हिन्दू मुस्लिम कि लड़ाई में इंसानियत कि जीत
जोरों की हवा चल रही होती है। तूफानी हवा जिसके कारण दरवाजे और खिड़कियां आपस में टकरा रहे थे।
शबाना बेगम अपनी औलाद खालिद से – देख न तेरे अब्बू अब तक नहीं आए? खालिद दौड़ कर आता है। क्या हुआ अम्मी कुछ कह रही थी क्या? हवा काफ़ी तेज है। शबाना – सुना नहीं! मैंने कहा तेरे अब्बू अब तक नहीं आए। खालिद – हां अम्मी, मैं भी ते को यही बोलने वाला था। अब्बू कब गए थे? शबाना – जाकर बाहर देखेगा भी, अल्लाह सब खैर-खिदमत रखें, या-अल्लाह जिन की औलाद सारे सवाल अभी ही कर लेगा? मुझे तेरे अब्बू की बहुत चिंता खाए जा रही है। खालिद अपने अब्बू को देखने बाहर चला जाता है।
नूरजहां चौक पर जाते ही उसे पता चलता है कि ट्रक पलट गई है।
खालिद थोड़ा घबरा जाता है और आस-पास के लोगों से पूछता है – कब पलटी थी? भीड़ में से एक आदमी बोलता है – शाम में ही। और मेरे अब्बू को कहीं देखा है क्या? हां! तेरे अब्बू उस ट्रक में से आदमी को निकालने की कोशिश कर रहे हैं। इतनी तेज तूफान में भी? शैतान उनके दिमाग में घुस गया है क्या? खालिद वही से बैरंग अपने घर वापस चला आता है और फिर अपनी अम्मी से। अम्मी – अब्बू इस तरह वापस नहीं आने वाले हैं। वहां चौक के पास ट्रक पलट गई है इसलिए अब्बू लोगों को बाहर निकालने की कोशिश में लगे हुए हैं। लोग बता रहे थे कि ट्रक अंदर गड्ढे में गिर गई हैं। अब्बू भी खामखां अपना शौक पूरा करते रहते हैं। ट्रक कितना भारी होता है कहीं किसी को….. शबाना खालिद की बात को बीच में ही काट देती है - अल्लाह ताला ना करें कुछ हो जाए तेरे अब्बू को। चल, चल मैं देखती हूं उनके दिमाग ठिकाने लगाती हूं। वहां से शबाना और खालिद दौड़ते हुए जाते हैं चौक कि तरफ।
शबाना बदहवास चिल्लाती हुई – खालिद के अब्बा! खालिद के अब्बा!
तभी राशिद अली उनकी तरफ आता है – अभी तक मुर्शीद चचा खंडहर के अंदर ही हैं। निकले नहीं है। शबाना जोर-जोर से चीखने लगती है - हाय रब्बा! अगर यह आदमी मर मरा गया तो मेरा क्या होगा? खालिद अपनी अम्मी को समझाते हुए – अम्मीजान! आप चिंता ना करिए अल्लाह ताला सब खैरियत करेगा। अल्लाह दरिया दिल है। शबाना दौड़ती हुई उन लोगों के पास जाती है – किसी ने जाकर देखा नहीं? तभी शबाना की नज़र खालिद के अब्बू पर पड़ती है। खालिद के अब्बू अपना सर बाहर निकालकर आवाज देते हैं – कोई रस्सी फेंकेगा, मुझे मिल गया वह बंदा। हमें लगता है उसे बांधकर निकालना पड़ेगा। उधर से अनवर रस्सी लेकर आता है। उस आदमी को खींचकर बाहर निकाला जाता है।
मुर्शीद मियां के बाहर आते ही शबाना बेगम उन पर टूट पड़ती हैं – तुम्हें दिखाई नहीं देता? एक औलाद है हमारी। पूरी जिंदगी खड़ी है। आए दिन तुम्हें फालतू के काम सुझते रहते हैं। और कोई नहीं था जो तुम्हें ही कुदना था खंडहर में।
मुर्शीद मियां अपनी बीवी की तरफ मुस्कुराते हुए देखते हैं – बेगम साहिबा! आपके शौहर ने बहादुरी का काम किया है और आप उसी को डांट पिला रही हैं। शबाना – आपकी बहादुरी आपको ही मुबारक। आपको देख-देख कर तो हमारा बेटा भी बिगड़ जाएगा। अपने पति को ठीक-ठाक देखकर शबाना भौंहें चढ़ा लेती है और चुपचाप वहां से घर वापिस चली आती है। मुर्शीद मियां भी अपनी बीवी के पीछे-पीछे घर चल पड़ते हैं और उनका बेटा खालिद ज़्यादा कुछ नहीं समझ पाता और वह भी घर चला आता है।
