नई पीढ़ी-पुरानी परंपरा
नई पीढ़ी-पुरानी परंपरा
किसी जंगल में एक शेर रहता था। उसका नाम जब्बा था। वह दिन-रात यही सोचता कि काश! सारे जानवर खुद-ब-खुद मेरे पास आ जाते तो कितना अच्छा होता? जिस दिन जिस जानवर को खाने का मन होता उसे खाता। मुलायम-मुलायम खरगोश, हिरन। मगर इन सबों को खाने में मेरी तो जान ही निकल जाती है। फिर मन में सोचता है – मैं अभी जवान हूँ, खरगोश कि क्या मजाल मैं तो हिरन भी पकड़ कर खा सकता हूँ। लेकिन जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा, तब मेरा क्या होगा? मुझे इस जवानी में ही सोचना होगा कुछ उपाय। जब्बा शेर सारे जानवरों कि बैठक बुलाता है। उस जंगल के सभी जानवर बैठक में शामिल होते है।
जब्बा शेर सभी जानवरों को संबोधित करते हुए – मुझे लगता है कि जंगल की व्यवस्था ठीक नहीं है। सभी जानवर सहमति भरते हुए – हां!हां!हां! जब्बा शेर – कोई किसी को कभी भी, कहीं भी खा जाता है यह कहां तक सही है? यह कहां तक सही है? एक बूढ़ा लोमड़ी – लेकिन प्राकृति ने हमें ऐसा ही बनाया है, महाराज! जब्बा शेर – वो तो मुझे भी पता है पर चीजें हमेशा सही तो नहीं होती। प्राकृति ने तो हमें मिलजुल के रहने के लिए बनाया है, पर हम एक-दुसरे को खाते है! नोचते हैं! खसोटते है! लोमड़ी डर जाता है और कहता है – महाराज! आप ही कोई उपाय बताइए। जब्बा शेर – मैने यह बैठक इसलिए नही बुलाई है कि मैं तुमलोगों को कोई आदेश दूं। मैने ये बैठक इसलिए बुलाई है कि सबका भला हो और किसी कि भी जान न जा सके। हिरन बोलता है-महाराज अगर सभी जानवर शाकाहारी हो जाएंगे तब किसी कि जान नहीं जाएगी। लोमड़ी गुस्से मे – क्या बात करती हो बहन? अगर सभी जानवर शाकाहारी हो जाएंगे तो पेड़-पौधों का क्या होगा वो भी तो सांस लेते हैं और जब पेड़-पौधों ही नहीं रहेंगे तो जंगल कैसे रहेगा? जब जंगल ही नहीं रहेगा तो फिर हमारा अस्तित्व कहाँ रहेगा? जीतने भी जानवर रहते हैं लोमड़ी की हां में हां मिलाते है। हिरनी चुपचाप बैठ जाती हैं।
शेर मन ही मन खुश होता है। सोचता है कि अब मुझे अपनी बात रखनी चाहिए। अपनी ख़ुशी को छिपाते हुए गंभीर मुद्रा मे-साथियों मेरी नजर में एक उपाय आया है। सभी जानवर हां-हां महाराज! बताइए। आपकी आज्ञा सर-आँखों पर। जब्बा शेर -अगर सभी मांसाहारी जानवर के पास स्वयं ही उसका भोजन आ जाए और उनके तीनों वक्त का खाना उपलब्ध करा दिया जाए तो यह नोच-खसोट ख़त्म हो जाएगी। कोई जानवर किसी को नहीं मारेगा। सारे मांसाहारी जानवर शेर के हां में हां मिलाने लगते है। और सारे शाकाहारी जानवर स्तब्ध हो जाते हैं। देखते ही देखते जंगल में दो गुट बन जाता है – एक मांसाहारी जानवर का, एक शाकाहारी जानवर का। वहां कोई राजा नहीं रह जाता है। सभी