अपनी इच्छा शक्ति से बदल दो अपना भविष्य
समीरा सुबह-सुबह सनोज के लिए चाय बना रही थी। चाय कि प्याली सनोज के सामने रखते हुए – तुम्हें नहीं लगता हम लोगों को बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में डालना चाहिए? कब तक ले वह हिंदी मीडियम में पढ़ते रहेंगे? मुझे नहीं लगता इससे उनका कुछ भविष्य बनने वाला है। तभी सनोज समीरा को आंखें दिखाते हुए बोलता है – तुम्हें क्या लगता है मैं दिन रात घर में बैठा रहता हूं? बाहर जाता हूं, काम करता हूं। सौ खर्चें है। उस पर से कॉन्वेंट का खर्चा, मुझे नहीं लगता मैं निकाल पाऊंगा। ये मुझसे अभी फिलहाल तो नहीं होनेवाला है। जैसे पढ़ रहा है पढ़ने दो, अभी छोटे ही तो है। धीरे-धीरे मैं कुछ जुगाड़ कर लूंगा तो उन्हें कान्वेंट में डाल दूंगा। तुम्हारी सुबह चाय के साथ यह बकवास मुझे पसंद नहीं है। तुम क्या चाहती हो? मैं एक दिन घर छोड़ कर चला जाऊंगा। तुम्हें क्या लगता है यह बच्चा मेरा नहीं है। तुम्ही उनकी मां हो? मैं उनका पिता नहीं हूं? जो रोज-रोज हर दिन मुझे यह ताने मारते रहती हो। कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा। अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो मुझे लगता है, सच में जिंदगी में कुछ नहीं हो पाएगा।
सनोज गुस्से में बाहर चला जाता है। समीरा बैठी हताश सोचने लगती है आखिर मैं क्या करूं अपने बच्चें के लिए? उसे बस एक ही बात लगती है अगर बच्चा हिंदी मीडियम में पढ़ेंगा तो शायद जिंदगी में आगे ना निकल पाए। समीरा कुछ देर यूं ही बैठे सोचती रहती है और कुछ देर के बाद अपने घर के काम में लग जाती है। घर का काम समाप्त होते ही वह अपनी दोस्त मोनिका के घर चली जाती है। मोनिका – क्या हुआ समीरा आज तुम बहुत परेशान लग रही हो? समीरा – क्या बताऊं यार वही घर की किच-किच, किच-किच और कुछ नहीं। तुम बेकार में सनोज पर गुस्सा करते रहती हो तुम्हें नहीं लगता अगर उससे कुछ नहीं होता तो तुम्हें कुछ करना चाहिए? अरे यार मैं तुम्हें क्या बताऊं? कितनी बार तो मैंने तुम्हें कहा है क्यों ना मैं कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ा लूं? लेकिन वह कहता है दूसरे के बच्चों को पढ़ाने से अच्छा है अपने बच्चों को पढ़ाओ। कितने पैसे आ जाएंगे? तुम्हें क्या लगता है उससे तुम कन्वेंट स्कूल में पढ़ा लोगी? मैं मेहनत करता ही हूं, तुम्हें कुछ करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं चाहता हूं जितनी मेहनत करके तुम ट्यूशन पढ़ाओगी, अगर इतनी मेहनत करके अपने बच्चों को ढंग से पढ़ा लोगी तो शायद उसका कुछ भला हो जाए। मोनिका – उफ़ रहने दो यार! मर्द तो यही चाहते हैं कि उनकी पत्नी घर में बस ऐसे ही बैठी रहे दुब के और कुछ नहीं। वह तो चाहते ही नहीं कि बाहर के माहौल से हमारा कोई वास्ता हो। बस इसीलिए इस तरह के बकवास बातें करते रहते हैं। कोई अगर बाहर के बच्चे को पढ़ाता है तो इसका मतलब यह थोड़ी ही है कि अपने बच्चों पर ध्यान देना कम कर देता है।
समीरा – क्या कह रही है यार? हमारी जिंदगी यही है, अगर उसकी बात ना मानो तो घर में रोज चिक-चिक। उससे भी तो बच्चों पर बुरा असर होगा। किसी न किसी एक को तो समझौता करना ही पड़ता है इसलिए मैं सोचती हूं मैं ही कर लूं क्योंकि मुझे नहीं लगता सनोज कोई समझौता करने के लिए तैयार है। मोनिका कहती है – रहने दे यार यह समझौता क्या है? एक घुटन है। जो तुम्हारे अंदर है लेकिन उसे तुम बाहर नहीं निकाल रही हो लेकिन यह घुटन एक दिन तुम्हारी जान ले लेगा। तुम्हें नहीं लगता इसके लिए कुछ करना चाहिए। मोनिका से समीरा बोलती है – सनोज को एक और बच्चा चाहिए था लेकिन मैंने ही जिद करके एक ही बच्चा रखा है। मुझे नहीं लगता कि मैं उसे और ज्यादा कुछ चीज है उम्मीद करूं तो वह करेगा। वह हमेशा से चाहता था हमारे कम से कम दो बच्चे हो लेकिन मैंने ही कहा जब एक का ही परवरिश ठीक से नहीं हो रहा तो दूसरे का कहां से होगा इसलिए मैंने सख्त मना कर दिया इस चीज के लिए। अब तो मैंने उसे यह भी कह दिया है जब तक कॉन्वेंट में नहीं जाएगा तब तक दूसरा बच्चा मुझे नहीं चाहिए एक बच्चे की परवरिश तो होती नहीं है दूसरे बच्चे का क्या होगा बच्चे पैदा करना बहुत आसान है लेकिन उसे सही राह पर पाल पोस कर सही तरीके से बड़ा करना बहुत मुश्किल काम है। अगर हमारे दस बच्चे हो और एक भी अच्छे ना निकले तो उनका कोई फायदा नहीं लेकिन उनका अगर एक ही बच्चा हो और हम उसका सही तरीके से पढ़ा-लिखा कर कुछ अच्छा बना लेते हैं तो वह सौ बच्चों के बराबर है। वह मेरा ही नहीं भारत देश का बेटा हो जाएंगा। लेकिन यह बात उसके दिमाग में घुसे तो न? वह बस दिन-रात एक ही बात करते रहता है मैं भी तो चीजों में बहुत कटौती करता रहता हुं, लेकिन कुछ खास हासिल नहीं हो पाता। मोनिका बोलती है – रहने दे यार, चीजों में कटौती करके कभी कुछ हासिल नहीं हो पाता। हासिल करने के लिए हमें कुछ करना पड़ता है। थूक चाटकर आदमी की प्यास नहीं बुझती। प्यास बुझाने के लिए पानी की ही जरूरत पड़ती है।