शबाना घर पहुंचते ही मुर्शीद मियां पर बरस पड़ती है – इन्हें घर का तो एक काम दिखाई नहीं देता और बाहर के पिच्हत़र काम करने होते हैं। यह नहीं होता कि घर कि छत टूट गई है,
उसकी मरम्मत करा दे लेकिन नहीं इन्हें तो फालतू की चाकरी करने से फुर्सत मिले तब न और पता नहीं कितनी बातों का उलाहना देते हुए मुर्शीद मियां को चैन से नहीं बैठने देती।
मुर्शीद मियां बाहर चले आते हैं। खालिद को लगता है कि उसके अब्बू को गुस्सा आ गया है इसलिए वह भी उनके पीछे-पीछे बाहर आ जाता है। खालिद – अब्बूजान! आप तो अम्मी को जानते ही हैं रहने भी दीजिए ना। मुर्शीद मियां – नहीं खालिद! मुझे आपकी अम्मी के गुस्से पर गुस्सा नहीं आता। मैं जानता हूं वह पूरी तरह से सही नहीं है पर मैं यह भी जानता हूं वो गलत भी नहीं है। उनका गुस्सा उनके प्यार को दिखाता है इसीलिए मुझे और भी प्यार आता है। अभी मैं जितने भी प्यार भरी बातें करूं उनका गुस्सा उतना ही बढ़ता जाएगा। इसलिए हम बाहर आ गए।
खालिद – अब्बू आपको नहीं लगता कोई और भी यह काम कर सकता था। आप जोख़िम भरा काम क्यों करते हैं? मुर्शीद मियां – ‘जिते तो सभी है अपनी ज़िंदगी, दूसरों के लिए जी कर देखो जो सुकून मिलता है कहीं नहीं है।' मैं भी पहले तुम्हारी अम्मी और तुम्हारी तरह हुआ करता था, लगता था अपना काम है दूसरों से क्या लेना-देना?
एक बार जब हम दिल्ली से बनारस जा रहे थे। जौनपुर के पास हमारी ट्रेन में आग लग गई थी।
हम बुरी तरह फंस चुके थे। उस समय एक 16 साल की शहज़ादी ने हमारी मदद की थी। हमने उसे काफी मना किया। नहीं बेटी तू ट्रेन से कूद जा, नहीं तो तू बचेगी नहीं। उसने कहा – नहीं चाचा! मुझे कुछ नहीं होगा। मेरी ओर कंबल फेंकते हुए – आप इसको पकड़ कर मेरी तरफ आ जाइए और हम दोनों मिलकर इस मुसीबत का सामना करेंगे। एक पल हमें लगा यह लड़की पागल है। आग कि लपटें इतनी तेज थी और धुआं हमारे फेफड़ों को जला रहा था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसकी हिम्मत देखकर हमें भी हिम्मत आ गई थी। हम दोनों ने मिलकर मूसिबत सामना किया और ट्रेन से कूद गए।
तब मैंने उससे कहा – तुम बहुत बहादुर हो।
उस समय जो उसने मुझे सीख दी आज तक मैं भूल ना पाया। वह सिख क्या थी अब्बू?
जिंदगी देने वाला भगवान है तो मौत भी वही दे सकता है। हम इंसानों को एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। मेरे पापा हमेशा यही सिखाते है।
बेटे हो सकता है कल होकर आप की भी शादी हो जाए और आप इस तरह का काम करें तब आपकी बेगम, आपकी औलाद इसका विरोध करें। वह गलत नहीं है क्योंकि वह आपके फिक्र करते हैं। वह गलत नहीं है लेकिन हमें इंसानियत नहीं छोड़नी चाहिए। अपने अब्बू की यह बात गांठ बांध लिजिए।
जब तक हम इस जहां में एक दूसरे की मदद करते रहेंगे तब तक इस दुनिया की कोई भी बुरी ताकत हमें नहीं हरा सकती और जिस दिन हम एक-दूसरे की मदद करना बंद कर देंगे तब दुनिया में कोई भी मूल्य हमें नहीं बचा सकेंगी और यह मानव जाति खत्म हो जाएगी।




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