एक-दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते है। तभी एक हिरनी-महाराज! मैं आपकी बहुत इज्ज़त करती हूँ, मगर कोई माँ अपने बच्चे को मरने के लिए कैसे भेज सकती है? जब्बा शेर – प्रकृति ने हमें ऐसा ही बनाया है। तुमलोगों हमारा भोजन हो, हमलोग कोई शौक से तुम्हें नही खाते। अगर हमलोग भोजन न करे तो मर जाएंगे। बच्चों के लिए ही तो बोल रहा हूँ। अगर तुमलोगों इस प्रस्ताव को मान लेते हो तो तुम जिसे चाहों उसे भेज सकते हो। नहीं तो हम जिसे चाहे उसे दबोच सकते है। हिरनी गुस्से मे – प्रकृति ने आपको हमसे ज्यादा मजबूत बनाया है पर हमें भी तो छरहरी टांगे दी है, इसका मतलब यह तो नहीं कि हम आत्मसमर्पण कर दे। जीने का सभी प्राणियों को समान हक है। मरना और जीना किस्मत की बात है। मेरे चाचा आज तक जिंदा है क्यों नहीं आपलोग पकड़ पाए। अपने बचाव के लिए लड़ना हर प्राणी का हक है। आत्मसमर्पण करना कायरता।
माहौल को बिगड़ता देख एक बूढ़ा शेर खड़ा होता है और सभी जानवरों को संबोधित करते हुए बोलता है – ये बैठक इसलिए बुलाई गई थी कि सभी का भला हो सके। हम आपस में लड़कर किसी परिणाम पर नहीं पहुंच सकते। जो व्यवस्था जैसे चल रही थी वैसे ही अभी चलेगी और इस बैठक को अगले दो दिनों के लिए स्थगित किया जाता है। सभी जानवर उसकी बात मान लेते है और अपने-अपने घर चले जाते है।
बूढ़ा शेर अपने बेटे से-जब्बा ये क्या है? मुझे लगा था इस जंगल की व्यवस्था तूम मुझसे बेहतर चला सकते हो, लेकिन आज की तुम्हारी हरकत से मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। तू मेरा बेटा है, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। मैं जानता हूँ तूम एक अच्छे शासक बन सकते हो, लेकिन तुमने यह कायरतापूर्ण हरकत क्यों की? जब्बा शेर – मुझे नहीं लगता मैने कोई गलत काम किया है। आप खामखा़ मुझ पर गुस्सा हो रहें है। बूढ़ा शेर गुस्से मे – तुमने सोच भी कैसे लिया कि वो आत्मसमर्पण कर देंगे। हर प्राणी को अपने जीवन के लिए लड़ने का हक है और यह हक उनसे कोई छीन नहीं सकता। कोई नहीं! इसमें तुम्हारी कायरता दिखती है। क्या मैने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं? किसी को बहला-फुसलाकर खा जाओ। मैने तुम्हें लड़ना सिखाया, जितना सिखाया, उच्च आर्दश रखना सिखाया। तूम राजा हो! राजा! तुम्हें हर जानवर के हित कि बात सोचनी चाहिए थी। अपने अंदर झाँक कर देखो और खुद से पुछो कि जो तूम कर रहे हो क्या वो सही है? मैं जानता हूँ तुम्हारे अंदर डर बैठ गया है और मुझे यही जानना है कि तुम्हारे अंदर किस बात का डर है? मैं तुम्हारा बाप हूँ और मेरा अनुभव तुमसे ज्यादा है। मैं तुम्हारे हर डर का जवाब देने के लिए तैयार हूँ, बताओ वो डर क्या है?
