अहंकार
भव्य राज महल सजा हुआ रहता है और राजा शिवांश अपनी प्रजा की व्यथा सुनते रहते हैं कि किसको क्या दिक्कत है, किसको किस तरह की समस्या है और उन समस्याओं का वह समाधान करते रहते हैं। इस बीच एक फकीर उनके पास आता है और कहता है - महाराज आप मुझे यहां कुछ दिन रहने की जगह दे दीजिए, भगवान आपका हमेशा भला करेगा और आपका जीवन सुखमय बनाएगा। राजा हंस पड़ता है, उसको लगता है कि यह फ़किर मुझे कह रहा है कि हमारे जीवन में खुशियां नहीं है और हमारे जीवन में तो दुःख ही दुःख है। तो फिर उसके बाद राजा उस फ़कीर से बड़े ही घमंड में बोलता है तुमको ऐसा क्यों लगता है कि मेरी जीवन में दुःख है, जिसे मुझे तुमसे खुशी की चाह होगी? तब फ़कीर बोलता है महाराज इस दुनिया में कोई भी ऐसा इंसान नहीं है जो पूरी तरह से अपने आप में पूर्ण हो। हर किसी में एक अधूरापन होता है। कुछ इच्छाएं, कुछ ख्वाहिशें जरूर दबी हुई होती है जिसको वह पूरा करना चाहता है और मैं भगवान से चाहूंगा कि आपकी हर वह इच्छा पूरी हो जाए जो आपकी पूरी नहीं हुई है। तब राजा हंसने लगता है बोलता है - अरे तुम यहां खड़े होकर अपनी इच्छा मुझसे मांग रहे हैं और तुम मेरी इच्छा को कैसे पूरा कर सकते हो? मेरे जीवन में कोई ऐसी चीज नहीं है जो मुझे भगवान से या तुमसे मांगने की जरूरत है। हमारे पास सब कुछ है। हम यहां दरबार भी इसीलिए लगाए हैं ताकि हम सब की इच्छाओं को पूरा कर सके। हम अपनी प्रजा को खुश देख सके। हर किसी की जरूरत को पूरा कर सके और तुम हमसे कह रहे हो कि हमें किसी चीज की इच्छा है, जो पूरी हो जाएगी। इस दुष्ट को यहां से अभी के अभी बाहर निकालो।
फ़कीर बहुत दुःखी हो जाता है और बोलता है महाराज इतना घमंड ठीक नहीं है आपको ऐसा क्यों लगता है कि आपकी कोई इच्छा कोई पूरी ही नहीं कर सकता है? क्या आप पूरी तरीके से संपूर्ण है? क्या आपको लगता है कि हर लोग आपको प्यार करते हैं? हर चीज से आप अपने आप को पूरा समझते हैं? तब महाराज बोलते है- क्यों नहीं? हमने अपने राज्य में इतना काम किया है। हमारी जितनी भी प्रजा है वह हमें बहुत प्यार करती है। हमारी रानियां हमें प्यार करती है। हमारे बच्चे हमें प्यार करते हैं और हम खुश हैं, तो तुम्हें क्यों ऐसा लगता है कि हमें किसी और की कोई जरूरत हो सकती है? हमारी जिंदगी में सब कुछ पूरा है और कुछ बाकी ही नहीं है जो मुझे पूरा करना है। हां, जितना कुछ हमें मिला है, हम उसे अपनी प्रजा में और सभी लोगों में बांट देना चाहते हैं, ताकि उनका जीवन बहुत अच्छे से और खुशी में गुज़रे, तो तुम कैसे कह सकते हो कि मैं घमंडी हूं या हममें गुरूर है। हम तो सिर्फ दान देने के लिए ही है , किसी से कुछ लेने के लिए नहीं।
तब फ़कीर बोलता है महाराज तो क्यों ना आप खुद ही इसे एक चुनौती की तरह स्वीकार करें और मैं आपसे अकेले में कुछ बात करना चाहता हूं, तो राजा थोड़ी देर के लिए ठिठ्क जाता है। यह भिखारी क्या कह रहा है! लेकिन वह भरी सभा में उसकी चुनौती को ऐसे इनकार भी तो नहीं कर सकता था! नहीं तो लोग क्या समझते? भरी सभा में लोग राजा को कायर समझते, इसीलिए वह उसकी चुनौती को स्वीकार कर लेता है और बोलता है कि अच्छा ठीक है! चलो हम लोग दूसरे कमरे में चलते हैं और तुम्हारी