वन की दृष्टि
एक विशाल वन था, जहाँ ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, छोटी-छोटी झाड़ियाँ, औषधीय पौधे और रंग-बिरंगे फूल अपनी-अपनी दुनिया में प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। बाहर से देखने पर वह वन जितना सुंदर दिखाई देता था, भीतर से उतना ही विचित्र था। वहाँ प्रकृति की विविधता तो थी, किंतु उस विविधता को स्वीकार करने वाला हृदय नहीं था। वन के मध्य एक विशाल बरगद का वृक्ष खड़ा था। उसकी जटाएँ धरती को छूती थीं, शाखाएँ दूर-दूर तक फैली थीं और उसकी छाया में अनेक छोटे पौधे पनपते थे। उसे अपनी विशालता पर बहुत अभिमान था। वह प्रायः छोटे पौधों से कहता, “देखो, मेरा विस्तार कितना विशाल है! मेरी छाया में कितने पौधे आश्रय पाते हैं। इस वन में मेरे समान महत्त्वपूर्ण भला कौन हो सकता है?” ...