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बचपन बचाओ

        सूर्य अपने पूरे सबाब पर था। दोपहर कि चिलचिलाती धूप सतीश को कहां रोक पा रही थी। वह तो दोस्तों के साथ दौड़-धूप और बचपन कि मस्ती में मग्न था। तभी अचानक मनू सतीश से – यार भूख लग गई है। मैं घर जा हूं। सतीश को लगता है वह ठिक कह रहा, उसे भी भूख लग गई है। वह दौड़ता हुआ अपने घर कि ओर उन सर्द गलियों में टूटे-फूटे नालो से बचते आगे बढ़ता है। उसके मन मे उमंग है। वह पूरे रास्ते सोचते रहता है एक और दांव मैं मनू को हरा दूंगा। सतीश का पैर अचानक रूक जाता है। उसके कानों में जोर-जोर से चीखें सूनाई देती है। तू मर क्यों नहीं जाता? जब तुम्हारी हड्डियों में ताकत ही नहीं थी कि तू अपनी लुगाई और बच्चों को न खिला सको तो क्यों शादी की थी? सतीश सहम जाता है। उसे समझते देर नही लगता कि मां-बापू झगड़ा कर रहे है। वह सोचने लगता है क्यों न वापस जाकर खेलने लगूं? तभी उसका पिता उसके मां के सर का बाल पकड़ के खिंचता हुआ उस झोपड़ी से बाहर निकलता है और वह अपनी पत्नी से कहता है तू घून है घून जो मुझे धिरे-धिरे खा रही है। जा कुलटा मर जाकर तू डायन है डायन। पहले मेरी मां को खा गई और अब मुझे खाने पर पड़ी है...

रंगीन दुनिया

दुनिया में जितने रंग है हर रंग उसके पास है प्यार के जितने शब्द है हर शब्द में वो खास है हर दिन एक नया रंग उसका सामने आता है उसके हर रंग कि मैं दिवानी हूँ हर रोज़ मुझे उससे प्यार हो जाता है और हर रोज़ मेरा उससे तलाक हो जाता है वो मुझे रेत सा लगता है मैं उसपे खुद को लिखती़ और खुद को मिटाती हूँ वो हर रोज़ मुझको ज़िने कि एक नयी पहचान देता है वह उगता हुआ सुरज है और मैं उसकी पहचान हूँ रूके जीवन में गति दी है उसने ये है मेरी सच्चाई वह सागर है और मैं हूँ उसकी गहराई मैं तोड़ती हूँ हर बंधन को वो जोड़ता है एक नया रिश्ता मुझसे ये आधी-अधुरी ज़िंदगी कब तक हम ज़ियेंगे कब मिलेगा वो किनारा जहाँ हमारा आशियाँ होगा|

एक नया आग़ाज

हम तो उनसे अपने दिल का हाल बयां कर रहे थे उन्होंने कलम उठाई और कविता लिख डाली यूं कह दो कि दिल के जख़्मों को एक साथ उन्होंने रख दिया हम भूल जाना चाहते हैं सबकुछ उन्होंने हर जख़्म को हरा कर दिया सूना था लोग कहते है सपने टूटते है, दिल टूटते है, ख्वाब टूटते है आज तो रिश्ता भी टूट गया देखा है बहुत कुछ बिखरते मैंने सबकुछ समेटने कि चाह में कहीं सूना था मैंने सबके मन से चलो तो रिश्ते में मिठास रहती है सबके साथ चलके देखा तो आज मेरे ही जीवन में कड़वाहट भर गई है पिछे मुड़ के देखने कि चाह नहीं आगे बढ़ने कि हिम्मत नहीं मुझमें शायद बसंत आयी, फुल खिले और झड़ गए  कुछ नहीं है बाकी, खत्म होने के लिए सब कुछ खत्म हो गया है लेकिन मरने के बाद ही दूसरा जीवन मिलता है अब जीऊंगी अपनी इच्छाओं से बहुत बन लिए लकिर का फकीर अब लकिर भी मेरी और क़िस्मत भी मेरी जीवन भी मेरा और फैसला भी मेरा ये ज़ीदगी एक बार मिलती है बहुत जी लिया दूसरो की शर्तों पे अब जीना है अपने शर्तों पे अब नहीं रोकेगा कोई बंधन मुझे ना ही रिश्तों में उलझेंगे सपने मेरे बहुत रह लिया घूँघट में अब घूँघट उतार के जाना ह...

