बहन का थप्पड़
आज पुरा घर खुशी से खनक रहा था। माँ की चूड़ियों कि खनक, बहन के पायल कि झनकार, दिल को छू जाने वाली वो महक, गुलाब-चमेली के फूल से सजा वो कमरा, मखमल के परदे लगाती माँ खिड़कियों पे, बहन पलंग पे रेशमी चादर बिछाती। माँ (फूलमती) बेटी से-जानती हो, मेरा सपना पूरा हो गया। मैं कब से चाहती थी कि लल्ला का शादी हो जाए। बहन (सुहाना) – हां माँ! जब देखो लोग पुछते रहते थे, भाई कि शादी कब होगी? भाई की शादी कब होगी? अब लोगों का मुंह तो बंद हुआ। अपने घर मे भी एक नई-नवेली दुलहन आ गई है। उसके आने से घर में कितनी रौनक हो गई है। तुम्हें एक बेटी और मुझे एक सहेली मिल गई है। फूलमती-हाँ! हाँ! ठीक कह रही है, जा जाकर देख भाभी क्या कर रही है? सुहाना-करेंगी क्या? आज थोड़ी न कुछ करना है, बैठी होगी। फूलमती-हाँ, तो रात बहूत हो गई है उसको अपने कमरे मे भेज।
सुहाना थोड़ी उछलती-कुदती और शरारत भरी नज़रो से-भाभी आपका कमरा तैयार हो गया है। श्वेता शरमाकर अपनी नज़रे झुका लेती है। सुहाना बांहो मे भरते हुए श्वेता को-भाभी चलिए रात हो गई है, थक गई होंगी, चलिए सो जाइए। श्वेता धीरे से-भईया कहाँ है? सुहाना-अरे! कहाँ गए? अभी तो यहीं थे। सुहाना चिल्लाते हुए-भईया, कहाँ है? भाभी बुला रहीं है। केदारनाथ सुहाना से-क्यों चिल्ला रही हो? देखो माँ के पास बैठा होगा।सुहाना-हां! ठिक कहते है पापा, उनको उनके बगैर चैन कहाँ? सुहाना माँ के कमरे मे जाती है। भईया काफी देर हो गई है, भाभी बुला रही है। सक्षम थोड़ा चिल्लाते हूए-जाता हूँ न देख नही रही बहुत जरुरी बात हो रही है। सुहाना थोड़ा अचंभित सी-अभी! क्या जरुरी बात हो रही है? इसकी शादी हो गई, अब बस तेरी हो जाए। सुहाना-तुम भी हद करती हो, आज तो इनकी सुहागरात है और तुम आज ही शुरू हो गई। अभी-अभी तो एक शादी खत्म हुई है। फूलमती-नही! नही! इसने तो नौकरी के चक्कर में बहुत देर कर दी। आए दिन लोग पुछते रहते है, बेटी कि कब किजिएगा? सक्षम-हां! हां! माँ तुम ठिक कहती हो। इस नौकरी के चक्कर मे काफी देर हो गई है। ये भी तो पच्चीस कि हो गई है। एक-दो लड़का है मेरी नज़रो मे। फूलमती-हाँ बेटा, तू ठीक कहता है। तेरे बाप से न होगी इसकी शादी। दिन-रात कहते-कहते मैं थक गई। दोनों बचवन कि शादी करना जरुरी है। हां-हां करते रहते थे, लेकिन तेरी नौकरी नहीं होती तो क्या होती तो क्या होती तेरी शादी? इनको दूसरे के पचह्तर काम करने से फुर्सत मिले तो न। केदारनाथ-मैं कुछ भी बोलूं तुमलोगों को सुनना तो है नहीं, तो मैं क्या बोलूं? सक्षम-पापा, अरे छोड़िए इन सब बातों को मैं देखता हूँ लड़का इसके लिए। केदारनाथ-हां! हां! देखो! सक्षम उठकर अपने कमरे मे चला जाता है।
