एक ऐसा भी प्रयास
कितनी सुहानी रात है। तारे टिमटिमाते हुए कितने अच्छे लगते हैं दीपाली के खुले बाल और उसकी दिलकश आंखें कितना मदहोश कर रहा था करण राज को। करण दीपाली से-आज तो तुम गजब ढाह रही हो। दीपाली शरमाते हुए-मैं झूठ नहीं बोलूंगी। करण दीपाली से- सच ही बोल दो। दीपाली-अब तुम पहले जैसे नहीं रहे। करण दिपाली को अपनी बाहों में भरते हुए-क्या बात करती हो जान! कल भी मैं तुम्हारे लिए पागल था और आज भी हूं। दीपाली मुंह चिढ़ाते हुए-कल भी तुम अपने काम के लिए पागल थे और आज भी। करण-कहना क्या चाहती हो तुम? मैं तुम्हें प्यार नहीं करता? दीपाली-प्यार का मतलब समझते हो तुम? करण-ये बात है, तो तुम ठीक ही कहती हो। 10 साल अपने पीछे घुमाने के बाद शादी की हो और तुमसे प्यार ही नहीं करता। दीपाली खुद से ही शर्मा जाती है। दीपाली-नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं! आजकल तुम सिर्फ अपने काम पर ध्यान देते हो। तुम्हें नहीं लगता हमें एक ब्रेक के जरूरत है। करण-ये बात तो तुम ठीक कहती हो, लेकिन क्या करूं तुम चाहती थी कि मैं UPSC करूं तो अब झेलो। दीपाली-इसका मतलब ये थोड़ी है कि तुम मुझसे प्यार न करो। जितने भी UPSC करते हैं तो क्या सभी संयासी बन जाते हैं। काम तो मैं भी करती हूं। करण-यार, मैं तो ये नहीं कहता कि तुम्हारा काम आसान है, लेकिन ये बात तो तुम्हें माननी पड़ेगी कि तुम शहजादी हो जब मन किया लिखा, मन किया नहीं लिखा, कोई दबाव नहीं है। दीपाली-वाह जनाब! अपने काम को कितना मुश्किल और मेरे काम को कितना आसान बता दिया। करण-गलत तो नहीं कहता तुम्हें। तुम्हें अपने काम से सिर्फ पाना ही पाना है और मुझे सिर्फ खोना ही खोना। दीपाली थोड़ा कौतूहल में-क्या बात करते हो जान! क्या पा लिया है मैंने और क्या खो दिया है तुमने? करण उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए-तुम्हारी हर कविता और कहानी पढ़ कर मैं कितना रोमांचित हो जाता हूं कितनी ताजा हो जाती है पुरानी यादें। जब लोग तुम्हारी तारिफे से करते हैं तो मैं कितना गर्व महसूस करता हूं। तुमने अपने काम से मुझे भी पाया है और अपने सम्मान को भी, लोग तुम्हें कितनी इज्जत भरी नजरों से देखते हैं। तुम रहो ना रहो इस संसार में यह कहानी-कविता जीवित रखेगा तुम्हें और तुम्हारे साथ साथ मुझे भी।
दीपाली के चेहरे का रंग उड़ जाता है। वो करण को इतना कमजोर कभी नहीं देखी थी। उसे तो खुद पर गुरूर था और कितना भरोसा कि वह कुछ भी कर सकता है। वह काम उसके लिए काम कभी नहीं था। इसके जरिए तो वह समाज को बदलना चाहता था यह नौकरी उसकी मजबूरी नहीं बल्कि सपना था। आज इतना दुःख इस नौकरी से वह करण को बाहों में समेटते हुए-क्या हुआ तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुमने इस नौकरी में सिर्फ खोया है? तुम जानते हो तुम जो चाहो कर सकते हो? करण दीपाली की बेचैनी देखकर खुद को रोक नहीं पाता वो उसमें सिमटता हुआ दीपाली से कहता है-‘चिज़े दूर से जितनी अच्छी लगती है उतना सच नहीं होता।' इस काम के चक्कर में मैंने तुम्हें दिया ही क्या है रातों का इंतजार! मुझे खो देने का डर! धमकियां! इसमें पाने जैसा कुछ था ही नहीं। हमही़ पागल थे। आज मेरे आदर्श, मेरे