खुद पर यकीन
वह उदास खड़ी कुछ देर तक अपने बारे में सोचते रहती है। वह सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए पर मुझे कुछ हासिल ना हुआ। आज इन दीवारों के बीच खड़ी होकर क्या पाया है मैंने कुछ खास नहीं शायद कुछ भी नहीं। इस छोटे से घर जिसमें वह अकेली पड़ी हुई रहती है और खुद को कोसते रहती है। दूर कहीं बहुत दूर शायद ओझल होते हुए आंखों से उसके सपने देख रही थी फिर वह को कोसती हुई आकर बिस्तर पर लेट जाती है और सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए लेकिन उसका परिणाम कभी कुछ सही ना निकल सका। जितने लोगों के साथ मैंने काम किया या जितने लोगों के लिए मैंने बहुत कुछ किया आज उन लोगों में से कोई एक आदमी भी मेरे साथ आज खड़ा नजर नहीं आता और हर आदमी मुझे कंपीटीटर ही समझता है। मैं हताश बेसहारा इन दीवारों में अपना सर रगड़ रही हूं। तभी वह दुःखी होकर सोचती है - क्या मिला मुझे क्या मैं चाहती थी कुछ भी तो नहीं हुआ वैसा जैसा वह चाहती थी तभी उसके दिमाग में कुछ ख्याल ऐसे आते हैं कि वह अपनी डायरी उठा कर देखने लगती है।
डायरी के पन्ने पलटते-पलटते उसकी आंखों से आंसू बहने लगते है और वह सोचती है कितने सपने थे जो मैंने पूरा नहीं किया और कितने ख्वाहिशें थी जो यूं ही छूट गए दूसरों के चक्कर में। उसकी आंखों के आंसू अब गालों पर छलकने लगते हैं। तभी डायरी के एक पन्ने पर उसकी नजर पड़ती है। कभी उस quotation को देखकर वह इतनी खुश होती थी और आज उसी quotation पे इतना गुस्सा आता है। उसमें लिखा था जितनी बार आप गिरते हैं जरूरी नहीं कि आप हार जाएं हाल तो तब आप जाते हैं जब आप उठना नहीं चाहते अपने इस कोटेशन को जिंदगी का सार बना ली थी और वह हर बार गिरकर उठने का प्रयास करती थी लेकिन आज वह इतनी ज्यादा अपने आप से दुःखी थी कि वह डायरी के पन्नों को बेतहाशा फाड़ने लगती है। डायरी के एक-एक पन्ने को फाड़ने के बाद भी उसकी बेचैनी खत्म नहीं होती। वह अंदर ही अंदर कहीं जल रही थी। उस आग से वह पूरी दुनिया को जलाना चाहती थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि मैं किसे जलाऊं?
शायद वह आग उसे ही जला रहा था अंदर तक। उस जलन से उसकी आंखें और शरीर का एक-एक रोआं तक जल रहा था। वह फूट-फूट कर यूं रोने लगती है जैसे कोई मर गया हो। शायद उसकी आत्मा मर गई थी। फिर अचानक उठती है और अपने रूम के अलमारी के तरफ देखती है उसमें लगा शीशा जैसे उसे चिढ़ा रहा होता है। वह उस चेहरे को देखकर एकदम घबरा-सी जाती है। एक डर उसके अंदर कौंध-सा जाता है। उसे लगता है यह कौन औरत है जो मेरे कमरे में है। वह इधर-उधर अपनी आंखों से उसे देखने लगती है पर वहां कोई नहीं था। उसकी घबराहट और बढ़ जाती है और वह डरती हुई उस अलमारी के शीशे के पास जाती है। तब उसे एहसास होता है ये धंसी-धंसी आंखें, ये बिखरे बाल, ये झूर्रियां किसी और के नहीं उसी के हैं। वह गिर पड़ती है। उसे समझ नहीं आता यह औरत मैं हूं मैं और मैं ऐसी हूं। यह सवाल उसके अंदर इतनी तेजी से घूमता है कि उसे चक्कर चक्कर आने लगता है और वह बेसुध गिर जाती है। कुछ देर बाद उसे होश आता है। वह