दूसरे दिन श्वेता रसोईघर में फूलमती के आदेशानुसार खाना बनाती हुई। फूलमती बहुत खुश है। मन ही मन सोचती है कि बिटवा का शादी हो गया, बिटिया का भी शादी हो जाता तो गंगा नहा लेते। लोगो ने बड़ा ताना मारा है। श्वेता खाना निकालकर फूलमती को देती है। जैसे ही फूलमती खाने के लिए हाथ बढ़ाती है सूहाना-माँ! चावल कच्चा है। भाभी ने चावल कच्चा बनाया है। श्वेता थोड़ा चौंककर-क्या चावल कच्चा है? केदारनाथ-तो क्या हुआ? फिर से बन जाएगा। फूलमती-नही! नही! मैं अभी ठीक कर देती हूँ। सक्षम-क्या हुआ? श्वेता फूट-फूट कर रोने लगती है। सक्षम-रो क्यों रही हो? केदारनाथ – रोने की क्या बात है? सूहाना-इसमे क्या हुआ? हो जाता है। फूलमती – कोई बात नही, मैं अभी ठीक कर देती हूँ। सक्षम-माँ लगता है इसको खाना बनाने नही आता, कल से तुम ही खाना बनाना। फूलमती चौंक जाती है – बहू के होते हुए, मैं खाना बनाऊं! केदारनाथ – तुमको शरम् नही आती ऐसी बाते बोलते हुए, अब इसकी उम्र रह गई है खाना बनाने की। सूहाना-आप तो बोलते थे भाभी को अच्छा खाना बनाने आता है। श्वेता और फूट-फूट कर रोने लगती है। श्वेता को लगता है सूहाना उस पर तंज कस रही है। माँ सबको शांत कराते हुए चुपचाप रसोईघर मे चली जाती है।
सक्षम आए दिन अपनी पत्नी की शिकायत कि पोटली अपनी माँ और बहन के सामने खोलते रहता है। एक दिन फूलमती गुस्से मे – दिन-रात मुझे क्या सूनाते रहता है, तेरी बीवी है तू क्यों नहीं समझाता? श्वेता मुंह चमकाते हुए – जब देखो ई बूढ़ी बकर-बकर करते रहती है। फूलमती क्रोधित हो जाती है देख रहा है अपनी बीवी को कोई काम तो आता नहीं है इसको, खाली जबान चार फिट लंबी हो गई है इसकी। श्वेता – क्यों नहीं चार फिट लंबी होगी? मेरा पति कमाता है और आप लोग बैठकर खाते है। सक्षम यह सब चुपचाप देखता रहता है और मुंह से कुछ नही कहता। फूलमती सक्षम कि खामोशी बर्दाश्त नही कर पाती और फूट-फूट कर रोने लगती है और बोलती है – हां-हां ये तेरा ही पति है, मेरा तो बेटा रहा नही। अपने जीवन का हर खुशी इसे दे दी। इसकी पढ़ाई-लिखाई के चक्कर मे अपने सारे गहने बेच दिये। ढंग का कपड़ा न खुद पहना न कभी अपनी बेटी को पहनने दिया। पति कि सारी कमाई इसमे लगा दी। ये नालायक घुट-घुट अपनी बीवी कि बात सून रहा है और एक शब्द मुंह से नही निकालता। ये नही जानती पर तू तो जानता है मैंने तुझे कितने कष्ट से पढ़ाया-लिखाया। सक्षम – तुम दोनों तो मेरा दिमाग खराब कर के रख दी हो। इसको रोने से और तुमको ताना मारने से फुर्सत कहां है। केदारनाथ फूलमती से – तुमको कितनी बार समझाया वो जो करती है करने दो, तुम्हें क्या पड़ी है बोलने कि। सूहाना – पापा ठीक कहते है तुमको क्या जरूरत है बोलने कि। फूलमती को लगता है अब उसका घर उसका नही रह गया है।
कुछ दिन ऐसे ही सबकुछ चलता रहा। एक दिन श्वेता आकर फूलमती से – मैं जारी हूँ। फूलमती – कहाँ ? श्वेता – अपने घर। फूलमती – क्यों? सक्षम – जाने भी दो न कितने सवाल करेगी, जब देखो बकर-बकर करते रहती है। फूलमती को धक्का-सा लगा, सोचते है अच्छा है ये डायन चली जाए। श्वेता और सक्षम घर से चले जाते है। कहने के लिए श्वेता अपने मायके चली गई थी लेकिन सक्षम अपना घर छोड़कर चला गया था।