समीरा मोनिका के बातों से बहुत प्रभावित होती है। घर आते-आते सोचती है मुझे कुछ करना चाहिए, चाहे समीर को अच्छा लगे अथवा बुरा। बच्चों का भविष्य अगर अच्छा करना हो तो इसका मतलब यह नहीं कि सारी जिम्मेदारी उसके पति पर ही हो बीवी भी तो कुछ कर सकती है। मुझे कुछ करना चाहिए। क्या करूं? घरवालों ने भी तो ज्यादा कुछ पढ़ाया नहीं और सनोज की बातों में भी कभी-कभी कुछ सच्चाई है लगती है जितना दूसरे बच्चे पढ़ेंगे उतना अपने बच्चों को पढ़ा कर कुछ सिखाऊंगी तो कुछ अच्छा कर जाएगा। करूं भी तो क्या करूं? कुछ तो करना ही होगा। यही सब सोचते हुए समीरा घर पहुंचती है। सनोज पहले से ही घर में मौजूद रहता है। सनोज समीरा को देखकर बोलता है – क्या हुआ कहीं गई थी? मैं कब से तुम्हें ढूंढ रहा था। तुम कब आए? मुझे कुछ पता ही नहीं था कि तुम बीच में आने वाले हो, इसीलिए मैं मोनिका के घर चली गई थी। नहीं! कोई बात नहीं ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन एक जरूरी बात करने के लिए मैं बीच में ही आ गया। बोलो क्या बात है? पता है तुम्हें जिस दुकान में मैं काम करता हूं। हां-हां मुझे पता है। उसका मालिक वह दुकान बेचना चाहता है। मैं सोच रहा था क्यों न वह दुकान मैं ही खरीद लूं, फिर हम दोनों मिलकर उस दुकान को चलाएंगे तो पैसे अच्छे-खासे आ जाएंगे और फिर बच्चे को भी कान्वेंट स्कूल में डाल देंगे। आइडिया कैसा है?
समीरा खुशी से उछल पड़ती है। हां, मुझे हमेशा से लगता था कि तुम चाहते हो मैं कहीं बाहर जाकर काम न करूं लेकिन मैं गलत थी। सुनो समीरा को बाहों में भरता हुआ सनोज बोलता है – मैं उन पतियों में से नहीं हूं जो अपनी पत्नी पर शक करें। कितनी बंदिशों में रखूंगा किसी को? अगर उसे भागना होगा तो भाग ही जाएगी इसलिए मैं तुम्हें बंदीश नहीं बल्कि एक सही रास्ता दिखाना चाहता था इसीलिए मैं तुम्हें मना करता था। ट्यूशन पढ़ाती तो कितने पैसे मिल जाते? उससे अच्छा होता कि बच्चों को पढ़ाओ ज्यादा थक जाती तो सब काम हो भी नहीं पाता। वैसे भी हिंदी मीडियम के बच्चों को पढ़ाने में कितने पैसे आ जाते? इसीलिए मैं तुम्हें मना करता था। मुझे तुम्हारे ट्यूशन पढ़ाने से कभी कोई आपत्ति नहीं थी। मैं चाहता था कि तुम कोई ऐसा काम करो जिसे तुम्हारे मेहनत का सही फल मिल सके। सनोज बोलता है – लेकिन पैसे उसे बहुत देने पड़ेंगे। मुझे समझ में नहीं आ रहा है इतने पैसे कहां से लाऊंगा? समीरा पूछती है – अच्छा यह तो बताओ कितने में तय हुआ है? दुकान तो महंगी है क्योंकि सामान भी भरा पड़ा है लेकिन उसे अभी हैं ₹400000/- की जरूरत है चार लाख में दे देगा। लेकिन करूं तो क्या करूं ₹400000/- तो मेरे पास नहीं है ना अभी। समीरा बोलती है – हां यह तो थोड़ा मुश्किल है लेकिन मैं सोच रही थी क्यों ना हम लोग लोन ले लेते हैं। सनोज कुछ सोचता हुआ – लोन, किस चीज पर लोन लो? समझ में नहीं आता। समीरा बोलती है – अरे मेरे मैट्रिक का सर्टिफिकेट है और तुम्हारा भी। उस पर हम लोग ₹100000 तो लोन ले ही सकते हैं ₹200000/- वह हो जाएंगे और जो मकान है उस पर कर्जा ले लेंगे ₹200000/- का तब हो जाएगा किसी तरीके से। सनोज खुश हो जाता है बोलता है – हां-हां यह आइडिया ठीक है। आगे बढ़ने के लिए लोगों को पीछे हटना ही पड़ता है। तुम कितनी चतुर हो मैं हमेशा से जानता था। दिमाग तो सबके पास होता है लेकिन समय पर सिर्फ तुम्हारा ही दिमाग चलता है। मैं तो भोथर ही हो जाता हूं। ठीक कहती हो मकान पर तो दो लाख का लोन आसानी से मिल जाएगा और हां डिग्रीयां किस दिन काम आएंगी। चलो ठीक ही है घर में पड़े-पड़े तो धुल ही फांक रही हैं। कोई नौकरी तो मिली नहीं लेकिन चलो इसी डिग्री से अगर हम लोगों को एक-एक लाख का लोन मिल जाता है तो अच्छा ही होगा। दोनों इस प्रयोजन से खुश हो जाते हैं।
₹400000/- का इंतजाम तो हो जाता है और दुकान भी उन दोनों को मिल जाती है। दुकान भी अच्छा चलने लगता है। पैसे भी आने लगते हैं। अब दोनों के बीच एक ही सवाल अब बच्चे को कन्वेंट स्कूल में डालना है। अपने बच्चे सोनू को नए-नए कपड़े लाकर देती है। सारी चीज़ें खरीदी जाती है, स्कूल में एडमिशन कराने के लिए। सोनू भी बहुत खुश है। उसे लगता है नया स्कूल है, बड़ा-सा स्कूल, खेलने के लिए बड़ा सा मैदान मिलेगा। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता उस समय। सनोज और समीरा भी बहुत खुश होते हैं, सोचते हैं जिंदगी में जो चाहा वह पा लिया अब कुछ और पाने की चाह नहीं। बस, किसी तरीके से इस बच्चे को इस स्कूल में एडमिशन करा दूंगा और जिंदगी में कुछ न कुछ अच्छा कर ही लेगा। इन्हीं सारी उम्मीदों पर टिकी हुई थी उनकी दुनिया। सोनू का ऐडमिशन कर दिया जाता है। उसकी सारी शर्तों को सनोज और समीरा पूरा कर देते हैं। लेकिन जो सबसे बड़ी मुसीबत सामने आती है वह था सोनू। पहले दिन सोनू स्कूल जाते समय बहुत खुश रहता है लेकिन दूसरे ही दिन वह दुःखी हो जाता है और वह उस स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता है। वह कहता है – मां मुझे नहीं लगता है मैं इस स्कूल में पढ़ कर कुछ कर पाऊंगा? मुझे कुछ समझ में नहीं आता है।
