अपने अंदर का घूटन जो रिश्ते को तार-तार कर दे
तान्या सुमन से – सुमन इन दिनों तुम दिखाई नहीं दे रहे थे? कहीं गए थे क्या? सुमन – नहीं यार कहीं नहीं। बस यूं ही थोड़ा बीमार था, इसलिए नहीं आ रहा था। ओ, तो कैसे हो अब? हां ठीक हूं, लेकिन क्या कहूं? ठीक हूं, क्या कहूं? मतलब क्या है तुम्हारा? ठीक नहीं लग रहा है? सुमन सब कुछ ठीक होते हुए चीजें खराब हो जाती हैं। यही जिंदगी का दस्तूर है तान्या। मैं तुम्हें क्या कहूं? तान्या थोड़ा आश्चर्य से क्या बात करते हो? मैं ठीक से समझ नहीं पा रही हूं। सब कुछ ठीक है फिर चीजें कैसे खराब हो जाती है? यह तो एक अजीब-सा द्वंवाद है। तुम्हें क्या लगता है? सुमन – अरे यार मैं तुम्हें क्या बताऊं? मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि चीजें क्यों ठीक है या सब गड़बड़ है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं, इसलिए इस बात को तुम्हें भी समझा नहीं सकता। तान्या सुमन कि बात बीच में ही काटते हुए – क्यों तुम इतनी उलझन में क्यों हो? जो बात है साफ-साफ कह सकते हो, आखिर मैं तुम्हारी दोस्त हूं। सुमन – हां तुम दोस्त हो इसलिए यह बातें नहीं समझ सकती और शायद मैं तुम्हें इतना खुलकर भी नहीं बता सकता। मैं नहीं समझा सकता तुम्हें कि मेरी जिंदगी में क्या क्या चल रहा है? तान्या बौखला जाती है। उसे लगता है जो लड़का मुझे आज तक अपनी संगिनी कहता था, वह तुरंत मुझे एक दोस्त इतने आराम से कैसे कह कर निकल सकता है और वह अपने बौखलाहट में वहां से खड़ी हो जाती है और जाने लगती है।
सुमन उसका पीछे से हाथ पकड़ लेता है – क्या हुआ बस गुस्सा हो गई? तान्या – क्योंकि हम सिर्फ दोस्त हैं और मुझे नहीं लगता मुझे ज्यादा बात करनी चाहिए तुमसे। मुझे और भी काम है। सुमन – तुम्हारी यह बौखलाहट सब कुछ बयां कर देती है, बस तुम्हारी जुबान से कुछ नहीं निकलता। तान्या – खुद में शरमा जाती है और चुपचाप बैठ जाती है। सब जानते हुए भी तुम अनजान बनते हो और मैं अनजान बनकर भी सब समझती हूं, फिर भी तुम्हारे अंदर कितना कुछ दबा है, यह बातें मैं नहीं जान सकती। मुझे तो लगता है तुम्हारे अंदर जो चीजें हैं, वह एक समंदर की तरह है। मैं जितना ही ज्यादा समझने की कोशिश करती हूं वह उतना ही गहरा होते जाता है और उस गहराई को नापना मेरे बस की बात नहीं है। सुमन तान्या से – मैं अपने घर के झंझटों से तुम्हें दूर रखना चाहता हूं। क्या कहूं? क्या सुनाऊं? मुझे लगता है तुम इतनी खुश मिजाज हो और तुम इतनी अच्छी हो, तुम्हारी जिंदगी इतनी अच्छी चल रही है, तो मैं अपने झंझटों में तुम्हें क्यों फंसा लूं, इसीलिए मैं तुम्हें कुछ कहना नहीं चाहता और हम दोस्त हैं। यह दोस्ती कितनी प्यारी है, मेरी जिंदगी में कभी और कुछ नहीं था, कभी हो भी नहीं सकता क्योंकि जब तुम्हारा साथ रहता है, तो मैं ऊंचाइयों पर खुद को देखता हूं, मुझे विश्वास होता है कि मैं हूं और मैं कुछ भी कर सकता हूं लेकिन मेरे पास नहीं होती हो तब दुनिया मुझ पर ताने मारती है और मुझे एहसास दिलाती है मैंने जिंदगी में कुछ भी नहीं किया और मैं कभी कुछ कर ही नहीं सकता, इसलिए मैं तुमसे कुछ कह नहीं पाता। मैं समझ ही नहीं पाता कि मैं कहां से शुरू करूं अपनी जिंदगी की कहानी और कहां खत्म करूं, इसीलिए मेरा कुछ कहना संभव नहीं है।