फूलमती, केदारनाथ और सूहाना को लगता है जैसे सक्षम ने उनहे ठग लिया हो। दिन पर दिन फूलमती कि सेहत गिरने लगी। इसी चिंता मे दिन-रात बिमार रहने लगी। सूहाना के हंसी-खुशी के दिन चले गये थे। घर के काम-काज और माँ की सेवा मे पूरा दिन लगे रहती। केदारनाथ इन सब चीज़ों को देखकर दुःखी होते रहते है और एक दिन सक्षम को फोन करते है – तुमको शर्म नही आती। क्या अब तुम्हारी माँ कि उम्र रह गई है खाना बनाने की। अब यही बाकी रह गया था कि मैं इस उम्र मे बर्तन धोऊँ? सक्षम तपाक से – सूहाना कहाँ है? केदारनाथ – तुमसे यही उम्मीद थी और केदारनाथ ने फोन काट दिया। फूलमती – जरूरत क्या थी उस नालायक को फोन करने की? केदारनाथ – घर कैसे चलेगा? सूहाना – जैसे पहले चलता था। फूलमती – ठीक कहती है, मेरी बेटी। केदारनाथ - हां ! मैं जब तक ज़िंदा हूँ, तब तक तो ये घर मैं ही चलाउंगा। (सूहाना कि तरफ देखते हुए) तू चिंता मत कर सब ठीक हो जाएगा।
सूहाना ये सब देखते हुए बहुत दुःखी होती है। उसे लगता है पता नही घर कि खुशियों को किसकी नज़र लग गई है। क्या भाई को दिखाई नही देता, उसकी बीवी गलत है। फिर वो सोचती है बदलते ज़माने मे यही सच्चाई है कि लोग सिर्फ भोग! भोग! और सिर्फ भोग करना चाहते है। किसी को किसी रिश्ते कि परवाह नही है। जब वो माँ का नही हुआ तो वो कभी किसी का नही हो सकता। उसके चंगुल मे फंस के उसकी बीवी कठपुतली बन गई है। सभी को लगता है कि उसकी बीवी गलत है लेकिन क्या सच मे उसकी बीवी गलत है! लेकिन वो खुद ही गलत है। केदारनाथ – क्या सोच रही हो मेरी बच्ची? सूहाना – कुछ नही पापा। केदारनाथ – तुम डरो मत! मैं तुम्हारे साथ हूँ। सूहाना – डरते तो वो है न जो गलत रहते है। मेरा भाई डरे, मैं क्यों? केदारनाथ के आँखों से आंसू छलक जाते है और बेटी का आत्मविश्वास देखकर उनका भी खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आ जाता है। केदारनाथ सुहाना से – तूम सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दो मेरी बच्ची, बाकी सब मैं देख लूंगा। फूलमती – जिसके लिए सबकुछ किया वही छोड़कर चला गया। अब किसके लिए क्या करू? केदारनाथ – बस करो! अब उससे कोई उम्मीद नही। बेटी मेरी है, जो करूंगा मैं करूंगा। फूलमती – सारी गाढ़ी कमाई तो उसपर खर्च कर दी। बेटी कि शादी करनी है, अब तो किसी से कुछ बोलते भी नही बनता, बोलो तो लोग कहते है – बेटा नौकरी करता है, क्या कमी है? केदारनाथ – किसी को कुछ बोलने कि जरुरत नही है, वो नौकरी करता है तो करे, हमको भी जो करना है करेंगे। फूलमती - क्या करेंगे हमलोग? केदारनाथ – उसने घर छोड़ दिया तो घरवाले उसकी चिंता क्यों करे? फूलमती – तुम कहना क्या चाहते हो? केदारनाथ – तुमने मेरी एक बात न सुनी कभी। बेटा को मालिक बना