जज्बात कुचले जा रहे हैं। तंग आ गया हूं इस ज़लालत भरी नौकरी से। खुद से ही नफरत होने लगी है। गलत हो रहा है आंखें बंद कर लो। मेरी आत्मा मुझे कोसती है। इतनी बेचैनी, इतनी बेबसी तो तब भी नहीं थी जब तुम्हें खो देने का डर था। एक उम्मीद और एक भरोसे पर टिकी थी मेरी जिंदगी। आज ना कोई उम्मीद है ना कोई भरोसा। दीपाली उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए,-किसी CASE की बात कर रहे हो क्या तुम? करण-रहने दो यार! इसके अलावा भी जिंदगी के सपने हैं जिसे पूरा करने हैं। जब किसी को पड़ी नहीं है तो मैं कितना कुछ करूंगा, यह अब इतना भी आसान नहीं रह गया। दीपाली-‘चीजें कभी आसान नहीं रहती'। यह हमसे बेहतर कौन जान सकता है? प्यार में एक लड़का और एक लड़की की रज़ामंदी की जरुरत होती है, मगर हमने इसे मुकम्मल करने में कितना कुछ पाया और कितना कुछ खोया है। न उस समय मैं डरती थी न आज। बस डर इस बात का है जो कल भी था, कहीं मैं तुम्हें खोना न दूं। करण थोड़ा अचंभित-सा और मुस्कुराता हुआ- अभी भी खोने का डर है जान! पाने की खुशी नहीं। दिपाली-खोने और पाने का मतलब साथ होना नहीं ,उसे मुकम्मल करना होता है। करण- मुकम्मल से क्या मतलब है? मैं मुकम्मल नहीं हूं?
दीपाली कुछ सोच हुए-मैंने जिसे प्यार किया था उसे तो खो ही रही हूं। करण अचंभित हो जाता है-क्या बात कर रही हो? ऐसा क्या कर दिया मैंने? तुम सिस्टम को नहीं समझती। बहुत से लोग इसमें मिले हुए हैं और मैं इसका हिस्सा नहीं बन सकता तुम समझ भी रही हो मैं किस केस की बात कर रहा हूं? कितनी डरावनी है यह सच्चाई और कितनी खोखली है यह सरकार? तुम्हें क्या लगता है मैं कुछ करना नहीं चाहता? हां-हां तुम ठीक कहती हो खो दिया है तुमने मुझे। अब मुझमें वह गुरुर, वह घमंड, समाज को बदलने का जज़्बा नहीं रहा। इतनी बेबसी है कि तुम्हें बता नहीं सकता कहने को तो मैं S.D.M हूं पर कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर गया हूं, बनना नहीं चाहता कठपुतली पर क्या करूं? सभी इसमें शामिल है प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष। मेरी आंखें और मेरा दिमाग दोनों पथरा गई है वो सच जानकर और तुम कहती हो कि मैं कुछ भी कर सकता हूं, अगर मैं कर सकता तो यू मुर्दा-सा यहां नहीं पड़ा रहता। दीपाली स्तब्ध हो जाती है। इतना गुस्सा होते हुए उसे आज तक नहीं देखा था, इतनी बेचैनी कभी महसूस नहीं की थी उसने। करण को अपनी बाहों में समेटती दीपाली, खुद को संभालती क्योंकि आज उसे करण को संभालना था। अपने पति को यूं बेबस देख कर पता नहीं कहां से उसके अंदर दिव्य ज्योति सी आ गई थी। उसका चेहरा चमक रहा था। करण से सीधे-सीधे पूछती है-बातें घुमाओ मत। मुझे उस केस के बारे में एक-एक बात जाननी है, जो तुम्हें इतना बेचैन कर रहा। करण-तुम अपनी लेखनी पर ध्यान दो। इस समाज का कुछ नहीं हो सकता। दीपाली-मैं और तुम कभी अलग नहीं थे इसलिए बकवास करना बंद करो और सीधे-सीधे मुद्दे पर आओ। करण टहलता हुआ कुर्सी पर बैठ जाता है।