जब्बा शेर अपने डर कि बात अपने पिता के मुँह से सुनकर आत्मग्लानी से भर जाता है। काँपते हुए बोलता है – पिताजी! आप ठीक कह रहे हैं। मैं डर गया था। अपने बेटे की ये हालत देखकर बूढ़ा शेर संतावना देते हुए बोलता है – डरो मत! मैं तुम्हारे साथ हूँ। बोल क्या बात है? जब्बा शेर रोते हुए – मैं हमेशा तो जवान नहीं रहूँगा, जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा तो कैसे शिकार करूंगा? इसलिए मैंने ये सब किया। बूढ़ा शेर मुस्कराते हुए-अरे पगले! मै भी तो बूढ़ा हूँ, मैं भी तो शिकार नहीं कर पाता पहले जैसा तो क्या मैं जिन्दा नहीं हूँ? जब्बा – वो तो मेरे कारण। मैं आपकी मदद करता हूँ और आप मेरे पिता है। मैं आपको भूखा कैसे छोड़ सकता हूँ? बूढ़ा शेर जब्बा से-नहीं! तुम्हारे कारण नहीं, अपने संस्कारो के कारण। मैने जो संस्कार तुम्हें दिए है, वही संस्कार जब अपने बच्चों को दोगे तो तुम कभी भी कमजोर नहीं बनोगे। जब्बा को बहुत दुःख होता है। उसे अपनी हरकत और अपनी कायरता पर पश्चाताप होता है। वह फूट-फूट कर रोने लगता है और अपने पिता से माफी मांगा है।
दो दिन बाद बैठक फिर से शुरू होती है। कुछ जानवर खुश थे कि बैठे-बिठाए भोजन मिल जाएगा और कुछ जानवर दुःखी और गुस्से मे थे कि वो आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। जब्बा-मैने आत्मचिंतन किया और मुझे लगता है जो हमारे संस्कार चलते आ रहे है पीढ़ी दर पीढ़ी उसमे सुधार कि गुंजाइश हो सकती है लेकिन उसे बदला नही जा सकता । मैं गलत था। जंगल कि व्यवस्था जैसे चल रही थी वैसे ही चलती रहेगी। सभी जानवर जब्बा कि बात से सहमत हो जाते है।
किसी जंगल में एक शेर रहता था। उसका नाम जब्बा था। वह दिन-रात यही सोचता कि काश! सारे जानवर खुद-ब-खुद मेरे पास आ जाते तो कितना अच्छा होता? जिस दिन जिस जानवर को खाने का मन होता उसे खाता। मुलायम-मुलायम खरगोश, हिरन। मगर इन सबों को खाने में मेरी तो जान ही निकल जाती है। फिर मन में सोचता है – मैं अभी जवान हूँ, खरगोश कि क्या मजाल मैं तो हिरन भी पकड़ कर खा सकता हूँ। लेकिन जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा, तब मेरा क्या होगा? मुझे इस जवानी में ही सोचना होगा कुछ उपाय। जब्बा शेर सारे जानवरों कि बैठक बुलाता है। उस जंगल के सभी जानवर बैठक में शामिल होते है।
जब्बा शेर सभी जानवरों को संबोधित करते हुए – मुझे लगता है कि जंगल की व्यवस्था ठीक नहीं है। सभी जानवर सहमति भरते हुए – हां!हां!हां! जब्बा शेर – कोई किसी को कभी भी, कहीं भी खा जाता है यह कहां तक सही है? यह कहां तक सही है? एक बूढ़ा लोमड़ी – लेकिन प्राकृति ने हमें ऐसा ही बनाया है, महाराज! जब्बा शेर – वो तो मुझे भी पता है पर चीजें हमेशा सही तो नहीं होती। प्राकृति ने तो हमें मिलजुल के रहने के लिए बनाया है, पर हम एक-दुसरे को खाते है! नोचते हैं! खसोटते है! लोमड़ी डर जाता है और कहता है – महाराज! आप ही कोई उपाय बताइए। जब्बा शेर – मैने यह बैठक इसलिए नही बुलाई है कि मैं तुमलोगों को कोई आदेश दूं। मैने ये बैठक इसलिए बुलाई है कि सबका भला हो और किसी कि भी जान न जा सके। हिरन बोलता है-महाराज अगर सभी जानवर शाकाहारी हो जाएंगे तब किसी कि जान नहीं जाएगी। लोमड़ी गुस्से मे – क्या बात करती हो बहन? अगर सभी जानवर शाकाहारी हो जाएंगे तो पेड़-पौधों का क्या होगा वो भी तो सांस लेते हैं और जब पेड़-पौधों ही नहीं रहेंगे तो जंगल कैसे रहेगा? जब जंगल ही नहीं रहेगा तो फिर हमारा अस्तित्व कहाँ रहेगा? जीतने भी जानवर रहते हैं लोमड़ी की हां में हां मिलाते है। हिरनी चुपचाप बैठ जाती हैं।
