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दोस्ती में ज़हर

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         रूपा और अर्चना दो दोस्त रहती है। रूपा आगे पढ़ाई नहीं करना चाहती थी क्योंकि उसकी family उतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी। अर्चना आगे पढ़ना चाहती थी क्योंकि family चाहती थी कि वो आगे पढ़े। अर्चना सोचती थी कि अगर रूपा भी उसके साथ पढ़े तो बेहतर होगा नहीं तो उसे अकेले ही जाना पड़ेगा कॉलेज। इसलिए अर्चना ने रूपा      और उसके परिवार को काफी समझाया था आगे पढ़ाई करने के लिए। रूपा के पिताजी तो मान गए थे इस चीज़ के लिए लेकिन रुपा की मां तैयारी नहीं हो रही थी। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कह दिया था रूपा को – मैट्रिक कर ली हो शादी हो जाएगी। घर के काम का सीख लो यही आगे काम देगा, नहीं तो तेरी दुर्गति हो जाएगी। जब देखो पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! अरे! पढ़-लिख के कलेक्टर बनना है तुमको का। तुमको पढ़ाई करनी है तो कर लेकिन मेरे घर के काम में एक भी बाधा हुई तो मैं उसी दिन तुम्हारी किताबों को जला दूंगी।           रूपा इन सब बातों को सुनने कि अभ्यस्त थी इसीलिए उसे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन अर्चना को काफी बुरा लग रहा था। अर्चना को अजीब लग रहा ...

संस्कार

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                      दो कौवे आपस में बात कर रहे थे पता है आजकल कोयलों का आतंक है। जब देखो हमारे घोसले में अपने अंडे देकर चली जाती है। उसके अंडों को हम लोग अपना अंडा समझ कर सेते रहते हैं। वही बच्चें बड़े होकर हमारे बच्चों को मार देते है। दूसरा कौआ – नहीं-नहीं ऐसा नहीं है, अगर हम उन्हें अच्छे संस्कार देकर बड़ा करते तो क्या ऐसा होता? संस्कार ही तो सबसे बड़ी चीज होती है, शायद हम बच्चों को सेते समय ज्ञान परक वाली कहानियां सुनाएं तो हमें उनके और अपने अंडे में फर्क करने की जरूरत ही ना पड़े? संस्कार उन्हें हमारे बच्चों की रक्षा करने के लिए आगे बढ़ाएगा। पहले कौवे को दूसरे कौवे कि बात पसंद आ जाती है। पहला कौआ – तुम्हारी बात में दम है लेकिन आखिरकार है तो कोयल की ही औलाद। कोयल अपना कुछ ना कुछ अंश तो उसमें छोड़ ही देगी। दूसरा कौवा पहले कौवे से – गुण किसी का भी हो लेकिन संस्कार तो उसमें डाले ही जा सकते हैं। जन्म देने वाले से ज्यादा महान पालने वाला होता है। उसेसे भी ज्यादा महान शिक्षा देने वाला होता है अगर सही तरीके से शिक्षा दी जाए कोयल के ब...

आओ नेतृत्व करे

              रूपाली चिल्लाते हुए - मां मेरा नाश्ता कहां है। मां - अभी लाती हूं। रूपाली कुछ सोचते-सोचते टीवी ऑन कर देती है। रुपाली के चाचा - क्या बेटा कॉलेज जा रही हो? रूपाली - हां चाचा जी कॉलेज जा रही हूं। टीवी पर न्यूज़ आते रहता है। राजनीति कितनी गंदी हो गई है न चाचा जी? नहीं बेटा, यह तो शुरू से ही गंदी थी, बस लोगों के देखने का नजरिया है। अच्छा, नहीं पहले तो ऐसे-ऐसे संवाद नहीं बोले जाते थे। मर्यादाओं का ध्यान रखा जाता था लेकिन आजकल तो इतनी गंदी बातें बोली जाती हैं कि मन करता है न्यूज़ चैनल चेंज कर दूं। हम लोग क्या उम्मीदें करते हैं और क्या देखते हैं समाज में, अजीब लगता है। चाचाजी - नहीं बेटा ऐसा नहीं है। पहले भी चीजें ऐसी थी। राजनीति में चीजें अच्छी और बुरी दोनों दो तरह की हैं। लोग बस फेमस होना चाहते हैं सोचते हैं जितना ज्यादा चेहरा चमकेगा उतना ही मुझे फायदा होगा। इसीलिए अच्छे से अच्छे लोग भी कभी-कभी ऐसी बातें बोल देते हैं जिस पर वाद-विवाद और चर्चा-परिचर्चा होने लगती है। पहले भी ऐसी चीजें थी लेकिन आजकल सोशल मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण यह इतनी...

