खुद में संपूर्ण

              आनंद और समीर दो सगे भाई थे। दोनों एक-दूसरे से एकदम अलग। समीर पढ़ाई में तेज़ था वह सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ही ध्यान देता था। समीर हमेशा अपने क्लास में अव्वल आता था लेकिन आनंद, आनंद अपने पिता के कामों में हाथ बंटाता था वह पढ़ने में कमजोर था और पढ़ने से हमेशा जी चुराता था। आनंद हमेशा सोचता था मैं ऐसा क्या करूं जिससे मुझे पढ़ाई ना करनी पड़े। उनके पिताजी कभी कुछ नहीं कहते ना हीं समीर
 कि ज्यादा तारीफ करते हैं ना ही आनंद की बुराई। दोनों बेटे उनके लिए समान थे।
            एक बार की बात है जब दोनों भाई क्लास में थे तभी शिक्षक आनंद से – तुम हमेशा क्लास में सोते रहते हो। कोई काम ठीक से नहीं करते, पढ़ते भी नहीं हो। अपने ही भाई समीर को देखो वह कितना अच्छा है। मन लगाकर पढ़ाई करता है। एक तुम हो कि हमेशा मटरगश्ती कि सोचते रहते हो और कोई दूसरा काम आता है भी है तुम्हें? आनंद चुपचाप खड़ा रहता है फिर उसके मास्टर जी – समीर जिंदगी में जरूर कुछ अच्छा करेगा। मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी तुम पर पैसे बर्बाद कर रहे है। जब तुम्हें पढ़ना ही नहीं है तो आते ही क्यों हो यहां? आनंद कुछ नहीं कहता शर्मिंदगी से उसकी आत्मा उसे धिक्कारने करने लगती है। वह चुपचाप बैठ जाता है। पूरे क्लास में वह यही सोचते रहता है – क्या मैं इतना नालायक हूं कि मैं अपने पापा के पैसे बर्बाद कर रहा हूं?
             पाठशाला की छुट्टी के बाद दोनों भाई घर आते-आते बात करते रहते हैं। आनंद समीर से – अच्छा तुम क्लास में हमेशा अच्छे नंबर लाते रहते हो और मैं नहीं ऐसा क्यों है? समीर – इसका मतलब साफ है तुम पढ़ाई नहीं करते हो इसलिए और तुम्हें दिखाई नहीं देता मैं कितना मेहनत करता हूं? जबकि तुम तो कोई मेहनत करते नहीं हो इसीलिए, जब मेहनत करोगे तब ना तुम्हें उसका फल मिलेगा। आनंद – कोशिश तो बहुत करता हूं यार, पर मन ही नहीं लगता। समीर गुरुर से – कोशिश करने से क्या होता है, उसके लिए दिमाग भी होना चाहिए। तुम्हारे पास दिमाग रहेगा तब ना! आनंद और दुःखी हो जाता है, सोचता है शायद मुझे पढ़ाई-लिखाई करनी ही नहीं चाहिए। शायद मैं अपने पापा का पैसा यूं ही बर्बाद कर रहा हूं। समीर कुछ देर बाद – क्या हुआ तुम अपना चेहरा क्यों लटका लिए हो? आनंद – कुछ नहीं बस मैं यही सोच रहा था मैं पापा का तो पैसा नहीं बर्बाद कर रहा हूं ना? समीर आनंद की तरफ देख कर मुस्कुराने लगता है। आनंद – तुम मुस्कुरा क्यों रहे हो? जो कहना है साफ-साफ कहो। समीर - कहना तो कुछ खास नहीं है मगर बुरा ना मानो तो एक बात कहूं? आनंद – हां बोलो ना! मुझे बुरा नहीं लगेगा। समीर – मास्टर जी ने ठीक ही कहा है तुमने पैसे बर्बाद ही किए हैं। अगर तुम ठीक से पढ़ाई नहीं करते पापा कितने मेहनत करते हैं। जो भी हो। मुझे भी अपने पढ़ाई में कटौती करनी पड़ती है। आनंद शर्म से और गड़ जाता है। उसे लगता है कि मुझे पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए।
        वह जब घर पहुंचते हैं तब आनंद अपने पिता से – पिताजी! मैंने कुछ सोचा है। उसके पिता किशूनजी – हां! बोलो क्या सोचा है? आनंद – मैं सोच रहा हूं मैं अपनी पढ़ाई पूरी ना करूं। वैसे भी मुझे पढ़ने में मन नहीं लगता। अब मैं आपके पैसे बर्बाद नहीं करना चाहता। तभी उसके पिता अपने पास बुला कर उसे समझाते हैं – देखो बेटा, तुम पढ़ाई क्यों नहीं करना चाहते हो? आनंद - क्योंकि मैं अपने क्लास में टॉप नहीं करता। किशूनजी – तो जितने लड़के पढ़ते हैं सभी टॉप करते हैं। आनंद – नहीं कोई एक ही लड़का टॉप करता है। आप क्या बकवास कर रहे हैं? किशूनजी – यही बात तो मैं भी तुम्हें समझाना चाह रहा हूं। क्या बकवास कर रहे हो?