करण दीपाली से-जानती हो! बालिका आश्रय गृह जो होता है। दीपाली-हां! बात क्या हो गई? करण-बालिका आश्रय गृह में उन लड़कियों को रखा जाता है जिनका कोई सहारा न हो। देखने में तो यह समाज सेवा लगता है, है भी। सरकार इस पर करोड़ों-करोड़ों रूपए खर्च करती है। बड़े-बड़े लोग इस तरह के सरकारी गैर-सरकारी NGO को अनुदान देते हैं। जो लोग इस तरह के NGO चलाते हैं आए दिन अखबारों, TV चैनलों पर तारिफ पाते हैं और उनको सम्मानित किया जाता है। नेता बड़े-बड़े भाषण देते हैं-बेटी बचाओ! बेटी पढ़ाओ! नारी शक्ति का रूप है, ये मां है, बहन है इनके अधिकार की बात की जाती है, लेकिन सच इसके विपरीत है। रोज लूटती है इनकी इज्जत, हर रोज दाम लगाया जाता है इनका। उन पैसों को अय्याशी पर खर्च किया जाता है। कहने के लिए यह लड़की की दलाली है पर उन लोगों के नजर से यह बहुत बड़ा कारोबार है। अफीम से भी ज्यादा नशा है लड़कियों का। वह इंसान तो रही ही नहीं। दिल बहलाने चीज बनकर रह है या कोई सामान है जिसे रोज बेचा जाता है। उनकी चीखें, उनकी बेबसी, उनका दर्द उनकी पीड़ा घुटन बनकर रह गई है मेरी सांसों में जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है। दीपाली तुम कुछ कर नहीं सकते? करण की आंखों में खून उतर आता है। हां-हां ये सच्चाई है मैं कुछ नहीं कर सकता। जब मैं जांच कर रहा था तो DM को सब बताया था। DM ने कहा यह बहुत दिनों से चल रहा है; तुम इसमें मत पड़ो। जब मैंने कहा सर यह तो जलालत है उसने कहा अपनी और अपने घर की फिक्र करो मैं तुम्हें अपने बेटे जैसा मानता हूं इसलिए कह रहा हूं। न जाने कितने लोग इस केस के चक्कर में ऊपर जा चुके हैं, ट्रांसफर हुआ तो ठीक लेकिन तुम ऊपर भी जा सकते हो या तुम्हारे घर से कोई और भी। कमीने हैं ये लोग क्या करें हम? दीपाली की आंखों में आंसू भर जाते हैं-तुम समाज कल्याण मंत्री से बात क्यों नहीं करते? करण मुस्कुराने लगता है-कितनी भोली हो ना तुम? मैंने कहा ना सब मिले हैं नीचे से ऊपर तक सबको पैसा पहुंचता है यह दलाली नहीं कमाई है। इसी के दम पर नेताओं को खरीदा जाता है। उन लड़कियों को सजा-धजा कर बड़े-बड़े लोगों के सामने परोसा जाता है और वह दिल बहलाते हैं उससे। कुछ नहीं हो सकता। दीपाली-‘जब तक तुम यह मानते रहोगे कुछ नहीं हो सकता तो सच में कुछ नहीं हो सकता।' करण-तो क्या मानूं? दीपाली वह जो हम पहले मानते थे। करण थोड़ा अचंभित सा-क्या? दीपाली एक गाना गुनगुनाने लगती है-‘कुछ भी हो सकता है कुछ भी हो जाएगा हम इतने नहीं नादान' रास्ता हमेशा होता है बस हमारी नजर वहां तक नहीं पहुंच पाती। पहुंचाना होगा हमें अपनी नजरों को। करण- यह तो ठीक है लेकिन मैं तुम्हें मुसीबत में नहीं डाल सकता। दीपाली मुस्कुराने लगती है और करण को अपनी बाहों में भर लेती है जब यह लोग हमें जिंदगी नहीं दे सकते तो मौत भी नहीं दे सकते वह कहावत भूल गए-‘मुद्दई लाख चाहे है तो क्या होता है वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है।' अरे यार हम लोग कब से डरने लगे तुम भी गजब बात करते हो।