समीरा के पैरों तले जमीन खिसक जाती है उसे लगता है सब कुछ दांव पर लगा दिया इसी स्कूल में एडमिशन कराने की खातिर और मेरा बच्चा कह रहा है मैं इस स्कूल में पढ़ुंगा तो कुछ नहीं हो सकता। वह कुछ समझ नहीं पाती और अपने बच्चे को आंखें दिखाते हुए – क्या बात करता है? क्यों नहीं समझ में आती? क्या ऐसा पढ़ाते हैं जो तुम्हें समझ में नहीं आती? सारे बच्चे को आती है। अभी पढ़ते ही किस क्लास में हो तुम? अभी फोर्थ क्लास में हो और तुम कहते हो तो मैं कुछ समझ में नहीं आता। क्यों नहीं समझ में आएगा धीरे धीरे चीजें समझ में आने लगती हैं कल तो पहला ही दिन था धीरे धीरे सब कुछ सीख जाओगे। तुम चिंता मत करो मैं तुम्हें पढ़ आऊंगी या कोई टीचर रख लेंगे तुम सीख जाओगे क्या समझ में नहीं आता है। तुम्हें स्कूल जाना ही होगा और वह जबरदस्ती सोनू को स्कूल भेज देती है। उसके स्कूल जाने के बाद हताश बैठी सोचती है कितनी मुश्किलों से एडमिशन कराया। उसके बावजूद देखो इसको इसे तो बस अपनी ही पड़ी है। मुझे कुछ समझ में नहीं आता आजकल के बच्चे भी न। इन्हीं सब सोच में डूबे हुए वह दुकान में काम करते रहती हैं। सनोज अपनी बीवी को मायूस देखकर – क्या हुआ तुम अब भी खुश नहीं हो? अब किस बात की कमी है? तुम चाहती थी की सोनू का एडमिशन कॉन्वेंट स्कूल में हो जाए और वह भी हो गया, फिर भी तुम दुःखी हो आखिर क्यों? समीरा उसे अपने दिल की बात कहती है – क्या बताऊं?
सोनू का एडमिशन तो कॉन्वेंट स्कूल में हो गया है लेकिन वह मुझसे आज ही कह रहा था मुझे स्कूल की पढ़ाई समझ में नहीं आती और वहां के बच्चे भी मुझे कुछ समझ में नहीं आते, मैं वहां रहूंगा तो मेरा कुछ नहीं होने वाला है। वह हमेशा अपने स्कूल की बुराई करते रहता है। वह खुश नहीं है वहां पर। जब वह उस चीज से ख़ुश नहीं है तब पढ़ाई क्या करेगा? मुझे लगता है कहीं हम लोग उसका उस जगह एडमिशन करा कर कोई गलती तो नहीं कर दी। सनोज समीरा के माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलता है – तुम चिंता मत करो। मुझे कभी यह नहीं लगता था कि मैं यह दुकान कभी खरीद पाता लेकिन फिर भी मेरे दिमाग में हर समय यही बात रहती थी काश यह दुकान मिल जाती तो सारे मुसीबत का हल था, तो जैसे ही यह दुकान मिल गई, मुझे लगा था कि सारी समस्या खत्म हो गई, लेकिन नहीं शायद समस्या तो अभी शुरू हुई है। अब देखो समस्या कभी खत्म नहीं होती। हर दिन समस्या का सामना करना पड़ता है। पहले हमारे पास पैसे नहीं थे तो समस्या थी। अब समस्या यह है कि बच्चा उस स्कूल में पढ़ना नहीं चाहता। उसका भी हल निकल जाएगा। कुछ सोचता हूं। समीरा बोलती है – इसमें हल निकालने की क्या बात है? मैं तो उसके हाथ-पैर बांधकर उसे स्कूल में भेज कर रहूंगी। धीरे-धीरे सीख जाएगा अभी नया-नया गया है इसलिए ऐसा लगता है। अंग्रेजी स्कूल है, नहीं समझ में आता है टीचर रख देंगे। इसमें क्या बड़ी बात है? सनोज समीरा को बोलता है – गुस्सा करने से कुछ नहीं होने वाला है सब ठीक हो जाएगा। तुम ज्यादा परेशान मत हो। मैं कुछ सोचता हूं। सनोज गंभीर होकर कुछ सोचने लगता है तभी उसके दिमाग में एक आइडिया आता है – तुम चिंता मत करो अगर सब कुछ ठीक रहा तो शायद सोनू की समस्या कल के कल ठीक हो जाएगी। नहीं तो कुछ और सोचना पड़ेगा। समीरा खुश हो जाती है – क्या? तुम्हारे दिमाग में तो कुछ ऐसी बात तो चल रही है जिससे तुम्हें लगता है कि वह सुधर सकता है, वह संभल सकता है।
सनोज समीरा की तरफ मुस्कुराते हुए देखता है – हां! मेरे दिमाग में वह बात चल रही है पर तुम्हारे लिए यह सरप्राइज होगा। मैं उसे समझाता हूं। मैंने सोच लिया मुझे उसे कैसे समझाना है। सनोज शाम को घर आते समय सोनू के लिए एक वीडियो गेम लेकर आता है। सोनू वीडियो गेम देख कर खुश हो जाता है। समीरा को कुछ समझ में नहीं आता यह क्या बेकार से सिर उठाकर ले आया बिना मतलब में। अभी ऐसे भी नया-नया स्कूल में एडमिशन कराया है। एक तो पढ़ाई में मन नहीं लगता, ऊपर से वीडियो गेम? तब तो यह दिन-रात वीडियो गेम ही खेलते रहेगा। मुझे नहीं लगता इनके दिमाग में कोई सही आईडिया है, बस ऐसे ही फालतू में सोचते हैं। बच्चे को वीडियो गेम दे दो बच्चा जाने लगेगा, कुछ नहीं होने वाला है इसका। बस दो दिन जाएगा तीसरे दिन बोलेगा अब मुझे यह ला दो, वह ला दो, ऐसे करो तब स्कूल जाऊंगा। पता चला बच्चे को स्कूल भेजना भी एक मुसीबत ही हो गई है। समीरा के गुस्से का ठिकाना नहीं रहता। वह सनोज पर चिल्लाने लगती है – यह क्या तरीका है मैंने सोचा था कि तुम सोनू को सुधार दोगे, लेकिन नहीं तुमने तो बिगाड़ने का एक नया उपाय ढूंढ लिया है। क्या दिन- रात बाहर खेलते-खेलते इसे इतना भी समय मिल जाता है कि यह घर बैठे-बैठे वीडियो गेम भी खेले? सनोज समीरा को बोलता है – अरे यार मैंने तुम्हें कहा था ना तुम्हारे लिए सरप्राइज है। तुम कभी-कभी मेरी बात मान क्यों नहीं लेती? जब काम पूरा होता है तभी तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास होता है, उससे पहले तो तुम्हारा दिमाग चलता ही नहीं है। प्लीज तुम मुझ पर भरोसा करो और चुप रहो। समीरा गुस्से में पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली जाती है।
