स्वयं की तलाश

                  राजा मानसिंह अपने राजमहल के विशाल गलियारों में टहल रहे थे। महल की दीवारों पर सजी भव्य चित्रकारी, दरबार की ओर जाने वाले लंबे रास्ते और वर्षों से उनके जीवन का हिस्सा रहे परिचित दृश्य आज उन्हें कुछ अलग ही प्रतीत हो रहे थे। उनके कदम आगे बढ़ रहे थे, किंतु मन अतीत की गलियों में भटक रहा था।

                वे सोच रहे थे—आखिर उन्होंने अपने जीवन में किया ही क्या है? उन्होंने अपना जीवन किस प्रकार जिया है? इतने वर्षों में उन्होंने क्या पाया और क्या खोया?

                प्रश्न अनेक थे, किंतु किसी का उत्तर उनके पास नहीं था। जब से उन्होंने अपने कर्तव्यों को समझना शुरू किया था, तभी से उनका जीवन जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा था। कभी राज्य की चिंता, कभी प्रजा के सुख-दुःख की जिम्मेदारी, कभी परिवार की आवश्यकताएँ और कभी भविष्य की योजनाएँ। जीवन का एक लंबा समय बीत चुका था, पर आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि इन सबके बीच वे स्वयं को कहीं पीछे छोड़ आए हैं।

                 विचारों का यह सिलसिला इतना बढ़ गया कि उनका मन व्याकुल होने लगा। वे धीरे-धीरे अपने कक्ष की ओर चले गए।

               राजा को पिछले कई दिनों से चिंतित देखकर महल के सैनिक भी परेशान थे। उनमें से एक ने महारानी के पास जाकर कहा, “महारानी, लगता है महाराज किसी गंभीर चिंता में हैं। उनके मुख पर पहले जैसी प्रसन्नता दिखाई नहीं देती। उचित होगा कि आप उनसे बात करें। संभव है, वे अपनी परेशानी आपसे साझा कर सकें।”

                        महारानी यह सुनकर चिंतित हो उठीं। वे तुरंत राजा के कक्ष की ओर चल पड़ीं।

              वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि राजा शांत बैठे हुए थे, किंतु उनके चेहरे पर गहरी उदासी थी। उनकी आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन था।

                 महारानी उनके समीप बैठीं और धीरे से बोलीं, “महाराज, आज आपके मुख पर वह तेज दिखाई नहीं दे रहा, जिसे देखकर पूरे राज्य को विश्वास मिलता है। आप इतने गंभीर क्यों हैं? क्या कोई समस्या है? यदि ऐसा है, तो कृपया मुझे बताइए।”

                                            राजा ने एक गहरी साँस ली।

“समस्या तो कोई विशेष नहीं है, महारानी। किंतु यदि सच कहूँ, तो लगता है जैसे मैं समस्याओं से ही घिरा हुआ हूँ।”

                   महारानी ने उनकी ओर देखते हुए कहा, “मैं आपकी बात समझ नहीं पा रही हूँ। आप जो कहना चाहते हैं, निःसंकोच कहिए। मुझसे कुछ छिपाने की आवश्यकता नहीं है।”

                 राजा कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “हमने जीवन के इतने वर्ष बिता दिए। कभी-कभी सोचता हूँ कि अब तो जीवन का अंतिम पड़ाव भी धीरे-धीरे निकट आ रहा है। लेकिन जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मैंने आज तक अपने लिए जीवन जिया ही नहीं।”

                                        महारानी आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगीं।

                 “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, महाराज? आपने अपने राज्य के लिए कितना कुछ किया है। हमारी प्रजा सुखी है, हमारा राज्य समृद्ध है। हमारे बच्चे हैं, परिवार है और हम सब आपके साथ प्रसन्न हैं। फिर आपको ऐसा क्यों लगता है कि आपने अपने जीवन में कुछ नहीं किया?”