शेर मन ही मन खुश होता है। सोचता है कि अब मुझे अपनी बात रखनी चाहिए। अपनी ख़ुशी को छिपाते हुए गंभीर मुद्रा मे-साथियों मेरी नजर में एक उपाय आया है। सभी जानवर हां-हां महाराज! बताइए। आपकी आज्ञा सर-आँखों पर। जब्बा शेर -अगर सभी मांसाहारी जानवर के पास स्वयं ही उसका भोजन आ जाए और उनके तीनों वक्त का खाना उपलब्ध करा दिया जाए तो यह नोच-खसोट ख़त्म हो जाएगी। कोई जानवर किसी को नहीं मारेगा। सारे मांसाहारी जानवर शेर के हां में हां मिलाने लगते है। और सारे शाकाहारी जानवर स्तब्ध हो जाते हैं। देखते ही देखते जंगल में दो गुट बन जाता है – एक मांसाहारी जानवर का, एक शाकाहारी जानवर का। वहां कोई राजा नहीं रह जाता है। सभी एक-दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते है। तभी एक हिरनी-महाराज! मैं आपकी बहुत इज्ज़त करती हूँ, मगर कोई माँ अपने बच्चे को मरने के लिए कैसे भेज सकती है? जब्बा शेर – प्रकृति ने हमें ऐसा ही बनाया है। तुमलोगों हमारा भोजन हो, हमलोग कोई शौक से तुम्हें नही खाते। अगर हमलोग भोजन न करे तो मर जाएंगे। बच्चों के लिए ही तो बोल रहा हूँ। अगर तुमलोगों इस प्रस्ताव को मान लेते हो तो तुम जिसे चाहों उसे भेज सकते हो। नहीं तो हम जिसे चाहे उसे दबोच सकते है। हिरनी गुस्से मे – प्रकृति ने आपको हमसे ज्यादा मजबूत बनाया है पर हमें भी तो छरहरी टांगे दी है, इसका मतलब यह तो नहीं कि हम आत्मसमर्पण कर दे। जीने का सभी प्राणियों को समान हक है। मरना और जीना किस्मत की बात है। मेरे चाचा आज तक जिंदा है क्यों नहीं आपलोग पकड़ पाए। अपने बचाव के लिए लड़ना हर प्राणी का हक है। आत्मसमर्पण करना कायरता।
माहौल को बिगड़ता देख एक बूढ़ा शेर खड़ा होता है और सभी जानवरों को संबोधित करते हुए बोलता है – ये बैठक इसलिए बुलाई गई थी कि सभी का भला हो सके। हम आपस में लड़कर किसी परिणाम पर नहीं पहुंच सकते। जो व्यवस्था जैसे चल रही थी वैसे ही अभी चलेगी और इस बैठक को अगले दो दिनों के लिए स्थगित किया जाता है। सभी जानवर उसकी बात मान लेते है और अपने-अपने घर चले जाते है।
बूढ़ा शेर अपने बेटे से-जब्बा ये क्या है? मुझे लगा था इस जंगल की व्यवस्था तूम मुझसे बेहतर चला सकते हो, लेकिन आज की तुम्हारी हरकत से मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। तू मेरा बेटा है, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। मैं जानता हूँ तूम एक अच्छे शासक बन सकते हो, लेकिन तुमने यह कायरतापूर्ण हरकत क्यों की? जब्बा शेर – मुझे नहीं लगता मैने कोई गलत काम किया है। आप खामखा़ मुझ पर गुस्सा हो रहें है। बूढ़ा शेर गुस्से मे – तुमने सोच भी कैसे लिया कि वो आत्मसमर्पण कर देंगे। हर प्राणी को अपने जीवन के लिए लड़ने का हक है और यह हक उनसे कोई छीन नहीं सकता। कोई नहीं! इसमें तुम्हारी कायरता दिखती है। क्या मैने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं? किसी को बहला-फुसलाकर खा जाओ। मैने तुम्हें लड़ना सिखाया, जितना सिखाया, उच्च आर्दश रखना सिखाया। तूम राजा हो! राजा! तुम्हें हर जानवर के हित कि बात सोचनी चाहिए थी। अपने अंदर झाँक कर देखो और खुद से पुछो कि जो तूम कर रहे हो क्या वो सही है? मैं जानता हूँ तुम्हारे अंदर डर बैठ गया है और मुझे यही जानना है कि तुम्हारे अंदर किस बात का डर है? मैं तुम्हारा बाप हूँ और मेरा अनुभव तुमसे ज्यादा है। मैं तुम्हारे हर डर का जवाब देने के लिए तैयार हूँ, बताओ वो डर क्या है?