तान्या भावुक हो जाती है और सुमन की बाहों में अपनी बाहों को डालकर बोलती है – तुम्हारी इतनी उलझन मुझसे बर्दाश्त नहीं होती क्या बात है कहो न? कहने से जी हल्का हो जाता है और तुम्हें नहीं लगता सारी चीजों की चाभी मेरे पास है शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं? सुमन तान्या को अपने आगोश में लेते हुए – कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिसकी सूलझन किसी के पास नहीं होती। मैं तुम्हें कुछ खास कह नहीं सकता और तुम कुछ खास समझ नहीं पाओगी, क्योंकि तुम्हारे लिए चीजें है तो या तो सही होती है या गलत। मेरे लिए भी यही थी, लेकिन आज चीजें गलत होते हुए भी सही हो जाती हैं और सही होते हुए भी गलत। कुछ इसी तरह के द्वंदवाद में फंसी है मेरी जिंदगी और मैं इस से बाहर नहीं निकल पा रहा हूं। तान्या सुमन के बातों से बोर होने लगती है – अब हमें चलना चाहिए। तुम ना ही मुझे समझा पाओगे और लगता है ना ही मैं समझ पाऊंगी। हमारी जिंदगी जैसे हैं वैसे ही ठीक है। तुम अपनी प्रॉब्लम को देखो और मुझे और भी काम है।
तान्या की बातें सुनकर सुमन को एक धक्का-सा लगता है। उसे लगता है जिस लड़की को मैं अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता हूं आज वह लड़की मुझे छोड़ कर अपनी जिंदगी के बारे में बात कर रही है। एक बार तो और कह दिया होता, हां मैं जाना चाहती हूं लेकिन नहीं इसे तो बस अपनी ही पड़ी है। वहीं तान्या अपने द्वंदवाद में फंसी सोचती है – कितना भी मनौउवत करो इसे कुछ कहना तो है नहीं, बिना मतलब का अपना सर खपाना है। इससे अच्छा है मैं यहां से निकलती हूं। जब इसके दिमाग में आएगा तब कह हीं देगा। वैसे भी जब पूछो तब बताना नहीं है और ना पूछो तो खुद ही पीछे पीछे आ कर अपनी बातें रख देता है मुझे याद आता है उस दिन की वह बात जब बहुत जिद करके पूछ रही थी बताओ ना कौन सी ऐसी बात है मुझ में जो तुम्हें पसंद नहीं है इस बात पर हम लोगों के बीच हुई थी लेकिन उसने एक साथ अपने मुंह से ना निकाला था और जब मैं अपने दोस्त से बात कर रही थी।
तब उसने अगर कह दिया था मुझे पसंद नहीं तुम घंटो किसी से यूं बातें करो। मुझे इतना आश्चर्य हुआ था, जितना जिंदगी में शायद ही कभी हुआ हो। मैंने अपना फोन कट करके उसे पूछा था दो दिन से मैं पूछ रही हूं तब तो तुम्हारे मुंह से ना निकला और आज बिना पूछे और बिना कहे फटाक से मेरे सामने बोल रहे हो मुझे यह पसंद नहीं कि तुम घंटो किसी से बातें करो। काश यह बात तुम पहले ही बोल देते तो मैं अपने किसी भी दोस्तों से कभी इतनी लंबी बातें नहीं की होती। उसकी चीजें तो हमेशा तभी शुरू होती हैं जब मैं कोई गलती कर दूं। वो पहले तो मुझे आगाह ही नहीं कर सकता इसलिए तो हमारे रिश्ते में खटास आती है। और ये बात इसकी समझ से परे है। तान्या यही सब सोचते हुए वहां से उठ कर चली जाती है, जबकि सुमन सोचता है कितनी बेरुखी भरी जिंदगी है मेरी और यह रिश्ता कितना खराब है। जब मैं इतने प्रॉब्लम में हूं तो इसे कुछ पड़ी ही नहीं है। आराम से महारानी की तरह उठी और चल दी। एक बार पीछे पलट कर देखने की भी फुर्सत नहीं है।