                                    राजा के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान उभरी।

               “यही तो मेरी उलझन है, महारानी। संसार की दृष्टि से देखूँ, तो मैं एक सफल राजा हूँ। मैंने अपने कर्तव्यों का पालन किया है, प्रजा की सेवा की है और अपने परिवार को सुख देने का प्रयास किया है। लेकिन जब अपने भीतर झाँकता हूँ, तो लगता है कि मैंने जीवन भर केवल दूसरों के लिए ही जिया है।"

               “जब से समझदार हुआ, तभी से कोई न कोई जिम्मेदारी मेरे सामने खड़ी रही। कभी राज्य के लिए जिया, कभी परिवार के लिए, कभी अपने बच्चों के भविष्य के लिए। हर बार मैंने अपने मन की इच्छाओं को यह सोचकर पीछे कर दिया कि पहले मेरा कर्तव्य है, फिर मेरी इच्छा।"

                “मैं यह नहीं कहता कि मैंने जो किया, वह गलत था। अपने कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक था।" लेकिन क्या जीवन में केवल कर्तव्य ही सब कुछ है? क्या मनुष्य का अपना कोई जीवन नहीं होता? क्या उसे कभी अपने लिए जीने का अधिकार नहीं है?

             “आज जब मैं अपने भीतर देखता हूँ, तो समझ नहीं आता कि मैं वास्तव में क्या चाहता हूँ। अब किसी काम में मन नहीं लगता। राजकाज से भी विरक्ति होने लगी है। कभी-कभी मन करता है कि सब कुछ छोड़कर कहीं दूर चला जाऊँ। ऐसी जगह, जहाँ मुझे कोई राजा न समझे, जहाँ कोई मुझसे कोई अपेक्षा न रखे। जहाँ मैं एक साधारण मनुष्य की तरह जीवन जी सकूँ और स्वयं को जान सकूँ।”

                                          महारानी की आँखों में चिंता उतर आई।

                “महाराज, आप यह कैसी बातें कर रहे हैं? यदि आप राजकाज नहीं सँभालना चाहते, तो हम अपने बड़े पुत्र को राजसिंहासन सौंप सकते हैं। लेकिन आप इस तरह सब कुछ छोड़कर कहीं दूर क्यों जाना चाहते हैं? वहाँ आप कैसे रहेंगे? किसके साथ रहेंगे? आपको किसी वस्तु की आवश्यकता होगी, तो उसका प्रबंध कैसे करेंगे?

                 “यदि अब आप कोई जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते, तो मत उठाइए। मैं आपसे कुछ नहीं कहूँगी। आप यहीं रहकर अपनी इच्छानुसार जीवन बिता सकते हैं। लेकिन मुझे इस तरह अकेला छोड़कर जाने की बात मत कीजिए।”

                 राजा ने गंभीर स्वर में कहा, “महारानी, त्याग केवल किसी वस्तु से दूर हो जाने का नाम नहीं है। जब तक मन उस वस्तु से बँधा रहता है, तब तक दूरी भी वास्तविक त्याग नहीं बन पाती।” 

               “यदि मैं यहाँ रहूँगा, तो इस राजमहल की दीवारें, राज्य की समस्याएँ और परिवार की आवश्यकताएँ मुझे बार-बार अपनी ओर खींचेंगी। मैं चाहकर भी स्वयं को इन सबसे अलग नहीं कर पाऊँगा। मुझे लगता है कि यदि मैं सचमुच स्वयं को खोजना चाहता हूँ, तो कुछ समय के लिए इन सबके बीच से निकलना होगा।”

                  “लेकिन मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे निर्णय से तुम दुखी हो। मैं तुमसे और अपने परिवार से बहुत प्रेम करता हूँ। तुम्हारी आँखों में आँसू देखकर मैं कभी प्रसन्न नहीं रह सकता। यदि तुम्हारी इच्छा नहीं है, तो मैं कहीं नहीं जाऊँगा। मैं स्वयं ही अपनी उलझनों में फँसा हुआ हूँ। तुम मुझे और उलझन में मत डालो।”

                 राजा की बातें सुनकर महारानी की आँखें भर आईं। वे कुछ देर तक मौन बैठी रहीं। उनके मन में पति को खो देने का भय था, लेकिन वे यह भी समझ रही थीं कि राजा की व्याकुलता केवल कुछ दिनों की थकान नहीं थी। वे लंबे समय से अपने भीतर किसी ऐसे प्रश्न को लिए घूम रहे थे, जिसका उत्तर उन्हें कहीं नहीं मिल रहा था।

                 कुछ देर बाद महारानी ने अपने आँसू पोंछे और कहा, “महाराज, आपने अपने जीवन में हमारे लिए और इस राज्य के लिए बहुत कुछ किया है। यदि अब आपको लगता है कि स्वयं को खोजने के लिए यहाँ से जाना आवश्यक है, तो मैं आपके मार्ग में बाधा नहीं बनूँगी।