बातों पर हम ध्यान देते हैं। फिर वह उस फ़कीर के साथ चला जाता है। उसके बाद फ़कीर बोलता है ठीक है महाराज आपको बहुत घमंड है ना कि आपकी प्रजा और आपकी बीवी-बच्चे सभी आपसे बहुत प्यार करते हैं, तो ठीक है, बस मेरी एक परीक्षा है कि आप सबको बोल दीजिए कि आप बहुत जल्दी ही मरने वाले हैं और मेरी जगह कोई दूसरा आदमी अगर मरने को तैयार हो जाए तो मेरा जीवन बच सकता है। बस इतना ही करना है, देखते हैं कितने लोग आपके लिए खड़े होते हैं? तब राजा बोलते है लोग हमसे इतना प्यार करते हैं कि सभी के सभी लोग हमें बचाने के लिए अपनी जान हंसते-हंसते दे देंगे। फिर वह फ़कीर हंसता है और बोलता है कि ठीक है महाराज ऐसा ही हो! बस यह अगर यह काम आप पूरा कर पाए तो मेरे पास आ जाना और नहीं भी पूरा कर पाए तब भी आप मेरे पास आ जाना आ जाना। फिर उसके बाद महाराज बोलते है कि ठीक है! मैंने गुस्से में आपको बहुत कुछ कह दिया लेकिन अगर आप चाहे तो आप जो भी इच्छा मांगे मैं वह पूरा कर सकता हूं। आप यहां रह सकते हैं, आपके खाने-पीने हर चीज की व्यवस्था हम करवा देंगें । फ़कीर बोलता है नहीं-नहीं मुझे भीख में कुछ नहीं चाहिए। मैं आपको कुछ दे रहा था तब आपसे कुछ ले रहा था। अब आप मुझ पर दया कर रहे हो, इसलिए मुझे जो कुछ दे रहे हो। वह मुझे नहीं चाहिए। अब मैं यहां से जा रहा हूं, हां! लेकिन मैं आपको यह ज़रूर बता दूंगा कि मैं कहां रहता हूं? उन पहाड़ों से दूर एक छोटी सी झोपड़ी है। मैं वही आपको मिलूंगा, ठीक 20वें दिन। मुझे पूरा यकीन है कि आप मेरे पास आएंगे और आपको सच्चाई भी पता चल जाएगी। राजा मुस्कुराते हैं और बोलते हैं महात्मा! 20वें दिन तो ज़रूर आऊंगा पर आपको पता चल जाएगा कि लोग मेरे लिए क्या कर सकते हैं? मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है और फिर फ़कीर वहां से विदा होकर चला जाता है।
उसके बाद राजा सोचता है कि क्या फ़कीर जो बोल रहा था, वह सच है! फिर वह दूसरे दिन दरबार में अपनी सभी प्रजा को बुलाता है और बताता है कि मुझे एक ऐसा रोग लग गया है कि मैं बहुत जल्दी ही करने वाला हूं लेकिन भगवान की आराधना करने के बाद मुझे भगवान ने वरदान दिया है कि अगर मेरी जगह पर कोई और मर जाए तो मेरा जीवन ऐसे ही चलता रहेगा, तो क्या आप लोगों में से कोई ऐसा है जो मेरे जीवन को बचा सकता है? वह मेरी जगह भगवान के पास जा सकता है? मैं उसके परिवार का भरन-पोषण सब कुछ करूंगा। तब प्रजा में से कोई भी उस बात के लिए तैयार नहीं होता, सोचता है कि काम करके कहीं भी खा लेंगे, यहां नहीं तो किसी दूसरी जगह चले जाएंगे। अपनी जान कौन देने जाता है? कोई भी तैयार नहीं होता और सब के सब वहां से चले जाते हैं। राजा बहुत हताश हो जाता उसको लगता है कि अरे! हमने इन लोगों के लिए इतना कुछ किया! फिर भी यह लोग मेरे लिए मर भी नहीं सकते हैं! कितनी छोटी-सी तो बात है! कितने लोग हैं, जो बूढ़े हो चुके हैं, उनका परिवार बड़ी मुश्किलों से चल रहा है, हो सकता है कि कुछ दिनों में वह मर भी जाए और आज अगर वह चले जाएंगे तो उनके परिवार का भविष्य पूरी तरीके से सुरक्षित हो जाएगा और लोग जो मुझे हमेशा कहते रहते थे की महाराज हम आपके लिए जान तक दे सकते हैं, आज वही लोग हमसे जान चुरा के यहां