उठ कर खड़ी होती है। वह फिर से खुद को देखती है और देखते रह जाती है। एक पल के लिए तो उसे लगता है शायद मैं बूढ़ी हो गई हूं या मैं पागल थी। उसके दिमाग में उसके एक शिक्षक की बात कौंधती है जब आप सबसे ज्यादा हताश होते हैं तब आपको शीशे के सामने खड़ा होकर अपने आप से यह बात करनी चाहिए कि आप से बेहतर कोई नहीं है दुनिया में तब आप बेहतर काम करते हैं। यह बात उसके दिमाग में आते ही उसे लगता है कि वह शीशा को तोड़ दे क्योंकि वह इतना बड़ा झूठ अपने आप से तो नहीं बोल सकती थी क्योंकि वह हार चुकी थी और खुद को हारा हुआ ही कहना चाहती थी। उसकी जुबान से यह कैसे निकलता की वह बेहतर है। वह फिर से फूट-फूट कर रोने लगती है इतना रोती है इतना रोती है कि उसके आंसुओं से उसका आंचल भीग जाता है।
कहीं से आवाज उसको सुनाई देती है टीना! टीना! खुद को संभालते खड़ी होती है अपने दुपट्टे को बदलते हुए। सब कुछ खो जाने के बाद भी एक चीज था जो उसके अंदर अभी भी जिंदा था उसका घमंड उसका गूरूर। वह अपने दोस्त को कैसे दिखा दे कि वह इतनी हार चुकी है? इसलिए उसने झट से अपने दुपट्टे को बदला और अपना चेहरा पोछा और एक मुस्कुराता हुआ चेहरा लेकर दरवाजे के पास आती है दरवाजा खोलते ही – हाय स्नेहा कैसी हो? मैं ठीक हूं। तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही टीना? कैसी हो तुम? बस लग रहा है जरा फीवर है इसलिए चेहरा थोड़ा उतर गया है। आजकल तुम्हारा चेहरा तो हमेशा उतरा ही रहता है। मुझे लगता तुम्हें एक अच्छे डॉक्टर की जरूरत है।
वह अपने मन में मुस्कुराती है नहीं मुझे एक अच्छे साथी की जरूरत है। फिर स्नेहा को अपने कमरे में अंदर बुलाती है। आओ बैठो। क्या सोच रही हो? नहीं शायद हम कहीं बाहर चलते हैं तो शायद तुम्हें भी अच्छा लगता? इन दिनों देखा है मैंने तुम्हें तुम बहुत उदास रहती हो। क्या हुआ? तुम कुछ बोलती भी तो नहीं। वह सोचती है किससे कहूं और किसलिए कहूं? इसलिए अपने चेहरे के भाव को छुपाते – नहीं यार! अब कहीं भी निकालने का मन नहीं करता। स्नेहा उसके मन को भांप जाती है – तुम शायद मायूस हो अपने आप से। टीना खुद पर हंसती हुई – क्या बात करती हो यार? अपने आप से मायूस! नहीं ऐसा नहीं हो सकता। स्नेहा – झूठ तुम्हारी आंखें बता रही हैं तुम मायूस हो। टीना खुद को रोक नहीं पाते और बोलती है – तुमने बिलकुल सही बात कही है। स्नेहा – यार तुमने सबके लिए बहुत कुछ किया है पर शायद किस्मत ने हीं तुम्हारा कभी साथ नहीं दिया इसलिए ऐसी जिंदगी जीने के लिए तुम मजबूर हो। मुझे नहीं लगता कि तुम इस चीज के लिए बनी थी। टीना का गुस्सा फूट पड़ता है – तुम ने सच कहा। मैंने बहुतों के लिए बहुत कुछ किया, पर एक बात तो सच है यार मैंने खुद के लिए कभी कुछ नहीं किया, शायद इसलिए मैं ऐसे जिंदगी जीने के लिए मजबूर हूं। अब नहीं! अब बहुत हो चुका।