              “मुझे केवल इस बात का भय है कि कहीं आप संसार से विरक्त होकर संन्यास की ओर तो नहीं जा रहे। मैं नहीं जानती कि आपके मन में क्या चल रहा है, लेकिन इतना अवश्य जानती हूँ कि आप जो भी निर्णय लें, वह अपने मन की शांति के लिए लें, किसी क्षणिक निराशा में नहीं।” 

                                                    राजा ने उनकी ओर देखा।

              “महारानी, मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं संन्यास की ओर जा रहा हूँ या किसी नई शुरुआत की ओर। मैं केवल इतना जानता हूँ कि मैं स्वयं से मिलना चाहता हूँ। जब तक मुझे अपने ही प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, तब तक मैं दूसरों को क्या उत्तर दूँगा?

              “मैं नहीं चाहता कि कोई मुझ पर दबाव डालकर मुझे रोके या जाने के लिए विवश करे। मैं चाहता हूँ कि मेरा निर्णय मेरी अपनी इच्छा से हो और तुम सबकी सहमति से हो। क्योंकि मैं अपने प्रियजनों को दुखी करके अपनी खुशी नहीं खोज सकता।”

                                                    महारानी ने धीरे से सिर हिलाया।

             “तो जाइए, महाराज। मैं आपको नहीं रोकूँगी। यदि इस यात्रा से आपको अपने प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं, यदि इससे आप स्वयं को पहचान पाते हैं, तो आपका जाना व्यर्थ नहीं होगा। मैं आपके लौटने की आशा अवश्य रखूँगी, लेकिन आपकी राह में बंधन बनकर नहीं खड़ी होऊँगी।”

             महारानी की बात सुनकर राजा का मन कुछ हल्का हुआ। पहली बार उन्हें लगा कि उनकी इच्छा को किसी ने समझने का प्रयास किया है।

                उसी क्षण उन्होंने अपने दरबारी को बुलवाया और आदेश दिया कि अगली सुबह राजसभा में सभी मंत्री, सभासद और प्रमुख अधिकारी उपस्थित हों।    

                  एक नया निर्णय

                अगली सुबह राजसभा सजी। सभी मंत्री और दरबारी अपने-अपने स्थान पर उपस्थित थे। राजा मानसिंह अपने सिंहासन पर बैठे, किंतु आज उनके चेहरे पर एक अलग ही गंभीरता थी।

उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “आज मैं आप सभी के सामने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण निर्णय रखने जा रहा हूँ। मैंने निश्चय किया है कि आज से राज्य का शासन मेरा ज्येष्ठ पुत्र सँभालेगा। वह इस राजसिंहासन पर बैठकर राज्य की समस्त जिम्मेदारियों का निर्वाह करेगा।”

                                            सभा में धीमी कानाफूसी होने लगी।

                                        राजा ने अपने पुत्र को अपने समीप बुलाया।

                “पुत्र, आज से यह राज्य तुम्हारी जिम्मेदारी है। मैं तुम्हें केवल एक ही बात समझाना चाहता हूँ। न्याय करते समय अपने और पराए का भेद मत करना। अपने संबंधों को भी न्याय से ऊपर मत रखना।”

                “राजसिंहासन बाहर से जितना भव्य दिखाई देता है, भीतर से उतना ही जिम्मेदारियों और कठिन निर्णयों से भरा होता है। राजा का सुख उसके अधिकारों में नहीं, बल्कि प्रजा के विश्वास में होता है। जहाँ न्याय होगा, वहीं सुख और शांति के लिए आधार बनेगा। इसलिए सदैव न्यायपूर्ण आचरण करना।”

                पुत्र ने पिता के चरण स्पर्श किए और उनकी आज्ञा स्वीकार करते हुए सिंहासन ग्रहण कर लिया।

                                इसके बाद राजा मानसिंह सभा के सामने खड़े हुए।

               “मेरा दूसरा निर्णय यह है कि अब मैं इस राजमहल में नहीं रहूँगा। मैं कुछ समय के लिए राज्य से बाहर जाना चाहता हूँ। मैं किसी राजकीय पद, किसी विशेष पहचान या किसी जिम्मेदारी के साथ नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य की तरह जीवन बिताना चाहता हूँ।”

                                        यह सुनते ही पूरी सभा में सन्नाटा छा गया।

                 कुछ क्षण बाद एक मंत्री ने साहस करके पूछा, “महाराज, आप कहाँ जाना चाहते हैं? और क्यों? क्या राज्य में कोई ऐसी समस्या उत्पन्न हो गई है, जिसके कारण आपको राजकाज छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा?”