दीपाली की हिम्मत को देखते हुए करण में भी हिम्मत आ जाती है। करण-हमें उन लड़कियों को इंसाफ दिलाना होगा। तुमको पता है कितनी लड़कियों को इन लोगों ने मार दिया। जिसने भी विरोध करने की कोशिश की या भागना चाही इनलोगों ने मौत के घाट उतार दिया। उनलोगों को तरह तरह से यातनाएं दी जाती हैं, मजबूर किया जाता है यह काम करने के लिए। दीपाली-जो हुआ उसे हम बदल नहीं सकते लेकिन अब हमलोग ये होने नहीं देंगे। करण- वह तो ठीक है पर कैसे? दीपाली-यार मैं एक लेखिका हूं मैं इस विषय पर लिखूंगी। करण-क्या बकवास है? कितने लोग पढ़ेंगे तुम्हारे लेख को? दीपाली- हमें ऐसा कोई रास्ता चूनना पड़ेगा जहां वो हमें रोक ना पाए। तुम इसके बारे में सब कुछ जानते हो। करण कुछ सोचता tv पर नजर गड़ा देता है उस पर ‘जेसिका’ मामला दिखाते रहता है तभी करण खुशी से उछल पड़ता है। दीपाली उत्सुकता से-क्या चल रहा है तुम्हारे दिमाग में? करण-इन सब के कपड़े उतारने होंगे। दिपाली-मतलब! करण- तुम्हारा वो दोस्त है न! दीपाली-कौन? करण-जो अखबार निकालता है, अगर मैं उसे सारी जानकारी दे दूं एक-एक घटना की कैसे घटती है घटनाएं तो क्या वो रिपोर्टिंग करेगा? दीपाली-हां क्यों नहीं करेगा? 'जो दुनिया के लिए बूरी खबर होती है वह पत्रकार के लिए अच्छी खबर होती है।' उससे तो उनका भी फायदा है tv चैनलों के trp बढ़ते हैं और एक बार जनता जाग गई तो बड़े से बड़े लोग भी धरासाई हो जाते हैं। करण-तुम ठीक कहती हो। मैं अपना काम करता हूं तुम अपना काम करो। दीपाली-हम दोनों मिलकर उन सारी बुरी शक्तियों को हरा देंगे 'जब कोई बुरा इंसान लोगों के साथ बुरा कर सकता है तो एक अच्छा इंसान लोगों के साथ और भी बुरा कर सकता है जो बुरा करते हैं।'
दीपाली और करण अपनी योजना पर खुश हो जाते हैं और इस काम को अंजाम देने के लिए पूरी ताकत से लग जाते हैं। करण-अपने खबरीयों से एक-एक खबर इकट्ठा करके दीपाली तक पहुंचाता है। दीपाली और उसके दोस्त प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकार से इतने सवाल करती है कि अंततः सरकार को झुकना पड़ता है और सरकार बालिका आश्रय गृह को बंद करने, लड़कियों के शारीरिक जांच का आदेश देती है। सारा मामला पूरी जनता के सामने आ जाता है। आश्रय गृह की 56 लड़कियों में से 56 के साथ बलात्कार किए गए होते हैं। सरकार भी सकते में आ जाती है। मामला इतना आगे बढ़ जाता है कि सरकार उससे पीछे नहीं हट सकती। एक एक दरिंदे को धीरे-धीरे जेल के अंदर पहुंचा दिया जाता है।
करण और दीपाली बहुत खुश है। करण का तो ट्रांसफर हो गया है फिर भी उसके चेहरे पर जीत की खुशी देखी जा सकती थी। करण दीपाली से-तुमने मुझे बचा लिया टूटने से। आज फिर से मुझे तुमसे प्यार हो गया है जान। हम जीत गए। दिपाली करण से-तुम्हारी रिपोर्ट बहुत काम आई। करण - और तुम्हारी हिम्मत।
दीपाली के चेहरे का रंग उड़ जाता है। वो करण को इतना कमजोर कभी नहीं देखी थी। उसे तो खुद पर गुरूर था और कितना भरोसा कि वह कुछ भी कर सकता है। वह काम उसके लिए काम कभी नहीं था। इसके जरिए तो वह समाज को बदलना चाहता था यह नौकरी उसकी मजबूरी नहीं बल्कि सपना था। आज इतना दुःख इस नौकरी से वह करण को बाहों में समेटते हुए-क्या हुआ तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुमने इस नौकरी में सिर्फ खोया है? तुम जानते हो तुम जो चाहो कर सकते हो? करण दीपाली की बेचैनी देखकर खुद को रोक नहीं पाता वो उसमें सिमटता हुआ दीपाली से कहता है-‘चिज़े दूर से जितनी अच्छी लगती है उतना सच नहीं होता।' इस काम के चक्कर में मैंने तुम्हें दिया ही क्या है