यह बात तुमने बिल्कुल ठीक कही कि मैं मायूस हूं और मुझे खुद से मायूस होना चाहिए। हां! मैं खुद से मायूस हूं और बहुत मायूस हूं। मुझे लगता है कि मैं अपनी जिंदगी में जो चीजें करनी चाहिए थी वह मैंने नहीं की लेकिन अब नहीं। अब मुझे जो अच्छा लगता है मैं वही करूंगी। इतना कहते हुए टीना के चेहरे पर तेज आ गया था। स्नेहा उसे देख कर भौंचकी-सी हो गई थी। उसे लगा था इतने खराब टाइम में कोई आदमी इतना confident कैसे हो सकता है? क्या बोलती है यार? तेरी हर चीज मुझे समझ में आती है पर तेरा कॉन्फिडेंस देखकर मुझे कुछ समझ में नहीं आता। तुम इतने बुरे वक्त में भी इतना अपने आप पर अटल कैसे रह सकती हो? टीना मुस्कुराते हुए स्नेहा की ओर मुखातिब होती है – यही तो चीज है ‘जब तक ख्वाहिशें हैं तब तक जिंदगी है ख्वाहिशें खत्म जिंदगी खत्म।' मैं अपनी ख्वाहिशे खुद से पूरा करने के लिए जीती हूं और तुम अपने ख्वाहिशें दूसरों से पूरा कराने के लिए जीती हो यही अंतर है इसलिए तो तुम्मे वह कॉन्फिडेंस नहीं है और वह कॉन्फिडेंस जो मुझमें है। कभी नहीं हो सकता। स्नेहा को टीना की बातें कुछ अच्छी नहीं लगती। वह उठकर वहां से चली जाती है – ठीक है मैं निकलती हूं फिर कभी बाहर चलेंगे। अभी शायद तुम्हारा मूड ठीक नहीं है। स्नेहा चली जाती हैं।
टीना को स्नेहा का व्यवहार अच्छा नहीं लगता और वह सोचती है देखो अगर सच जुबान पर आ जाए तो लोग बुरा मान ही जाते हैं। रहने दो मुझे क्या फर्क पड़ता है। इन्हीं सब चीजों को तो सोच-सोच कर जिंदगी में वह बहुत सारे काम नहीं किए जो मुझे करना चाहिए था। आज जिंदगी के इस पड़ाव पर मैं ऐसी जगह खड़ी हूं जहां मैं कुछ भी कर सकती हूं। हर किसी ने मुझे छोड़ दिया है। यह एक दुःख की बात है पर एक खुशी की बात भी है अगर कोई साथ नहीं तो किसी का डर नही। किस बात पर? वह तुरंत अपना लैपटॉप खोलते हुए कुछ देखने लगती है। उसे एक विज्ञापन नजर आता है उस विज्ञापन में दिखाता है अगर आप नाइट शिफ्ट में काम करना चाहते हैं तो आप इस कंपनी को ज्वाइन कर सकते हैं। उन्हें जरूरत है नाइट शिफ्ट में काम करने वाले किसी बंदे की। वह अपना आवेदन उस कंपनी में करती हैं। उसमें वह इंटरव्यू के लिए जाती है। टीना को वह नौकरी मिल भी जाती है। नौकरी से कहां उसका जी भरने वाला था। नौकरी करते-करते कुछ लोगों से उसकी दोस्ती हो जाती है और फिर उसके बाद उसका दिमाग अपने आप ही चलने लगता है। ‘जिंदगी में जब आप काम करना बंद कर देते हैं तो शायद आपका दिमाग ही बंद हो जाता है।'
ऐसा ही कुछ टीना के साथ हो रहा था उसने अपने काम को रोक दिया था जैसे वह रुक गई थी लेकिन यहां उसके काम ने उसकी उम्मीद से ज्यादा एक तरंग दे दिया था वह रात को काम करने जाती और सुबह वापस आकर सोने के बाद वह खुद के लिए काम करने लगती। धीरे-धीरे वह अपना एक बिजनेस सेटअप करने लगी थी। इस तरह वह दिन-रात इतनी व्यस्त रहने लगी जितना वह सोच भी नहीं सकती थी। शायद वह अपने खालीपन से इतना डर गई थी कि वह अब अकेले रहना नहीं चाहती थी और अकेले नहीं रहने का मतलब था काम इसलिए वह दिन रात काम करती थी। रात में वह एम्पलाई के रूप में काम करती थी और दिन में मालकिन की तरह। उसने अपना एक छोटा-सा बिजनेस खोल लिया था।