दोनों अपने-अपने उलझनों में उलझे एक दूसरे से बिना कुछ कहे और बहुत कुछ उम्मीदें लिए अपने-अपने घर की तरफ चले जाते हैं। तान्या सोचती है सुमन अब फोन करेगा तब फोन करेगा सुमन का फोन नहीं आता है क्योंकि सुमन तान्या से कहीं ना कहीं दुःखी था और वह सोच रहा था गीता ने उसे फोन करेगी। इसी ईगो में समय बीत जाता हैं। दोनों में से कोई एक-दूसरे को फोन नहीं करता। झगड़े की कोई बात नहीं थी बस अहम बीच में आ रहा था। सुमन को लग रहा था तान्या गलत है और तान्या को लग रहा था सुमन गलत है। इसी चक्कर में दोनों में से कोई एक-दूसरे को फोन नहीं करता। दूसरे दिन जब वे कॉलेज आते हैं तब तान्या कुछ बोलती सुमन से इससे पहले वह देखती है, उसकी तरफ देख कर भी सुमन नहीं देखता, तब उसे लगता है ऊफ! इतना घमंड, रहने दो मुझे भी कोई जरूरत नहीं पड़ी है। सुमन को लगता है कितनी घमंडी है यह लड़की एक तो फोन नहीं किया पहुंचने के बाद और अब देख कर भी नहीं देख रही हैं। मुझे क्या पड़ी हुई है जाओ जो समझना है समझो। जो करना है करो वह तो आज के बाद कुछ बोलने वाला ही नहीं।
तान्या और सुमन दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे पर यह बेरुखी दोनों को अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। सुमन का दोस्त अर्पित सुमन के पास आकर बोलता है – क्या बात है यार तुम दोनों के बीच झगड़ा हो गया है क्या? सुमन बौखला जाता है क्योंकि जब सच्चाई जुबां पर आती है तो लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं कुछ ऐसा ही सुमन के साथ भी हुआ था। उसे लगा कैसे इसे पता चल गया और वह बहुत गुस्से में कहता है – किससे झगड़ा हो गया? तुमसे? अर्पित बोलता है – नहीं यार मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूं। मैं तो तान्या की बात कर रहा हूं। सुमन गुस्से में – मुझे क्या पड़ी है कि मैं उससे झगड़ा करूं? वैसी दसो लड़की मेरे पीछे घूमती है। सुमन की यह बात उसके दोस्त को कुछ खास अच्छी नहीं लगती। वह सोच भी नहीं सकता था कभी कि सुमन कभी तान्या के बारे में ऐसी भी सोच रख सकता है l लेकिन अंदर ही अंदर वह खुश हो जाता है। इस लड़के से तो पीछा छूटा, अच्छा हुआ। तान्या कितनी अच्छी लड़की है।
वह लड़का इस बात का ढिंढोरा पूरे कॉलेज में पीट देता है। यह बात तान्या को भी पता चलती है। सुमन की यह बात तान्या बर्दाश्त नहीं कर पाती। उसे लगता है उसने कह दिया कि मेरे जैसी दसो लड़कियां उसके पीछे घूमती हैं। तान्या को भी इस बात पर गुस्सा था। उसने भी सबसे कह दिया उसके जैसे सैकड़ों लड़के मेरे पीछे घूमते हैं। क्या तुम लोगों को नहीं पता है कितने दिन मेरे पीछे घूमने के बाद मैंने उसे हां कहा था और अब घमंड में वह मुझे यह बातें कह रहा है। उन दोनों के बीच बिना आमने-सामने हुए झगड़ा कहां से कहां तक बढ़ते चला गया। दोनों के बीच की दूरियां इतनी बढ़ गई कि वह न अपनी नजरें मिला पाते थे और ना ही एक-दूसरे से बात कर पाते थे।
सुमन उसका पीछे से हाथ पकड़ लेता है – क्या हुआ बस गुस्सा हो गई? तान्या – क्योंकि हम सिर्फ दोस्त हैं और मुझे नहीं लगता मुझे ज्यादा बात करनी चाहिए तुमसे। मुझे और भी काम है। सुमन – तुम्हारी यह बौखलाहट सब कुछ बयां कर देती है, बस तुम्हारी जुबान से कुछ नहीं निकलता। तान्या – खुद में शरमा जाती है और चुपचाप बैठ जाती है। सब जानते हुए भी तुम अनजान बनते हो और मैं अनजान बनकर भी सब समझती हूं, फिर भी तुम्हारे अंदर कितना कुछ दबा है, यह बातें मैं नहीं जान सकती। मुझे तो लगता है तुम्हारे अंदर जो चीजें हैं, वह एक समंदर की तरह है। मैं जितना ही ज्यादा समझने की कोशिश करती हूं वह उतना ही गहरा होते जाता है और उस गहराई को नापना मेरे बस की बात नहीं है। सुमन तान्या से – मैं अपने घर के झंझटों से तुम्हें दूर रखना चाहता हूं। क्या कहूं? क्या सुनाऊं? मुझे लगता है तुम इतनी खुश मिजाज हो और तुम इतनी अच्छी हो, तुम्हारी जिंदगी इतनी अच्छी