दिया और आज भी तूम सिर्फ बेटे के बारे मे सोचती हो। हमारी एक बेटी भी है, उसके बारे मे सोचो। फूलमती – उसके बारे मे तो सोच-सोच के दिन-रात मुझे चैन नही है। केदारनाथ – सोचने से कुछ नही होगा। हमें कुछ करना होगा। फूलमती – क्या करना चाहते हो? मैं समझ नही पा रही हूँ। सूहाना उनकी बातें सुनने रहती है। तभी केदारनाथ – बेटी तूम चिंता मत करो, हमलोग जो करेंगे सही करेंगे। सूहाना – ये तो मुझे हमेशा से लगता है कि आप जो करेंगे सही करेंगे लेकिन भाई के व्यवहार के कारण अब आप कुछ गलत करने जा रहे है। केदारनाथ - मेरी बच्ची तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? सूहाना – अगर आप चाहते है आपका बेटा वापस आ जाए..... केदारनाथ गुस्से मे तमतमा जाता है और बिच मे ही सूहाना कि बात काटते हुए – मुझे उस नालायक से कोई मतलब नही है। सूहाना – “यही बात तो है पिताजी अपने छूटे नहीं छूटते और अपने इसी का फायदा उठाते है।“ कल हो के भाई को कोई problem होगा और वो यहाँ आ जाएगा तो सभी हंसी-खुशी अपना लेंगे। फूलमती गुस्से मे-तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? मैं कभी उसे अपना नही सकती। सूहाना – आप लोगों को यही लगता हैकि अपनी बेटी कि शादी कर दूं और फिर सबकुछ ठीक हो जाएगा। ये तब तक ठीक नही होगा जब तक उसे हमारी जरुरत न होगी। वो भी तो यही चाहता है की मेरी शादी कैसे भी कर दीजिए। वो भी तो अपने कर्तव्य से भाग रहा है। आज मेरी शादी का, कल बूढ़े माँ-बाप को खिलाने-पिलाने का। आप कब तक ये सब सहते रहेंगे? केदारनाथ कुछ समझ नही पाता – मेरी बच्ची तेरी एक-एक बात मे सच्चाई है पर तू कहना क्या चाहती है? सूहाना – बात साफ है पिताजी बस मैं लड़की हूँ इसलिए समझ नही पा रहें है। फूलमती – तू कहना क्या चाहती है? साफ-साफ क्यों नही बोलती? पहेलियाँ क्या बुझा रही है? सूहाना – मैं आपके सम्मान को वापस लाना चाहती हूँ। एक मौका तो देकर देखिए। मैं बता दूंगी कि मैं भाई से बेहतर हूँ। केदारनाथ को समझते देर न लगी कि मेरी बच्ची कहना क्या चाहती है। केदारनाथ अपनी बच्ची को गले लगा लेते है और बोलते हैं – तुम सक्षम से अच्छी नौकरी करेगी। हम सब मिलकर घर चलाएंगे और यही सक्षम के मुँह पर सही तमाचा होगा। तुमने मेरी आँखें खोल दी। शादी तो मैं तुम्हारी कैसे भी कर देता, पर वो कभी भी हमारी कमजोरी, बेबसी और लाचारी को न समझता, लेकिन अगर हमलोग मिलकर घर चलाए और तुम्हें एक सही मौका दे जो सक्षम को दिया। फूलमती - अब हमें यही करना है। सूहाना - रोने का वक्त गया काम शुरू करे और तीनों हँसना लगते है।
