प्रकृति का मौन
उस दिन जंगल में कोई आवाज़ नहीं थी।
न पत्तों पर हवा की थाप थी, न नदी की कलकल में कोई गीत, न पक्षियों के कलरव में सुबह का उल्लास। ऐसा नहीं था कि जंगल उजड़ गया था या नदी सूख गई थी। सब कुछ वहीं था, जहाँ सदियों से था। बस, प्रकृति ने जैसे अपनी आवाज़ मनुष्य तक पहुँचाना बंद कर दिया था।
हिमालय की एक ऊंची चोटी पर बैठा बुढ़ा पहाड़ दूर तक पहले संसार को देख रहा था। उसके चहरे पर बर्फ की सफेदी थी और आंखों मे युगों का अनुभव।
उसके सामने बहने वाली नदी ने धीरे-से पूछा, "आज इतने मौन क्यों हो? क्या तुम्हें मनुष्य से की चिंता नहीं रही?"
पहाड़ ने अपनी दृष्टि नीचे बसे नगर की ओर घुमाई।
"चिंता?" उसने एक लंबी सांस ली। "मैंने सदियों तक उसकी चिंता कि है। जब वह प्यासा था, मैंने अपने भीतर से नदियों को जन्म दिया। जब वह भूखा था, मैंने अपने गोद में जंगल उगाए। जब उसे रहने के लिए जगह चाहिए थी, मैंने अपनी धरती उसके लिए खुली छोड़ दी। जब वह भटकता था, मैंने उसे रास्ते दिए। लेकिन अब वह स्वयं को इतना समर्थ समझने लगा है कि उसे लगता है, वह मेरे बिना भी अपना संसार बना सकता है।"
नदी कुछ क्षण चुप रही।
"लेकिन वह तुम्हें काट रहा है। जंगल उजाड़ रहा है। मेरी धाराओं में गंदगी बह रहा है। क्या तुम्हें क्रोध नहीं आता?"
पहाड़ मुस्कुराया।
"क्रोध उस पर किया जाता है, जिससे कुछ बदलने की आशा हो मैंने उसे रितु के माध्यम से समझाया सुखे माध्यम से समझाया, बाढ़ और भूस्खलन के माध्यम से समझाया। मैंने उसे दिखाया कि मेरे वनों के बिना मिट्टी कैसे बह जाती है, मेरे हिमखंडों के बदलने से नदियों का भविष्य कैसे प्रभावित होता है। लेकिन उसने हर चेतावनी को एक नई परियोजना का नाम दे दिया हर संकट को जीतने के लिए उसने एक नया हथियार बना लिया पर यह नहीं पूछा की संकट पैदा क्यों हआ?"
नदी की लहरें उदास हो गई।
"तो क्या अब हम कुछ नहीं करेंगे?"
"हम अपना काम करते रहेंगे,"पहाड़ ने कहा, "लेकिन मनुष्य को बचाने के लिए उसके पीछे नहीं दौड़ेंगे। उसे अपने निर्णयों के साथ जीने देंगे। शायद उसे अपनी स्वतंत्रता का अर्थ तभी समझ आएगा।"
उस रात प्रकृति ने एक निर्णय लिया।
वह मनुष्य से युद्ध नहीं करेगी। उसे श्राप नहीं देगी। उसके नगरों पर कोई क्रोध नहीं उतारेगी वह बस अपने अस्तित्व को मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार ढालने की कोशिश छोड़ देगी।
मनुष्य उन्हें नियमों को समझे चाहे तो अनदेखा करें।
अगली सुबह शहर मैं सब कुछ सामान्य था।
कारखानों की चिमनियों से धुआं निकल रहा था। सड़कों पर गाड़ियों की कतारें थीं। बड़ी-बड़ी ईमारतों के शीशे पर सूरज की किरणें चमक रही थीं। लोग अपनी व्यस्तता मैं डूबे हुए थे।
एक विशाल कारखाने के मालिक ने अपने कार्यालय की खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, "इस साल उत्पादन दोगुना करना है। हमें प्रकृति के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना होगा।"
उसके सामने बैठे अधिकारी ने मुस्कुराकर कर उत्तर दिया, "जी सर हमने अपने पानी की खपत कम करने के लिए एक नई मशीन का प्रस्ताव भी तैयार किया है।"
मलिक प्रसन्न हो गया।
उसे लगा, मनुष्य ने एक और समस्या का समाधान खोज लिया।
उसे यह नहीं मालूम था कि कारखाने से निकलने वाले अपशिष्ट को साफ करने की मशीन से कहीं अधिक जरूरी था उस अपशिष्ट को नदी तक जाने से रोकना। उसे यह भी नहीं मालूम था कि जिस नदी से कारखाने के लिए पानी लिया जा रहा है, उसी नदी के किनारे बसे गॉंव मैं गर्मियों के दौरान कुंए पहले से ही सूखने लगे थे।
नदी ने यह सब देखा।
लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की।
वह अपने बचे हुए जल के साथ बहती रही।
उसने न मनुष्य को रोका, न उसे समझाने के लिए अपनी धारा मोड़ी। वह केवल अपने अस्तित्व के नियमों के अनुसार आगे बढ़ती रही।
कुछ महीने बीते।
गाँव के बाहर खड़ा एक पुराना पीपल अब पहले जैसा हरा नहीं था। उसकी जड़ों के आसपास की मिट्टी कठोर हो गई थी। आसपास के छोटे पौधे सूख रहे थे। जिस रास्ते से कभी चरवाहे अपनी गायों को लेकर गुजरते थे, वहाँ अब एक नई सड़क बन गई थी।
एक दिन गाँव का दस वर्षीय लड़का उस पीपल के नीचे आकर बैठा।
वह अपनी हथेली में मिट्टी लेकर उसे मसलने लगा।
“बाबा कहते हैं, पहले यहाँ बहुत ठंडक रहती थी,” उसने पास बैठे अपने दादा से कहा। “यहाँ इतनी गर्मी क्यों है?”
