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My loving Child

सारी खुशियां छीन कर कितना दर्द दिया है तुमने लेकिन, जो खुशी दी है तुमने वो जहां में कोई दूसरा देना सकता था हमें अक्सर लोग देखते थे अलग-अलग, तुमने बताया हम एक हैं मैं खो जाती हूं, तुम्हारे ख्यालों में यूं दूर कर दिया है तुमने मेरे हमसफ़र से या यूं कहो हमें बांध दिया है एक धागे में वर्तमान का डर भविष्य की चिंता फिर आज से एक मंजिल दे दिया है तुमने रुक गए थे कहीं हम चलने की वजह दे दी है तुमने पता नहीं कैसे आओगे तुम इस आंगन में इसलिए खोल दिए हैं घर के हर दरवाजे हमने तुम्हारे आने की उम्मीद से चमकती है मेरी आंखें जिसकी आंखों पर हम मर मिटे थे महकता है उसका आंगन बस तुम्हें पाने की इच्छा है तुझे सजाने और संवारने की तमन्नाएं अब तक हम देखते थे एक-दूसरे में ही दुनिया को अब देखती है हमारी आंखें तेरे नए आयाम को टूटते बिखरते रिश्ते को यूं सवांर दोगे तुम नदी से समंदर बना दिया है तुमने हमें रास्ते में भटकना था जिंदगी मेरी अब हर किसी को रास्ता दिखाना मंजिल है मेरी अब मंजिले नए हैं सोच नई आ जाओ अब इंतजार नहीं होता बेसब्र हूं मैं, तुम्हें देखने की चाहत में मै...

खुद में संपूर्ण

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              आनंद और समीर दो सगे भाई थे। दोनों एक-दूसरे से एकदम अलग। समीर पढ़ाई में तेज़ था वह सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ही ध्यान देता था। समीर हमेशा अपने क्लास में अव्वल आता था लेकिन आनंद, आनंद अपने पिता के कामों में हाथ बंटाता था वह पढ़ने में कमजोर था और पढ़ने से हमेशा जी चुराता था। आनंद हमेशा सोचता था मैं ऐसा क्या करूं जिससे मुझे पढ़ाई ना करनी पड़े। उनके पिताजी कभी कुछ नहीं कहते ना हीं समीर  कि ज्यादा तारीफ करते हैं ना ही आनंद की बुराई। दोनों बेटे उनके लिए समान थे।             एक बार की बात है जब दोनों भाई क्लास में थे तभी शिक्षक आनंद से – तुम हमेशा क्लास में सोते रहते हो। कोई काम ठीक से नहीं करते, पढ़ते भी नहीं हो। अपने ही भाई समीर को देखो वह कितना अच्छा है। मन लगाकर पढ़ाई करता है। एक तुम हो कि हमेशा मटरगश्ती कि सोचते रहते हो और कोई दूसरा काम आता है भी है तुम्हें? आनंद चुपचाप खड़ा रहता है फिर उसके मास्टर जी – समीर जिंदगी में जरूर कुछ अच्छा करेगा। मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी तुम पर पैसे बर्बाद कर रहे है। जब तुम्ह...

हिन्दू मुस्लिम कि लड़ाई में इंसानियत कि जीत

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              जोरों की हवा चल रही होती है। तूफानी हवा जिसके कारण दरवाजे और खिड़कियां आपस में टकरा रहे थे। शबाना बेगम अपनी औलाद खालिद से – देख न तेरे अब्बू अब तक नहीं आए? खालिद दौड़ कर आता है। क्या हुआ अम्मी कुछ कह रही थी क्या? हवा काफ़ी तेज है। शबाना – सुना नहीं! मैंने कहा तेरे अब्बू अब तक नहीं आए। खालिद – हां अम्मी, मैं भी ते को यही बोलने वाला था। अब्बू कब गए थे? शबाना – जाकर बाहर देखेगा भी, अल्लाह सब खैर-खिदमत रखें, या-अल्लाह जिन की औलाद सारे सवाल अभी ही कर लेगा? मुझे तेरे अब्बू की बहुत चिंता खाए जा रही है। खालिद अपने अब्बू को देखने बाहर चला जाता है।         नूरजहां चौक पर जाते ही उसे पता चलता है कि ट्रक पलट गई है। खालिद थोड़ा घबरा जाता है और आस-पास के लोगों से पूछता है – कब पलटी थी? भीड़ में से एक आदमी बोलता है – शाम में ही। और मेरे अब्बू को कहीं देखा है क्या? हां! तेरे अब्बू उस ट्रक में से आदमी को निकालने की कोशिश कर रहे हैं। इतनी तेज तूफान में भी? शैतान उनके दिमाग में घुस गया है क्या? खालिद वही से बैरंग अपने घर वापस...

एक मासूम सवाल

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           किसी जंगल में जब्बू नाम का शेर था। वह काफी बहादुर और हिष्ट पुष्ट रहता है।  सभी जानवर उसकी बहुत इज्जत करते थे। जब्बू का एक बेटा भी था उसका नाम वह बड़े ही प्यार से रखता है जब्बा। जब्बा भी अपने बाप कि तरह खूबसूरत था उसकी प्यारी प्यारी आंखें थी और वह अपने बाप की तरह ही हिष्ट पुष्ट था। जब्बा हमेशा जब्बू से एक ही सवाल करता पिताजी मैं कैसे सफलता प्राप्त करूंगा? मैं आपकी तरह एक सफल शेर बनना चाहता हूं। आप की तरह आप की तरह बहादुर। आपकी तरह साहसी आपकी तरह हमेशा सही है निर्णय करने वाला। बिल्कुल आपकी तरह। जब्बु - देखो बेटा  तुम्हारा नाम जब्बा इसलिए रखा है क्योंकि मुझे पता है तुम सबसे बहादुर हो। हर प्राणी खुद में ही स्पेशल है हर प्राणी एक-दुसरे से एकदम अलग है। इसीलिए तुम्हें किसी और की तरह बनने की जरुरत नहीं है तुम जब्बा हो और जब्बा की तरह बढ़ो जब्बू बनने की जरुरत नहीं है।              जब्बा कहां जब्बू कि सुनने वाला था वह हमेशा जब्बू  के आगे-पीछे घूमते रहता था। यह कारण है कि उसे कोई दोस्त नहीं बन पाते हैं...