अगले दिन काम कि तलाश मे केदारनाथ अपने पुराने मालिक के पास जाता है। मालिक – आओ कदारनाथ! कैसे हो? केदारनाथ – कुछ ठीक नही है। मालिक – बचवा तो नौकरी करने लगा है, अब किस बात की दिक्कत? केदारनाथ – अच्छा होता मालिक कि नौकरी नही होता। नौकरी के ही घमंड मे तो हमलोगो को छोड़कर चला गया। मेरे लिए वो मर गया। मालिक – पगला गए हो का? बेटी जवान हो गई है, गोड़-हाथ पकड़ के बूला ले उसको। बेटी कि शादी करनी है कि नही? तू अकेली जान क्या करेगा? बेटी का ब्याह करना मज़ाक नहीं है। कितनी बार समझाया तूझे कि कुछ पैसे बेटी के लिए भी रख, लेकिन तू नालायक सारी कमाई बेटे को दे दी। अब देख क्या दशा हो गई है तुम्हारी। केदारनाथ – जो दशा होनी थी वो तो हो गयी मालिक, एक बात तो अपने ठीक कहा कुछ पैसे तो बेटी के लिए बचा के रखना चाहिए था। मेरी बिटिया पढ़ने मे तेज है मालिक, देखिएगा उ सक्षमओ से अच्छी नौकरी करेगी। मालिक – तूम बूढ़ारी मे पगला गए हो केदार, लड़की नौकरी करेगी? मेरी बात मान, एक-दो है मेरी नज़र मे। किसी के हाथ धरा दे, लड़का कमाता-खाता है, खुद का टेम्पू है। लड़की को खाने-पिने कि दिक्कत नही रहेगी। लड़की हाथ से निकल जाएगी तो क्या इज्ज़त रह जाएगी? केदारनाथ – यही सोच-सोच के तो अपनी बेटी को कभी आजादी नही दी, जो आजादी सक्षम को दी। “बेटा हाथ से निकल गया तो क्या इज्ज़त रही मेरी।“ आज दर-दर कि ठोकरें खाने पर मज़बूर हो गया हूँ, लेकिन उसी बच्ची के कारण हिम्मत हुई है। अब मैं उसकी आजादी नही छिनूंगा। उसे पढ़ा-लिखा कर बड़ा अफसर बनाउंगा ताकि कल हो के उसके बच्चे उसे छोड़कर चले भी जाए तो उसे वो दुःख न झेलना पड़े जो मुझे झेलना पड़ रहा है। माँ-बाप तो बच्चों का खुशी ही चाहते है। मालिक – तुझे समझाने का कोई फायदा नही, तू है बड़ा ढीठ कल भी तू मेरी बात नही सूना था, आज भी नही सून रहा है। तुझे देखकर दया आती है, आ! लग जा काम पे।
फूलमती अपनी बेटी से – पता नही उनको नौकरी पर रखेगा भी कि नही उनका मालिक, लेकिन है अच्छा आदमी रख ही लेगा। सूहाना – चिंता मत करो माँ, सब ठीक हो जाएगा, नही भी रखेंगे तो मैं घर चला लुंगी। फूलमती – तू कैसे चला लेगी? सूहाना – मैंने अपने कुछ दोस्तों से बात कि है, घर पर विद्यार्थी आ जाएंगे। मैं उनको पढ़ाऊंगी। फूलमती – छोटे-छोटे बच्चों को पढा़ कर कितने पैसे कमा लोगी? सूहाना – नहीं माँ, वो M.A के विद्यार्थी है, एक-एक नोट्स बनाने के दो-दो हजार रुपये मिलते है। फूलमती – ये तेरे से हो जाएगा? मैंने तुम्हें कोचिंग नही पढा़या, सक्षम कि तरह कभी बाहर रहकर नही पढ़ी। सूहाना – मैं कॉलेज मे टॉपर रही हूँ माँ, भूल गई? सभी Junior चाहते थे कि मैं उनलोगो को पढ़ाऊ। फूलमती फूट-फूट कर रोने लगती है – हां-हां ! याद है मुझे। मैंने ही तुमपे कभी ध्यान नही दिया। तू क्या बोलती थी, क्या बनेगी? कलेक्टर? तू उसी पे ध्यान दे। मैं बिल्कुल ठीक हो गयी हूँ। घर का कोई काम नही करना है तुमको, मैं जिंदा हूँ अभी।