मां का सपना : बेटी ने सच किया

                  सुबह का वक्त था। धीरे-धीरे हवा चल रही थी। सनसनाती आवाजों में कुछ गूंज रहा था। स्वाति अभी कुछ समझ ही पाती की उधर से आवाज आती है। स्वाति!स्वाति! हां मां क्या हुआ? कुछ नहीं बेटा देख रहे हो पड़ोसी हल्ला कर रहे हैं। क्यों तुम तो झगड़े में नहीं हो न? ना-ना बेटा मैं क्यों झगड़ा करूंगी। वह लोग पता नहीं आपस में क्यो लड़ते रहते हैं? मुझे तो आज तक समझ मे नहीं आता जिस बेटे को इतनी मुश्किल से पढ़ाया लिखा है उसी से झगड़ा करने का क्या मतलब बनता है। रहने दो मां उन लोगों का तो रोज का काम है। तुम अपने काम पर ध्यान दो। हां हां हां तुम ठीक कहती हो। तुम क्या कर रही हो? कुछ नहीं अभी-अभी सुबह की ताजी हवा ले रही थी। अच्छा जल्दी करो तैयार हो जाओ कॉलेज नहीं जाना है? हां बस अब निकलने ही वाली थी, सोच रही थी जा कर नहा लू। हां-हां जाकर नहा लो मैं नाश्ता बना देती हूं। स्वाति तैयार होकर जब बाहर आती है। मां - इन दिनों मैं थोड़ी चिंतित हूं। किसलिए मां? सोच रही थी कि तुम कहीं अगर नौकरी कर लेती तो ठीक रहता। मेरे भी रिटायरमेंट के दिन नजदीक आ रहे हैं। तुम्हारा ...

बचपन बचाओ

        सूर्य अपने पूरे सबाब पर था। दोपहर कि चिलचिलाती धूप सतीश को कहां रोक पा रही थी। वह तो दोस्तों के साथ दौड़-धूप और बचपन कि मस्ती में मग्न था। तभी अचानक मनू सतीश से – यार भूख लग गई है। मैं घर जा हूं। सतीश को लगता है वह ठिक कह रहा, उसे भी भूख लग गई है। वह दौड़ता हुआ अपने घर कि ओर उन सर्द गलियों में टूटे-फूटे नालो से बचते आगे बढ़ता है। उसके मन मे उमंग है। वह पूरे रास्ते सोचते रहता है एक और दांव मैं मनू को हरा दूंगा। सतीश का पैर अचानक रूक जाता है। उसके कानों में जोर-जोर से चीखें सूनाई देती है। तू मर क्यों नहीं जाता? जब तुम्हारी हड्डियों में ताकत ही नहीं थी कि तू अपनी लुगाई और बच्चों को न खिला सको तो क्यों शादी की थी? सतीश सहम जाता है। उसे समझते देर नही लगता कि मां-बापू झगड़ा कर रहे है। वह सोचने लगता है क्यों न वापस जाकर खेलने लगूं? तभी उसका पिता उसके मां के सर का बाल पकड़ के खिंचता हुआ उस झोपड़ी से बाहर निकलता है और वह अपनी पत्नी से कहता है तू घून है घून जो मुझे धिरे-धिरे खा रही है। जा कुलटा मर जाकर तू डायन है डायन। पहले मेरी मां को खा गई और अब मुझे खाने पर पड़ी है...

रंगीन दुनिया

दुनिया में जितने रंग है हर रंग उसके पास है प्यार के जितने शब्द है हर शब्द में वो खास है हर दिन एक नया रंग उसका सामने आता है उसके हर रंग कि मैं दिवानी हूँ हर रोज़ मुझे उससे प्यार हो जाता है और हर रोज़ मेरा उससे तलाक हो जाता है वो मुझे रेत सा लगता है मैं उसपे खुद को लिखती़ और खुद को मिटाती हूँ वो हर रोज़ मुझको ज़िने कि एक नयी पहचान देता है वह उगता हुआ सुरज है और मैं उसकी पहचान हूँ रूके जीवन में गति दी है उसने ये है मेरी सच्चाई वह सागर है और मैं हूँ उसकी गहराई मैं तोड़ती हूँ हर बंधन को वो जोड़ता है एक नया रिश्ता मुझसे ये आधी-अधुरी ज़िंदगी कब तक हम ज़ियेंगे कब मिलेगा वो किनारा जहाँ हमारा आशियाँ होगा|

एक नया आग़ाज

हम तो उनसे अपने दिल का हाल बयां कर रहे थे उन्होंने कलम उठाई और कविता लिख डाली यूं कह दो कि दिल के जख़्मों को एक साथ उन्होंने रख दिया हम भूल जाना चाहते हैं सबकुछ उन्होंने हर जख़्म को हरा कर दिया सूना था लोग कहते है सपने टूटते है, दिल टूटते है, ख्वाब टूटते है आज तो रिश्ता भी टूट गया देखा है बहुत कुछ बिखरते मैंने सबकुछ समेटने कि चाह में कहीं सूना था मैंने सबके मन से चलो तो रिश्ते में मिठास रहती है सबके साथ चलके देखा तो आज मेरे ही जीवन में कड़वाहट भर गई है पिछे मुड़ के देखने कि चाह नहीं आगे बढ़ने कि हिम्मत नहीं मुझमें शायद बसंत आयी, फुल खिले और झड़ गए  कुछ नहीं है बाकी, खत्म होने के लिए सब कुछ खत्म हो गया है लेकिन मरने के बाद ही दूसरा जीवन मिलता है अब जीऊंगी अपनी इच्छाओं से बहुत बन लिए लकिर का फकीर अब लकिर भी मेरी और क़िस्मत भी मेरी जीवन भी मेरा और फैसला भी मेरा ये ज़ीदगी एक बार मिलती है बहुत जी लिया दूसरो की शर्तों पे अब जीना है अपने शर्तों पे अब नहीं रोकेगा कोई बंधन मुझे ना ही रिश्तों में उलझेंगे सपने मेरे बहुत रह लिया घूँघट में अब घूँघट उतार के जाना ह...