         आनंद क्लास की पूरी घटना और समीर के साथ हुई बातचीत एक-एक बात अपने पिताजी को बताता है। किशूनजी मुस्कुराने लगते हैं और बोलते हैं – तुम दूसरों से खुद compair मत करो। तुम जैसे हो वैसे ही अच्छे हो और अपने पढ़ाई को जैसे पूरा करना चाहते हो वैसा ही करो। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। तब आनंद थोड़ा गुस्से में – लेकिन समीर बोल रहा था मेरे कारण उसके पढ़ाई में कटौती होती है। उसके पिताजी मुस्कुराकर बोलते हैं – तुम्हारे कारण उसकी पढ़ाई में कटौती कैसे हो सकती है? यह हो सकता है कि मैं उसकी इच्छाओं को पूरा ना कर सकूं लेकिन तुम, तुम तो उसके भाई हो, तुम इसमें कहां हो कि तुम्हारे कारण उसके पैसों में कटौती होती है? तुम जैसे हो वैसे ही सही हो। पढ़ाई पर ध्यान दो। आनंद कुछ नहीं बोलता और अपनी पढ़ाई ऐसे ही जारी रखता है। फिर भी वह अंदर से बहुत दुःखी रहता है। मैट्रिक का रिजल्ट आता है। आनंद ही पास कर जातात है और समीर पुरे जिले में टॉप करता है। उसे स्कॉलरशिप मिलती है। वह शहर चला जाता है पढ़ने के लिए लेकिन आनंद अपने पिता के पास रहता है और वहीं से अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाता है और अपने पिता का हमेशा साथ देता है।
       एक दिन जब सभी लोग चौक पर बैठ कर बातें कर रहे थे। सभी लोग समीर की तारीफ़ कर रहे थे लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी किशून जी आपके बेटे ने बहुत नाम किया है। आपका ही नहीं बल्कि पूरे गांव का भी। जहां भी जाओ समीर की तो बात ही अलग है। आपके बेटे ने पूरे जिले में टॉप किया है। सभी लोग उसकी तारीफ करते रहते हैं।
      आनंद कहीं ना कहीं भीतर ही भीतर कुढ़ता रहता है। उसे समझ में ही नहीं आता वह क्या करें? वह ऐसा क्या करें कि समीर से खुद को बेहतर साबित कर सके? दिन-रात मेहनत करते रहता है। अपने पिता के कामों में भी मेहनत करता है और अपनी पढ़ाई में भी पूरे तरीके से लगा हुआ रहता है।
     उधर समीर अपनी ज़रूरतों से ज्यादा अपनी इच्छाओं पर पैसे खर्च करता है। आए दिन वह अपने पापा से पैसों की डिमांड करते रहता है। उसके पिता किशून जी उसे हिदायत देते रहते हैं देखो बेटा तू वहां पढ़ाई करने के लिए गया है, अगर ज्यादा फालतू खर्च करोगे तो मुझे नहीं लगता तुम्हें वह पैसे दे पाऊंगा? मुझे आनंद की भी तो पढ़ाई देखनी है।
    समीर एक दिन फोन पर ही गुस्से में – देखें पिताजी आनंद पढ़ता-लिखता है नहीं उसमें पैसे बर्बाद करने की क्या जरूरत है और मैं इतना मेहनत करता हूं कल होकर मैं अगर कुछ अच्छा कर जाऊंगा तो आपको ही फायदा होगा और आनंद को भी अपने लाइफ में सेटल कर दूंगा। आप बात को क्यों नहीं समझते हैं? मुझे जरूरत है। मैं ऐसा तो नहीं हूं ऐसे फालतू में फालतू पैसे खर्च करता रहूं। आनंद के पिताजी कुछ नहीं कहते हैं और चुपचाप फोन काट देते हैं। यह सिलसिला यूं ही कुछ दिन तक चलता रहता है। आनंद अपने पिता के काम में धीरे-धीरे हाथ बढ़ाते-बढ़ाते उनको इतना आगे बढ़ा देता है और सबल कर देता है कि वह ना सिर्फ समीर की ज़रूरतों को तो छोड़ो उसकी इच्छाओं को भी पूरा करते हैं। समीर भी खुश रहने लगता है लेकिन आनंद के चेहरे पर वह आनंद कभी नहीं आ पाती क्योंकि कहीं ना कहीं वह खुद को समीर से बहुत ही छोटा मानता है। उसे लगता है मैं कितना भी कुछ क्यों न कर लूं लेकिन मैं वह इज्जत वह मान जो पिताजी को समीर के कारण मिली है वह मैं अपने पिताजी को कभी नहीं दिला सकता।
