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प्रकृति का मौन

                     उस दिन जंगल में कोई आवाज़ नहीं थी।                                            न पत्तों पर हवा की थाप थी, न नदी की कलकल में कोई गीत, न पक्षियों के कलरव में सुबह का उल्लास। ऐसा नहीं था कि जंगल उजड़ गया था या नदी सूख गई थी। सब कुछ वहीं था, जहाँ सदियों से था। बस, प्रकृति ने जैसे अपनी आवाज़ मनुष्य तक पहुँचाना बंद कर दिया था।                                                                                                 हिमालय की एक ऊंची चोटी पर बैठा बुढ़ा पहाड़ दूर तक पहले संसार को देख रहा था। उसके चहरे प...

प्रकृति की हँसी

                             उस रात पहाड़ों पर चाँद कुछ अधिक देर तक ठहरा रहा। जंगल की पत्तियाँ हवा के साथ सरसराती हुई न जाने किस बात पर मुस्करा रही थीं। नदी के पानी में चाँद का प्रतिबिंब बार-बार टूटता और फिर जुड़ जाता। ऐसा लगता था, मानो प्रकृति के समूचे अस्तित्व में कोई गुप्त बातचीत चल रही हो।                          सदियों से मौन खड़ा एक विशाल पहाड़ उस रात कुछ अधिक ही गंभीर था। उसके सामने बहती नदी ने अपनी चंचल धारा को थोड़ा धीमा किया और पूछा, “क्या सोच रहे हो, मित्र? आज तुम्हारी चुप्पी कुछ अलग है।”                              पहाड़ ने अपनी बर्फ से ढकी चोटियों को आकाश की ओर उठाया और धीरे से कहा, “मनुष्य के बारे में सोच रहा हूँ।”                             ...

पहाड़ की चुप्पी:एक साहित्यिक कहानी

                                पहाड़ के उस पार बसे छोटे-से गाँव में राघव का बचपन बीता था। उसके लिए पहाड़ कोई आश्चर्य नहीं था। वह उसकी सुबहों का हिस्सा था, जैसे आँगन में तुलसी का पौधा, घर के पीछे बहती पतली-सी धारा और शाम को लौटते पक्षियों का शोर।                               बचपन में उसकी माँ कहा करती थी, “बेटा, पहाड़ केवल धरती का ऊँचा हिस्सा नहीं होता। वह अपने भीतर न जाने कितने जीवन सँभालकर रखता है।”                                                राघव उस समय माँ की बात सुनकर हँस देता।                                              ...

पहाड़ की आख़िरी इच्छा:एक पहाड़ की आत्मकथा

                                        मैं पहाड़ हूँ।                     वही पहाड़, जिसे तुमने अपनी किताबों में विशाल, अडिग और निर्जीव पढ़ा है। सदियों से मैं इसी धरती पर खड़ा हूँ। मैंने ऋतुओं को बदलते देखा है, नदियों को जन्म लेते देखा है और समय को अपनी आँखों के सामने अनगिनत बार गुजरते देखा है।                                           लेकिन एक बात मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ—मैं कभी निर्जीव नहीं था।                                                   मेरे भीतर भी एक संसार बसता था।                ...