चल रही है, तो मैं अपने झंझटों में तुम्हें क्यों फंसा लूं, इसीलिए मैं तुम्हें कुछ कहना नहीं चाहता और हम दोस्त हैं। यह दोस्ती कितनी प्यारी है, मेरी जिंदगी में कभी और कुछ नहीं था, कभी हो भी नहीं सकता क्योंकि जब तुम्हारा साथ रहता है, तो मैं ऊंचाइयों पर खुद को देखता हूं, मुझे विश्वास होता है कि मैं हूं और मैं कुछ भी कर सकता हूं लेकिन मेरे पास नहीं होती हो तब दुनिया मुझ पर ताने मारती है और मुझे एहसास दिलाती है मैंने जिंदगी में कुछ भी नहीं किया और मैं कभी कुछ कर ही नहीं सकता, इसलिए मैं तुमसे कुछ कह नहीं पाता। मैं समझ ही नहीं पाता कि मैं कहां से शुरू करूं अपनी जिंदगी की कहानी और कहां खत्म करूं, इसीलिए मेरा कुछ कहना संभव नहीं है।
तान्या भावुक हो जाती है और सुमन की बाहों में अपनी बाहों को डालकर बोलती है – तुम्हारी इतनी उलझन मुझसे बर्दाश्त नहीं होती क्या बात है कहो न? कहने से जी हल्का हो जाता है और तुम्हें नहीं लगता सारी चीजों की चाभी मेरे पास है शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं? सुमन तान्या को अपने आगोश में लेते हुए – कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिसकी सूलझन किसी के पास नहीं होती। मैं तुम्हें कुछ खास कह नहीं सकता और तुम कुछ खास समझ नहीं पाओगी, क्योंकि तुम्हारे लिए चीजें है तो या तो सही होती है या गलत। मेरे लिए भी यही थी, लेकिन आज चीजें गलत होते हुए भी सही हो जाती हैं और सही होते हुए भी गलत। कुछ इसी तरह के द्वंदवाद में फंसी है मेरी जिंदगी और मैं इस से बाहर नहीं निकल पा रहा हूं। तान्या सुमन के बातों से बोर होने लगती है – अब हमें चलना चाहिए। तुम ना ही मुझे समझा पाओगे और लगता है ना ही मैं समझ पाऊंगी। हमारी जिंदगी जैसे हैं वैसे ही ठीक है। तुम अपनी प्रॉब्लम को देखो और मुझे और भी काम है।
तान्या की बातें सुनकर सुमन को एक धक्का-सा लगता है। उसे लगता है जिस लड़की को मैं अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता हूं आज वह लड़की मुझे छोड़ कर अपनी जिंदगी के बारे में बात कर रही है। एक बार तो और कह दिया होता, हां मैं जाना चाहती हूं लेकिन नहीं इसे तो बस अपनी ही पड़ी है। वहीं तान्या अपने द्वंदवाद में फंसी सोचती है – कितना भी मनौउवत करो इसे कुछ कहना तो है नहीं, बिना मतलब का अपना सर खपाना है। इससे अच्छा है मैं यहां से निकलती हूं। जब इसके दिमाग में आएगा तब कह हीं देगा। वैसे भी जब पूछो तब बताना नहीं है और ना पूछो तो खुद ही पीछे पीछे आ कर अपनी बातें रख देता है मुझे याद आता है उस दिन की वह बात जब बहुत जिद करके पूछ रही थी बताओ ना कौन सी ऐसी बात है मुझ में जो तुम्हें पसंद नहीं है इस बात पर हम लोगों के बीच हुई थी लेकिन उसने एक साथ अपने मुंह से ना निकाला था और जब मैं अपने दोस्त से बात कर रही थी।
तब उसने अगर कह दिया था मुझे पसंद नहीं तुम घंटो किसी से यूं बातें करो। मुझे इतना आश्चर्य हुआ था, जितना जिंदगी में शायद ही कभी हुआ हो। मैंने अपना फोन कट करके उसे पूछा था दो दिन से मैं पूछ रही हूं तब तो तुम्हारे मुंह से ना निकला और आज बिना पूछे और बिना कहे फटाक से मेरे सामने बोल रहे हो मुझे यह पसंद नहीं कि तुम घंटो किसी से बातें करो। काश यह बात तुम पहले ही बोल देते तो मैं अपने किसी भी दोस्तों से कभी इतनी लंबी बातें नहीं की होती। उसकी चीजें तो हमेशा तभी शुरू होती हैं जब मैं कोई गलती कर दूं। वो पहले तो मुझे आगाह ही नहीं कर सकता इसलिए तो हमारे रिश्ते में खटास आती है। और ये बात इसकी समझ से परे है। तान्या यही सब सोचते हुए वहां से उठ कर चली जाती है, जबकि सुमन सोचता है कितनी बेरुखी भरी जिंदगी है मेरी और यह रिश्ता कितना खराब है। जब मैं इतने प्रॉब्लम में हूं तो इसे कुछ पड़ी ही नहीं है। आराम से महारानी की तरह उठी और चल दी। एक बार पीछे पलट कर देखने की भी फुर्सत नहीं है।
