नई पीढ़ी-पुरानी परंपरा
नई पीढ़ी - पुरानी परंपरा किसी जंगल में एक शेर रहता था। उसका नाम जब्बा था। वह दिन-रात यही सोचता कि काश! सारे जानवर खुद-ब-खुद मेरे पास आ जाते तो कितना अच्छा होता? जिस दिन जिस जानवर को खाने का मन होता उसे खाता। मुलायम-मुलायम खरगोश, हिरन। मगर इन सबों को खाने में मेरी तो जान ही निकल जाती है। फिर मन में सोचता है – मैं अभी जवान हूँ, खरगोश कि क्या मजाल मैं तो हिरन भी पकड़ कर खा सकता हूँ। लेकिन जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा, तब मेरा क्या होगा? मुझे इस जवानी में ही सोचना होगा कुछ उपाय। जब्बा शेर सारे जानवरों कि बैठक बुलाता है। उस जंगल के सभी जानवर बैठक में शामिल होते है। जब्बा शेर सभी जानवरों को संबोधित करते हुए – मुझे लगता है कि जंगल की व्यवस्था ठीक नहीं है। सभी जानवर सहमति भरते हुए – हां!हां!हां! जब्बा शेर – कोई किसी को कभी भी, कहीं भी खा जाता है यह कहां तक सही है? यह कहां तक सही है? एक बूढ़ा लोमड़ी ...