नारी का सम्मान

मैं खामोश खड़ी एक तूफान है मेरे अंदर जी चाहता है तोड़ दूं सारे बंधन को मैं तोड़ती नही बंधन तोड़ रहा है वह मुझे मैं ज़िंदा हूं मैं सच में ज़िंदा हूं या चलती है सिर्फ सांसे मेरी मैं क्या हूं इस दुनिया में और क्यों आयी हूं यह सवाल मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कभी झिलमीलाती थी मेरी आँखें कभी कीमत थी मेरे आँसूओं की सब कुछ छीन लिया इस यौवन ने मेरा मेरा मान, सम्मान मेरे होने का अस्तित्व अब बार-बार हर बातों में रोकना-टोकना कोई कीमत नहीं मेरे आँसूओं की मेरे मन में है इक सवाल उठता है बार-बार लड़की होने का मतलब क्या है सिर्फ भोग-भोग और कुछ नहीं तो क्यों दिए नाम दुनिया ने इतने सारे माँ-बहन-बेटी-देवी क्यूँ है ये समाज का दोहरा चलन कोई मुझे बता दे क्यूँ अस्तित्व खत्म करती है दुनिया मेरी क्यूँ भूल जाती है दुनिया कि मैं ही हूं सृष्टि की रचना करनेवाली मैं गंगा हूं दुनिया के पापों को धो रही हूं क्यूँ भूल जाती है दुनिया कि मैं सूनामी भी हूं जो मिटा सकती है सबकुछ मेरे अस्तित्व को ऐसे खत्म न करो नहीं तो खत्म हो जाएगी ये दुनिया।

मेरी यादों में तुम

खुद में देखती थी सारी दुनिया तोड़ती थी सारे रस्मों-रिवाजों को कहां बांध पाती थी मां मुझे नील गगन में उड़ती थी टुक-टुक निहारती तुम्हारी प्यारी आंखें उठते गिरते कदमों से ठुमक-ठुमक कर आना तुम्हारा मेरे पास लोटते-पोटते बदन से तेरा इठलाना कितना मनोरम लगता है अब बन गया मेरे जीवन का सार ना तो मुझे आंखें दिखाता है ना ही रस्म-रिवाज समझता है फिर भी खुद को बांधती हूं बंधनों में तू बांधता है मुझे उम्मीदों में तू भटकता है अपने सपनों में मैं भटकती हूं तुम्हारी यादों में तूने ही सिखलाया है जीवन की सच्चाई मैं कुछ नहीं तुम्हारे बिना तू सब कुछ मेरा देखती थी दुनिया हमें अलग-अलग तूने बतलाया दुनिया को हम एक हैं तू आधा सरोज तू आधा मानसी है तू पूरा हनी है।

एक ऐसा भी प्रयास

           कितनी सुहानी रात है। तारे टिमटिमाते हुए कितने अच्छे लगते हैं दीपाली के खुले बाल और उसकी दिलकश आंखें कितना मदहोश कर रहा था करण राज को। करण दीपाली से-आज तो तुम  गजब ढाह रही हो। दीपाली शरमाते हुए-मैं झूठ नहीं बोलूंगी। करण दीपाली से- सच ही बोल दो। दीपाली-अब तुम पहले जैसे नहीं रहे। करण दिपाली को अपनी बाहों में भरते हुए-क्या बात करती हो जान! कल भी मैं तुम्हारे लिए पागल था और आज भी हूं। दीपाली मुंह चिढ़ाते हुए-कल भी तुम अपने काम के लिए पागल थे और आज भी। करण-कहना क्या चाहती हो तुम? मैं तुम्हें प्यार नहीं करता? दीपाली-प्यार का मतलब समझते हो तुम? करण-ये बात है, तो तुम ठीक ही कहती हो। 10 साल अपने पीछे घुमाने के बाद शादी की हो और तुमसे प्यार ही नहीं करता। दीपाली खुद से ही शर्मा जाती है। दीपाली-नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं! आजकल तुम सिर्फ अपने काम पर ध्यान देते हो। तुम्हें नहीं लगता हमें एक ब्रेक के जरूरत है। करण-ये बात तो तुम ठीक कहती हो, लेकिन क्या करूं तुम चाहती थी कि मैं UPSC करूं तो अब झेलो। दीपाली-इसका मतलब ये थोड़ी है कि तुम मुझसे प्यार न करो। जितने भी...

मेरी जिद

कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं इतना आगे निकल कर पिछे नहीं जा सकता मैं वो पल फिर मेरी जिंदगी मे वापस क्यों नहीं आ सकता जहां मैं सिर्फ मैं था न माँ कि उम्मीदे थी न पिता कि ख़्वाहिशे।                 एक छोटा-सा बच्चा                 जो अपने ही सपनो मे खोया रहता है                 अपनी ही धून मे खोया रहता है                 आज उम्मीदों से टूट चूका हूँ मैं                 माँ कि हाय और बाप के तानो से ऊब चूका हूँ मैं।                 माँ कि हाय और बाप के तानों से ऊब चूका हूँ मैं। सोचता हूँ मैं क्या मैं वही बच्चा हूँ जिसको देखकर माँ कि आँखे खुशी से चमक उठती थी बाप का सीना गर्व से फुल उठता था अब वही आँखे शर्म से झुक जाती है।                 मैं सोचता हूँ...