                                                    दूसरे दरबारी भी प्रश्न करने लगे।

                राजा ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “राज्य में कोई ऐसी समस्या नहीं है। मैं किसी से नाराज होकर नहीं जा रहा और न ही किसी से भाग रहा हूँ। मैं केवल स्वयं को खोजना चाहता हूँ। इतने वर्षों तक मैंने अपने कर्तव्यों का पालन किया है, लेकिन अब अपने भीतर उठ रहे प्रश्नों को समझना चाहता हूँ।”

             “आज मेरे पास अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। इसलिए मैं आपसे भी कोई उत्तर नहीं माँगता और न ही आपके प्रश्नों का उत्तर दे सकता हूँ। जब मुझे अपने भीतर शांति और स्पष्टता मिलेगी, तब शायद मैं स्वयं समझ पाऊँगा कि मुझे क्या चाहिए।” 

         “अभी मुझे जाने दीजिए। मेरे इस निर्णय का सम्मान करना ही मेरे प्रति आपका सबसे बड़ा सहयोग होगा।”

             इतना कहकर राजा ने अपने राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। उन्होंने साधारण वस्त्र धारण किए और बिना किसी राजकीय वैभव के महल से बाहर निकल पड़े।

                पीछे रह गया एक विशाल राज्य, एक परिवार और एक ऐसा जीवन, जिसे संसार सफल मानता था।

                                आगे थी एक अनजान राह, जिसका कोई निश्चित पड़ाव नहीं था।

                  भटकती हुई तलाश

                राजा मानसिंह अब किसी राज्य के राजा नहीं थे। वे एक साधारण यात्री थे, जो अपने प्रश्नों का उत्तर खोजने निकले थे। 

                वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा करते रहे। कभी किसी गाँव में रुकते, कभी किसी नगर की गलियों में घूमते और कभी किसी निर्जन मार्ग पर अकेले चलते रहते।

                 उन्होंने अपनी पहचान छिपा ली थी। अब कोई उन्हें महाराज कहकर संबोधित नहीं करता था। कोई उनके सामने झुकता नहीं था, कोई उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा नहीं करता था।

                                    फिर भी उनके मन को शांति नहीं मिली।

                जिस महल से वे बाहर निकले थे, उसकी स्मृतियाँ अब भी उनके भीतर जीवित थीं। कभी उन्हें अपने बच्चों की याद आती, कभी महारानी की आँखों में ठहरे आँसू याद आते और कभी राज्य की जिम्मेदारियाँ उनके मन में लौट आतीं।

                वे सोचते, ‘मैं सब कुछ छोड़कर तो आ गया, लेकिन मेरे भीतर वही प्रश्न अब भी जीवित हैं। मैंने अपना स्थान बदल लिया, अपना पहनावा बदल लिया और अपनी पहचान तक छिपा ली। फिर भी मेरा मन पहले जैसा ही अशांत क्यों है?’ 

                                कई दिनों तक भटकने के बाद वे स्वयं से ही थकने लगे।

             एक दिन वे एक वन से होकर गुजर रहे थे। मार्ग के किनारे उन्हें एक छोटी-सी कुटिया दिखाई दी। कुटिया के बाहर एक ऋषि ध्यानमग्न बैठे थे। उनके चेहरे पर एक अद्भुत शांति थी। उनके आसपास न कोई वैभव था, न किसी प्रकार का प्रदर्शन, फिर भी उनके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि राजा के कदम अनायास ही रुक गए।

             राजा कुछ देर तक उन्हें देखते रहे। फिर उनके मन में विचार आया कि क्यों न कुछ दिन इस ऋषि के पास रहकर अपने प्रश्नों के उत्तर खोजे जाएँ।

             वे ऋषि के समीप पहुँचे और विनम्रतापूर्वक बोले, “महाराज, यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं कुछ दिनों तक आपकी कुटिया में रहना चाहता हूँ।” 

                                        ऋषि ने आँखें खोलीं और उन्हें ध्यान से देखा।

            “तुम कौन हो, वत्स? और यहाँ किस उद्देश्य से आए हो? तुम्हारे व्यवहार से लगता है कि तुमने जीवन को निकट से देखा है। फिर भी तुम इस प्रकार भटक क्यों रहे हो?”