सनोज वीडियो गेम निकाल कर सोनू के हाथ में दे देता है। सोनू वीडियो गेम देख कर बहुत खुश हो जाता है। वह खुशी-खुशी उससे खेलना शुरू कर देता है। जब वह वीडियो गेम खेलते रहता है - पापा पता है यह वीडियो गेम मैं बहुत दिन से खेलना चाह रहा था, पर था ही नहीं मेरे पास। सभी दोस्त बोलते थे तो मैंने सुना था बहुत अच्छा है। मैं भी इसे खेलना चाहता था। सनोज बोलता हैं – हां बेटा तुम्हें जिंदगी में हर वह काम करना है जो तुम कभी चाहते थे, इसीलिए तो मैं वह हर चीज है तुम्हें ला ला कर दे रहा हूं और मुझे पूरा विश्वास है कि तुम पूरी लगन से हर वो चीज़ पूरी करोगे। सोनू के दिमाग में कुछ जाता तो नहीं है लेकिन वह पूरी तन्मयता के साथ वीडियो गेम खेलता है। वह एक भी स्टेज पूरा नहीं कर पाता। सनोज भी उसे कुछ नहीं बोलता और चुपचाप किचन में चला जाता है और समीरा को वहीं से आवाज देता है – समीरा! समीरा! समीरा बाहर आकर – क्या बकवास बात है? मुझे कुछ नहीं सुनना। देखो ना सोनू वीडियो गेम खेल रहा है। तो खेलने दो न। लेकर आए हो तो खेलेगा ही, रात भर खेलेगा। अब मुझे क्या है? क्या मैं उसके पहरेदारी करूं? कैसे वीडियो गेम खेलता है? सनोज उसे प्यार से बाहों में लेते हुए – नहीं मेरी जान तुम्हें उसकी पहरेदारी करने की कोई जरूरत नहीं है, पर अपने पतिदेव के लिए खाना निकालोगी? चलो खा लेते हैं। मुझे भूख लगी है। समीरा नरम पड़ते हुए – अच्छा ठीक है। खाना निकालती हूं। तुमने कुछ सोचा इसे कैसे समझाना है? सनोज उसकी तरफ देखते हुए – हां-हां सोच लिया है। खाना तो लेकर चलो। समीरा खाना लेते हुए टाइम टेबल पर आती है। सनोज सोनू से पूछता है – क्या बेटा कितना स्टेज पार किए? सोनू उदास – पापा अभी तक तो मैंने एक स्टेज भी पार नहीं किया है, पर मैं जरूर इसे पार कर लूंगा, मैं कोशिश कर रहा हूं। सनोज सोनू से बोलता है – हां-हां मुझे पूरा विश्वास है तुम इसका एक-एक स्टेज पार कर लोगे और तुम इस खेल में माहिर हो जाओगे। वह खाना खाना शुरू कर देता है। खाना खत्म होते-होते सोनू पहला स्टेज पार कर जाता है और खुशी से उछल पड़ता है - पापा मैंने पहला स्टेज पार कर दिया है। सनोज भी उसकी खुशी में शामिल हो जाता है – हां बेटा मुझे पूरा विश्वास था कि तुम यह काम कर दोगे और उसे गले लगा लेता है।
सोनू भी खुशी-खुशी अपने पापा के गाल को चूमने लगता है और बोलता है – मैंने कहा था ना मैं धीरे-धीरे करके एक-एक स्टेज पार कर दूंगा। सनोज सोनू से पूछता है – तुम कब से खेल रहे हो? सोनू कुछ सोच में पड़ जाता है – मुझे याद नहीं। आप जब आए थे, मुझे दिया था, तब से खेल रहा हूं। सनोज घड़ी की तरफ देखते हुए – तुम पिछले एक घंटे से खेल रहे हो तब जाकर यह स्टेज पार किया। सोनू – हां क्योंकि मैंने इसे पहले कभी खेला नहीं था ना। सनोज सोनू को प्यार से अपने गोदी में बैठा कर बोलता है – देखो बेटा कभी तुम कान्वेंट स्कूल में नहीं गए, जहां बच्चे अंग्रेजी बोलते हो। तुम उस स्कूल में पढ़े हो जिसमें सभी बच्चे हिंदी में बातें करते थे। सारे कॉपी-किताब ऐसे ही थे, लेकिन तुम हमेशा उस स्कूल में तुम कॉन्वेंट स्कूल के बच्चों के बारे में सुनते होंगे और तुम्हारी भी इच्छा होती होगी कि मैं उस बड़े से स्कूल में जाऊं। आज मैंने मौका तुम्हें दिया है हो सकता है कि तुम आज उस ऊंचाई पर नहीं हो जहां तुम अपने आप को देखना चाहते हो, लेकिन जैसे तुमने इस गेम का एक पहला स्टेज पर किया और तुमने अपनी इच्छाशक्ति से कहा मैं एक-एक करके इसका पूरा स्टेज पार कर लूंगा उसी तरीके से अगर तुम स्कूल में भी मन लगा कर पढ़ो और अपनी इच्छाशक्ति पर भरोसा करो तो तुम धीरे-धीरे हर क्लास को पार कर लोगे और पार ही नहीं करोगे अपनी मेहनत से एक दिन तुम उस स्कूल के टॉपर स्टूडेंट बनोगे। सोनू की आंखें खुल जाती है और वह अपने पापा को गले लगा कर बोलता है – हां पापा मैं स्कूल जरूर जाऊंगा और अब देख लीजिएगा मैं धीरे-धीरे सब कुछ सीख जाऊंगा और मैं उस स्कूल में टॉप करूंगा। समीरा यह सब चीजें देखकर खुश हो जाती है – शायद मैं तुम्हें इस जिंदगी में कभी नहीं समझ पाई। सनोज उसकी तरफ मुस्कुराता हुआ देखता है – तुम समझती तो मुझे बहुत हो, बस थोड़ा अपने बच्चे के मामले में घबरा जाती हो, वरना ऐसी कोई बात नहीं है। समीरा और सनोज दोनों खुश हो जाते है। सोनू को भी बात समझ में आ जाती है और वह आराम से स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाता है।
