नारी का सम्मान

मैं खामोश खड़ी
एक तूफान है
मेरे अंदर
जी चाहता है तोड़ दूं
सारे बंधन को
मैं तोड़ती नही बंधन
तोड़ रहा है
वह मुझे
मैं ज़िंदा हूं
मैं सच में
ज़िंदा हूं
या चलती है
सिर्फ सांसे मेरी
मैं क्या हूं
इस दुनिया में
और क्यों आयी हूं
यह सवाल मेरे ज़ेहन में
बार-बार उठता है
कभी झिलमीलाती थी
मेरी आँखें
कभी कीमत थी
मेरे आँसूओं की
सब कुछ छीन लिया
इस यौवन ने मेरा
मेरा मान, सम्मान
मेरे होने का अस्तित्व
अब बार-बार
हर बातों में रोकना-टोकना
कोई कीमत नहीं
मेरे आँसूओं की
मेरे मन में
है इक सवाल
उठता है बार-बार
लड़की होने का
मतलब क्या है
सिर्फ भोग-भोग
और कुछ नहीं
तो क्यों दिए नाम
दुनिया ने इतने सारे
माँ-बहन-बेटी-देवी
क्यूँ है ये समाज का
दोहरा चलन
कोई मुझे बता दे
क्यूँ अस्तित्व खत्म
करती है दुनिया मेरी
क्यूँ भूल जाती है दुनिया
कि मैं ही हूं
सृष्टि की रचना करनेवाली
मैं गंगा हूं
दुनिया के पापों को
धो रही हूं
क्यूँ भूल जाती है दुनिया
कि मैं सूनामी भी हूं
जो मिटा सकती है सबकुछ
मेरे अस्तित्व को ऐसे
खत्म न करो
नहीं तो खत्म हो जाएगी
ये दुनिया।

Comments

  1. है कुछ जो कहा गया नहीं नहीं
    है अबोध तू कुछ पढो लिखो
    नारी का सम्मान करते हैं सभी
    द्वीप सीखा जल रही है पता नहीं
    पता नहीं महिला सशक्तीकरण तुम्हे

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  2. नारी की समस्या भारत में ही नहीं विश्व में समाजिक स्तर पर है जिसे नारी को सम्मान देकर पूरा किया जा सकता है, इसके लिए सरकार, बौधिक वर्ग और अन्य संस्थाए प्रयास रत है। लखिका ने ऐसे समाजिक मुद्दा को कविता के माध्यम से
    विश्व की नारी को जागरूक करने का प्रयास किया है। जो सराहनीय है।

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