दोस्ती में ज़हर
रूपा और अर्चना दो दोस्त रहती है। रूपा आगे पढ़ाई नहीं करना चाहती थी क्योंकि उसकी family उतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी। अर्चना आगे पढ़ना चाहती थी क्योंकि family चाहती थी कि वो आगे पढ़े। अर्चना सोचती थी कि अगर रूपा भी उसके साथ पढ़े तो बेहतर होगा नहीं तो उसे अकेले ही जाना पड़ेगा कॉलेज। इसलिए अर्चना ने रूपा
और उसके परिवार को काफी समझाया था आगे पढ़ाई करने के लिए। रूपा के पिताजी तो मान गए थे इस चीज़ के लिए लेकिन रुपा की मां तैयारी नहीं हो रही थी। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कह दिया था रूपा को – मैट्रिक कर ली हो शादी हो जाएगी। घर के काम का सीख लो यही आगे काम देगा, नहीं तो तेरी दुर्गति हो जाएगी। जब देखो पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! अरे! पढ़-लिख के कलेक्टर बनना है तुमको का। तुमको पढ़ाई करनी है तो कर लेकिन मेरे घर के काम में एक भी बाधा हुई तो मैं उसी दिन तुम्हारी किताबों को जला दूंगी।
रूपा इन सब बातों को सुनने कि अभ्यस्त थी इसीलिए उसे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन अर्चना को काफी बुरा लग रहा था। अर्चना को अजीब लग रहा था कि उसकी मां ऐसा कैसे बोल सकती है फिर भी वह खुश थी क्योंकि अर्चना का काम निकल गया था।
वह रूपा के लिए 10+2 का फॉर्म लाती है। वह दोनों पढ़ने लगती है।
अर्चना को तो पढ़ाई करके उसे आगे काफी कुछ करना था इसलिए वह नई-नई किताबें लाती और पढ़ाई किया करती। रूपा का तो पढ़ाई में उतना मन नहीं लगता, शायद उसके घर का माहौल ही कुछ ऐसा था। परंतु अर्चना के साथ रहने का असर था कि वह भी काफी कुछ सीख गई थी। वह क्लास में तो पास कर ही जाया करती थी दुसरे शब्दों में कहें तो अर्चना के साथ रहते-रहते उसकी भी आंखें खुल गई थी।
रूपा ज्यों-ज्यों आगे बढ़ी, उसे एजुकेशन का महत्व समझ में आने लगा था।
एक बार की बात है जब रूपा B.A part-ll में रहती है तब अर्चना को ऐसा झटका देती है कि अर्चना को कुछ समझ में ही नहीं आता और अब अर्चना तथा रूपा की दोस्ती में दरार आ जाता है। रूपा अपने कॉलेज में टॉप कर जाती हैं। अर्चना को काफी आश्चर्य होता है, यह लड़की! यह लड़की कैसे टॉप कर सकती है। इसको ना तो खुद ही पढ़ने में मन लगता है ना ही इसकी मां पढ़ने देती है।
अर्चना रूपा से – तुमने जरूर कुछ किया है। रूपा – क्या बात करती हो? मैंने अच्छे से पढ़ाई किया है और मुझे लगता है मैं ही अपने फैमिली कि किस्मत बदल सकती हूं। अर्चना को यह सारी बातें अजीब लगती है पता नहीं यही बात न जाने कितनी बार अर्चना ने रूपा को समझाने की कोशिश की होगी। आज यही बात है रूपा के मुंह से सुनकर उसे ऐसा लग रहा था कि यह सब बाते रूपा के लिए बनी ही नहीं हो। अर्चना कुछ बोल तो नहीं पाती बस यूं ही – हूंह! तुम्हें क्या लगता है? तुम्हारे घर वाले क्या तुम्हें आगे पढ़ने देंगे? वह तो मैं थी नहीं तो तुम्हें तो मैट्रिक करा कर ही घर बैठा देते।