केदारनाथ, सूहाना और फूलमती तीनों अपने-अपने तरीके से घर को चलाने और खुद को व्यवस्थित करने मे लग जाते है। अब केदारनाथ को तो याद भी नही रहता कि उनका कोई बेटा भी है। फूलमती कभी-कभी सक्षम को कोस लिया करती थी, कोसते-कोसते उनकी आँखे छलक जाती थी और सूहाना सिर्फ इसी धून मे रहती थी कि वह अपने भाई से खुद को बेहतर साबित करे। वह अपनी पढ़ाई पर वापस लौट गई थी। “घृणा मे एक शक्ति है और वही शक्ति सूहाना को मिल रही थी।“ वह अपना पूरा ध्यान ‘UPSC' कि तैयारी मे लगा दी थी। पहले तो फूलमती को विश्वास नही रहता है कि वो कुछ करेगी या नही, लेकिन सूहाना के ट्यूशन पढा़ने से खुश रहती है।
जब सूहाना का PT का परिणाम आता है तब केदारनाथ और फूलमती पूरी ताकत से सूहाना के साथ खड़े हो जाते है। केदारनाथ दिन-रात मेहनत करते है। “पता नहीं कहाँ से उन बूढ़ी हड्डियों मे इतनी ताकत आ गयी थी कि इतना काम करने के बावजूद भी उनके चेहरे पर तेज दिखता था।“ फूलमती कि भी काया पलट हो गयी थी और सूहाना तो अपने सपनो को पंख देने मे जूटी रहती है। जब उसके ‘MAINS’ का Result आता है केदारनाथ अपनी बच्ची सूहाना से बोलते है – तू न होती तो आज मुझे इतना घमंड न होता, जितने लोगों ने मुझे ताने मारे है और सवाल पूछा है, उस हर सवाल का जवाब है तू, मेरी बच्ची। सूहाना गर्व से-हां पापा! फूलमती -भगवान करे कैसे भी इसकी नौकरी हो जाए। केदारनाथ – तू चिंता काहे करती है पगली! हमही लोगो को कभी नही दिखा, सूहाना शुरू से ही सक्षम से ज्यादा बेहतर थी। अगर शुरू से ध्यान दिया होता तो आज ये दिन नही देखना पड़ता। सूहाना – जो हुआ सो हुआ अब हमे आगे ओर देखना है। जब सूहाना ‘Interview' देने जाती है तो आस-पास के सभी लोग केदारनाथ कि तारिफ़ करते रहते है और सूहाना को स्टेशन तक छोड़ने जाते है।
कुछ महीने बाद सक्षम पेपर मे देखता है कि सूहाना की तस्वीर छपी है। थोड़ा आश्चर्य और ख़ुशी मिली रहती है उसके चेहरे पर। सक्षम थोड़ा चीखते हुए -श्वेता! श्वेता! श्वेता – क्या हुआ? सक्षम – सूहाना कि फोटो छपी है अखबार मे। श्वेता – क्या कर दिया उस डायन ने? मुझे तो पहले से ही पता था कि एक न एक दिन कोई गुल खिलाएगी। सक्षम गुस्से मे – तुम्हारा तो दिमाग ही खराब है, बुरे लोगो को बुरी बात ही समझ मे आती है। मेरी बहन UPSC मे टॉप की है। मोटी बुद्धि मे कुछ गया? श्वेता के चेहरे का रंग ही उड़ जाता है। क्या बात करते हो? सक्षम – सच बोल रहा हूँ, देखो अखबार। श्वेता – हमलोगो को घर चलना चाहिए। सक्षम – किस मुंह से जाऊँ घर। श्वेता – भाई हो तुम उसके। सक्षम मम्मी –पापा मुझे नहीं माफ करेंगे। सक्षम के ससुराल वाले – क्या बात करते है दामाद जी, घर मे तो छोटे-मोटे झगड़े होते ही है। आपको जाना चाहिए, बधाई देना चाहिए। कोई कुछ भी कहें, है तो आपकी ही बहन! श्वेता – हां-हां गलती हो गयी है, माफी मांग लेंगे हम।