रातों का इंतजार! मुझे खो देने का डर! धमकियां! इसमें पाने जैसा कुछ था ही नहीं। हमही़ पागल थे। आज मेरे आदर्श, मेरे जज्बात कुचले जा रहे हैं। तंग आ गया हूं इस ज़लालत भरी नौकरी से। खुद से ही नफरत होने लगी है। गलत हो रहा है आंखें बंद कर लो। मेरी आत्मा मुझे कोसती है। इतनी बेचैनी, इतनी बेबसी तो तब भी नहीं थी जब तुम्हें खो देने का डर था। एक उम्मीद और एक भरोसे पर टिकी थी मेरी जिंदगी। आज ना कोई उम्मीद है ना कोई भरोसा। दीपाली उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए,-किसी CASE की बात कर रहे हो क्या तुम? करण-रहने दो यार! इसके अलावा भी जिंदगी के सपने हैं जिसे पूरा करने हैं। जब किसी को पड़ी नहीं है तो मैं कितना कुछ करूंगा, यह अब इतना भी आसान नहीं रह गया। दीपाली-‘चीजें कभी आसान नहीं रहती'। यह हमसे बेहतर कौन जान सकता है? प्यार में एक लड़का और एक लड़की की रज़ामंदी की जरुरत होती है, मगर हमने इसे मुकम्मल करने में कितना कुछ पाया और कितना कुछ खोया है। न उस समय मैं डरती थी न आज। बस डर इस बात का है जो कल भी था, कहीं मैं तुम्हें खोना न दूं। करण थोड़ा अचंभित-सा और मुस्कुराता हुआ- अभी भी खोने का डर है जान! पाने की खुशी नहीं। दिपाली-खोने और पाने का मतलब साथ होना नहीं ,उसे मुकम्मल करना होता है। करण- मुकम्मल से क्या मतलब है? मैं मुकम्मल नहीं हूं?
दीपाली कुछ सोच हुए-मैंने जिसे प्यार किया था उसे तो खो ही रही हूं। करण अचंभित हो जाता है-क्या बात कर रही हो? ऐसा क्या कर दिया मैंने? तुम सिस्टम को नहीं समझती। बहुत से लोग इसमें मिले हुए हैं और मैं इसका हिस्सा नहीं बन सकता तुम समझ भी रही हो मैं किस केस की बात कर रहा हूं? कितनी डरावनी है यह सच्चाई और कितनी खोखली है यह सरकार? तुम्हें क्या लगता है मैं कुछ करना नहीं चाहता? हां-हां तुम ठीक कहती हो खो दिया है तुमने मुझे। अब मुझमें वह गुरुर, वह घमंड, समाज को बदलने का जज़्बा नहीं रहा। इतनी बेबसी है कि तुम्हें बता नहीं सकता कहने को तो मैं S.D.M हूं पर कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर गया हूं, बनना नहीं चाहता कठपुतली पर क्या करूं? सभी इसमें शामिल है प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष। मेरी आंखें और मेरा दिमाग दोनों पथरा गई है वो सच जानकर और तुम कहती हो कि मैं कुछ भी कर सकता हूं, अगर मैं कर सकता तो यू मुर्दा-सा यहां नहीं पड़ा रहता। दीपाली स्तब्ध हो जाती है। इतना गुस्सा होते हुए उसे आज तक नहीं देखा था, इतनी बेचैनी कभी महसूस नहीं की थी उसने। करण को अपनी बाहों में समेटती दीपाली, खुद को संभालती क्योंकि आज उसे करण को संभालना था। अपने पति को यूं बेबस देख कर पता नहीं कहां से उसके अंदर दिव्य ज्योति सी आ गई थी। उसका चेहरा चमक रहा था। करण से सीधे-सीधे पूछती है-बातें घुमाओ मत। मुझे उस केस के बारे में एक-एक बात जाननी है, जो तुम्हें इतना बेचैन कर रहा। करण-तुम अपनी लेखनी पर ध्यान दो। इस समाज का कुछ नहीं हो सकता। दीपाली-मैं और तुम कभी अलग नहीं थे इसलिए बकवास करना बंद करो और सीधे-सीधे मुद्दे पर आओ। करण टहलता हुआ कुर्सी पर बैठ जाता है।