रूपा बोलती है – हां कह तो तुम सही रही हो लेकिन अब मैं वो करूंगी जो मैं करना चाहती हूं। अर्चना उसे ज्यादा कुछ नहीं कहती लेकिन रिश्ते में कहीं ना कहीं खटास आ जाती हैं क्योंकि रूपा अब उसकी दोस्त नहीं competitor बन चुकी थी।
आए दिन सभी अर्चना की तुलना रूपा से करने लगे थे। अर्चना इस बात से इतना परेशान होती है कि वह रूपा का साथ छोड़ ही देती है।
रूपा के घर वाले तो पहले उसकी पढ़ाई के लिए तैयार नहीं था फिर एक दिन उसके पिता का मालिक घर के बरामदे में खड़ा रहता है तब उसका मालिक आता है - क्या बनवारी क्या कर रहा है, काम पर काहे नहीं आ रहा? बनवारी – मालिक तबियत ठीक नहीं था इसीलिए नहीं आ पाया। अच्छा कोई बात नहीं अब तो ठीक है ना इधर से गुजर रहा था इसलिए पूछ भी लिया। हां-हां कल से जरूर आऊंगा। अच्छी बात है तब बाल-बच्चा सब क्या कर रहा है? वैसे तो कुछ खास नहीं कहीं-कहीं काम कर रहे हैं। बेटी पढ़ रही है अभी B.A. में। बोलती है नौकरी करेगी। वाह बनवारी तूने तो कमाल कर दिया लोग यहां बेटे को नहीं पढ़ा पाते और तूने ने बेटी को पढ़ा दिया।
बनवारी की आंखों में यह बातें सुनकर गुरुर आ जाता है। हां-हां लोग तो यहां बेटे को नहीं पढ़ाया था मैंने बेटी को पढ़ा दिया। ऐसे तो रूपा के पढ़ाई में उनके मां-बाप का कुछ खास योगदान नहीं रहता लेकिन आज उसके बाप का सीना उसी की वजह से फूल जाता है। पता है साहब लड़की ना टॉप की है बोल रही थी हम तो पढ़े-लिखे हैं नहीं आप तो बड़े लोग हैं आप लोग ही समझ सकते हैं टॉप का मतलब क्या होता है? ओहो! तेरी लड़की पढ़ने में बहुत तेज है अच्छा नाम करेगी।
बनवारी खुश हो जाता है और अपनी बेटी को पढ़ाने में लग जाता है। रूपा भी मन लगाकर पढ़ने लगती हैं। उसकी ख्याति धीरे-धीरे सभी जगह फैलने लगती है। उसके आस-पास के लोग उसके रिश्तेदार कुछ उसकी तारीफ करते हैं तो कुछ मजाक भी उड़ाते थे।
रूपा खुद में खुद को स्पेशल समझने लगी थी।
इधर अर्चना कि ईष्र्या उसे जीने नहीं दे रही थी। एक दिन उसने अपने पिता से कहा - बनवारी अंकल कितने गरीब हैं? आपको नहीं लगता हम लोगों को उनकी मदद करनी चाहिए? अर्चना के पिता जी – हां-हां क्यों नहीं? कोई काम है तो बोलो? क्यों रूपा को पैसे चाहिए? तब अर्चना चिढ़ती हुई बोलती हैं -पैसे लेकर वह क्या करेगी? आपको नहीं लगता वह इतनी बड़ी हो गई है, उसकी शादी कर देनी चाहिए? आप लोगों को तो कुछ दिखाई नहीं देता। मैं क्या बोलूं? बनवारी अंकल बेचारे कितने परेशान होते रहते हैं।
अर्चना के पिता अपनी बेटी की मनोदशा को भांपते हुए – बेटा कंपटीशन से कभी डरना नहीं चाहिए और तुम उसकी शादी की चिंता क्यों करती हो? यह उसके माता-पिता का मामला है तुम इसमें ना ही पड़ो तो अच्छा है। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।
अर्चना गुस्से में – अच्छा आपको लगता है कि मैं चाहती हूं कि रूपा कि पढ़ाई पूरी ना हो? उसी दिन तो आंटी फूट-फूटकर रो रही थी। मैंने सोचा अगर आप लोग मदद कर देंगे तो अच्छा रहेगा। उसी समय अर्चना की मां आ जाती हैं – इनको तो किसी भी काम में मेरी बेटी की ही गलती दिखती है। एक बार बोल दिया। कोई आदमी किसी की क्या भलाई करेगा जब उसे लगता है कि यह व्यक्ति गलत है। कोई किसी की कैसे मदद कर सकता है?
