मेरी यादों में तुम

खुद में देखती थी
सारी दुनिया
तोड़ती थी सारे
रस्मों-रिवाजों को
कहां बांध पाती थी
मां मुझे
नील गगन में उड़ती थी
टुक-टुक निहारती
तुम्हारी प्यारी आंखें
उठते गिरते कदमों से
ठुमक-ठुमक कर आना
तुम्हारा मेरे पास
लोटते-पोटते बदन से
तेरा इठलाना
कितना मनोरम लगता है
अब बन गया मेरे
जीवन का सार
ना तो मुझे आंखें दिखाता है
ना ही रस्म-रिवाज
समझता है
फिर भी खुद को
बांधती हूं बंधनों में
तू बांधता है मुझे
उम्मीदों में
तू भटकता है
अपने सपनों में
मैं भटकती हूं
तुम्हारी यादों में
तूने ही सिखलाया है
जीवन की सच्चाई
मैं कुछ नहीं
तुम्हारे बिना
तू सब कुछ मेरा
देखती थी दुनिया हमें
अलग-अलग
तूने बतलाया दुनिया को
हम एक हैं
तू आधा सरोज तू आधा मानसी है
तू पूरा हनी है।

Comments

  1. Very NYC poem , and your thoughts is incredible which is very inspiring for our generation.

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  2. Sweet love poem, अपने एहसासों को शब्दों में पिरोना कोई आपसे सीखे। बहुत प्यारी और अच्छी कविता, जो हर जेनरेस के दिल को छू लेती है।

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  3. I m very glad to ur thinking skill , it is very loveable poem .

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