दादा ने पेड़ की ओर देखा।
“पहले यहाँ बहुत पेड़ थे, बेटा। खेतों के किनारे भी, सड़क के दोनों ओर भी। अब सब काट दिए गए हैं।”
“तो फिर नए पेड़ क्यों नहीं लगा देते?”
दादा ने उसकी ओर देखा। उसके पास उत्तर था, पर वह उत्तर इतना सरल नहीं था।
“पेड़ लगाना आसान है, बेटा। उन्हें बड़ा होने तक बचाए रखना मुश्किल। और जो पेड़ सदियों में धरती का हिस्सा बनते हैं, उनकी जगह कुछ नए पौधे एक ही मौसम में नहीं ले सकते।”
लड़का चुप हो गया।
उसने पेड़ के तने पर हाथ रखा और धीरे से पूछा, “तुम्हें दु:ख होता है?”
पीपल के पास कोई शब्द नहीं थे। फिर भी उसकी एक सूखी पत्ती टूटकर लड़के की हथेली पर आ गिरी।
दूर कहीं हवा चल रही थी।
प्रकृति ने उस बच्चे को देखा। पहली बार लंबे समय बाद उसकी आँखों में एक कोमल चमक उभरी।
उसे मालूम था कि मनुष्य की सारी संवेदना अभी समाप्त नहीं हुई है।
लेकिन वह अब किसी को बदलने के लिए स्वयं को थकाना नहीं चाहती थी।
वह प्रतीक्षा करेगी।
उधर पहाड़ों में एक और बदलाव हो रहा था।
जहाँ कभी घने वन थे, वहाँ अब खुली चट्टानें दिखाई देने लगी थीं। बारिश का पानी मिट्टी को अपने साथ बहाकर नीचे ले जाता था। पहाड़ के पुराने रास्तों पर दरारें पड़ने लगी थीं।
एक इंजीनियर सर्वेक्षण के लिए वहाँ आया।
उसने नक्शा खोला, चट्टानों की जाँच की और अपने सहयोगी से कहा, “इस ढलान को स्थिर करने के लिए हमें मजबूत दीवार बनानी होगी।”
सहयोगी ने पूछा, “और ऊपर की ओर जंगल काटने से जो समस्या पैदा हुई है, उसका क्या?”
इंजीनियर ने कुछ क्षण नक्शे को देखा।
“वह अलग परियोजना है। उसका प्रस्ताव बाद में बनाएँगे।”
पहाड़ ने यह सुना तो उसकी चट्टानों के भीतर एक पुरानी स्मृति जाग उठी।
उसे वह समय याद आया, जब उसकी ढलानों पर पेड़ों की जड़ें मिट्टी को थामे रहती थीं। जब बारिश का पानी धीरे-धीरे धरती में उतरता था। जब छोटे झरने पूरे वर्ष बहते थे।
अब मनुष्य उस समस्या को ठीक करने के लिए दीवारें बना रहा था, जिसकी जड़ें कहीं और थीं। पहाड़ हँसा नहीं।
इस बार वह केवल मौन रहा।
क्योंकि कभी-कभी व्यंग्य से भी अधिक गहरा होता है वह मौन, जिसमें किसी की भूल को बार-बार दोहराते हुए देखा जाता है।
समय बीतता गया।
किसी वर्ष बारिश कम हुई। किसी वर्ष असमय अधिक हुई। कहीं नदियाँ उफनीं, कहीं जलस्रोत सिकुड़े। जंगलों में आग लगी। कुछ शहरों की हवा इतनी खराब हुई कि लोगों को बाहर निकलने से पहले अपने स्वास्थ्य के बारे में सोचना पड़ा।
मनुष्य ने इन समस्याओं से लड़ने के लिए नई तकनीकें बनाईं। कुछ सफल हुईं, कुछ अधूरी रहीं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी, किसानों ने अपने अनुभव सुनाए, बच्चों ने पेड़ लगाने के अभियान चलाए। कई लोगों ने अपनी आदतें बदलीं और कई ने पुराने रास्ते पर चलना जारी रखा।
प्रकृति ने सब देखा।
वह यह नहीं चाहती थी कि मनुष्य नष्ट हो जाए। उसे किसी के विनाश में आनंद नहीं मिलता था। वह तो बस उस भ्रम से बाहर आ चुकी थी कि हर बार मनुष्य की भूल का भार भी वही अपने ऊपर उठा ले।
वह अब अपने संतुलन की प्रतीक्षा कर रही थी।
लेकिन प्रकृति का संतुलन कोई ऐसा पहिया नहीं था, जिसे मनुष्य की अनुपस्थिति में घुमाकर फिर पहले जैसी दुनिया लौटा दी जाए। उजड़े वन लौटने में दशकों लगा सकते थे। नष्ट हुई प्रजातियाँ शायद कभी वापस न आतीं। दूषित जल और बदलती जलवायु के प्रभाव पीढ़ियों तक रह सकते थे।
प्रकृति का मौन कोई जादू नहीं था।
वह मनुष्य को यह समझने का अवसर था कि उसके कर्मों के परिणाम वास्तविक होते हैं।
एक शाम वही छोटा लड़का, जो कभी पीपल के नीचे बैठा था, अपने विद्यालय से लौटते समय एक पौधा लेकर आया।
उसने उसे अपने घर के बाहर लगाया।
पिता ने पूछा, “एक पौधा लगाने से क्या बदल जाएगा?”