करण दीपाली से-जानती हो! बालिका आश्रय गृह जो होता है। दीपाली-हां! बात क्या हो गई? करण-बालिका आश्रय गृह में उन लड़कियों को रखा जाता है जिनका कोई सहारा न हो। देखने में तो यह समाज सेवा लगता है, है भी। सरकार इस पर करोड़ों-करोड़ों रूपए खर्च करती है। बड़े-बड़े लोग इस तरह के सरकारी गैर-सरकारी NGO को अनुदान देते हैं। जो लोग इस तरह के NGO चलाते हैं आए दिन अखबारों, TV चैनलों पर तारिफ पाते हैं और उनको सम्मानित किया जाता है। नेता बड़े-बड़े भाषण देते हैं-बेटी बचाओ! बेटी पढ़ाओ! नारी शक्ति का रूप है, ये मां है, बहन है इनके अधिकार की बात की जाती है, लेकिन सच इसके विपरीत है। रोज लूटती है इनकी इज्जत, हर रोज दाम लगाया जाता है इनका। उन पैसों को अय्याशी पर खर्च किया जाता है। कहने के लिए यह लड़की की दलाली है पर उन लोगों के नजर से यह बहुत बड़ा कारोबार है। अफीम से भी ज्यादा नशा है लड़कियों का। वह इंसान तो रही ही नहीं। दिल बहलाने चीज बनकर रह है या कोई सामान है जिसे रोज बेचा जाता है। उनकी चीखें, उनकी बेबसी, उनका दर्द उनकी पीड़ा घुटन बनकर रह गई है मेरी सांसों में जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है। दीपाली तुम कुछ कर नहीं सकते? करण की आंखों में खून उतर आता है। हां-हां ये सच्चाई है मैं कुछ नहीं कर सकता। जब मैं जांच कर रहा था तो DM को सब बताया था। DM ने कहा यह बहुत दिनों से चल रहा है; तुम इसमें मत पड़ो। जब मैंने कहा सर यह तो जलालत है उसने कहा अपनी और अपने घर की फिक्र करो मैं तुम्हें अपने बेटे जैसा मानता हूं इसलिए कह रहा हूं। न जाने कितने लोग इस केस के चक्कर में ऊपर जा चुके हैं, ट्रांसफर हुआ तो ठीक लेकिन तुम ऊपर भी जा सकते हो या तुम्हारे घर से कोई और भी। कमीने हैं ये लोग क्या करें हम? दीपाली की आंखों में आंसू भर जाते हैं-तुम समाज कल्याण मंत्री से बात क्यों नहीं करते? करण मुस्कुराने लगता है-कितनी भोली हो ना तुम? मैंने कहा ना सब मिले हैं नीचे से ऊपर तक सबको पैसा पहुंचता है यह दलाली नहीं कमाई है। इसी के दम पर नेताओं को खरीदा जाता है। उन लड़कियों को सजा-धजा कर बड़े-बड़े लोगों के सामने परोसा जाता है और वह दिल बहलाते हैं उससे। कुछ नहीं हो सकता। दीपाली-‘जब तक तुम यह मानते रहोगे कुछ नहीं हो सकता तो सच में कुछ नहीं हो सकता।' करण-तो क्या मानूं? दीपाली वह जो हम पहले मानते थे। करण थोड़ा अचंभित सा-क्या? दीपाली एक गाना गुनगुनाने लगती है-‘कुछ भी हो सकता है कुछ भी हो जाएगा हम इतने नहीं नादान' रास्ता हमेशा होता है बस हमारी नजर वहां तक नहीं पहुंच पाती। पहुंचाना होगा हमें अपनी नजरों को। करण- यह तो ठीक है लेकिन मैं तुम्हें मुसीबत में नहीं डाल सकता। दीपाली मुस्कुराने लगती है और करण को अपनी बाहों में भर लेती है जब यह लोग हमें जिंदगी नहीं दे सकते तो मौत भी नहीं दे सकते वह कहावत भूल गए-‘मुद्दई लाख चाहे है तो क्या होता है वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है।' अरे यार हम लोग कब से डरने लगे तुम भी गजब बात करते हो।