सनोज गुस्से में बाहर चला जाता है। समीरा बैठी हताश सोचने लगती है आखिर मैं क्या करूं अपने बच्चें के लिए? उसे बस एक ही बात लगती है अगर बच्चा हिंदी मीडियम में पढ़ेंगा तो शायद जिंदगी में आगे ना निकल पाए। समीरा कुछ देर यूं ही बैठे सोचती रहती है और कुछ देर के बाद अपने घर के काम में लग जाती है। घर का काम समाप्त होते ही वह अपनी दोस्त मोनिका के घर चली जाती है। मोनिका – क्या हुआ समीरा आज तुम बहुत परेशान लग रही हो? समीरा – क्या बताऊं यार वही घर की किच-किच, किच-किच और कुछ नहीं। तुम बेकार में सनोज पर गुस्सा करते रहती हो तुम्हें नहीं लगता अगर उससे कुछ नहीं होता तो तुम्हें कुछ करना चाहिए? अरे यार मैं तुम्हें क्या बताऊं? कितनी बार तो मैंने तुम्हें कहा है क्यों ना मैं कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ा लूं? लेकिन वह कहता है दूसरे के बच्चों को पढ़ाने से अच्छा है अपने बच्चों को पढ़ाओ। कितने पैसे आ जाएंगे? तुम्हें क्या लगता है उससे तुम कन्वेंट स्कूल में पढ़ा लोगी? मैं मेहनत करता ही हूं, तुम्हें कुछ करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं चाहता हूं जितनी मेहनत करके तुम ट्यूशन पढ़ाओगी, अगर इतनी मेहनत करके अपने बच्चों को ढंग से पढ़ा लोगी तो शायद उसका कुछ भला हो जाए। मोनिका – उफ़ रहने दो यार! मर्द तो यही चाहते हैं कि उनकी पत्नी घर में बस ऐसे ही बैठी रहे दुब के और कुछ नहीं। वह तो चाहते ही नहीं कि बाहर के माहौल से हमारा कोई वास्ता हो। बस इसीलिए इस तरह के बकवास बातें करते रहते हैं। कोई अगर बाहर के बच्चे को पढ़ाता है तो इसका मतलब यह थोड़ी ही है कि अपने बच्चों पर ध्यान देना कम कर देता है।
समीरा – क्या कह रही है यार? हमारी जिंदगी यही है, अगर उसकी बात ना मानो तो घर में रोज चिक-चिक। उससे भी तो बच्चों पर बुरा असर होगा। किसी न किसी एक को तो समझौता करना ही पड़ता है इसलिए मैं सोचती हूं मैं ही कर लूं क्योंकि मुझे नहीं लगता सनोज कोई समझौता करने के लिए तैयार है। मोनिका कहती है – रहने दे यार यह समझौता क्या है? एक घुटन है। जो तुम्हारे अंदर है लेकिन उसे तुम बाहर नहीं निकाल रही हो लेकिन यह घुटन एक दिन तुम्हारी जान ले लेगा। तुम्हें नहीं लगता इसके लिए कुछ करना चाहिए। मोनिका से समीरा बोलती है – सनोज को एक और बच्चा चाहिए था लेकिन मैंने ही जिद करके एक ही बच्चा रखा है। मुझे नहीं लगता कि मैं उसे और ज्यादा कुछ चीज है उम्मीद करूं तो वह करेगा। वह हमेशा से चाहता था हमारे कम से कम दो बच्चे हो लेकिन मैंने ही कहा जब एक का ही परवरिश ठीक से नहीं हो रहा तो दूसरे का कहां से होगा इसलिए मैंने सख्त मना कर दिया इस चीज के लिए। अब तो मैंने उसे यह भी कह दिया है जब तक कॉन्वेंट में नहीं जाएगा तब तक दूसरा बच्चा मुझे नहीं चाहिए एक बच्चे की परवरिश तो होती नहीं है दूसरे बच्चे का क्या होगा बच्चे पैदा करना बहुत आसान है लेकिन उसे सही राह पर पाल पोस कर सही तरीके से बड़ा करना बहुत मुश्किल काम है। अगर हमारे दस बच्चे हो और एक भी अच्छे ना निकले तो उनका कोई फायदा नहीं लेकिन उनका अगर एक ही बच्चा हो और हम उसका सही तरीके से पढ़ा-लिखा कर कुछ अच्छा बना लेते हैं तो वह सौ बच्चों के बराबर है। वह मेरा ही नहीं भारत देश का बेटा हो जाएंगा। लेकिन यह बात उसके दिमाग में घुसे तो न? वह बस दिन-रात एक ही बात करते रहता है मैं भी तो चीजों में बहुत कटौती करता रहता हुं, लेकिन कुछ खास हासिल नहीं हो पाता। मोनिका बोलती है – रहने दे यार, चीजों में कटौती करके कभी कुछ हासिल नहीं हो पाता। हासिल करने के लिए हमें कुछ करना पड़ता है। थूक चाटकर आदमी की प्यास नहीं बुझती। प्यास बुझाने के लिए पानी की ही जरूरत पड़ती है।
समीरा मोनिका के बातों से बहुत प्रभावित होती है। घर आते-आते सोचती है मुझे कुछ करना चाहिए, चाहे समीर को अच्छा लगे अथवा बुरा। बच्चों का भविष्य अगर अच्छा करना हो तो इसका मतलब यह नहीं कि सारी जिम्मेदारी उसके पति पर ही हो बीवी भी तो कुछ कर सकती है। मुझे कुछ करना चाहिए। क्या करूं? घरवालों ने भी तो ज्यादा कुछ पढ़ाया नहीं और सनोज की बातों में भी कभी-कभी कुछ सच्चाई है लगती है जितना दूसरे बच्चे पढ़ेंगे उतना अपने बच्चों को पढ़ा कर कुछ सिखाऊंगी तो कुछ अच्छा कर जाएगा। करूं भी तो क्या करूं? कुछ तो करना ही होगा। यही सब सोचते हुए समीरा घर पहुंचती है। सनोज पहले से ही घर में मौजूद रहता है। सनोज समीरा को देखकर बोलता है – क्या हुआ कहीं गई थी? मैं कब से तुम्हें ढूंढ रहा था। तुम कब आए? मुझे कुछ पता ही नहीं था कि तुम बीच में आने वाले हो, इसीलिए मैं मोनिका के घर चली गई थी। नहीं! कोई बात नहीं ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन एक जरूरी बात करने के लिए मैं बीच में ही आ गया। बोलो क्या बात है? पता है तुम्हें जिस दुकान में मैं काम करता हूं। हां-हां मुझे पता है। उसका मालिक वह दुकान बेचना चाहता है। मैं सोच रहा था क्यों न वह दुकान मैं ही खरीद लूं, फिर हम दोनों मिलकर उस दुकान को चलाएंगे तो पैसे अच्छे-खासे आ जाएंगे और फिर बच्चे को भी कान्वेंट स्कूल में डाल देंगे। आइडिया कैसा है?