लड़के ने मिट्टी दबाते हुए कहा, “सब कुछ तो नहीं बदलेगा, पिताजी। लेकिन अगर कोई कुछ नहीं करेगा, तो कुछ भी नहीं बदलेगा।”
पिता देर तक उसे देखते रहे।
उन्हें अपने बचपन का गाँव याद आया। मिट्टी की सोंधी गंध, पेड़ों की छाँव, कुएँ का ठंडा पानी और बरसात के बाद खेतों में उतरती हरियाली। उन्हें यह भी याद आया कि उन्होंने स्वयं कितनी बार सुविधा के लिए पेड़ काटने पर सहमति दी थी, बिना यह सोचे कि उनकी जगह क्या आएगा।
उन्होंने बेटे के हाथ से पौधा लिया और उसके चारों ओर मिट्टी ठीक करने लगे।
“कल कुछ और पौधे लाएँगे,” उन्होंने कहा।
लड़का मुस्कराया।
उस रात बहुत समय बाद हवा ने उस घर की खिड़की पर दस्तक दी।
वह हवा पूरी तरह शुद्ध नहीं थी। नदी भी पहले जैसी निर्मल नहीं हुई थी। पहाड़ों के घाव भी नहीं भरे थे।
फिर भी प्रकृति ने उस छोटे-से प्रयास को देखा।
उसने अपना निर्णय नहीं बदला। वह अब भी मनुष्य को उसके कर्मों के परिणामों से बचाने का वादा नहीं करती थी।
लेकिन उसने यह भी नहीं ठाना था कि मनुष्य को कभी दूसरा अवसर नहीं मिलेगा।
क्योंकि प्रकृति प्रतिशोध नहीं लेती। वह अवसरों का हिसाब नहीं रखती। वह अपने नियमों में चलती है और जीवन को वहाँ जगह देती है, जहाँ जीवन पनप सकता है।
पहाड़ ने उस रात नदी से कहा, “शायद मनुष्य अब धीरे-धीरे समझ रहा है।”
नदी ने पूछा, “क्या हमें फिर उसकी सहायता करनी चाहिए?”
पहाड़ ने उत्तर दिया, “हमने सहायता करना कभी बंद नहीं किया। हम तो अब भी पानी देते हैं, मिट्टी में जीवन रखते हैं, हवा में साँस की संभावना बनाए रखते हैं। हमने केवल उसे यह भ्रम देना बंद किया है कि वह कुछ भी करे, प्रकृति हमेशा उसके लिए सब ठीक कर देगी।”
नदी शांत होकर बहने लगी।
ऊपर आकाश में तारे चमक रहे थे।
धरती अपने लंबे समय में साँस ले रही थी।
और प्रकृति, मनुष्य को उसके हाल पर छोड़कर, अपने संतुलन की प्रतीक्षा कर रही थी।
उसे मालूम था कि यह प्रतीक्षा छोटी नहीं होगी। शायद मनुष्य के जीवनकाल से भी लंबी होगी।
फिर भी वह प्रतीक्षा करेगी।
क्योंकि प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति केवल जीवन देना नहीं है; उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जीवन के नियमों के साथ निरंतर बने रहना।
और मनुष्य के सामने अब एक चुनाव था—वह उन नियमों को समझकर अपने जीवन को उनके अनुरूप बनाए, या अपनी बुद्धिमानी के अहंकार में यह भूलता रहे कि इस धरती पर उसका अस्तित्व किसी विजय का पुरस्कार नहीं, बल्कि एक साझा जीवन का हिस्सा है।
प्रकृति ने मनुष्य को छोड़ा नहीं था। उसने बस उसे उसके निर्णयों की जिम्मेदारी सौंप दी थी।
और शायद मनुष्य के लिए यही सबसे कठिन परीक्षा थी।
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