकिन उसके भीतर एक पूरी सभ्यता सोती है।

                            और सभ्यताएँ तब नहीं मरतीं जब उनके खेत सूख जाते हैं।

            वे तब मरने लगती हैं, जब आने वाली पीढ़ियाँ यह भूल जाती हैं कि बीज बचाकर क्यों रखे जाते थे।

Comments

Popular posts from this blog

खुद में संपूर्ण

मैं और मेरा प्यारा रिश्ता

No Definition of love