समीरा खुशी से उछल पड़ती है। हां, मुझे हमेशा से लगता था कि तुम चाहते हो मैं कहीं बाहर जाकर काम न करूं लेकिन मैं गलत थी। सुनो समीरा को बाहों में भरता हुआ सनोज बोलता है – मैं उन पतियों में से नहीं हूं जो अपनी पत्नी पर शक करें। कितनी बंदिशों में रखूंगा किसी को? अगर उसे भागना होगा तो भाग ही जाएगी इसलिए मैं तुम्हें बंदीश नहीं बल्कि एक सही रास्ता दिखाना चाहता था इसीलिए मैं तुम्हें मना करता था। ट्यूशन पढ़ाती तो कितने पैसे मिल जाते? उससे अच्छा होता कि बच्चों को पढ़ाओ ज्यादा थक जाती तो सब काम हो भी नहीं पाता। वैसे भी हिंदी मीडियम के बच्चों को पढ़ाने में कितने पैसे आ जाते? इसीलिए मैं तुम्हें मना करता था। मुझे तुम्हारे ट्यूशन पढ़ाने से कभी कोई आपत्ति नहीं थी। मैं चाहता था कि तुम कोई ऐसा काम करो जिसे तुम्हारे मेहनत का सही फल मिल सके। सनोज बोलता है – लेकिन पैसे उसे बहुत देने पड़ेंगे। मुझे समझ में नहीं आ रहा है इतने पैसे कहां से लाऊंगा? समीरा पूछती है – अच्छा यह तो बताओ कितने में तय हुआ है? दुकान तो महंगी है क्योंकि सामान भी भरा पड़ा है लेकिन उसे अभी हैं ₹400000/- की जरूरत है चार लाख में दे देगा। लेकिन करूं तो क्या करूं ₹400000/- तो मेरे पास नहीं है ना अभी। समीरा बोलती है – हां यह तो थोड़ा मुश्किल है लेकिन मैं सोच रही थी क्यों ना हम लोग लोन ले लेते हैं। सनोज कुछ सोचता हुआ – लोन, किस चीज पर लोन लो? समझ में नहीं आता। समीरा बोलती है – अरे मेरे मैट्रिक का सर्टिफिकेट है और तुम्हारा भी। उस पर हम लोग ₹100000 तो लोन ले ही सकते हैं ₹200000/- वह हो जाएंगे और जो मकान है उस पर कर्जा ले लेंगे ₹200000/- का तब हो जाएगा किसी तरीके से। सनोज खुश हो जाता है बोलता है – हां-हां यह आइडिया ठीक है। आगे बढ़ने के लिए लोगों को पीछे हटना ही पड़ता है। तुम कितनी चतुर हो मैं हमेशा से जानता था। दिमाग तो सबके पास होता है लेकिन समय पर सिर्फ तुम्हारा ही दिमाग चलता है। मैं तो भोथर ही हो जाता हूं। ठीक कहती हो मकान पर तो दो लाख का लोन आसानी से मिल जाएगा और हां डिग्रीयां किस दिन काम आएंगी। चलो ठीक ही है घर में पड़े-पड़े तो धुल ही फांक रही हैं। कोई नौकरी तो मिली नहीं लेकिन चलो इसी डिग्री से अगर हम लोगों को एक-एक लाख का लोन मिल जाता है तो अच्छा ही होगा। दोनों इस प्रयोजन से खुश हो जाते हैं।
₹400000/- का इंतजाम तो हो जाता है और दुकान भी उन दोनों को मिल जाती है। दुकान भी अच्छा चलने लगता है। पैसे भी आने लगते हैं। अब दोनों के बीच एक ही सवाल अब बच्चे को कन्वेंट स्कूल में डालना है। अपने बच्चे सोनू को नए-नए कपड़े लाकर देती है। सारी चीज़ें खरीदी जाती है, स्कूल में एडमिशन कराने के लिए। सोनू भी बहुत खुश है। उसे लगता है नया स्कूल है, बड़ा-सा स्कूल, खेलने के लिए बड़ा सा मैदान मिलेगा। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता उस समय। सनोज और समीरा भी बहुत खुश होते हैं, सोचते हैं जिंदगी में जो चाहा वह पा लिया अब कुछ और पाने की चाह नहीं। बस, किसी तरीके से इस बच्चे को इस स्कूल में एडमिशन करा दूंगा और जिंदगी में कुछ न कुछ अच्छा कर ही लेगा। इन्हीं सारी उम्मीदों पर टिकी हुई थी उनकी दुनिया। सोनू का ऐडमिशन कर दिया जाता है। उसकी सारी शर्तों को सनोज और समीरा पूरा कर देते हैं। लेकिन जो सबसे बड़ी मुसीबत सामने आती है वह था सोनू। पहले दिन सोनू स्कूल जाते समय बहुत खुश रहता है लेकिन दूसरे ही दिन वह दुःखी हो जाता है और वह उस स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता है। वह कहता है – मां मुझे नहीं लगता है मैं इस स्कूल में पढ़ कर कुछ कर पाऊंगा? मुझे कुछ समझ में नहीं आता है।
समीरा के पैरों तले जमीन खिसक जाती है उसे लगता है सब कुछ दांव पर लगा दिया इसी स्कूल में एडमिशन कराने की खातिर और मेरा बच्चा कह रहा है मैं इस स्कूल में पढ़ुंगा तो कुछ नहीं हो सकता। वह कुछ समझ नहीं पाती और अपने बच्चे को आंखें दिखाते हुए – क्या बात करता है? क्यों नहीं समझ में आती? क्या ऐसा पढ़ाते हैं जो तुम्हें समझ में नहीं आती? सारे बच्चे को आती है। अभी पढ़ते ही किस क्लास में हो तुम? अभी फोर्थ क्लास में हो और तुम कहते हो तो मैं कुछ समझ में नहीं आता। क्यों नहीं समझ में आएगा धीरे धीरे चीजें समझ में आने लगती हैं कल तो पहला ही दिन था धीरे धीरे सब कुछ सीख जाओगे। तुम चिंता मत करो मैं तुम्हें पढ़ आऊंगी या कोई टीचर रख लेंगे तुम सीख जाओगे क्या समझ में नहीं आता है। तुम्हें स्कूल जाना ही होगा और वह जबरदस्ती सोनू को स्कूल भेज देती है। उसके स्कूल जाने के बाद हताश बैठी सोचती है कितनी मुश्किलों से एडमिशन कराया। उसके बावजूद देखो इसको इसे तो बस अपनी ही पड़ी है। मुझे कुछ समझ में नहीं आता आजकल के बच्चे भी न। इन्हीं सब सोच में डूबे हुए वह दुकान में काम करते रहती हैं। सनोज अपनी बीवी को मायूस देखकर – क्या हुआ तुम अब भी खुश नहीं हो? अब किस बात की कमी है? तुम चाहती थी की सोनू का एडमिशन कॉन्वेंट स्कूल में हो जाए और वह भी हो गया, फिर भी तुम दुःखी हो आखिर क्यों? समीरा उसे अपने दिल की बात कहती है – क्या बताऊं?