                                    राजा यह सुनकर कुछ क्षण के लिए ठिठक गए।

            उन्होंने कहा, “ऋषिवर, आप मुझे ज्ञानी क्यों समझ रहे हैं? यदि मैं ज्ञानी होता, तो अपने ही मन की उलझनों में इस प्रकार भटकता नहीं। मेरे भीतर इतना अज्ञान है कि मुझे स्वयं नहीं पता कि मैं क्या खोज रहा हूँ।”

                                                        ऋषि मुस्कुराए।

            “अच्छा, तो मुझे अपनी अज्ञानता के बारे में बताओ। संभव है, तुम्हारे प्रश्नों को समझने में मैं तुम्हारी सहायता कर सकूँ।” 

                    राजा उनके सामने बैठ गए और अपने मन की सारी व्यथा कह सुनाई।

              “ऋषिवर, मैं स्वयं को खोजने निकला था। मैंने अपना सब कुछ बदल दिया। अपना स्थान, अपना पहनावा, अपनी पहचान और अपना जीवन जीने का ढंग। लेकिन मेरे भीतर कुछ भी नहीं बदला।”

              “मैं जहाँ भी जाता हूँ, कुछ समय बाद मेरा मन उन्हीं पुरानी बातों में उलझ जाता है। मैं अपने अतीत के बारे में सोचता रहता हूँ। कभी लगता है कि मैंने जीवन भर केवल दूसरों के लिए काम किया, तो कभी लगता है कि मैंने स्वयं के लिए कुछ किया ही नहीं।”

            “मैंने सोचा था कि सबसे दूर चला जाऊँगा, तो अपने भीतर की शांति पा लूँगा। लेकिन जितना अधिक भटकता हूँ, उतना ही अधिक उलझता जाता हूँ। अब तो मुझे यह भी नहीं पता कि मुझे आगे कहाँ जाना चाहिए।”

           ऋषि उनकी बात सुनकर मुस्कुराए और बोले, “वत्स, तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुमने अपना स्थान नहीं बदला। तुम्हारी समस्या यह है कि तुम स्थान बदलकर अपने मन को बदलना चाहते हो।”

              “तुमने राजमहल छोड़ दिया, लेकिन राजमहल से जुड़ी स्मृतियाँ अपने साथ ले आए। तुमने अपनी पहचान त्याग दी, लेकिन उस पहचान से जुड़ी अपेक्षाएँ अब भी तुम्हारे मन में जीवित हैं। तुमने जिम्मेदारियों से दूरी बना ली, लेकिन उन जिम्मेदारियों के बारे में विचार करना नहीं छोड़ा।” 

                “फिर तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हें वही संसार दिखाई देगा, जिससे तुम दूर भागना चाहते हो। क्योंकि संसार का एक रूप तुम्हारे बाहर है और दूसरा तुम्हारे भीतर।”

                                राजा ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनने लगे।

            ऋषि ने आगे कहा, “मनुष्य अक्सर सोचता है कि जब उसकी परिस्थितियाँ बदल जाएँगी, तब वह सुखी हो जाएगा। वह एक नई जगह, एक नया जीवन और एक नई पहचान खोजता है। लेकिन यदि उसका मन हर समय अतीत और भविष्य के बीच झूलता रहे, तो नई परिस्थितियों में भी उसे शांति नहीं मिलती।

              “तुम जीवन भर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते रहे। अब तुम्हारे मन में अपने लिए जीने की इच्छा जागी है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन अपने लिए जीने का अर्थ यह नहीं कि तुम अपने पुराने जीवन को व्यर्थ मानने लगो।”   

                “जो समय तुमने अपने परिवार, अपने राज्य और अपनी प्रजा के लिए दिया, वह तुम्हारे जीवन का ही हिस्सा था। उसे नकारकर तुम अपने जीवन को नहीं समझ सकते। तुम्हें केवल यह सीखना है कि दूसरों के लिए जीते हुए स्वयं को कैसे समझा जाए और स्वयं के लिए जीते हुए अपने मन को कैसे शांत रखा जाए।”

                 राजा ने पूछा, “लेकिन ऋषिवर, मैं अपने मन को शांत कैसे करूँ? मैं क्या करूँ कि मेरे भीतर उठने वाले ये प्रश्न समाप्त हो जाएँ?” 