अर्चना के पिता को खुद में ही शर्मिंदगी महसूस होती हैं और वह कहती हैं – अच्छा! मैं जाकर बात करता हूं।
अर्चना के पिता – अरे बनवारी! सुना है तू अपनी लड़की की शादी करना चाहता है? एक लड़का है मेरी नजर में कहोगे तो बात आगे बढ़ाऊंगा।
बनवारी बहुत खुश हो जाता है वह तो यही चाह रहा था कि बेटी के हाथ पिले कर दे और वह अपनी पत्नी के पास जाता है – रूपा का भाग्य बहुत तेज है अर्चना के पिता जी आए हुए थे बता रहे थे उन्होंने रूपा के लिए कोई लड़का देख रखा है। भले लोग हैं अच्छे घर में लड़की चली जाएगी तो अच्छा होगा। रूपा की मां बहुत खुश हो जाती है लेकिन जैसे ही यह बात रूपा को पता चलती है उसे समझते देर नहीं लगती यह सारा किया-धरा अर्चना का ही है।
रूपा को कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या करें? गुस्से में वह अर्चना के पास जाती है – तुम्हें क्या लगता है मैं तुम्हारी इन फालतू हरकतों से डर जाऊंगी? क्या जरूरत थी अपने पिताजी को मेरे पिता के पास भेजने की? मुझे नहीं शादी करनी।
अर्चना थोड़ा गुरूर से - यह बात मुझसे नहीं, जा कर अपने बाप से बोलो। अगर हिम्मत है तो?
रूपा समझ नहीं पाती कि वह अर्चना से क्या कहें? रूपा एकदम असहाय शांत बिल्कुल थमे हुए जल की भाती वहां से वह अपने घर वापस चली आती है।
रूपा के मां और पिताजी रूपा से – क्या हुआ बेटा क्या बात है? रूपा कुछ नहीं बोलती और चादर तान कर लेट जाती है।
रूपा की मां समझ नहीं पाती कि आखिरकार इस लड़की को क्या हो गया है। वह रूपा को गालियां देना शुरू कर देती है – इसकी तो मति मारी गई है, जब कोई बात पूछो तो सीधे चादर तान देती हैं। कोई जाने तब ना कुछ कहे। यह लड़की किसी दिन जीने नहीं देगी। डायन है डायन पूरी तरीके से। कोई काम-धाम तो करना नहीं है चादर तान के सो जाना है।
रूपा की मां को रूपा की सिसकियां सुनाई देती हैं।
बनवारी भी दौड़ कर आता हैं – क्या बात है बेटा क्या हुआ? क्यों रो रही हो? तभी रूपा – नहीं पिताजी कुछ नहीं हुआ। बनवारी अपनी बेटी को अपनी बाहों में समेटते हुए - बोलो बेटा क्या बात है? रूपा की सिसकियां चीख में बदल जाती है। बनवारी जी समझ नहीं पाते क्या ऐसी बात हो गई है कि मेरे बच्ची फूट-फूट कर रो रही है।
रूपा – आपको पता है पिताजी अर्चना के पिता से यहां पर क्यों आए थे?
बनवारी – हां! मुझे पता है। तुम्हारी शादी के लिए आए हुए थे। नहीं! पिताजी। अर्चना को लगता है कि मैं उससे आगे निकल जाऊंगी इसलिए यह उसकी तरकीब थी। इसीलिए मैं उसके पास गई थी। जब मैं वहां पहुंची तब उसने कहा अगर हिम्मत है तो यह बात जाकर अपने बाप को बता। मैं जानती हूं मेरे बोलने ना बोलने से आप लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। आप वही करेंगे जो आप करना चाहते हैं। शायद मेरी किस्मत ही खराब थी, जो मैंने इस घर में जन्म लिया। मुझे कभी आगे नहीं बढ़ने दिया गया। इतना कहते ही वह फिर से फूट-फूट कर रोने लगती है। रूपा के मुंह से यह बात सुनकर तो बनवारी जी के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। रूपा को पकड़कर बनवारी जी भी फूट-फूट कर रोने लगते हैं और बोलते हैं – बेटा हम लोग गरीब हैं और हमें लगता