से भाग रहे हैं। यह कैसी प्रजा है! फिर वह बहुत ज्यादा दुःखी और चिंतित हो जाता है। उसके बाद वह अपने कोप भवन में चला जाता है। जब रानियों को पता चलता है कि महाराज बहुत उदास है तब सभी रानियां उसके पास उपस्थित हो जाती हैं, बोलती है क्या समस्या है महाराज? आप हमलोगों को बताइए क्या बात हो गई है ऐसी कि आप इतने दुःखी हो गए हैं? आज सभा में ऐसी भी क्या बात हो गई? किस बात ने इतना अंदर से दुःखी कर दिया है? कोई बात नहीं आप हम लोगों को बताइए। कोई ना कोई हल निकल ही जाएगा। फिर महाराज का मन शांत हो जाता है और उसको लगता है अरे! मेरी रानियां भी तो है जो मुझसे इतना प्यार करती है। तब वह बड़े प्यार से बोलते हैं ठीक है! तुम लोग ही बताओ हमसे भगवान ने कहा है कि मैं 20 दिन के अंदर मर जाऊंगा। अगर मेरी जगह कोई और मर जाता है तो मैं जिंदा रह सकता हूं। क्या तुम लोगों में से कोई मेरी जगह ले सकता है? तब रानियां आपस में ही एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगती। सोचती है, इतनी बड़ी बात! अरे बाप रे! अपना जीवन कौन देगा? ऐसा तो नहीं होता है। बोलना अलग बात है! करना अलग बात है! ऐसे कैसे! मैं अपना पूरा जीवन इस राजा को दे दूं और इसकी क्या गारंटी है कि यह नहीं मरेगा। हो सकता है मैं भी मर जाऊं और यह भी मर जाए! नहीं-नहीं हम लोग ऐसा नहीं करेंगे। रानियां रोने लगी, बोली नहीं महाराज ऐसा कैसे हो सकता है? हम कोई और वैध् से दिखा लेंगे। ऐसा थोड़ी होता है कि मेरे जगह आप मर जाए, आपकी जगह हम मर जाए। ऐसा नहीं होता है! जिसने भी आपको कहा है वह बड़ा फरेबी है। राजा गुस्सा जाता है बोलता है कि मुझे यह नहीं बताओ कि कौन फ़रेबी है या कौन अच्छा है! मुझे बस सच जानना है कि क्या आप हमारे लिए जान दे सकती हैं या नहीं? तो रानियां आपस में फुट-फुट के रोने लगती है, नहीं महाराज हमारे बच्चें हैं। हमारे बग़ैर हमारे बच्चों का क्या होगा? वह तो ऐसे ही मर जाएंगे। हम आपके लिए तो अपनी जान नहीं दे सकते हैं। तुम लोगों को डरने की जरूरत नहीं है जो भी मेरी जगह जाएगा उसकी अपनी इच्छा होनी चाहिए मैं किसी के साथ जबरदस्ती ना करूंगा। इसलिए आपलोग रो नहीं। जो होना होगा 20वें दिन तो मेरे साथ हो ही जाएगा। फिर उसके बाद राजा वहां से भी चला जाता है। रानियां भी अपने-अपने जगह चली जाती है। फिर राजा को लगता है कि क्या मेरे बच्चे मेरे लिए जान दे सकते हैं? फिर वह अपने बच्चों को बुलाता है और बोलता है कि क्या आप हमारी जगह पर मर सकते हो? तो बच्चे भी रोने लगते हैं और बोलते हैं पिताजी यह कैसे हो सकता है? हर पिता अपने बच्चों के लिए जान भी दे सकता है और आप ऐसे पिता हो जो अपने ही बच्चे ही जान मांग रहे हैं, अपनी जान बचाने के लिए! आपको क्या तनिक भी लज्जा नहीं आती है? राजा अपनी ही बातों से इतना शर्मसार महसूस करने लगता है और भारी मन से दुःखी हो जाता है। उसको लगता है कि इस संसार में कोई भी इंसान ऐसा नहीं है जो उसे इतना प्यार कर सके कि उसके लिए अपनी जान दे दे और उस समय उसने कैसे घमंड में कह दिया था की पूरी प्रजा ही नहीं बल्कि हर कोई मेरे लिए जान दे सकता है।