                                        ऋषि ने कुछ क्षण मौन रहकर उत्तर दिया।

                    “वत्स, क्या तुमने कभी किसी छोटे बच्चे को चलते हुए देखा है?” 

                                                राजा ने कहा, “हाँ, ऋषिवर।”

             “जब कोई बच्चा पहली बार चलना सीखता है, तब क्या उसे पता होता है कि उसे कितनी दूर जाना है? क्या वह अपने हर कदम का हिसाब लगाता है? क्या वह यह सोचकर चलना छोड़ देता है कि कहीं गिर गया तो क्या होगा?” 

              “वह बस एक कदम उठाता है। कभी गिरता है, कभी सँभलता है और फिर एक दूसरा कदम उठाता है। उसे यह भी नहीं पता होता कि वह कितने दिनों में ठीक से चलना सीख जाएगा। फिर भी वह प्रयास करता रहता है।”

             “मनुष्य जब बड़ा होता है, तो हर काम से पहले उसके परिणाम के बारे में सोचने लगता है। वह सोचता है कि यदि यह किया, तो क्या मिलेगा; यदि वह किया, तो क्या खो जाएगा। धीरे-धीरे उसका ध्यान काम करने से अधिक उसके परिणाम पर रहने लगता है। वह वर्तमान में जीने के बजाय अपने मन में ही अनेक भविष्य बना लेता है।”

              “तुम भी यही कर रहे हो। तुम स्वयं को खोजना चाहते हो, लेकिन साथ ही यह भी जानना चाहते हो कि स्वयं को खोजने के बाद तुम्हें क्या मिलेगा। तुम शांति चाहते हो, लेकिन हर दिन यह जाँचते हो कि तुम्हारे भीतर शांति आई या नहीं। तुम एक नई शुरुआत करना चाहते हो, लेकिन बार-बार अपने पुराने जीवन से उसकी तुलना करते हो।”  “इस तरह तुम वर्तमान को भी अपने प्रश्नों में उलझा देते हो।”

                राजा ने गंभीरता से पूछा, “तो क्या मुझे अपने जीवन का कोई लक्ष्य ही नहीं बनाना चाहिए?”

             ऋषि बोले, “लक्ष्य बनाना गलत नहीं है, वत्स। लेकिन हर समय लक्ष्य के पीछे भागते रहना और जीवन को केवल उसकी प्राप्ति से जोड़ देना उचित नहीं। कभी-कभी मनुष्य को कुछ समय रुककर यह भी देखना चाहिए कि वह जिस मंजिल की तलाश में है, क्या वास्तव में उसे वही चाहिए?” 

              “तुम्हें हर प्रश्न का उत्तर आज ही नहीं खोजना है। तुम्हें यह भी आवश्यक नहीं कि अपने जीवन को एक ही दिन में बदल डालो। जो काम करना चाहते हो, उसे पूरी सजगता से करो। जो जिम्मेदारी निभानी है, उसे निभाओ। जो सीखना चाहते हो, उसे सीखो। और जब कुछ न करने का मन हो, तो कुछ समय शांत बैठकर अपने मन को समझने का प्रयास करो।” 

             “लेकिन ध्यान रखना, कुछ न करने का अर्थ अपने कर्तव्यों से भागना नहीं है। इसका अर्थ है अपने मन को अनावश्यक भागदौड़ से विराम देना।”

            “तुम्हें अपने मन की हर आवाज के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं। कुछ विचार आते हैं और चले जाते हैं। उन्हें पकड़कर बैठ जाने से वे और उलझन पैदा करते हैं। अपने विचारों को देखो, अपनी साँसों को महसूस करो और समझने का प्रयास करो कि तुम्हारे भीतर वास्तव में क्या चल रहा है।”

            “तुम्हें स्वयं को खोजने के लिए किसी दूर देश जाने की आवश्यकता नहीं थी। तुम्हें अपने भीतर देखने की आवश्यकता थी। तुम जिस शांति की तलाश में बाहर भटक रहे हो, उसकी शुरुआत तुम्हारे अपने मन से होगी।” 