वह रोज 12:00 बजे के बाद कुछ बच्चों को पढ़ाती थी। उसे अच्छा लगता था उन लोगों को पढ़ा कर। धीरे-धीरे उसके पढ़ाने से बच्चें इतने प्रभावित हो गए कि वह एक अच्छा-खासा कोचिंग चलाने लगी। नाइट शिफ्ट काम करना भी उसने बंद कर दिया और धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बिल्कुल बदल गई। ‘जब आप खुद पर भरोसा करते हैं तो दुनिया की कोई भी चीज आप को नहीं हरा सकती।' यही बात टीना के साथ भी हुई। वह हार चुकी थी लेकिन जीत उसे तब मिलती है जब खुद पर भरोसा करने लगती है।
डायरी के पन्ने पलटते-पलटते उसकी आंखों से आंसू बहने लगते है और वह सोचती है कितने सपने थे जो मैंने पूरा नहीं किया और कितने ख्वाहिशें थी जो यूं ही छूट गए दूसरों के चक्कर में। उसकी आंखों के आंसू अब गालों पर छलकने लगते हैं। तभी डायरी के एक पन्ने पर उसकी नजर पड़ती है। कभी उस quotation को देखकर वह इतनी खुश होती थी और आज उसी quotation पे इतना गुस्सा आता है। उसमें लिखा था जितनी बार आप गिरते हैं जरूरी नहीं कि आप हार जाएं हाल तो तब आप जाते हैं जब आप उठना नहीं चाहते अपने इस कोटेशन को जिंदगी का सार बना ली थी और वह हर बार गिरकर उठने का प्रयास करती थी लेकिन आज वह इतनी ज्यादा अपने आप से दुःखी थी कि वह डायरी के पन्नों को बेतहाशा फाड़ने लगती है। डायरी के एक-एक पन्ने को फाड़ने के बाद भी उसकी बेचैनी खत्म नहीं होती। वह अंदर ही अंदर कहीं जल रही थी। उस आग से वह पूरी दुनिया को जलाना चाहती थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि मैं किसे जलाऊं?
शायद वह आग उसे ही जला रहा था अंदर तक। उस जलन से उसकी आंखें और शरीर का एक-एक रोआं तक जल रहा था। वह फूट-फूट कर यूं रोने लगती है जैसे कोई मर गया हो। शायद उसकी आत्मा मर गई थी। फिर अचानक उठती है और अपने रूम के अलमारी के तरफ देखती है उसमें लगा शीशा जैसे उसे चिढ़ा रहा होता है। वह उस चेहरे को देखकर एकदम घबरा-सी जाती है। एक डर उसके अंदर कौंध-सा जाता है। उसे लगता है यह कौन औरत है जो मेरे कमरे में है। वह इधर-उधर अपनी आंखों से उसे देखने लगती है पर वहां कोई नहीं था। उसकी घबराहट और बढ़ जाती है और वह डरती हुई उस अलमारी के शीशे के पास जाती है। तब उसे एहसास होता है ये धंसी-धंसी आंखें, ये बिखरे बाल, ये झूर्रियां किसी और के नहीं उसी के हैं। वह गिर पड़ती है। उसे समझ नहीं आता यह औरत मैं हूं मैं और मैं ऐसी हूं। यह सवाल उसके अंदर इतनी तेजी से घूमता है कि उसे चक्कर चक्कर आने लगता है और वह बेसुध गिर जाती है। कुछ देर बाद उसे होश आता है। वह उठ कर खड़ी होती है। वह फिर से खुद को देखती है और देखते रह जाती है। एक पल के लिए तो उसे लगता है शायद मैं बूढ़ी हो गई हूं या मैं पागल थी। उसके दिमाग में उसके एक शिक्षक की बात कौंधती है जब आप सबसे ज्यादा हताश होते हैं तब आपको शीशे के सामने खड़ा होकर अपने आप से यह बात करनी चाहिए कि आप से बेहतर कोई नहीं है दुनिया में तब आप बेहतर काम करते हैं। यह बात उसके दिमाग में आते ही उसे लगता है कि वह शीशा को तोड़ दे क्योंकि वह इतना बड़ा झूठ अपने आप से तो नहीं बोल सकती थी क्योंकि वह हार चुकी थी और खुद को हारा हुआ ही कहना चाहती थी। उसकी जुबान से यह कैसे निकलता की वह बेहतर है। वह फिर से फूट-फूट कर रोने लगती है इतना रोती है इतना रोती है कि उसके आंसुओं से उसका आंचल भीग जाता है।