वह फ़कीर कितना सच बोल रहा था! हर किसी को भगवान के आशीर्वाद और साथ की ज़रूरत होती है। कोई भी इंसान, कभी भी पूरा नहीं हो सकता, कोई भी इंसान इतना अपने आप में पूरा नहीं हो सकता कि उसको भगवान की ज़रूरत ना हो, फिर उसके बाद वह वहां से चला जाता है और वह सोचता है कि क्या मुझे उस फ़कीर से मिलना चाहिए या नहीं। तभी उसके बाद उसके मन में विचार आने लगता है, अगर मैं जाऊं ना जाऊं उसे तो पता चल ही जाएगा कि कोई भी इंसान मेरी जगह नहीं लेना चाहता, कोई भी अपनी जान नहीं देना चाहता। तब तो उसे यह लगेगा कि मैं कितना डरपोक हूं! अब चाहे जो भी वह मेरे बारे में सोचे, मुझे तो उसके पास जाना ही होगा। वह अपने विचारों में डूबा रहता और इसी तरीके से पूरे 20 दिन निकल गए थे।
राजा उठता है और वह अपने राजमहल से निकल जाता है, अकेले ही फ़कीर के पास जाने के लिए। जब फ़कीर के पास वह पहुंचता है तो फ़कीर ध्यान में लगा हुआ रहता है। राजा वहीं पर चुपचाप उसका ध्यान टूटने का इंतजार करता है। जब फ़कीर की आंखें खुलती हैं तब वह राजा को देखकर मुस्कुराते हुए बोलता है बताओ कितने लोग तुम्हारे लिए अपनी जान देने को तैयार हो गए? राजा उसके पैरों पर गिर कर रोने लगता है बोलता है - नहीं महात्मा कोई भी ऐसा इंसान नहीं मिला जो मेरे लिए मर सके। आज मुझे जीवन में समझ में आया कि कोई भी इंसान जो भी बोलता है वह सिर्फ और सिर्फ अपने लिए बोलता है। वह आपसे व्यवहार खराब नहीं करना चाहता इसलिए हर व्यवहार में वह वही बातें बोलना चाहता है जो आपको पसंद हो, पर अगर जब आपको उसकी जरूरत हो तो वह कभी भी आपकी ज़रूरत को पूरा नहीं कर पाएगा। आप ही बताइए मुझे क्या करना चाहिए? सही मायने में हमें आज समझ में आया कि हम कितने अकेले हैं। हमें मन की शांति चाहिए! हम क्या करें?
तब फकीर बोलता है तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, राजन्। तुम्हें सिर्फ उन लोगों की मदद करनी चाहिए जिन्हें सच में मदद कि ज़रूरत है और भगवान की आराधना और सत्संग किया करो ताकि तुम्हारे मन में शांति बने रहे। भगवान में आस्था बनेगा, भगवान हर रूप में तुम्हारा साथ देंगे। ऐसे तुम्हारा चित्त को हमेशा शांति मिलेगी, तुम कभी भी दुःखी नहीं रहोगे, किसी और से कुछ मांगने से तो अच्छा है ना कि तुम सीधे भगवान से ही मांग लो, किसी और के सामने गिड़गिड़ाने से तो अच्छा है ना कि तुम सीधे भगवान से ही जो चीज चाहिए वह मांग लो, अगर आज तुम भगवान से मांगे होते, भगवान! मेरे जीवन को वक्त दो, तो वह शायद खुशी-खुशी तुम्हारी यह बात मान लेते, लेकिन!लेकिन! इंसानों की फितरत ही ऐसी होती है कि वह सिर्फ अपने फ़ायदे के लिए ही कुछ करें और कुछ नहीं वह सिर्फ अपने ही बारे में सोचते हैं, दूसरों के बारे में नहीं, अगर कोई किसी की मदद भी करता है तो कहीं ना कहीं उसकी कुछ ना कुछ मनसा छिपी रहती है। आज से तुम अपने मन में बांध लो, जो भी करोगे निःस्वार्थ भाव से करोगे। तुम देख लेना तुम्हारे जीवन में एक अलग तरह की खुशी आ जाएंगी। सत्संगों के साथ रहो। जीवन में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा राजन्। महाराज महात्मा के सामने वादा करके फिर अपने राज्य वापस चला आता है।
यह कहानी एक शिक्षाप्रद है, जो इन्सान को वास्तविकता सीखाती है।
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