मेरी जिद
कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं
कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं
इतना आगे निकल कर पिछे नहीं जा सकता मैं
वो पल फिर मेरी जिंदगी मे
वापस क्यों नहीं आ सकता
जहां मैं सिर्फ मैं था
न माँ कि उम्मीदे थी न पिता कि ख़्वाहिशे।
एक छोटा-सा बच्चा
जो अपने ही सपनो मे खोया रहता है
अपनी ही धून मे खोया रहता है
आज उम्मीदों से टूट चूका हूँ मैं
माँ कि हाय और बाप के तानो से ऊब चूका हूँ मैं।
माँ कि हाय और बाप के तानों से ऊब चूका हूँ मैं।
सोचता हूँ मैं क्या मैं वही बच्चा हूँ
जिसको देखकर माँ कि आँखे
खुशी से चमक उठती थी
बाप का सीना गर्व से फुल उठता था
अब वही आँखे शर्म से झुक जाती है।
मैं सोचता हूँ मैने कोशिशें बहुत कि
जो चाहा विद्यार्थी जीवन मे, वो सब मिला
न मिला एक ठिकाना, जहाँ मैं रुक सकता।
न मिला एक ठिकाना, जहाँ मैं रुक सकता।
मैं नदी कि तरह बह रहा हूँ
लोग चाहते है, मैं तालाब बनूं
ठहराव तो मृत्यु कि निशानी है, बहना जिंदगी है
मैं क्यों बांधू खुद को नौकरी में?
मैं क्यों बांधू खुद को नौकरी में?
कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं
इतना आगे निकल कर पिछे नहीं जा सकता मैं
वो पल फिर मेरी जिंदगी मे
वापस क्यों नहीं आ सकता
जहां मैं सिर्फ मैं था
न माँ कि उम्मीदे थी न पिता कि ख़्वाहिशे।
एक छोटा-सा बच्चा
जो अपने ही सपनो मे खोया रहता है
अपनी ही धून मे खोया रहता है
आज उम्मीदों से टूट चूका हूँ मैं
माँ कि हाय और बाप के तानो से ऊब चूका हूँ मैं।
माँ कि हाय और बाप के तानों से ऊब चूका हूँ मैं।
सोचता हूँ मैं क्या मैं वही बच्चा हूँ
जिसको देखकर माँ कि आँखे
खुशी से चमक उठती थी
बाप का सीना गर्व से फुल उठता था
अब वही आँखे शर्म से झुक जाती है।
मैं सोचता हूँ मैने कोशिशें बहुत कि
जो चाहा विद्यार्थी जीवन मे, वो सब मिला
न मिला एक ठिकाना, जहाँ मैं रुक सकता।
न मिला एक ठिकाना, जहाँ मैं रुक सकता।
मैं नदी कि तरह बह रहा हूँ
लोग चाहते है, मैं तालाब बनूं
ठहराव तो मृत्यु कि निशानी है, बहना जिंदगी है
मैं क्यों बांधू खुद को नौकरी में?
मैं क्यों बांधू खुद को नौकरी में?
मैं क्यों बांधू खुद को नौकरी में! वाह! क्या खूब लिखा है आपने|
ReplyDeleteSo nice line di
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