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आधुनिक युग में रिश्तों पर टेक्नोलॉजी का प्रभाव

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          स्नेहा और सूनील दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। स्नेहा – क्या कर रहे हो? कुछ नहीं, बस यूं ही कुछ काम कर रहा हूं।                स्नेहा - दिन-रात तो काम ही करते रहते हो, कभी मेरी तरफ़ भी तो देखा करो। सूनील – यार अगर काम नहीं करूंगा तो पैसे कहां से आएंगे और पैसे नहीं रहेंगे तो घर कैसे चलेगा? स्नेहा चिढ़ जाती है और चुपचाप रसोईघर में चली जाती है। रसोईघर का काम खत्म करके फिर से सूनील के पास – क्या हो रहा है? सूनील – एक बार तो बताया न काम कर रहा हूं। स्नेहा – मेरा काम तो खत्म हो गया और तुम्हारा कैसा काम है जो खत्म ही नहीं हो रहा है? सूनील स्नेहा को चिढ़ाते हुए – हां! तुम्हारा काम तो खत्म हो गया, पर तुम्हारे नखरें तो खत्म नहीं होते। उसे पूरा करने के लिए मुझे काम करना पड़ता है। Please जाओ और मुझे तंग मत करो। स्नेहा कुछ नहीं बोलती चुपचाप बिस्तर पर चली जाती है। स्नेहा एक बार फिर से सूनील को देखती है लेकिन उसकी आंखों में कोई प्यार नहीं रहता है। स्नेहा सूनील को देखकर भी न देखने का बहाना करते हुए अपनी आंखें बंद क...

आधुनिक युग में टूटते रिश्ते का सच

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              सनी और डिंपल दोनों आज़ाद ख्याल के थे और दोनों कि दोस्ती उससे भी ज़्यादा आज़ाद। दोनों एक दूसरे पर कभी शक नहीं करते थे। डिंपल कमाल की खूबसूरत थी। कॉलेज के सभी लड़के उस पर दिल दे बैठे थे। मगर डिंपल का दिल आया भी तो सनी पर और सिर्फ सनी पर। वह दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। सनी थोड़ा शर्मीला था मगर डिंपल मे हर वह चीज थी जो हर लड़का अपने पार्टनर में ढूंढता है भरोसा, खूबसूरती और समझदारी। एक दिन सनी डिंपल से – यह तुम्हारे सुनहरे बाल देख कर मुझे वह दिन याद आ जाता है जब मैं बालकनी में खड़ा था और सुनहरी-सी चादर आकाश में बिछी थी। डिंपल मुस्कुराते हुए – अच्छा! तुम मुझे सिर्फ आकाश में ही देखते हो। कभी कोई अच्छी तुलना तो कर लिया करो यार। सनी थोड़ा मुस्कुराते हुए – क्यों? यही उपमाएं तो कहानियों और कविताओं में दी जाती है तो लोग रूपक अलंकार और पता नहीं क्या-क्या कहते हैं और सभी लोग खुश होते हैं। डिंपल सनी को छेड़ते हुए – अच्छा! तो तुम मुझे काव्य के द्वारा मोहित करने की कोशिश कर रहे हो? सनी नहीं मैं बस यूं ही कह रहा था। डिंपल – तुम्हें क्या लगता है...

खुद से खुद की पहचान

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           सुनैना आज बहुत खुश है क्योंकि आज ही तो उसकी मौसी ने फोन करके उसकी मां से कहा कि सुनैना को मेरे पास भेज दो। सुनैना की खुशी का ठिकाना न था उसकी मां भी खुशी-खुशी अपनी बहन के घर उसे भेजना चाहती थी। उसका पति डरा सहमा-सा उसे बोलता है तुम्हें नहीं लगता उसे वहां भेजना ठीक नहीं होगा यहां रहती है तो स्कूल भी चली जाती है, वहां जाने के बाद यह भी छूट जाएगा। सुनैना की मां अपने पति पर चिल्लाते हुए - कौन से स्कूल की बात करते हो, खाने के तो यहां पैसे नहीं है स्कूल की बात करते हो। सरकारी स्कूल में पढ़ती है लड़की है घर के दो-चार काम सीख जाएगी तो इसे ही फायदा होगा। सरकारी स्कूल में पढ़-पढ़ कर तो कितने क्या-क्या बन गए हैं। मुझे नहीं लगता इसका कोई भविष्य भी है। वहां जाएगी दो काम करेगी तो भर पेट खाना भी तो खाएगी। खुश हो जाएगी तो कुछ दे भी देगी, तुमसे तो इसके लिए एक गहना भी नहीं बना। हुंह! मैं तो दिन-रात इसी चिंता में रहती हूं कि बेटी की शादी करनी है और तुम हो कि दिन-रात इसी चिंता में रहते हो कि कैसे मेरे कलेजे पर सांप लोट सके। सुनैना का पिता चुप हो जाता है क्योंकि उस...

