मां का सपना : बेटी ने सच किया
सुबह का वक्त था। धीरे-धीरे हवा चल रही थी। सनसनाती आवाजों में कुछ गूंज रहा था। स्वाति अभी कुछ समझ ही पाती की उधर से आवाज आती है। स्वाति!स्वाति! हां मां क्या हुआ? कुछ नहीं बेटा देख रहे हो पड़ोसी हल्ला कर रहे हैं। क्यों तुम तो झगड़े में नहीं हो न? ना-ना बेटा मैं क्यों झगड़ा करूंगी। वह लोग पता नहीं आपस में क्यो लड़ते रहते हैं? मुझे तो आज तक समझ मे नहीं आता जिस बेटे को इतनी मुश्किल से पढ़ाया लिखा है उसी से झगड़ा करने का क्या मतलब बनता है। रहने दो मां उन लोगों का तो रोज का काम है। तुम अपने काम पर ध्यान दो। हां हां हां तुम ठीक कहती हो। तुम क्या कर रही हो? कुछ नहीं अभी-अभी सुबह की ताजी हवा ले रही थी। अच्छा जल्दी करो तैयार हो जाओ कॉलेज नहीं जाना है? हां बस अब निकलने ही वाली थी, सोच रही थी जा कर नहा लू। हां-हां जाकर नहा लो मैं नाश्ता बना देती हूं। स्वाति तैयार होकर जब बाहर आती है। मां - इन दिनों मैं थोड़ी चिंतित हूं। किसलिए मां? सोच रही थी कि तुम कहीं अगर नौकरी कर लेती तो ठीक रहता। मेरे भी रिटायरमेंट के दिन नजदीक आ रहे हैं। तुम्हारा ...