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मेरी यादों में तुम

खुद में देखती थी सारी दुनिया तोड़ती थी सारे रस्मों-रिवाजों को कहां बांध पाती थी मां मुझे नील गगन में उड़ती थी टुक-टुक निहारती तुम्हारी प्यारी आंखें उठते गिरते कदमों से ठुमक-ठुमक कर आना तुम्हारा मेरे पास लोटते-पोटते बदन से तेरा इठलाना कितना मनोरम लगता है अब बन गया मेरे जीवन का सार ना तो मुझे आंखें दिखाता है ना ही रस्म-रिवाज समझता है फिर भी खुद को बांधती हूं बंधनों में तू बांधता है मुझे उम्मीदों में तू भटकता है अपने सपनों में मैं भटकती हूं तुम्हारी यादों में तूने ही सिखलाया है जीवन की सच्चाई मैं कुछ नहीं तुम्हारे बिना तू सब कुछ मेरा देखती थी दुनिया हमें अलग-अलग तूने बतलाया दुनिया को हम एक हैं तू आधा सरोज तू आधा मानसी है तू पूरा हनी है।

एक ऐसा भी प्रयास

           कितनी सुहानी रात है। तारे टिमटिमाते हुए कितने अच्छे लगते हैं दीपाली के खुले बाल और उसकी दिलकश आंखें कितना मदहोश कर रहा था करण राज को। करण दीपाली से-आज तो तुम  गजब ढाह रही हो। दीपाली शरमाते हुए-मैं झूठ नहीं बोलूंगी। करण दीपाली से- सच ही बोल दो। दीपाली-अब तुम पहले जैसे नहीं रहे। करण दिपाली को अपनी बाहों में भरते हुए-क्या बात करती हो जान! कल भी मैं तुम्हारे लिए पागल था और आज भी हूं। दीपाली मुंह चिढ़ाते हुए-कल भी तुम अपने काम के लिए पागल थे और आज भी। करण-कहना क्या चाहती हो तुम? मैं तुम्हें प्यार नहीं करता? दीपाली-प्यार का मतलब समझते हो तुम? करण-ये बात है, तो तुम ठीक ही कहती हो। 10 साल अपने पीछे घुमाने के बाद शादी की हो और तुमसे प्यार ही नहीं करता। दीपाली खुद से ही शर्मा जाती है। दीपाली-नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं! आजकल तुम सिर्फ अपने काम पर ध्यान देते हो। तुम्हें नहीं लगता हमें एक ब्रेक के जरूरत है। करण-ये बात तो तुम ठीक कहती हो, लेकिन क्या करूं तुम चाहती थी कि मैं UPSC करूं तो अब झेलो। दीपाली-इसका मतलब ये थोड़ी है कि तुम मुझसे प्यार न करो। जितने भी...

मेरी जिद

कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं कितनी बार पिछे मुड़ कर जाना चाहा मैं इतना आगे निकल कर पिछे नहीं जा सकता मैं वो पल फिर मेरी जिंदगी मे वापस क्यों नहीं आ सकता जहां मैं सिर्फ मैं था न माँ कि उम्मीदे थी न पिता कि ख़्वाहिशे।                 एक छोटा-सा बच्चा                 जो अपने ही सपनो मे खोया रहता है                 अपनी ही धून मे खोया रहता है                 आज उम्मीदों से टूट चूका हूँ मैं                 माँ कि हाय और बाप के तानो से ऊब चूका हूँ मैं।                 माँ कि हाय और बाप के तानों से ऊब चूका हूँ मैं। सोचता हूँ मैं क्या मैं वही बच्चा हूँ जिसको देखकर माँ कि आँखे खुशी से चमक उठती थी बाप का सीना गर्व से फुल उठता था अब वही आँखे शर्म से झुक जाती है।                 मैं सोचता हूँ...