कहीं से आवाज उसको सुनाई देती है टीना! टीना! खुद को संभालते खड़ी होती है अपने दुपट्टे को बदलते हुए। सब कुछ खो जाने के बाद भी एक चीज था जो उसके अंदर अभी भी जिंदा था उसका घमंड उसका गूरूर। वह अपने दोस्त को कैसे दिखा दे कि वह इतनी हार चुकी है? इसलिए उसने झट से अपने दुपट्टे को बदला और अपना चेहरा पोछा और एक मुस्कुराता हुआ चेहरा लेकर दरवाजे के पास आती है दरवाजा खोलते ही – हाय स्नेहा कैसी हो? मैं ठीक हूं। तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही टीना? कैसी हो तुम? बस लग रहा है जरा फीवर है इसलिए चेहरा थोड़ा उतर गया है। आजकल तुम्हारा चेहरा तो हमेशा उतरा ही रहता है। मुझे लगता तुम्हें एक अच्छे डॉक्टर की जरूरत है।
वह अपने मन में मुस्कुराती है नहीं मुझे एक अच्छे साथी की जरूरत है। फिर स्नेहा को अपने कमरे में अंदर बुलाती है। आओ बैठो। क्या सोच रही हो? नहीं शायद हम कहीं बाहर चलते हैं तो शायद तुम्हें भी अच्छा लगता? इन दिनों देखा है मैंने तुम्हें तुम बहुत उदास रहती हो। क्या हुआ? तुम कुछ बोलती भी तो नहीं। वह सोचती है किससे कहूं और किसलिए कहूं? इसलिए अपने चेहरे के भाव को छुपाते – नहीं यार! अब कहीं भी निकालने का मन नहीं करता। स्नेहा उसके मन को भांप जाती है – तुम शायद मायूस हो अपने आप से। टीना खुद पर हंसती हुई – क्या बात करती हो यार? अपने आप से मायूस! नहीं ऐसा नहीं हो सकता। स्नेहा – झूठ तुम्हारी आंखें बता रही हैं तुम मायूस हो। टीना खुद को रोक नहीं पाते और बोलती है – तुमने बिलकुल सही बात कही है। स्नेहा – यार तुमने सबके लिए बहुत कुछ किया है पर शायद किस्मत ने हीं तुम्हारा कभी साथ नहीं दिया इसलिए ऐसी जिंदगी जीने के लिए तुम मजबूर हो। मुझे नहीं लगता कि तुम इस चीज के लिए बनी थी। टीना का गुस्सा फूट पड़ता है – तुम ने सच कहा। मैंने बहुतों के लिए बहुत कुछ किया, पर एक बात तो सच है यार मैंने खुद के लिए कभी कुछ नहीं किया, शायद इसलिए मैं ऐसे जिंदगी जीने के लिए मजबूर हूं। अब नहीं! अब बहुत हो चुका।
यह बात तुमने बिल्कुल ठीक कही कि मैं मायूस हूं और मुझे खुद से मायूस होना चाहिए। हां! मैं खुद से मायूस हूं और बहुत मायूस हूं। मुझे लगता है कि मैं अपनी जिंदगी में जो चीजें करनी चाहिए थी वह मैंने नहीं की लेकिन अब नहीं। अब मुझे जो अच्छा लगता है मैं वही करूंगी। इतना कहते हुए टीना के चेहरे पर तेज आ गया था। स्नेहा उसे देख कर भौंचकी-सी हो गई थी। उसे लगा था इतने खराब टाइम में कोई आदमी इतना confident कैसे हो सकता है? क्या बोलती है यार? तेरी हर चीज मुझे समझ में आती है पर तेरा कॉन्फिडेंस देखकर मुझे कुछ समझ में नहीं आता। तुम इतने बुरे वक्त में भी इतना अपने आप पर अटल कैसे रह सकती हो? टीना मुस्कुराते हुए स्नेहा की ओर मुखातिब होती है – यही तो चीज है ‘जब तक ख्वाहिशें हैं तब तक जिंदगी है ख्वाहिशें खत्म जिंदगी खत्म।' मैं अपनी ख्वाहिशे खुद से पूरा करने के लिए जीती हूं और तुम अपने ख्वाहिशें दूसरों से पूरा कराने के लिए जीती हो यही अंतर है इसलिए तो तुम्मे वह कॉन्फिडेंस नहीं है और वह कॉन्फिडेंस जो मुझमें है। कभी नहीं हो सकता। स्नेहा को टीना की बातें कुछ अच्छी नहीं लगती। वह उठकर वहां से चली जाती है – ठीक है मैं निकलती हूं फिर कभी बाहर चलेंगे। अभी शायद तुम्हारा मूड ठीक नहीं है। स्नेहा चली जाती हैं।
