प्रकृति की हँसी

                      उस रात पहाड़ों पर चाँद कुछ अधिक देर तक ठहरा रहा। जंगल की पत्तियाँ हवा के साथ सरसराती हुई न जाने किस बात पर मुस्करा रही थीं। नदी के पानी में चाँद का प्रतिबिंब बार-बार टूटता और फिर जुड़ जाता। ऐसा लगता था, मानो प्रकृति के समूचे अस्तित्व में कोई गुप्त बातचीत चल रही हो।

                    सदियों से मौन खड़ा एक विशाल पहाड़ उस रात कुछ अधिक ही गंभीर था। उसके सामने बहती नदी ने अपनी चंचल धारा को थोड़ा धीमा किया और पूछा, “क्या सोच रहे हो, मित्र? आज तुम्हारी चुप्पी कुछ अलग है।”  

                     पहाड़ ने अपनी बर्फ से ढकी चोटियों को आकाश की ओर उठाया और धीरे से कहा, “मनुष्य के बारे में सोच रहा हूँ।” 

                                            नदी खिलखिलाकर हँस पड़ी।  

                            “मनुष्य! वही मनुष्य, जो स्वयं को इस धरती का सबसे बुद्धिमान प्राणी कहता है?”                                                                                                  “हाँ, वही।” पहाड़ की आवाज में एक अजीब-सी थकान थी।

                            पास खड़ा एक पुराना बरगद अपनी जड़ों को धरती में और गहरा उतारते हुए उनकी बातें सुनने लगा। उसकी शाखाओं पर सोए पक्षी भी जैसे जाग गए थे। 

                        नदी ने कहा, “याद है, जब मनुष्य पहली बार मेरे किनारे आया था? उसके पास मिट्टी के कुछ बर्तन थे, कुछ बीज थे और प्यास बुझाने के लिए मेरे जल के सिवा कोई दूसरा सहारा नहीं था। वह मुझे माँ कहता था। मेरे किनारे बैठकर अपने सुख-दुख सुनाता था। तब वह कितना छोटा था और उसकी आवश्यकताएँ कितनी सरल थीं!”  

                                                   “और अब?” पहाड़ ने पूछा। 

                                                    नदी का चेहरा गंभीर हो गया। 

                    “अब वह मेरे किनारे कारखाने बनाता है। मेरी धाराओं में अपना कचरा छोड़ता है। मेरे पानी को दूषित करके फिर उसी पानी को पीने योग्य बनाने के लिए मशीनें लगाता है। वह अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है, और मैं सोचती हूँ—क्या यह सचमुच बुद्धिमानी है?”  

                                     इतना सुनते ही जंगल में एक धीमी हँसी गूँज उठी। 

                    यह हँसी किसी एक पेड़ की नहीं थी। हवा हँस रही थी, पत्तियाँ हँस रही थीं, नदी हँस रही थी और पहाड़ की कठोर चट्टानों के भीतर भी जैसे कोई मुस्कराहट जाग उठी थी।

                        आकाश में चंद्रमा ने बादलों के पीछे छिपकर पूछा, “तुम सब हँस क्यों रहे हो?” 

                         बरगद ने उत्तर दिया, “मनुष्य अपनी बुद्धि से हमें बदलने निकला है। उसे लगता है कि उसने प्रकृति को अपने वश में कर लिया है। उसे कौन बताए कि वह जिस धरती पर अपना साम्राज्य खड़ा कर रहा है, उसके नियम उसने बनाए ही नहीं हैं!”  

                                                हवा ने एक लंबी साँस ली।  

                        “मुझे याद है वह समय, जब मैं खेतों से होकर गुजरती थी। पकी फसलों की गंध अपने साथ लेकर गाँवों तक जाती थी। बच्चों के बालों को सहलाती थी, फूलों की खुशबू घर-घर पहुँचाती थी। लोग मेरे आने पर खिड़कियाँ खोल देते थे।”

                                                वह कुछ क्षण रुकी।

                        “आज मैं शहरों से गुजरती हूँ तो मेरे साथ धुएँ का बोझ होता है। कारखानों की चिमनियाँ मुझे काला करती हैं, वाहनों का धुआँ मेरे भीतर घुल जाता है। फिर मनुष्य मास्क लगाकर मुझे छानने की कोशिश करता है। मुझे साफ करने के लिए नए उपकरण बनाता है और उन उपकरणों को चलाने के लिए फिर ऊर्जा खर्च करता है।” 

                                             हवा अचानक हँस पड़ी।

                        “वाह रे मनुष्य! पहले तुमने मुझे गंदा करने के साधन बनाए, फिर मुझे साफ करने के साधन बनाए और अब इन दोनों को अपनी प्रगति बता रहे हो!” 