सोनू का एडमिशन तो कॉन्वेंट स्कूल में हो गया है लेकिन वह मुझसे आज ही कह रहा था मुझे स्कूल की पढ़ाई समझ में नहीं आती और वहां के बच्चे भी मुझे कुछ समझ में नहीं आते, मैं वहां रहूंगा तो मेरा कुछ नहीं होने वाला है। वह हमेशा अपने स्कूल की बुराई करते रहता है। वह खुश नहीं है वहां पर। जब वह उस चीज से ख़ुश नहीं है तब पढ़ाई क्या करेगा? मुझे लगता है कहीं हम लोग उसका उस जगह एडमिशन करा कर कोई गलती तो नहीं कर दी। सनोज समीरा के माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलता है – तुम चिंता मत करो। मुझे कभी यह नहीं लगता था कि मैं यह दुकान कभी खरीद पाता लेकिन फिर भी मेरे दिमाग में हर समय यही बात रहती थी काश यह दुकान मिल जाती तो सारे मुसीबत का हल था, तो जैसे ही यह दुकान मिल गई, मुझे लगा था कि सारी समस्या खत्म हो गई, लेकिन नहीं शायद समस्या तो अभी शुरू हुई है। अब देखो समस्या कभी खत्म नहीं होती। हर दिन समस्या का सामना करना पड़ता है। पहले हमारे पास पैसे नहीं थे तो समस्या थी। अब समस्या यह है कि बच्चा उस स्कूल में पढ़ना नहीं चाहता। उसका भी हल निकल जाएगा। कुछ सोचता हूं। समीरा बोलती है – इसमें हल निकालने की क्या बात है? मैं तो उसके हाथ-पैर बांधकर उसे स्कूल में भेज कर रहूंगी। धीरे-धीरे सीख जाएगा अभी नया-नया गया है इसलिए ऐसा लगता है। अंग्रेजी स्कूल है, नहीं समझ में आता है टीचर रख देंगे। इसमें क्या बड़ी बात है? सनोज समीरा को बोलता है – गुस्सा करने से कुछ नहीं होने वाला है सब ठीक हो जाएगा। तुम ज्यादा परेशान मत हो। मैं कुछ सोचता हूं। सनोज गंभीर होकर कुछ सोचने लगता है तभी उसके दिमाग में एक आइडिया आता है – तुम चिंता मत करो अगर सब कुछ ठीक रहा तो शायद सोनू की समस्या कल के कल ठीक हो जाएगी। नहीं तो कुछ और सोचना पड़ेगा। समीरा खुश हो जाती है – क्या? तुम्हारे दिमाग में तो कुछ ऐसी बात तो चल रही है जिससे तुम्हें लगता है कि वह सुधर सकता है, वह संभल सकता है।
सनोज समीरा की तरफ मुस्कुराते हुए देखता है – हां! मेरे दिमाग में वह बात चल रही है पर तुम्हारे लिए यह सरप्राइज होगा। मैं उसे समझाता हूं। मैंने सोच लिया मुझे उसे कैसे समझाना है। सनोज शाम को घर आते समय सोनू के लिए एक वीडियो गेम लेकर आता है। सोनू वीडियो गेम देख कर खुश हो जाता है। समीरा को कुछ समझ में नहीं आता यह क्या बेकार से सिर उठाकर ले आया बिना मतलब में। अभी ऐसे भी नया-नया स्कूल में एडमिशन कराया है। एक तो पढ़ाई में मन नहीं लगता, ऊपर से वीडियो गेम? तब तो यह दिन-रात वीडियो गेम ही खेलते रहेगा। मुझे नहीं लगता इनके दिमाग में कोई सही आईडिया है, बस ऐसे ही फालतू में सोचते हैं। बच्चे को वीडियो गेम दे दो बच्चा जाने लगेगा, कुछ नहीं होने वाला है इसका। बस दो दिन जाएगा तीसरे दिन बोलेगा अब मुझे यह ला दो, वह ला दो, ऐसे करो तब स्कूल जाऊंगा। पता चला बच्चे को स्कूल भेजना भी एक मुसीबत ही हो गई है। समीरा के गुस्से का ठिकाना नहीं रहता। वह सनोज पर चिल्लाने लगती है – यह क्या तरीका है मैंने सोचा था कि तुम सोनू को सुधार दोगे, लेकिन नहीं तुमने तो बिगाड़ने का एक नया उपाय ढूंढ लिया है। क्या दिन- रात बाहर खेलते-खेलते इसे इतना भी समय मिल जाता है कि यह घर बैठे-बैठे वीडियो गेम भी खेले? सनोज समीरा को बोलता है – अरे यार मैंने तुम्हें कहा था ना तुम्हारे लिए सरप्राइज है। तुम कभी-कभी मेरी बात मान क्यों नहीं लेती? जब काम पूरा होता है तभी तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास होता है, उससे पहले तो तुम्हारा दिमाग चलता ही नहीं है। प्लीज तुम मुझ पर भरोसा करो और चुप रहो। समीरा गुस्से में पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली जाती है।