टीना को स्नेहा का व्यवहार अच्छा नहीं लगता और वह सोचती है देखो अगर सच जुबान पर आ जाए तो लोग बुरा मान ही जाते हैं। रहने दो मुझे क्या फर्क पड़ता है। इन्हीं सब चीजों को तो सोच-सोच कर जिंदगी में वह बहुत सारे काम नहीं किए जो मुझे करना चाहिए था। आज जिंदगी के इस पड़ाव पर मैं ऐसी जगह खड़ी हूं जहां मैं कुछ भी कर सकती हूं। हर किसी ने मुझे छोड़ दिया है। यह एक दुःख की बात है पर एक खुशी की बात भी है अगर कोई साथ नहीं तो किसी का डर नही। किस बात पर? वह तुरंत अपना लैपटॉप खोलते हुए कुछ देखने लगती है। उसे एक विज्ञापन नजर आता है उस विज्ञापन में दिखाता है अगर आप नाइट शिफ्ट में काम करना चाहते हैं तो आप इस कंपनी को ज्वाइन कर सकते हैं। उन्हें जरूरत है नाइट शिफ्ट में काम करने वाले किसी बंदे की। वह अपना आवेदन उस कंपनी में करती हैं। उसमें वह इंटरव्यू के लिए जाती है। टीना को वह नौकरी मिल भी जाती है। नौकरी से कहां उसका जी भरने वाला था। नौकरी करते-करते कुछ लोगों से उसकी दोस्ती हो जाती है और फिर उसके बाद उसका दिमाग अपने आप ही चलने लगता है। ‘जिंदगी में जब आप काम करना बंद कर देते हैं तो शायद आपका दिमाग ही बंद हो जाता है।'
ऐसा ही कुछ टीना के साथ हो रहा था उसने अपने काम को रोक दिया था जैसे वह रुक गई थी लेकिन यहां उसके काम ने उसकी उम्मीद से ज्यादा एक तरंग दे दिया था वह रात को काम करने जाती और सुबह वापस आकर सोने के बाद वह खुद के लिए काम करने लगती। धीरे-धीरे वह अपना एक बिजनेस सेटअप करने लगी थी। इस तरह वह दिन-रात इतनी व्यस्त रहने लगी जितना वह सोच भी नहीं सकती थी। शायद वह अपने खालीपन से इतना डर गई थी कि वह अब अकेले रहना नहीं चाहती थी और अकेले नहीं रहने का मतलब था काम इसलिए वह दिन रात काम करती थी। रात में वह एम्पलाई के रूप में काम करती थी और दिन में मालकिन की तरह। उसने अपना एक छोटा-सा बिजनेस खोल लिया था।
वह रोज 12:00 बजे के बाद कुछ बच्चों को पढ़ाती थी। उसे अच्छा लगता था उन लोगों को पढ़ा कर। धीरे-धीरे उसके पढ़ाने से बच्चें इतने प्रभावित हो गए कि वह एक अच्छा-खासा कोचिंग चलाने लगी। नाइट शिफ्ट काम करना भी उसने बंद कर दिया और धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बिल्कुल बदल गई। ‘जब आप खुद पर भरोसा करते हैं तो दुनिया की कोई भी चीज आप को नहीं हरा सकती।' यही बात टीना के साथ भी हुई। वह हार चुकी थी लेकिन जीत उसे तब मिलती है जब खुद पर भरोसा करने लगती है।
बहुत सुन्दर कहानी है। सच कहे तो काम ही आदमी को आदमी बनता है। स्नेहा का संघर्ष प्रेरणादायक है।
ReplyDeleteअकेली महिला की संघर्ष की बेहतरीन कहानी है। मानसी यादव जी आपने समाज का असली चेहरा पेश किया है, अक्सर हम महिलाएं अपनों के लिए बहुत कुछ करती हैं और बदले में हमें सिर्फ तन्हाई मिलती है।
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