था गरीब लोग मेहनत-मज़ूरी करके ही पैसे कमा सकते हैं लेकिन तुमने हमें एहसास दिलाया शिक्षा भी कोई चीज है, जिससे आदमी सम्मान और पैसे दोनों कमा सकता है। तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम्हारी शादी बिना तुम्हारी मर्जी के कर दूंगा। वह कौन होते हैं अर्चना के पिताजी जो तुम्हारा भाग्य तय करें। मैं तुम्हारा पिता हूं और मैं तुम्हारा भाग्य तय करूंगा। मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगा। तू जैसे चाहती हैं वैसे जिए।
और उसके परिवार को काफी समझाया था आगे पढ़ाई करने के लिए। रूपा के पिताजी तो मान गए थे इस चीज़ के लिए लेकिन रुपा की मां तैयारी नहीं हो रही थी। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कह दिया था रूपा को – मैट्रिक कर ली हो शादी हो जाएगी। घर के काम का सीख लो यही आगे काम देगा, नहीं तो तेरी दुर्गति हो जाएगी। जब देखो पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! अरे! पढ़-लिख के कलेक्टर बनना है तुमको का। तुमको पढ़ाई करनी है तो कर लेकिन मेरे घर के काम में एक भी बाधा हुई तो मैं उसी दिन तुम्हारी किताबों को जला दूंगी।
रूपा इन सब बातों को सुनने कि अभ्यस्त थी इसीलिए उसे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन अर्चना को काफी बुरा लग रहा था। अर्चना को अजीब लग रहा था कि उसकी मां ऐसा कैसे बोल सकती है फिर भी वह खुश थी क्योंकि अर्चना का काम निकल गया था।
वह रूपा के लिए 10+2 का फॉर्म लाती है। वह दोनों पढ़ने लगती है।
अर्चना को तो पढ़ाई करके उसे आगे काफी कुछ करना था इसलिए वह नई-नई किताबें लाती और पढ़ाई किया करती। रूपा का तो पढ़ाई में उतना मन नहीं लगता, शायद उसके घर का माहौल ही कुछ ऐसा था। परंतु अर्चना के साथ रहने का असर था कि वह भी काफी कुछ सीख गई थी। वह क्लास में तो पास कर ही जाया करती थी दुसरे शब्दों में कहें तो अर्चना के साथ रहते-रहते उसकी भी आंखें खुल गई थी।
रूपा ज्यों-ज्यों आगे बढ़ी, उसे एजुकेशन का महत्व समझ में आने लगा था।
एक बार की बात है जब रूपा B.A part-ll में रहती है तब अर्चना को ऐसा झटका देती है कि अर्चना को कुछ समझ में ही नहीं आता और अब अर्चना तथा रूपा की दोस्ती में दरार आ जाता है। रूपा अपने कॉलेज में टॉप कर जाती हैं। अर्चना को काफी आश्चर्य होता है, यह लड़की! यह लड़की कैसे टॉप कर सकती है। इसको ना तो खुद ही पढ़ने में मन लगता है ना ही इसकी मां पढ़ने देती है।
अर्चना रूपा से – तुमने जरूर कुछ किया है। रूपा – क्या बात करती हो? मैंने अच्छे से पढ़ाई किया है और मुझे लगता है मैं ही अपने फैमिली कि किस्मत बदल सकती हूं। अर्चना को यह सारी बातें अजीब लगती है पता नहीं यही बात न जाने कितनी बार अर्चना ने रूपा को समझाने की कोशिश की होगी। आज यही बात है रूपा के मुंह से सुनकर उसे ऐसा लग रहा था कि यह सब बाते रूपा के लिए बनी ही नहीं हो। अर्चना कुछ बोल तो नहीं पाती बस यूं ही – हूंह! तुम्हें क्या लगता है? तुम्हारे घर वाले क्या तुम्हें आगे पढ़ने देंगे? वह तो मैं थी नहीं तो तुम्हें तो मैट्रिक करा कर ही घर बैठा देते।
