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अपनी इच्छा शक्ति से बदल दो अपना भविष्य

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               समीरा सुबह-सुबह सनोज के लिए चाय बना रही थी। चाय कि प्याली सनोज के सामने रखते हुए – तुम्हें नहीं लगता हम लोगों को बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में डालना चाहिए? कब तक ले वह हिंदी मीडियम में पढ़ते रहेंगे? मुझे नहीं लगता इससे उनका कुछ भविष्य बनने वाला है। तभी सनोज समीरा को आंखें दिखाते हुए बोलता है – तुम्हें क्या लगता है मैं दिन रात घर में बैठा रहता हूं? बाहर जाता हूं, काम करता हूं। सौ खर्चें है।  उस पर से कॉन्वेंट का खर्चा, मुझे नहीं लगता मैं निकाल पाऊंगा। ये मुझसे अभी फिलहाल तो नहीं होनेवाला है। जैसे पढ़ रहा है पढ़ने दो, अभी छोटे ही तो है। धीरे-धीरे मैं कुछ जुगाड़ कर लूंगा तो उन्हें कान्वेंट में डाल दूंगा। तुम्हारी सुबह चाय के साथ यह बकवास मुझे पसंद नहीं है। तुम क्या चाहती हो? मैं एक दिन घर छोड़ कर चला जाऊंगा। तुम्हें क्या लगता है यह बच्चा मेरा नहीं है। तुम्ही उनकी मां हो? मैं उनका पिता नहीं हूं? जो रोज-रोज हर दिन मुझे यह ताने मारते रहती हो। कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा। अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो मुझे लगता है, सच में जिंदगी में ...

अपने अंदर का घूटन जो रिश्ते को तार-तार कर दे

           तान्या सुमन से – सुमन इन दिनों तुम दिखाई नहीं दे रहे थे? कहीं गए थे क्या? सुमन – नहीं यार कहीं नहीं। बस यूं ही थोड़ा बीमार था, इसलिए नहीं आ रहा था। ओ, तो कैसे हो अब? हां ठीक हूं, लेकिन क्या कहूं? ठीक हूं, क्या कहूं? मतलब क्या है तुम्हारा? ठीक नहीं लग रहा है? सुमन सब कुछ ठीक होते हुए चीजें खराब हो जाती हैं। यही जिंदगी का दस्तूर है तान्या। मैं तुम्हें क्या कहूं? तान्या थोड़ा आश्चर्य से क्या बात करते हो? मैं ठीक से समझ नहीं पा रही हूं। सब कुछ ठीक है फिर चीजें कैसे खराब हो जाती है? यह तो एक अजीब-सा द्वंवाद है। तुम्हें क्या लगता है? सुमन – अरे यार मैं तुम्हें क्या बताऊं? मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि चीजें क्यों ठीक है या सब गड़बड़ है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं, इसलिए इस बात को तुम्हें भी समझा नहीं सकता। तान्या सुमन कि बात बीच में ही काटते हुए – क्यों तुम इतनी उलझन में क्यों हो? जो बात है साफ-साफ कह सकते हो, आखिर मैं तुम्हारी दोस्त हूं। सुमन – हां तुम दोस्त हो इसलिए यह बातें नहीं समझ सकती और शायद मैं तुम्हें इतना खुलकर भी नहीं बता सकता। मैं नहीं...

खुद पर यकीन

         वह उदास खड़ी कुछ देर तक अपने बारे में सोचते रहती है। वह सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए पर मुझे कुछ हासिल ना हुआ। आज इन दीवारों के बीच खड़ी होकर क्या पाया है मैंने कुछ खास नहीं शायद कुछ भी नहीं। इस छोटे से घर जिसमें वह अकेली पड़ी हुई रहती है और खुद को कोसते रहती है। दूर कहीं बहुत दूर शायद ओझल होते हुए आंखों से उसके सपने देख रही थी फिर वह को कोसती हुई आकर बिस्तर पर लेट जाती है और सोचती है कितना कुछ किया है मैंने सबके लिए लेकिन उसका परिणाम कभी कुछ सही ना निकल सका। जितने लोगों के साथ मैंने काम किया या जितने लोगों के लिए मैंने बहुत कुछ किया आज उन लोगों में से कोई एक आदमी भी मेरे साथ आज खड़ा नजर नहीं आता और हर आदमी मुझे कंपीटीटर ही समझता है। मैं हताश बेसहारा इन दीवारों में अपना सर रगड़ रही हूं। तभी वह दुःखी होकर सोचती है - क्या मिला मुझे क्या मैं चाहती थी कुछ भी तो नहीं हुआ वैसा जैसा वह चाहती थी तभी उसके दिमाग में कुछ ख्याल ऐसे आते हैं कि वह अपनी डायरी उठा कर देखने लगती है।            डायरी के पन्ने पलटते-पलटते उसकी ...

दोस्ती में ज़हर

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         रूपा और अर्चना दो दोस्त रहती है। रूपा आगे पढ़ाई नहीं करना चाहती थी क्योंकि उसकी family उतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी। अर्चना आगे पढ़ना चाहती थी क्योंकि family चाहती थी कि वो आगे पढ़े। अर्चना सोचती थी कि अगर रूपा भी उसके साथ पढ़े तो बेहतर होगा नहीं तो उसे अकेले ही जाना पड़ेगा कॉलेज। इसलिए अर्चना ने रूपा      और उसके परिवार को काफी समझाया था आगे पढ़ाई करने के लिए। रूपा के पिताजी तो मान गए थे इस चीज़ के लिए लेकिन रुपा की मां तैयारी नहीं हो रही थी। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कह दिया था रूपा को – मैट्रिक कर ली हो शादी हो जाएगी। घर के काम का सीख लो यही आगे काम देगा, नहीं तो तेरी दुर्गति हो जाएगी। जब देखो पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! अरे! पढ़-लिख के कलेक्टर बनना है तुमको का। तुमको पढ़ाई करनी है तो कर लेकिन मेरे घर के काम में एक भी बाधा हुई तो मैं उसी दिन तुम्हारी किताबों को जला दूंगी।           रूपा इन सब बातों को सुनने कि अभ्यस्त थी इसीलिए उसे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन अर्चना को काफी बुरा लग रहा था। अर्चना को अजीब लग रहा ...