दीपाली की हिम्मत को देखते हुए करण में भी हिम्मत आ जाती है। करण-हमें उन लड़कियों को इंसाफ दिलाना होगा। तुमको पता है कितनी लड़कियों को इन लोगों ने मार दिया। जिसने भी विरोध करने की कोशिश की या भागना चाही इनलोगों ने मौत के घाट उतार दिया। उनलोगों को तरह तरह से यातनाएं दी जाती हैं, मजबूर किया जाता है यह काम करने के लिए। दीपाली-जो हुआ उसे हम बदल नहीं सकते लेकिन अब हमलोग ये होने नहीं देंगे। करण- वह तो ठीक है पर कैसे? दीपाली-यार मैं एक लेखिका हूं मैं इस विषय पर लिखूंगी। करण-क्या बकवास है? कितने लोग पढ़ेंगे तुम्हारे लेख को? दीपाली- हमें ऐसा कोई रास्ता चूनना पड़ेगा जहां वो हमें रोक ना पाए। तुम इसके बारे में सब कुछ जानते हो। करण कुछ सोचता tv पर नजर गड़ा देता है उस पर ‘जेसिका’ मामला दिखाते रहता है तभी करण खुशी से उछल पड़ता है। दीपाली उत्सुकता से-क्या चल रहा है तुम्हारे दिमाग में? करण-इन सब के कपड़े उतारने होंगे। दिपाली-मतलब! करण- तुम्हारा वो दोस्त है न! दीपाली-कौन? करण-जो अखबार निकालता है, अगर मैं उसे सारी जानकारी दे दूं एक-एक घटना की कैसे घटती है घटनाएं तो क्या वो रिपोर्टिंग करेगा? दीपाली-हां क्यों नहीं करेगा? 'जो दुनिया के लिए बूरी खबर होती है वह पत्रकार के लिए अच्छी खबर होती है।' उससे तो उनका भी फायदा है tv चैनलों के trp बढ़ते हैं और एक बार जनता जाग गई तो बड़े से बड़े लोग भी धरासाई हो जाते हैं। करण-तुम ठीक कहती हो। मैं अपना काम करता हूं तुम अपना काम करो। दीपाली-हम दोनों मिलकर उन सारी बुरी शक्तियों को हरा देंगे 'जब कोई बुरा इंसान लोगों के साथ बुरा कर सकता है तो एक अच्छा इंसान लोगों के साथ और भी बुरा कर सकता है जो बुरा करते हैं।'
दीपाली और करण अपनी योजना पर खुश हो जाते हैं और इस काम को अंजाम देने के लिए पूरी ताकत से लग जाते हैं। करण-अपने खबरीयों से एक-एक खबर इकट्ठा करके दीपाली तक पहुंचाता है। दीपाली और उसके दोस्त प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकार से इतने सवाल करती है कि अंततः सरकार को झुकना पड़ता है और सरकार बालिका आश्रय गृह को बंद करने, लड़कियों के शारीरिक जांच का आदेश देती है। सारा मामला पूरी जनता के सामने आ जाता है। आश्रय गृह की 56 लड़कियों में से 56 के साथ बलात्कार किए गए होते हैं। सरकार भी सकते में आ जाती है। मामला इतना आगे बढ़ जाता है कि सरकार उससे पीछे नहीं हट सकती। एक एक दरिंदे को धीरे-धीरे जेल के अंदर पहुंचा दिया जाता है।
करण और दीपाली बहुत खुश है। करण का तो ट्रांसफर हो गया है फिर भी उसके चेहरे पर जीत की खुशी देखी जा सकती थी। करण दीपाली से-तुमने मुझे बचा लिया टूटने से। आज फिर से मुझे तुमसे प्यार हो गया है जान। हम जीत गए। दिपाली करण से-तुम्हारी रिपोर्ट बहुत काम आई। करण - और तुम्हारी हिम्मत।
महिला अत्याचार आज देश की बड़ी समस्याओं में एक है, आपने इस समस्या को अपना विषय बनाया इसके लिए आपका तहेदिल से धन्यवाद करता हूँ। यह एक बहुत अच्छी है, जो समाज के सच को बया करती है। नारी का शोषण अब सरकार के नाक के नीचे कुछ मंत्री और आला अफसर कर रहे हैं। ऐसे लोगों का समाज में बहिष्कार होना चाहिए और उनके किये कार्य के लिए उन्हें सजा मिलनी चाहिए तब ही नारी को इंसाफ़ मिलेगा।
ReplyDeleteHumare system me bhout problem hai , lekin jb tk Karan or Dipali jaise log h , iss problem ka solution v nikal he jata hai .
ReplyDelete