          एक दिन आनंद बरामदे में दुःखी बैठा रहता है। उसी समय उसके पिताजी आते हैं – क्या हुआ बेटा? तुम इतने दुःखी क्यों हो? कुछ हुआ है क्या? आनंद – कुछ नहीं पिताजी बस यूंहीं बैठा सोच रहा था। किशून जी – क्या, सोच रहे थे? मुझे बताओगे भी? आनंद – कुछ नहीं, शायद आपके लिए समीर ही सही था। मैं कभी ठीक नहीं था जो शायद आप मुझसे चाहते थे वह मैंने आपको कभी नहीं दिया। आनंद की आंखों से आंसू बहने लगते है। 
       किशूनजी आनंद को गले लगा लेते हैं – बेटा जो तुमने मुझे दिया वह मुझे कभी समीर नहीं दे सकता है। यह बात सच है उसने जिले में टॉप किया, मेरा नाम रोशन किया लेकिन आए दिन उसके फ़िज़ूल खर्चे; उसे मुझसे कोई मतलब नहीं है। आज तक उसने मेरे काम में कभी हाथ नहीं बंटाया। पहले भी मैं जब कभी बीमार रहा तो वह मेरे पास एक पल के लिए भी बैठा नहीं। अगर मेरे दिल से पूछो तो जितना कुछ तुमने मेरे लिए किया है उतना कभी भी समीर ने नहीं किया है। ‘वह दुनिया के लिए बहुत कुछ कर सकता है पर मेरे लिए कुछ नहीं कर सकता।' तुम क्यों ऐसा सोचते हो कि तुम समीर से बेहतर नहीं हो? तुम समीर से ही नहीं तुम सभी से बेहतर हो।
      मैंने तुम्हें एक बार समझाया था कि ‘कभी किसी से competition नहीं करना चाहिए हर आदमी अपने आप में स्पेशल है।' समीर अपनी जगह स्पेशल है और तुम भी अपनी जगह स्पेशल हो, अगर मेरे दो बेटे नहीं होते और शायद तुम मेरी जिंदगी में नहीं होते या तुम भी समीर की तरह होते तो शायद मैं तुम दोनों का खर्चा भी वहन नहीं कर पाता और जिस प्रतिष्ठा से मैं इस गांव में रह रहा हूं मैं नहीं रह पाता इसलिए तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए।
     तुम ख़ुद को देखो जब तुम छोटे थे तो यह घर छोटा-सा झोपड़ी था। तुम्हारे कारण ही मैंने अपने बिजनेस को इतना आगे बढ़ाया है और इतनी सफलता पाई है और समीर को भी इतना आगे बढ़ाने में तुमने जो मेरी मदद की है उसको शायद समीर भी नहीं समझ सकता। अगर तुमने मेरी मदद नहीं की होती तो मैं शायद समीर का खर्चां भी वहन नहीं कर पाता इसलिए समीर को सफल बनाने में तुम्हारा भी हाथ है।
     “हर कामयाब आदमी के पीछे बहुत सारे लोगों का हाथ होता है लेकिन जो कामयाब इंसान होता है वह सिर्फ और सिर्फ अपना ही हाथ समझता है, कभी वह अपनी आंखें बंद करके सोचेगा और अपने दिल से पूछेगा तो उसे एहसास हो जाएगा कि उसने तो कभी कुछ नहीं किया हर वक्त हर किसी ने उसकी मदद की और वह धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहा। आगे बढ़ना और कामयाबी हासिल करना बहुत आसान है लेकिन किसी को आगे बढ़ाना और उसके लिए समर्पण करना बहुत मुश्किल काम है” जो तुमने किया है वह शायद कभी समीर नहीं कर पाता। जो खुशी तुमने मुझे दी है वह शायद कभी समीर मुझे नहीं दे पाया इसीलिए तुम सबसे बेहतर हो आनंद और आनंद खुश हो जाता है और अपने पिता को गले लगा लेता है।

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