संस्कार

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                      दो कौवे आपस में बात कर रहे थे पता है आजकल कोयलों का आतंक है। जब देखो हमारे घोसले में अपने अंडे देकर चली जाती है। उसके अंडों को हम लोग अपना अंडा समझ कर सेते रहते हैं। वही बच्चें बड़े होकर हमारे बच्चों को मार देते है। दूसरा कौआ – नहीं-नहीं ऐसा नहीं है, अगर हम उन्हें अच्छे संस्कार देकर बड़ा करते तो क्या ऐसा होता? संस्कार ही तो सबसे बड़ी चीज होती है, शायद हम बच्चों को सेते समय ज्ञान परक वाली कहानियां सुनाएं तो हमें उनके और अपने अंडे में फर्क करने की जरूरत ही ना पड़े? संस्कार उन्हें हमारे बच्चों की रक्षा करने के लिए आगे बढ़ाएगा। पहले कौवे को दूसरे कौवे कि बात पसंद आ जाती है। पहला कौआ – तुम्हारी बात में दम है लेकिन आखिरकार है तो कोयल की ही औलाद। कोयल अपना कुछ ना कुछ अंश तो उसमें छोड़ ही देगी। दूसरा कौवा पहले कौवे से – गुण किसी का भी हो लेकिन संस्कार तो उसमें डाले ही जा सकते हैं। जन्म देने वाले से ज्यादा महान पालने वाला होता है। उसेसे भी ज्यादा महान शिक्षा देने वाला होता है अगर सही तरीके से शिक्षा दी जाए कोयल के ब...

आओ नेतृत्व करे

              रूपाली चिल्लाते हुए - मां मेरा नाश्ता कहां है। मां - अभी लाती हूं। रूपाली कुछ सोचते-सोचते टीवी ऑन कर देती है। रुपाली के चाचा - क्या बेटा कॉलेज जा रही हो? रूपाली - हां चाचा जी कॉलेज जा रही हूं। टीवी पर न्यूज़ आते रहता है। राजनीति कितनी गंदी हो गई है न चाचा जी? नहीं बेटा, यह तो शुरू से ही गंदी थी, बस लोगों के देखने का नजरिया है। अच्छा, नहीं पहले तो ऐसे-ऐसे संवाद नहीं बोले जाते थे। मर्यादाओं का ध्यान रखा जाता था लेकिन आजकल तो इतनी गंदी बातें बोली जाती हैं कि मन करता है न्यूज़ चैनल चेंज कर दूं। हम लोग क्या उम्मीदें करते हैं और क्या देखते हैं समाज में, अजीब लगता है। चाचाजी - नहीं बेटा ऐसा नहीं है। पहले भी चीजें ऐसी थी। राजनीति में चीजें अच्छी और बुरी दोनों दो तरह की हैं। लोग बस फेमस होना चाहते हैं सोचते हैं जितना ज्यादा चेहरा चमकेगा उतना ही मुझे फायदा होगा। इसीलिए अच्छे से अच्छे लोग भी कभी-कभी ऐसी बातें बोल देते हैं जिस पर वाद-विवाद और चर्चा-परिचर्चा होने लगती है। पहले भी ऐसी चीजें थी लेकिन आजकल सोशल मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण यह इतनी...

मां का सपना : बेटी ने सच किया

                  सुबह का वक्त था। धीरे-धीरे हवा चल रही थी। सनसनाती आवाजों में कुछ गूंज रहा था। स्वाति अभी कुछ समझ ही पाती की उधर से आवाज आती है। स्वाति!स्वाति! हां मां क्या हुआ? कुछ नहीं बेटा देख रहे हो पड़ोसी हल्ला कर रहे हैं। क्यों तुम तो झगड़े में नहीं हो न? ना-ना बेटा मैं क्यों झगड़ा करूंगी। वह लोग पता नहीं आपस में क्यो लड़ते रहते हैं? मुझे तो आज तक समझ मे नहीं आता जिस बेटे को इतनी मुश्किल से पढ़ाया लिखा है उसी से झगड़ा करने का क्या मतलब बनता है। रहने दो मां उन लोगों का तो रोज का काम है। तुम अपने काम पर ध्यान दो। हां हां हां तुम ठीक कहती हो। तुम क्या कर रही हो? कुछ नहीं अभी-अभी सुबह की ताजी हवा ले रही थी। अच्छा जल्दी करो तैयार हो जाओ कॉलेज नहीं जाना है? हां बस अब निकलने ही वाली थी, सोच रही थी जा कर नहा लू। हां-हां जाकर नहा लो मैं नाश्ता बना देती हूं। स्वाति तैयार होकर जब बाहर आती है। मां - इन दिनों मैं थोड़ी चिंतित हूं। किसलिए मां? सोच रही थी कि तुम कहीं अगर नौकरी कर लेती तो ठीक रहता। मेरे भी रिटायरमेंट के दिन नजदीक आ रहे हैं। तुम्हारा ...