जब्बा शेर अपने डर कि बात अपने पिता के मुँह से सुनकर आत्मग्लानी से भर जाता है। काँपते हुए बोलता है – पिताजी! आप ठीक कह रहे हैं। मैं डर गया था। अपने बेटे की ये हालत देखकर बूढ़ा शेर संतावना देते हुए बोलता है – डरो मत! मैं तुम्हारे साथ हूँ। बोल क्या बात है? जब्बा शेर रोते हुए – मैं हमेशा तो जवान नहीं रहूँगा, जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा तो कैसे शिकार करूंगा? इसलिए मैंने ये सब किया। बूढ़ा शेर मुस्कराते हुए-अरे पगले! मै भी तो बूढ़ा हूँ, मैं भी तो शिकार नहीं कर पाता पहले जैसा तो क्या मैं जिन्दा नहीं हूँ? जब्बा – वो तो मेरे कारण। मैं आपकी मदद करता हूँ और आप मेरे पिता है। मैं आपको भूखा कैसे छोड़ सकता हूँ? बूढ़ा शेर जब्बा से-नहीं! तुम्हारे कारण नहीं, अपने संस्कारो के कारण। मैने जो संस्कार तुम्हें दिए है, वही संस्कार जब अपने बच्चों को दोगे तो तुम कभी भी कमजोर नहीं बनोगे। जब्बा को बहुत दुःख होता है। उसे अपनी हरकत और अपनी कायरता पर पश्चाताप होता है। वह फूट-फूट कर रोने लगता है और अपने पिता से माफी मांगा है।
दो दिन बाद बैठक फिर से शुरू होती है। कुछ जानवर खुश थे कि बैठे-बिठाए भोजन मिल जाएगा और कुछ जानवर दुःखी और गुस्से मे थे कि वो आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। जब्बा-मैने आत्मचिंतन किया और मुझे लगता है जो हमारे संस्कार चलते आ रहे है पीढ़ी दर पीढ़ी उसमे सुधार कि गुंजाइश हो सकती है लेकिन उसे बदला नही जा सकता । मैं गलत था। जंगल कि व्यवस्था जैसे चल रही थी वैसे ही चलती रहेगी। सभी जानवर जब्बा कि बात से सहमत हो जाते है।
Really inspired this story. Realised that father is soo important in our life.
ReplyDeleteबहुत उम्दा! डर आदमी को न करने के काम करवाता है। शेर को भी लोमड़ी की तरह सोचने पर मजबूर कर देता है। ऐसे में परिवार के बुजुर्गों का फर्ज है कि वे उसको हिम्मत दिलाये, मुश्किलों का सामना करना सिखाये। परिवार साथ मे हो तो इंसान कितना भी बड़ा पहाड़ लांघ सकता है।
ReplyDeleteउम्मीद है आप ऐसी प्रेरणात्मक कहानियां लिखती रहेगी।👌🏽👍🏽
धन्यवाद। आपका आशीर्वाद हमेशा मुझ पर बना रहे ।
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