                        पहाड़ की चोटियों पर जमी बर्फ हल्की-सी चमकी। वह भी हँस रहा था, लेकिन उसकी हँसी में एक पुरानी पीड़ा छिपी थी।

                        “मनुष्य सोचता है कि पहाड़ केवल पत्थर हैं। वह मेरे सीने को काटकर रास्ते बनाता है, मेरी चट्टानों को तोड़कर इमारतें खड़ी करता है। मेरे जंगलों को हटाकर अपने शहर फैलाता है। उसे लगता है कि मैं विरोध नहीं करता, इसलिए मुझे दर्द नहीं होता।” 

                        पहाड़ ने नीचे बसे शहर की ओर देखा। वहाँ रात के अँधेरे को चीरती हुई असंख्य रोशनियाँ चमक रही थीं।

                        “उसे यह नहीं मालूम कि मेरी खामोशी मेरी कमजोरी नहीं है। मैं लाखों वर्षों से खड़ा हूँ। मैंने न जाने कितनी सभ्यताओं को जन्म लेते और मिटते देखा है। मनुष्य का इतिहास मेरी उम्र के सामने एक क्षण से अधिक नहीं।” 

                                तभी एक छोटी-सी चिड़िया उड़कर बरगद की शाखा पर आ बैठी।

                    उसने भोलेपन से पूछा, “अगर मनुष्य इतना बुद्धिमान है, तो वह अपने रहने की जगह को ही खराब क्यों कर रहा है?” 

                                        इस प्रश्न के बाद जंगल में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।

                                                        कोई उत्तर नहीं दे पाया। 

                    फिर नदी ने धीरे से कहा, “शायद वह भूल गया है कि आवश्यकता और लालच में अंतर होता है। आवश्यकता उसे जीवन देती है, लेकिन लालच उसे उसी जीवन के विरुद्ध खड़ा कर देता है।” 

                    हवा ने उसकी बात आगे बढ़ाई, “वह विकास चाहता है। इसमें बुराई नहीं। लेकिन वह यह भूल जाता है कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन, अधिक मशीनें और अधिक सुविधाएँ नहीं है। विकास वह भी है, जिसमें आने वाली पीढ़ियों के लिए साँस लेने योग्य हवा, पीने योग्य पानी और जीने योग्य धरती बची रहे।”

                                    पहाड़ ने मुस्कराकर कहा, “लेकिन मनुष्य को यह बात कौन समझाएगा?”

                                                    बरगद की शाखाएँ हवा में हिलीं।

                            “हम क्यों समझाएँ? हम तो सदियों से उसे समझाते आए हैं। हर सूखा, हर बाढ़, हर कटता जंगल, हर सूखती नदी उसे कुछ कहती है। वह सुनना ही नहीं चाहता। वह हर समस्या का समाधान खोज लेता है, लेकिन कभी-कभी उस समाधान के पीछे छिपी नई समस्या को देखना भूल जाता है।” 

                                                और फिर प्रकृति एक बार फिर हँस पड़ी।

                    उस हँसी में उपहास था, क्योंकि मनुष्य अपनी ही बनाई समस्याओं को जीतने का उत्सव मनाता था।

                उस हँसी में विस्मय था, क्योंकि जीवन पाने के बाद भी वह जीवन के आधारों को नष्ट करने में लगा था।

और उस हँसी में एक गहरा व्यंग्य था, क्योंकि जो प्राणी स्वयं को संसार का सबसे बुद्धिमान कहता था, वही अपने भविष्य की नींव को अपने हाथों से कमजोर कर रहा था।

                उसी रात शहर के एक बड़े कारखाने में काम करने वाला एक युवक अपनी थकी हुई देह लेकर घर लौट रहा था। उसके कपड़ों में धुएँ की गंध थी। गला सूख रहा था और आँखों में जलन थी। रास्ते में उसने देखा कि सड़क किनारे लगा एक छोटा-सा पेड़ धूल से ढका खड़ा है। उसकी कुछ पत्तियाँ पीली पड़ चुकी थीं।

                                        युवक ने क्षणभर उसे देखा और आगे बढ़ गया। 

                        उसे जल्दी थी। घर पहुँचकर उसे मोबाइल चलाना था, अगले दिन फिर काम पर जाना था और महीने के अंत में अपनी कमाई से परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करनी थीं। 

                                            लेकिन कुछ दूर जाने के बाद वह रुक गया। 

                       उसे अपनी माँ की कही एक पुरानी बात याद आई—“बेटा, पेड़ किसी से कुछ माँगते नहीं, फिर भी सबको कुछ न कुछ देते रहते हैं।”

                     वह वापस लौटा। सड़क किनारे रखे एक बर्तन में थोड़ा पानी बचा था। उसने उसे पेड़ की जड़ों में डाल दिया।

                                                    पेड़ की पत्तियाँ हल्की-सी हिलीं। 

                                       उसे लगा, जैसे किसी ने उसका धन्यवाद किया हो।

                                                वह मुस्कराया और घर की ओर चल पड़ा। 

                                            दूर पहाड़ों के उस पार प्रकृति ने यह दृश्य देखा।

                         नदी ने पहाड़ से कहा, “देखो, मनुष्य में अभी भी संवेदना शेष है।” 

