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Showing posts from November 25, 2018

आधुनिक युग में रिश्तों पर टेक्नोलॉजी का प्रभाव

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          स्नेहा और सूनील दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। स्नेहा – क्या कर रहे हो? कुछ नहीं, बस यूं ही कुछ काम कर रहा हूं।                स्नेहा - दिन-रात तो काम ही करते रहते हो, कभी मेरी तरफ़ भी तो देखा करो। सूनील – यार अगर काम नहीं करूंगा तो पैसे कहां से आएंगे और पैसे नहीं रहेंगे तो घर कैसे चलेगा? स्नेहा चिढ़ जाती है और चुपचाप रसोईघर में चली जाती है। रसोईघर का काम खत्म करके फिर से सूनील के पास – क्या हो रहा है? सूनील – एक बार तो बताया न काम कर रहा हूं। स्नेहा – मेरा काम तो खत्म हो गया और तुम्हारा कैसा काम है जो खत्म ही नहीं हो रहा है? सूनील स्नेहा को चिढ़ाते हुए – हां! तुम्हारा काम तो खत्म हो गया, पर तुम्हारे नखरें तो खत्म नहीं होते। उसे पूरा करने के लिए मुझे काम करना पड़ता है। Please जाओ और मुझे तंग मत करो। स्नेहा कुछ नहीं बोलती चुपचाप बिस्तर पर चली जाती है। स्नेहा एक बार फिर से सूनील को देखती है लेकिन उसकी आंखों में कोई प्यार नहीं रहता है। स्नेहा सूनील को देखकर भी न देखने का बहाना करते हुए अपनी आंखें बंद क...

आधुनिक युग में टूटते रिश्ते का सच

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              सनी और डिंपल दोनों आज़ाद ख्याल के थे और दोनों कि दोस्ती उससे भी ज़्यादा आज़ाद। दोनों एक दूसरे पर कभी शक नहीं करते थे। डिंपल कमाल की खूबसूरत थी। कॉलेज के सभी लड़के उस पर दिल दे बैठे थे। मगर डिंपल का दिल आया भी तो सनी पर और सिर्फ सनी पर। वह दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। सनी थोड़ा शर्मीला था मगर डिंपल मे हर वह चीज थी जो हर लड़का अपने पार्टनर में ढूंढता है भरोसा, खूबसूरती और समझदारी। एक दिन सनी डिंपल से – यह तुम्हारे सुनहरे बाल देख कर मुझे वह दिन याद आ जाता है जब मैं बालकनी में खड़ा था और सुनहरी-सी चादर आकाश में बिछी थी। डिंपल मुस्कुराते हुए – अच्छा! तुम मुझे सिर्फ आकाश में ही देखते हो। कभी कोई अच्छी तुलना तो कर लिया करो यार। सनी थोड़ा मुस्कुराते हुए – क्यों? यही उपमाएं तो कहानियों और कविताओं में दी जाती है तो लोग रूपक अलंकार और पता नहीं क्या-क्या कहते हैं और सभी लोग खुश होते हैं। डिंपल सनी को छेड़ते हुए – अच्छा! तो तुम मुझे काव्य के द्वारा मोहित करने की कोशिश कर रहे हो? सनी नहीं मैं बस यूं ही कह रहा था। डिंपल – तुम्हें क्या लगता है...

खुद से खुद की पहचान

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           सुनैना आज बहुत खुश है क्योंकि आज ही तो उसकी मौसी ने फोन करके उसकी मां से कहा कि सुनैना को मेरे पास भेज दो। सुनैना की खुशी का ठिकाना न था उसकी मां भी खुशी-खुशी अपनी बहन के घर उसे भेजना चाहती थी। उसका पति डरा सहमा-सा उसे बोलता है तुम्हें नहीं लगता उसे वहां भेजना ठीक नहीं होगा यहां रहती है तो स्कूल भी चली जाती है, वहां जाने के बाद यह भी छूट जाएगा। सुनैना की मां अपने पति पर चिल्लाते हुए - कौन से स्कूल की बात करते हो, खाने के तो यहां पैसे नहीं है स्कूल की बात करते हो। सरकारी स्कूल में पढ़ती है लड़की है घर के दो-चार काम सीख जाएगी तो इसे ही फायदा होगा। सरकारी स्कूल में पढ़-पढ़ कर तो कितने क्या-क्या बन गए हैं। मुझे नहीं लगता इसका कोई भविष्य भी है। वहां जाएगी दो काम करेगी तो भर पेट खाना भी तो खाएगी। खुश हो जाएगी तो कुछ दे भी देगी, तुमसे तो इसके लिए एक गहना भी नहीं बना। हुंह! मैं तो दिन-रात इसी चिंता में रहती हूं कि बेटी की शादी करनी है और तुम हो कि दिन-रात इसी चिंता में रहते हो कि कैसे मेरे कलेजे पर सांप लोट सके। सुनैना का पिता चुप हो जाता है क्योंकि उस...