आधुनिक युग में रिश्तों पर टेक्नोलॉजी का प्रभाव

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          स्नेहा और सूनील दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। स्नेहा – क्या कर रहे हो? कुछ नहीं, बस यूं ही कुछ काम कर रहा हूं।                स्नेहा - दिन-रात तो काम ही करते रहते हो, कभी मेरी तरफ़ भी तो देखा करो। सूनील – यार अगर काम नहीं करूंगा तो पैसे कहां से आएंगे और पैसे नहीं रहेंगे तो घर कैसे चलेगा? स्नेहा चिढ़ जाती है और चुपचाप रसोईघर में चली जाती है। रसोईघर का काम खत्म करके फिर से सूनील के पास – क्या हो रहा है? सूनील – एक बार तो बताया न काम कर रहा हूं। स्नेहा – मेरा काम तो खत्म हो गया और तुम्हारा कैसा काम है जो खत्म ही नहीं हो रहा है? सूनील स्नेहा को चिढ़ाते हुए – हां! तुम्हारा काम तो खत्म हो गया, पर तुम्हारे नखरें तो खत्म नहीं होते। उसे पूरा करने के लिए मुझे काम करना पड़ता है। Please जाओ और मुझे तंग मत करो। स्नेहा कुछ नहीं बोलती चुपचाप बिस्तर पर चली जाती है। स्नेहा एक बार फिर से सूनील को देखती है लेकिन उसकी आंखों में कोई प्यार नहीं रहता है। स्नेहा सूनील को देखकर भी न देखने का बहाना करते हुए अपनी आंखें बंद क...

आधुनिक युग में टूटते रिश्ते का सच

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              सनी और डिंपल दोनों आज़ाद ख्याल के थे और दोनों कि दोस्ती उससे भी ज़्यादा आज़ाद। दोनों एक दूसरे पर कभी शक नहीं करते थे। डिंपल कमाल की खूबसूरत थी। कॉलेज के सभी लड़के उस पर दिल दे बैठे थे। मगर डिंपल का दिल आया भी तो सनी पर और सिर्फ सनी पर। वह दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। सनी थोड़ा शर्मीला था मगर डिंपल मे हर वह चीज थी जो हर लड़का अपने पार्टनर में ढूंढता है भरोसा, खूबसूरती और समझदारी। एक दिन सनी डिंपल से – यह तुम्हारे सुनहरे बाल देख कर मुझे वह दिन याद आ जाता है जब मैं बालकनी में खड़ा था और सुनहरी-सी चादर आकाश में बिछी थी। डिंपल मुस्कुराते हुए – अच्छा! तुम मुझे सिर्फ आकाश में ही देखते हो। कभी कोई अच्छी तुलना तो कर लिया करो यार। सनी थोड़ा मुस्कुराते हुए – क्यों? यही उपमाएं तो कहानियों और कविताओं में दी जाती है तो लोग रूपक अलंकार और पता नहीं क्या-क्या कहते हैं और सभी लोग खुश होते हैं। डिंपल सनी को छेड़ते हुए – अच्छा! तो तुम मुझे काव्य के द्वारा मोहित करने की कोशिश कर रहे हो? सनी नहीं मैं बस यूं ही कह रहा था। डिंपल – तुम्हें क्या लगता है...

खुद से खुद की पहचान

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           सुनैना आज बहुत खुश है क्योंकि आज ही तो उसकी मौसी ने फोन करके उसकी मां से कहा कि सुनैना को मेरे पास भेज दो। सुनैना की खुशी का ठिकाना न था उसकी मां भी खुशी-खुशी अपनी बहन के घर उसे भेजना चाहती थी। उसका पति डरा सहमा-सा उसे बोलता है तुम्हें नहीं लगता उसे वहां भेजना ठीक नहीं होगा यहां रहती है तो स्कूल भी चली जाती है, वहां जाने के बाद यह भी छूट जाएगा। सुनैना की मां अपने पति पर चिल्लाते हुए - कौन से स्कूल की बात करते हो, खाने के तो यहां पैसे नहीं है स्कूल की बात करते हो। सरकारी स्कूल में पढ़ती है लड़की है घर के दो-चार काम सीख जाएगी तो इसे ही फायदा होगा। सरकारी स्कूल में पढ़-पढ़ कर तो कितने क्या-क्या बन गए हैं। मुझे नहीं लगता इसका कोई भविष्य भी है। वहां जाएगी दो काम करेगी तो भर पेट खाना भी तो खाएगी। खुश हो जाएगी तो कुछ दे भी देगी, तुमसे तो इसके लिए एक गहना भी नहीं बना। हुंह! मैं तो दिन-रात इसी चिंता में रहती हूं कि बेटी की शादी करनी है और तुम हो कि दिन-रात इसी चिंता में रहते हो कि कैसे मेरे कलेजे पर सांप लोट सके। सुनैना का पिता चुप हो जाता है क्योंकि उस...