Loving Husband

खोए-खोए से सपने को अब वह पूरा करने लगा है टूटती-बिखरती मैं अब वह मुझे समेटना लगा है।            वक्त बदला है            बदल गया जीने का अंदाज़            जो कभी सपनो मे सोचती थी            अब वह करने लगी हूँ            यर्थाथ मे। अब डर नही किसी का न कोई बंधन है वह देता है मेरे सपनो को पंख अब मैं उड़ने लगी हूँ मेरे अंदर का घमंड जो उसने दिया है मुझे ।            वह कहता है समाज से            आ, अगर है हिम्मत तो            रोक ले मुझे। कभी-कभी सोचती हूँ मैं है क्या सच मे इतना हसिन ये जिंदगी मेरी या कोई सपना है।             सपनो जैसा लगता वह             लेकिन ये है सच             खोए-खोए आँखों से             जब...

बहन का थप्पड़

            आज पुरा घर खुशी से खनक रहा था। माँ की चूड़ियों कि खनक, बहन के पायल कि झनकार, दिल को छू जाने वाली वो महक, गुलाब-चमेली के फूल से सजा वो कमरा, मखमल के परदे लगाती माँ खिड़कियों पे, बहन पलंग पे रेशमी चादर बिछाती। माँ (फूलमती) बेटी से-जानती हो, मेरा सपना पूरा हो गया। मैं कब से चाहती थी कि लल्ला का शादी हो जाए। बहन (सुहाना) – हां माँ! जब देखो लोग पुछते रहते थे, भाई कि शादी कब होगी? भाई की शादी कब होगी? अब लोगों का मुंह तो बंद हुआ। अपने घर मे भी एक नई-नवेली दुलहन आ गई है। उसके आने से घर में कितनी रौनक हो गई है। तुम्हें एक बेटी और मुझे एक सहेली मिल गई है। फूलमती-हाँ! हाँ! ठीक कह रही है, जा जाकर देख भाभी क्या कर रही है? सुहाना-करेंगी क्या? आज थोड़ी न कुछ करना है, बैठी होगी। फूलमती-हाँ, तो रात बहूत हो गई है उसको अपने कमरे मे भेज।                 सुहाना थोड़ी उछलती-कुदती और शरारत भरी नज़रो से-भाभी आपका कमरा तैयार हो गया है। श्वेता शरमाकर अपनी नज़रे झुका लेती है। सुहाना बांहो मे भरते हुए श्वेता को-भाभी चलिए रात हो गई...

राही और रास्ता

यूँ घूरती है तुम्हारी नज़रे मुझको मेरे होने का एहसास होता है दूसरो कि नज़रे यूँ घूरती है तुमको तुम्हें खोने का एहसास होता है।                तब तुम मुझे एहसास दिलाते हो                मैं क्या हूँ तुम्हारे लिए                जीवन सार्थक लगता है, तुम्हारे कारण                तब दूसरे एहसास दिलाते है                मैं कुछ नहीं, तुम सबकुछ हो। मेरा अस्तित्व कुछ नहीं तुम्हारे बगैर जैसे तारों का अस्तित्व नहीं है रात के बगैर जैसे दिये का अस्तित्व नहीं है बात्ति बगैर।                मैं खुद को ढूंढने लगती हूँ तुम्में                तब तुम मुझे बताते हो                तुम सूरज हो                दिन का अस्तित्व नहीं, तुम्हा...

हर-हर मोदी घर-घर मोदी

              हर-हर मोदी घर-घर मोदी हर-हर मोदी घर-घर मोदी का नारा लेकर आया सामने वह फरिश्ता बनकर दिखाए सपने प्यारे-प्यारे मन में जगाए ज्ज़बात और उमंग             पंद्रह लाख हर खाते मे आएगा             मिलेगा हर साल रोज़गार युवाओ को             हम खुशी से झूम रहे थे             नाच रहे थे गा रहे थे             हर-हर मोदी घर-घर मोदी हर खाते का पैसा गूल हर खाते का पैसा गूल ले गया नीरव मोदी हम करते रह गए हर-हर मोदी घर-घर मोदी            वह सीना ताने कहता था            हमें प्रधानमंत्री नहीं चौकिदार बनाइए            हम पाकिस्तान का एक नहीं दस सर काटेंगे            56 इंच का सीना दिखाता क्या उलटफेर खूब दिखाया पाक मे जा के केक खाया हम कहते रह गए हर-हर मोदी घर-घर मोदी ...