रूपा बोलती है – हां कह तो तुम सही रही हो लेकिन अब मैं वो करूंगी जो मैं करना चाहती हूं। अर्चना उसे ज्यादा कुछ नहीं कहती लेकिन रिश्ते में कहीं ना कहीं खटास आ जाती हैं क्योंकि रूपा अब उसकी दोस्त नहीं competitor बन चुकी थी।
आए दिन सभी अर्चना की तुलना रूपा से करने लगे थे। अर्चना इस बात से इतना परेशान होती है कि वह रूपा का साथ छोड़ ही देती है।
रूपा के घर वाले तो पहले उसकी पढ़ाई के लिए तैयार नहीं था फिर एक दिन उसके पिता का मालिक घर के बरामदे में खड़ा रहता है तब उसका मालिक आता है - क्या बनवारी क्या कर रहा है, काम पर काहे नहीं आ रहा? बनवारी – मालिक तबियत ठीक नहीं था इसीलिए नहीं आ पाया। अच्छा कोई बात नहीं अब तो ठीक है ना इधर से गुजर रहा था इसलिए पूछ भी लिया। हां-हां कल से जरूर आऊंगा। अच्छी बात है तब बाल-बच्चा सब क्या कर रहा है? वैसे तो कुछ खास नहीं कहीं-कहीं काम कर रहे हैं। बेटी पढ़ रही है अभी B.A. में। बोलती है नौकरी करेगी। वाह बनवारी तूने तो कमाल कर दिया लोग यहां बेटे को नहीं पढ़ा पाते और तूने ने बेटी को पढ़ा दिया।
बनवारी की आंखों में यह बातें सुनकर गुरुर आ जाता है। हां-हां लोग तो यहां बेटे को नहीं पढ़ाया था मैंने बेटी को पढ़ा दिया। ऐसे तो रूपा के पढ़ाई में उनके मां-बाप का कुछ खास योगदान नहीं रहता लेकिन आज उसके बाप का सीना उसी की वजह से फूल जाता है। पता है साहब लड़की ना टॉप की है बोल रही थी हम तो पढ़े-लिखे हैं नहीं आप तो बड़े लोग हैं आप लोग ही समझ सकते हैं टॉप का मतलब क्या होता है? ओहो! तेरी लड़की पढ़ने में बहुत तेज है अच्छा नाम करेगी।
बनवारी खुश हो जाता है और अपनी बेटी को पढ़ाने में लग जाता है। रूपा भी मन लगाकर पढ़ने लगती हैं। उसकी ख्याति धीरे-धीरे सभी जगह फैलने लगती है। उसके आस-पास के लोग उसके रिश्तेदार कुछ उसकी तारीफ करते हैं तो कुछ मजाक भी उड़ाते थे।
रूपा खुद में खुद को स्पेशल समझने लगी थी।
इधर अर्चना कि ईष्र्या उसे जीने नहीं दे रही थी। एक दिन उसने अपने पिता से कहा - बनवारी अंकल कितने गरीब हैं? आपको नहीं लगता हम लोगों को उनकी मदद करनी चाहिए? अर्चना के पिता जी – हां-हां क्यों नहीं? कोई काम है तो बोलो? क्यों रूपा को पैसे चाहिए? तब अर्चना चिढ़ती हुई बोलती हैं -पैसे लेकर वह क्या करेगी? आपको नहीं लगता वह इतनी बड़ी हो गई है, उसकी शादी कर देनी चाहिए? आप लोगों को तो कुछ दिखाई नहीं देता। मैं क्या बोलूं? बनवारी अंकल बेचारे कितने परेशान होते रहते हैं।
अर्चना के पिता अपनी बेटी की मनोदशा को भांपते हुए – बेटा कंपटीशन से कभी डरना नहीं चाहिए और तुम उसकी शादी की चिंता क्यों करती हो? यह उसके माता-पिता का मामला है तुम इसमें ना ही पड़ो तो अच्छा है। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।
अर्चना गुस्से में – अच्छा आपको लगता है कि मैं चाहती हूं कि रूपा कि पढ़ाई पूरी ना हो? उसी दिन तो आंटी फूट-फूटकर रो रही थी। मैंने सोचा अगर आप लोग मदद कर देंगे तो अच्छा रहेगा। उसी समय अर्चना की मां आ जाती हैं – इनको तो किसी भी काम में मेरी बेटी की ही गलती दिखती है। एक बार बोल दिया। कोई आदमी किसी की क्या भलाई करेगा जब उसे लगता है कि यह व्यक्ति गलत है। कोई किसी की कैसे मदद कर सकता है?