दोनों अपने-अपने उलझनों में उलझे एक दूसरे से बिना कुछ कहे और बहुत कुछ उम्मीदें लिए अपने-अपने घर की तरफ चले जाते हैं। तान्या सोचती है सुमन अब फोन करेगा तब फोन करेगा सुमन का फोन नहीं आता है क्योंकि सुमन तान्या से कहीं ना कहीं दुःखी था और वह सोच रहा था गीता ने उसे फोन करेगी। इसी ईगो में समय बीत जाता हैं। दोनों में से कोई एक-दूसरे को फोन नहीं करता। झगड़े की कोई बात नहीं थी बस अहम बीच में आ रहा था। सुमन को लग रहा था तान्या गलत है और तान्या को लग रहा था सुमन गलत है। इसी चक्कर में दोनों में से कोई एक-दूसरे को फोन नहीं करता। दूसरे दिन जब वे कॉलेज आते हैं तब तान्या कुछ बोलती सुमन से इससे पहले वह देखती है, उसकी तरफ देख कर भी सुमन नहीं देखता, तब उसे लगता है ऊफ! इतना घमंड, रहने दो मुझे भी कोई जरूरत नहीं पड़ी है। सुमन को लगता है कितनी घमंडी है यह लड़की एक तो फोन नहीं किया पहुंचने के बाद और अब देख कर भी नहीं देख रही हैं। मुझे क्या पड़ी हुई है जाओ जो समझना है समझो। जो करना है करो वह तो आज के बाद कुछ बोलने वाला ही नहीं।
तान्या और सुमन दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे पर यह बेरुखी दोनों को अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। सुमन का दोस्त अर्पित सुमन के पास आकर बोलता है – क्या बात है यार तुम दोनों के बीच झगड़ा हो गया है क्या? सुमन बौखला जाता है क्योंकि जब सच्चाई जुबां पर आती है तो लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं कुछ ऐसा ही सुमन के साथ भी हुआ था। उसे लगा कैसे इसे पता चल गया और वह बहुत गुस्से में कहता है – किससे झगड़ा हो गया? तुमसे? अर्पित बोलता है – नहीं यार मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूं। मैं तो तान्या की बात कर रहा हूं। सुमन गुस्से में – मुझे क्या पड़ी है कि मैं उससे झगड़ा करूं? वैसी दसो लड़की मेरे पीछे घूमती है। सुमन की यह बात उसके दोस्त को कुछ खास अच्छी नहीं लगती। वह सोच भी नहीं सकता था कभी कि सुमन कभी तान्या के बारे में ऐसी भी सोच रख सकता है l लेकिन अंदर ही अंदर वह खुश हो जाता है। इस लड़के से तो पीछा छूटा, अच्छा हुआ। तान्या कितनी अच्छी लड़की है।
वह लड़का इस बात का ढिंढोरा पूरे कॉलेज में पीट देता है। यह बात तान्या को भी पता चलती है। सुमन की यह बात तान्या बर्दाश्त नहीं कर पाती। उसे लगता है उसने कह दिया कि मेरे जैसी दसो लड़कियां उसके पीछे घूमती हैं। तान्या को भी इस बात पर गुस्सा था। उसने भी सबसे कह दिया उसके जैसे सैकड़ों लड़के मेरे पीछे घूमते हैं। क्या तुम लोगों को नहीं पता है कितने दिन मेरे पीछे घूमने के बाद मैंने उसे हां कहा था और अब घमंड में वह मुझे यह बातें कह रहा है। उन दोनों के बीच बिना आमने-सामने हुए झगड़ा कहां से कहां तक बढ़ते चला गया। दोनों के बीच की दूरियां इतनी बढ़ गई कि वह न अपनी नजरें मिला पाते थे और ना ही एक-दूसरे से बात कर पाते थे।
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