अपनी इच्छा शक्ति से बदल दो अपना भविष्य

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               समीरा सुबह-सुबह सनोज के लिए चाय बना रही थी। चाय कि प्याली सनोज के सामने रखते हुए – तुम्हें नहीं लगता हम लोगों को बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में डालना चाहिए? कब तक ले वह हिंदी मीडियम में पढ़ते रहेंगे? मुझे नहीं लगता इससे उनका कुछ भविष्य बनने वाला है। तभी सनोज समीरा को आंखें दिखाते हुए बोलता है – तुम्हें क्या लगता है मैं दिन रात घर में बैठा रहता हूं? बाहर जाता हूं, काम करता हूं। सौ खर्चें है।  उस पर से कॉन्वेंट का खर्चा, मुझे नहीं लगता मैं निकाल पाऊंगा। ये मुझसे अभी फिलहाल तो नहीं होनेवाला है। जैसे पढ़ रहा है पढ़ने दो, अभी छोटे ही तो है। धीरे-धीरे मैं कुछ जुगाड़ कर लूंगा तो उन्हें कान्वेंट में डाल दूंगा। तुम्हारी सुबह चाय के साथ यह बकवास मुझे पसंद नहीं है। तुम क्या चाहती हो? मैं एक दिन घर छोड़ कर चला जाऊंगा। तुम्हें क्या लगता है यह बच्चा मेरा नहीं है। तुम्ही उनकी मां हो? मैं उनका पिता नहीं हूं? जो रोज-रोज हर दिन मुझे यह ताने मारते रहती हो। कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा। अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो मुझे लगता है, सच में जिंदगी में ...

अपने अंदर का घूटन जो रिश्ते को तार-तार कर दे

           तान्या सुमन से – सुमन इन दिनों तुम दिखाई नहीं दे रहे थे? कहीं गए थे क्या? सुमन – नहीं यार कहीं नहीं। बस यूं ही थोड़ा बीमार था, इसलिए नहीं आ रहा था। ओ, तो कैसे हो अब? हां ठीक हूं, लेकिन क्या कहूं? ठीक हूं, क्या कहूं? मतलब क्या है तुम्हारा? ठीक नहीं लग रहा है? सुमन सब कुछ ठीक होते हुए चीजें खराब हो जाती हैं। यही जिंदगी का दस्तूर है तान्या। मैं तुम्हें क्या कहूं? तान्या थोड़ा आश्चर्य से क्या बात करते हो? मैं ठीक से समझ नहीं पा रही हूं। सब कुछ ठीक है फिर चीजें कैसे खराब हो जाती है? यह तो एक अजीब-सा द्वंवाद है। तुम्हें क्या लगता है? सुमन – अरे यार मैं तुम्हें क्या बताऊं? मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि चीजें क्यों ठीक है या सब गड़बड़ है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं, इसलिए इस बात को तुम्हें भी समझा नहीं सकता। तान्या सुमन कि बात बीच में ही काटते हुए – क्यों तुम इतनी उलझन में क्यों हो? जो बात है साफ-साफ कह सकते हो, आखिर मैं तुम्हारी दोस्त हूं। सुमन – हां तुम दोस्त हो इसलिए यह बातें नहीं समझ सकती और शायद मैं तुम्हें इतना खुलकर भी नहीं बता सकता। मैं नहीं...

खुद पर यकीन

         वह उदास खड़ी कुछ देर तक अपने बारे में सोचते रहती है। वह सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए पर मुझे कुछ हासिल ना हुआ। आज इन दीवारों के बीच खड़ी होकर क्या पाया है मैंने कुछ खास नहीं शायद कुछ भी नहीं। इस छोटे से घर जिसमें वह अकेली पड़ी हुई रहती है और खुद को कोसते रहती है। दूर कहीं बहुत दूर शायद ओझल होते हुए आंखों से उसके सपने देख रही थी फिर वह को कोसती हुई आकर बिस्तर पर लेट जाती है और सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए लेकिन उसका परिणाम कभी कुछ सही ना निकल सका। जितने लोगों के साथ मैंने काम किया या जितने लोगों के लिए मैंने बहुत कुछ किया आज उन लोगों में से कोई एक आदमी भी मेरे साथ आज खड़ा नजर नहीं आता और हर आदमी मुझे कंपीटीटर ही समझता है। मैं हताश बेसहारा इन दीवारों में अपना सर रगड़ रही हूं। तभी वह दुःखी होकर सोचती है - क्या मिला मुझे क्या मैं चाहती थी कुछ भी तो नहीं हुआ वैसा जैसा वह चाहती थी तभी उसके दिमाग में कुछ ख्याल ऐसे आते हैं कि वह अपनी डायरी उठा कर देखने लगती है।            डायरी के पन्ने पलटते-पलटते उसकी ...

दोस्ती में ज़हर

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         रूपा और अर्चना दो दोस्त रहती है। रूपा आगे पढ़ाई नहीं करना चाहती थी क्योंकि उसकी family उतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी। अर्चना आगे पढ़ना चाहती थी क्योंकि family चाहती थी कि वो आगे पढ़े। अर्चना सोचती थी कि अगर रूपा भी उसके साथ पढ़े तो बेहतर होगा नहीं तो उसे अकेले ही जाना पड़ेगा कॉलेज। इसलिए अर्चना ने रूपा      और उसके परिवार को काफी समझाया था आगे पढ़ाई करने के लिए। रूपा के पिताजी तो मान गए थे इस चीज़ के लिए लेकिन रुपा की मां तैयारी नहीं हो रही थी। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कह दिया था रूपा को – मैट्रिक कर ली हो शादी हो जाएगी। घर के काम का सीख लो यही आगे काम देगा, नहीं तो तेरी दुर्गति हो जाएगी। जब देखो पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! अरे! पढ़-लिख के कलेक्टर बनना है तुमको का। तुमको पढ़ाई करनी है तो कर लेकिन मेरे घर के काम में एक भी बाधा हुई तो मैं उसी दिन तुम्हारी किताबों को जला दूंगी।           रूपा इन सब बातों को सुनने कि अभ्यस्त थी इसीलिए उसे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन अर्चना को काफी बुरा लग रहा था। अर्चना को अजीब लग रहा ...