                                राजा बहुत देर तक मौन बैठे रहे।

              उनके मन में अनेक बातें उठ रही थीं, लेकिन इस बार वे उन विचारों से लड़ नहीं रहे थे। वे पहली बार अपने भीतर उठने वाले प्रश्नों को बिना किसी जल्दबाजी के सुनने का प्रयास कर रहे थे।

                        कुछ देर बाद उन्होंने पूछा, “ऋषिवर, क्या इतना करने से मैं स्वयं को जान पाऊँगा?” 

           ऋषि ने मुस्कुराकर कहा, “स्वयं को जानना कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम किसी एक दिन प्राप्त करके अपने पास रख लोगे। यह तो जीवन भर चलने वाली समझ है। हर दिन अपने व्यवहार को देखो, अपनी इच्छाओं को समझो और अपने भीतर उठने वाले द्वंद्व को पहचानो।

                “बहुत कुछ बदलने की जल्दबाजी में मनुष्य कभी-कभी अपने भीतर देखने का अवसर ही खो देता है। इसलिए थोड़ा ठहरो। हर दिन थोड़ा प्रयास करो। यदि किसी दिन कुछ समझ में न आए, तो स्वयं को दोष मत दो। यदि किसी दिन तुम्हारा मन अशांत हो, तो यह मत मान लेना कि तुम्हारी सारी साधना व्यर्थ हो गई।”

             “जीवन को समझने के लिए धैर्य चाहिए। जैसे एक बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है, वैसे ही मन को समझने में भी समय लगता है।”

                        “और एक बात सदैव याद रखना—तुम्हें अपने जीवन को दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने की आवश्यकता नहीं, लेकिन अपनी इच्छाओं को समझे बिना उनके पीछे भागना भी उचित नहीं। पहले यह जानो कि तुम्हारे लिए वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है। फिर उस दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ो।”

                    राजा को ऐसा लगा, जैसे उनके भीतर लंबे समय से बंद कोई द्वार धीरे-धीरे खुल रहा हो।

             वे इतने दिनों से स्वयं को पाने के लिए संसार से दूर भाग रहे थे, जबकि उन्हें पहली बार समझ में आया कि अपने भीतर की अशांति को समझे बिना कहीं भी शांति नहीं मिल सकती।

          उन्होंने ऋषि के चरण स्पर्श किए और कहा, “ऋषिवर, आज आपने मुझे कोई ऐसा उत्तर नहीं दिया, जिससे मेरे सारे प्रश्न एक ही क्षण में समाप्त हो जाएँ। लेकिन आपने मुझे यह अवश्य समझा दिया कि मुझे अपने प्रश्नों के साथ कैसे जीना है। शायद मैं अब तक उत्तर खोजने की जल्दी में स्वयं को सुन ही नहीं पा रहा था।”

            ऋषि ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “जाओ, वत्स। अब अपने जीवन को समझने का प्रयास करो। तुम्हें जहाँ रहना है, वहाँ रहो; जो करना है, वह करो। बस अपने मन की अशांति से भागने के बजाय उसे समझना सीखो।”

                            राजा ने ऋषि से विदा ली और अपने राज्य की ओर लौट पड़े। 

             स्वयं को पा लेना 

                     जब राजा मानसिंह अपने राज्य पहुँचे, तो वे वही व्यक्ति थे, जिन्होंने कुछ समय पहले राजमहल छोड़ा था; फिर भी उनके भीतर एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आ चुका था।

                    उन्होंने यह समझ लिया था कि जीवन भर निभाए गए कर्तव्य उनके जीवन की व्यर्थता नहीं, बल्कि उसकी यात्रा का हिस्सा थे। स्वयं के लिए जीने का अर्थ अपने अतीत को मिटा देना नहीं, बल्कि अपने वर्तमान को समझना था।

                    राजा ने राजसिंहासन पर दोबारा बैठने का निर्णय नहीं लिया। उन्होंने शासन की जिम्मेदारी अपने पुत्र के हाथों में ही रहने दी। वे राजमहल के वैभव से दूर एक शांत स्थान पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने एक छोटी-सी कुटिया बनवाई, जहाँ वे अध्ययन करते, ध्यान करते और अपने भीतर उठने वाले विचारों को समझने का प्रयास करते।