                       पहाड़ ने उत्तर दिया, “हाँ। शायद उसकी सबसे बड़ी भूल यह नहीं कि उसने हमें बदलने की कोशिश की। उसकी भूल यह है कि उसने स्वयं को हमसे अलग समझ लिया।” 

                                            बरगद की पत्तियाँ फिर सरसराईं।

                    “जिस दिन मनुष्य समझ लेगा कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक हिस्सा है, उस दिन हमारी हँसी बदल जाएगी।”

“कैसी हो जाएगी?” चिड़िया ने पूछा। 

        हवा ने उसे अपनी गोद में उठाते हुए कहा, “तब हम उस पर नहीं हँसेंगे। तब हम उसके साथ हँसेंगे।” 

                                            सुबह हुई।

                    सूरज रोज की तरह निकला। नदी बहती रही। पहाड़ खड़े रहे। पेड़ों ने अपनी शाखाएँ आकाश की ओर फैला दीं। पक्षियों ने अपने घोंसलों से निकलकर उड़ान भरी।

                                                    और मनुष्य? 

                                    वह फिर अपने काम में लग गया। 

                    कहीं नई इमारतें बन रही थीं, कहीं नए कारखाने खुल रहे थे, कहीं नदियों के किनारे कचरे के ढेर बढ़ रहे थे। कहीं लोग प्रदूषण के विरुद्ध आवाज उठा रहे थे, कहीं कुछ लोग जंगल बचाने के लिए पेड़ लगा रहे थे। धरती पर विनाश और संरक्षण, दोनों की कहानियाँ एक साथ लिखी जा रही थीं। 

                                            प्रकृति ने यह सब देखा। 

                                            वह फिर मुस्कराई। 

                          उसे मनुष्य की शक्ति से ईर्ष्या नहीं थी, न उसकी बुद्धि से कोई शिकायत। उसे केवल उस भ्रम पर हँसी आती थी, जिसमें मनुष्य अपनी उपलब्धियों को इतना बड़ा समझ बैठता है कि अपने अस्तित्व का आधार ही भूल जाता है। 

                        क्योंकि प्रकृति जानती थी—मनुष्य उसके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन प्रकृति मनुष्य के बिना भी अपने नियमों में चलती रह सकती है। हालाँकि मनुष्य के जाने से होने वाली क्षति और बदलाव भी प्रकृति को एक ही रात में उसके पुराने रूप में नहीं लौटा देंगे। 

                                                    प्रकृति की हँसी का रहस्य यही था। 

                                वह मनुष्य को छोटा दिखाने के लिए नहीं हँसती थी। 

                        वह इसलिए हँसती थी कि मनुष्य स्वयं को इतना बड़ा समझने लगा था।

                                    और उस हँसी में एक प्रश्न हमेशा जीवित रहता था— 

                        “हे मनुष्य! तुमने चाँद तक पहुँचने का रास्ता खोज लिया, समुद्र की गहराइयाँ नाप लीं और आकाश को अपनी मशीनों से भर दिया। लेकिन क्या तुमने कभी अपने भीतर झाँककर यह पूछा कि जिस धरती पर खड़े होकर तुम अपनी बुद्धिमानी का उत्सव मना रहे हो, यदि वही धरती तुम्हारे रहने योग्य न रही, तो तुम्हारी सारी उपलब्धियों का अर्थ क्या होगा?” 

                                        प्रकृति ने कोई उत्तर नहीं दिया।

                                            वह बस हँसती रही। 

                    और मनुष्य, अपनी ही बनाई दुनिया में, उस हँसी का अर्थ समझने के लिए अभी भी बहुत व्यस्त था।

Comments

  1. प्रकृति का ऐसा चित्रण दुर्लभ ही मिलता है। मानसी जी ने जो बातें प्रकृति के मुंह से कहीं वह सचमुच पूरी मानव समाज को समझना चाहिए कि हमें प्रकृति के प्रति जागरूक और संवेदनशील होना होगा तभी हम अपने आनेवाली पीढ़ी को साफ सुथरी प्रकृति सौंप सकते हैं और उन्हें प्रकृति से दोस्ती करना सीखा सकते हैं। यह मानव जाति को समझना होगा कि प्रकृति को नष्ट करने से मानव समाज भी डायनासोर की तरह इस घरती हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो जाएगी तब पहाड़ और नदियां सचमुच में उन पर हंसेगी और अपने पीड़ी बतायेगी कभी इस भर्ती पर मानव रहता था। ऐसी परिस्थिति न आये इसलिए मानव को प्रकृति हमारा दोस्त उसे समझना होगा और प्रकृति का दोहन रोकना होगा। मानसी जी जो विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार है उन्होंने प्रकृति के दुःख को हंसी के माध्यम से पेश किया है जो उनके प्रकृति प्रेम को दिखाता है। इस कहानी के लिए मानसी जी को तहेदिल से धन्यवाद।

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