अर्चना के पिता को खुद में ही शर्मिंदगी महसूस होती हैं और वह कहती हैं – अच्छा! मैं जाकर बात करता हूं।
अर्चना के पिता – अरे बनवारी! सुना है तू अपनी लड़की की शादी करना चाहता है? एक लड़का है मेरी नजर में कहोगे तो बात आगे बढ़ाऊंगा।
बनवारी बहुत खुश हो जाता है वह तो यही चाह रहा था कि बेटी के हाथ पिले कर दे और वह अपनी पत्नी के पास जाता है – रूपा का भाग्य बहुत तेज है अर्चना के पिता जी आए हुए थे बता रहे थे उन्होंने रूपा के लिए कोई लड़का देख रखा है। भले लोग हैं अच्छे घर में लड़की चली जाएगी तो अच्छा होगा। रूपा की मां बहुत खुश हो जाती है लेकिन जैसे ही यह बात रूपा को पता चलती है उसे समझते देर नहीं लगती यह सारा किया-धरा अर्चना का ही है।
रूपा को कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या करें? गुस्से में वह अर्चना के पास जाती है – तुम्हें क्या लगता है मैं तुम्हारी इन फालतू हरकतों से डर जाऊंगी? क्या जरूरत थी अपने पिताजी को मेरे पिता के पास भेजने की? मुझे नहीं शादी करनी।
अर्चना थोड़ा गुरूर से - यह बात मुझसे नहीं, जा कर अपने बाप से बोलो। अगर हिम्मत है तो?
रूपा समझ नहीं पाती कि वह अर्चना से क्या कहें? रूपा एकदम असहाय शांत बिल्कुल थमे हुए जल की भाती वहां से वह अपने घर वापस चली आती है।
रूपा के मां और पिताजी रूपा से – क्या हुआ बेटा क्या बात है? रूपा कुछ नहीं बोलती और चादर तान कर लेट जाती है।
रूपा की मां समझ नहीं पाती कि आखिरकार इस लड़की को क्या हो गया है। वह रूपा को गालियां देना शुरू कर देती है – इसकी तो मति मारी गई है, जब कोई बात पूछो तो सीधे चादर तान देती हैं। कोई जाने तब ना कुछ कहे। यह लड़की किसी दिन जीने नहीं देगी। डायन है डायन पूरी तरीके से। कोई काम-धाम तो करना नहीं है चादर तान के सो जाना है।
रूपा की मां को रूपा की सिसकियां सुनाई देती हैं।
बनवारी भी दौड़ कर आता हैं – क्या बात है बेटा क्या हुआ? क्यों रो रही हो? तभी रूपा – नहीं पिताजी कुछ नहीं हुआ। बनवारी अपनी बेटी को अपनी बाहों में समेटते हुए - बोलो बेटा क्या बात है? रूपा की सिसकियां चीख में बदल जाती है। बनवारी जी समझ नहीं पाते क्या ऐसी बात हो गई है कि मेरे बच्ची फूट-फूट कर रो रही है।
रूपा – आपको पता है पिताजी अर्चना के पिता से यहां पर क्यों आए थे?
बनवारी – हां! मुझे पता है। तुम्हारी शादी के लिए आए हुए थे। नहीं! पिताजी। अर्चना को लगता है कि मैं उससे आगे निकल जाऊंगी इसलिए यह उसकी तरकीब थी। इसीलिए मैं उसके पास गई थी। जब मैं वहां पहुंची तब उसने कहा अगर हिम्मत है तो यह बात जाकर अपने बाप को बता। मैं जानती हूं मेरे बोलने ना बोलने से आप लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। आप वही करेंगे जो आप करना चाहते हैं। शायद मेरी किस्मत ही खराब थी, जो मैंने इस घर में जन्म लिया। मुझे कभी आगे नहीं बढ़ने दिया गया। इतना कहते ही वह फिर से फूट-फूट कर रोने लगती है। रूपा के मुंह से यह बात सुनकर तो बनवारी जी के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। रूपा को पकड़कर बनवारी जी भी फूट-फूट कर रोने लगते हैं और बोलते हैं – बेटा हम लोग गरीब हैं और हमें लगता था गरीब लोग मेहनत-मज़ूरी करके ही पैसे कमा सकते हैं लेकिन तुमने हमें एहसास दिलाया शिक्षा भी कोई चीज है, जिससे आदमी सम्मान और पैसे दोनों कमा सकता है। तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम्हारी शादी बिना तुम्हारी मर्जी के कर दूंगा। वह कौन होते हैं अर्चना के पिताजी जो तुम्हारा भाग्य तय करें। मैं तुम्हारा पिता हूं और मैं तुम्हारा भाग्य तय करूंगा। मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगा। तू जैसे चाहती हैं वैसे जिए।






यह कहानी दिल को छू जाती हैं। यह सच है कि आप जब गरीब होते हैं तो आपको अपने जीवन को बेहतर बनाने के तरीके नहीं पता होता है और जो अनजाने में आप की मदद करते हैं वहीं इन्सान आपकी काबिलियत से नफ़रत करने लगता है। यह सब नजरिये की बात है।
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