बचपन बचाओ
सूर्य अपने पूरे सबाब पर था। दोपहर कि चिलचिलाती धूप सतीश को कहां रोक पा रही थी। वह तो दोस्तों के साथ दौड़-धूप और बचपन कि मस्ती में मग्न था। तभी अचानक मनू सतीश से – यार भूख लग गई है। मैं घर जा हूं। सतीश को लगता है वह ठिक कह रहा, उसे भी भूख लग गई है। वह दौड़ता हुआ अपने घर कि ओर उन सर्द गलियों में टूटे-फूटे नालो से बचते आगे बढ़ता है। उसके मन मे उमंग है। वह पूरे रास्ते सोचते रहता है एक और दांव मैं मनू को हरा दूंगा। सतीश का पैर अचानक रूक जाता है। उसके कानों में जोर-जोर से चीखें सूनाई देती है। तू मर क्यों नहीं जाता? जब तुम्हारी हड्डियों में ताकत ही नहीं थी कि तू अपनी लुगाई और बच्चों को न खिला सको तो क्यों शादी की थी? सतीश सहम जाता है। उसे समझते देर नही लगता कि मां-बापू झगड़ा कर रहे है। वह सोचने लगता है क्यों न वापस जाकर खेलने लगूं? तभी उसका पिता उसके मां के सर का बाल पकड़ के खिंचता हुआ उस झोपड़ी से बाहर निकलता है और वह अपनी पत्नी से कहता है तू घून है घून जो मुझे धिरे-धिरे खा रही है। जा कुलटा मर जाकर तू डायन है डायन। पहले मेरी मां को खा गई और अब मुझे खाने पर पड़ी है...