सनोज वीडियो गेम निकाल कर सोनू के हाथ में दे देता है। सोनू वीडियो गेम देख कर बहुत खुश हो जाता है। वह खुशी-खुशी उससे खेलना शुरू कर देता है। जब वह वीडियो गेम खेलते रहता है - पापा पता है यह वीडियो गेम मैं बहुत दिन से खेलना चाह रहा था, पर था ही नहीं मेरे पास। सभी दोस्त बोलते थे तो मैंने सुना था बहुत अच्छा है। मैं भी इसे खेलना चाहता था। सनोज बोलता हैं – हां बेटा तुम्हें जिंदगी में हर वह काम करना है जो तुम कभी चाहते थे, इसीलिए तो मैं वह हर चीज है तुम्हें ला ला कर दे रहा हूं और मुझे पूरा विश्वास है कि तुम पूरी लगन से हर वो चीज़ पूरी करोगे। सोनू के दिमाग में कुछ जाता तो नहीं है लेकिन वह पूरी तन्मयता के साथ वीडियो गेम खेलता है। वह एक भी स्टेज पूरा नहीं कर पाता। सनोज भी उसे कुछ नहीं बोलता और चुपचाप किचन में चला जाता है और समीरा को वहीं से आवाज देता है – समीरा! समीरा! समीरा बाहर आकर – क्या बकवास बात है? मुझे कुछ नहीं सुनना। देखो ना सोनू वीडियो गेम खेल रहा है। तो खेलने दो न। लेकर आए हो तो खेलेगा ही, रात भर खेलेगा। अब मुझे क्या है? क्या मैं उसके पहरेदारी करूं? कैसे वीडियो गेम खेलता है? सनोज उसे प्यार से बाहों में लेते हुए – नहीं मेरी जान तुम्हें उसकी पहरेदारी करने की कोई जरूरत नहीं है, पर अपने पतिदेव के लिए खाना निकालोगी? चलो खा लेते हैं। मुझे भूख लगी है। समीरा नरम पड़ते हुए – अच्छा ठीक है। खाना निकालती हूं। तुमने कुछ सोचा इसे कैसे समझाना है? सनोज उसकी तरफ देखते हुए – हां-हां सोच लिया है। खाना तो लेकर चलो। समीरा खाना लेते हुए टाइम टेबल पर आती है। सनोज सोनू से पूछता है – क्या बेटा कितना स्टेज पार किए? सोनू उदास – पापा अभी तक तो मैंने एक स्टेज भी पार नहीं किया है, पर मैं जरूर इसे पार कर लूंगा, मैं कोशिश कर रहा हूं। सनोज सोनू से बोलता है – हां-हां मुझे पूरा विश्वास है तुम इसका एक-एक स्टेज पार कर लोगे और तुम इस खेल में माहिर हो जाओगे। वह खाना खाना शुरू कर देता है। खाना खत्म होते-होते सोनू पहला स्टेज पार कर जाता है और खुशी से उछल पड़ता है - पापा मैंने पहला स्टेज पार कर दिया है। सनोज भी उसकी खुशी में शामिल हो जाता है – हां बेटा मुझे पूरा विश्वास था कि तुम यह काम कर दोगे और उसे गले लगा लेता है।
सोनू भी खुशी-खुशी अपने पापा के गाल को चूमने लगता है और बोलता है – मैंने कहा था ना मैं धीरे-धीरे करके एक-एक स्टेज पार कर दूंगा। सनोज सोनू से पूछता है – तुम कब से खेल रहे हो? सोनू कुछ सोच में पड़ जाता है – मुझे याद नहीं। आप जब आए थे, मुझे दिया था, तब से खेल रहा हूं। सनोज घड़ी की तरफ देखते हुए – तुम पिछले एक घंटे से खेल रहे हो तब जाकर यह स्टेज पार किया। सोनू – हां क्योंकि मैंने इसे पहले कभी खेला नहीं था ना। सनोज सोनू को प्यार से अपने गोदी में बैठा कर बोलता है – देखो बेटा कभी तुम कान्वेंट स्कूल में नहीं गए, जहां बच्चे अंग्रेजी बोलते हो। तुम उस स्कूल में पढ़े हो जिसमें सभी बच्चे हिंदी में बातें करते थे। सारे कॉपी-किताब ऐसे ही थे, लेकिन तुम हमेशा उस स्कूल में तुम कॉन्वेंट स्कूल के बच्चों के बारे में सुनते होंगे और तुम्हारी भी इच्छा होती होगी कि मैं उस बड़े से स्कूल में जाऊं। आज मैंने मौका तुम्हें दिया है हो सकता है कि तुम आज उस ऊंचाई पर नहीं हो जहां तुम अपने आप को देखना चाहते हो, लेकिन जैसे तुमने इस गेम का एक पहला स्टेज पर किया और तुमने अपनी इच्छाशक्ति से कहा मैं एक-एक करके इसका पूरा स्टेज पार कर लूंगा उसी तरीके से अगर तुम स्कूल में भी मन लगा कर पढ़ो और अपनी इच्छाशक्ति पर भरोसा करो तो तुम धीरे-धीरे हर क्लास को पार कर लोगे और पार ही नहीं करोगे अपनी मेहनत से एक दिन तुम उस स्कूल के टॉपर स्टूडेंट बनोगे। सोनू की आंखें खुल जाती है और वह अपने पापा को गले लगा कर बोलता है – हां पापा मैं स्कूल जरूर जाऊंगा और अब देख लीजिएगा मैं धीरे-धीरे सब कुछ सीख जाऊंगा और मैं उस स्कूल में टॉप करूंगा। समीरा यह सब चीजें देखकर खुश हो जाती है – शायद मैं तुम्हें इस जिंदगी में कभी नहीं समझ पाई। सनोज उसकी तरफ मुस्कुराता हुआ देखता है – तुम समझती तो मुझे बहुत हो, बस थोड़ा अपने बच्चे के मामले में घबरा जाती हो, वरना ऐसी कोई बात नहीं है। समीरा और सनोज दोनों खुश हो जाते है। सोनू को भी बात समझ में आ जाती है और वह आराम से स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाता है।



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