                  धीरे-धीरे आसपास के लोग उनके पास आने लगे। कोई अपने परिवार की समस्या लेकर आता, कोई अपने जीवन की उलझन लेकर और कोई केवल मन की शांति की तलाश में।

                 राजा किसी को जीवन का एक निश्चित मार्ग अपनाने का आदेश नहीं देते थे। वे लोगों की बातें सुनते और उन्हें अपने जीवन को समझने की प्रेरणा देते। वे उन्हें बताते कि हर व्यक्ति का जीवन अलग है, इसलिए किसी दूसरे के अनुभव को अपने जीवन का अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए।

                समय के साथ लोग उन्हें एक ज्ञानी पुरुष के रूप में सम्मान देने लगे। वे अब भी सीख रहे थे, अब भी अपने मन को समझ रहे थे। अंतर केवल इतना था कि पहले वे अपने प्रश्नों से परेशान होकर उनसे भागते थे, जबकि अब वे उन्हीं प्रश्नों को अपने जीवन को समझने का माध्यम बना चुके थे।

              एक दिन एक युवक उनके पास आया। वह अपने जीवन की जिम्मेदारियों से परेशान था और सब कुछ छोड़कर कहीं दूर जाना चाहता था।

                   उसने राजा से पूछा, “गुरुदेव, क्या संसार छोड़ देने से मनुष्य को शांति मिल जाती है?”

            राजा कुछ क्षण मुस्कुराए। फिर बोले, “पुत्र, संसार छोड़ने से पहले यह समझना आवश्यक है कि तुम वास्तव में छोड़ना क्या चाहते हो। कभी-कभी हम संसार से नहीं, अपनी ही उलझनों से परेशान होते हैं। और यदि उन उलझनों को समझे बिना कहीं दूर चले जाएँ, तो वे हमारे साथ ही चली जाती हैं।  

             “अपने जीवन में परिवर्तन करना चाहो, तो अवश्य करो। नई शुरुआत करना चाहो, तो अवश्य करो। लेकिन यह मत समझो कि तुम्हारी सारी समस्याओं का समाधान केवल स्थान बदल देने में है। अपने मन को समझने का प्रयास करो। अपने जीवन को धीरे-धीरे व्यवस्थित करो और जो कुछ तुम्हारे सामने है, उसे पूरी सजगता से जीना सीखो।” 

             युवक उनकी बात सुनकर कुछ देर विचार करता रहा। फिर उसने राजा को प्रणाम किया और अपने घर लौट गया।  

                राजा उसे जाते हुए देखते रहे। उनके मन में एक गहरा संतोष था। उन्हें अब यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी कि उन्होंने अपने जीवन में क्या पाया या क्या खोया। वे धीरे-धीरे समझने लगे थे कि जीवन का अर्थ केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया में भी छिपा होता है।

                जिस शांति की तलाश में वे कभी अपना राज्य छोड़कर भटकते रहे थे, उसकी शुरुआत अब उनके अपने भीतर हो चुकी थी।

         उन्होंने अंततः समझ लिया था कि स्वयं को पाने के लिए संसार से भागना आवश्यक नहीं; अपने भीतर के द्वंद्व को समझना आवश्यक है। क्योंकि कभी-कभी जीवन में आगे बढ़ने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, और कभी-कभी स्वयं को समझने के लिए बस ठहरना पड़ता है।

Comments

  1. इस कहानी को पढ़ने से मन को शांति मिलती है और यह सीख हमें मिलती है कि हमें अपनी समस्याओं, उलझनों से दर भागने या अपनी अवस्था को बदलने से कुछ नहीं होता है। हमें अपनी समस्याओं और उलझनों को समझना होगा तभी उसका समाधान हमें मिलेगा। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मानसी जी ने विश्वव्यापी मानव मन को समझा है और उन्होंने हम पाठक को यह आजादी दी है कि इस कहानी को हम अपनी विवेक से समझे और इस पर अपनी प्रतिक्रिया दें। मैंने बहुत दिनों बाद इतनी खूबसूरत और ससक्त कहानी पढ़ी है। मैं मानसी जी का आभार प्रकट करता हूं और आशा करता हूं कि इस तरह अच्छी कहानीयों सिलसिला चलता रहेगा।

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