सक्षम और श्वेता अपने बेटे के साथ घर वापस लौटते है। सक्षम – कहाँ हो मेरी प्यारी बहन? केदारनाथ – अब आया है? फूलमती – क्यों आया है? श्वेता फूट-फूट कर रोने लगती है – मुझे माफ अर दीजिए माँ जी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी। फूलमती – गलती नही थी, वो पाप था, जो तुने किया डायन। सक्षम माँ के हां मे हां मिलाते हुए – इसी के चक्कर मे मैंने सबको भूला दिया, मुझे माफ कर दो माँ। सूहाना – 'मैंने कहा था न माँ मैं तुम्हारा बेटा वापस ला दूंगी।' केदारनाथ – अपने पोते को गोद मे उठा लेते है।
सुहाना थोड़ी उछलती-कुदती और शरारत भरी नज़रो से-भाभी आपका कमरा तैयार हो गया है। श्वेता शरमाकर अपनी नज़रे झुका लेती है। सुहाना बांहो मे भरते हुए श्वेता को-भाभी चलिए रात हो गई है, थक गई होंगी, चलिए सो जाइए। श्वेता धीरे से-भईया कहाँ है? सुहाना-अरे! कहाँ गए? अभी तो यहीं थे। सुहाना चिल्लाते हुए-भईया, कहाँ है? भाभी बुला रहीं है। केदारनाथ सुहाना से-क्यों चिल्ला रही हो? देखो माँ के पास बैठा होगा।सुहाना-हां! ठिक कहते है पापा, उनको उनके बगैर चैन कहाँ? सुहाना माँ के कमरे मे जाती है। भईया काफी देर हो गई है, भाभी बुला रही है। सक्षम थोड़ा चिल्लाते हूए-जाता हूँ न देख नही रही बहुत जरुरी बात हो रही है। सुहाना थोड़ा अचंभित सी-अभी! क्या जरुरी बात हो रही है? इसकी शादी हो गई, अब बस तेरी हो जाए। सुहाना-तुम भी हद करती हो, आज तो इनकी सुहागरात है और तुम आज ही शुरू हो गई। अभी-अभी तो एक शादी खत्म हुई है। फूलमती-नही! नही! इसने तो नौकरी के चक्कर में बहुत देर कर दी। आए दिन लोग पुछते रहते है, बेटी कि कब किजिएगा? सक्षम-हां! हां! माँ तुम ठिक कहती हो। इस नौकरी के चक्कर मे काफी देर हो गई है। ये भी तो पच्चीस कि हो गई है। एक-दो लड़का है मेरी नज़रो मे। फूलमती-हाँ बेटा, तू ठीक कहता है। तेरे बाप से न होगी इसकी शादी। दिन-रात कहते-कहते मैं थक गई। दोनों बचवन कि शादी करना जरुरी है। हां-हां करते रहते थे, लेकिन तेरी नौकरी नहीं होती तो क्या होती तो क्या होती तेरी शादी? इनको दूसरे के पचह्तर काम करने से फुर्सत मिले तो न। केदारनाथ-मैं कुछ भी बोलूं तुमलोगों को सुनना तो है नहीं, तो मैं क्या बोलूं? सक्षम-पापा, अरे छोड़िए इन सब बातों को मैं देखता हूँ लड़का इसके लिए। केदारनाथ-हां! हां! देखो! सक्षम उठकर अपने कमरे मे चला जाता है।
दूसरे दिन श्वेता रसोईघर में फूलमती के आदेशानुसार खाना बनाती हुई। फूलमती बहुत खुश है। मन ही मन सोचती है कि बिटवा का शादी हो गया, बिटिया का भी शादी हो जाता तो गंगा नहा लेते। लोगो ने बड़ा ताना मारा है। श्वेता खाना निकालकर फूलमती को देती है। जैसे ही फूलमती खाने के लिए हाथ बढ़ाती है सूहाना-माँ! चावल कच्चा है। भाभी ने चावल कच्चा बनाया है। श्वेता थोड़ा चौंककर-क्या चावल कच्चा है? केदारनाथ-तो क्या हुआ? फिर से बन जाएगा। फूलमती-नही! नही! मैं अभी ठीक कर देती हूँ। सक्षम-क्या हुआ? श्वेता फूट-फूट कर रोने लगती है। सक्षम-रो क्यों रही हो? केदारनाथ – रोने की क्या बात है? सूहाना-इसमे क्या हुआ? हो जाता है। फूलमती – कोई बात नही, मैं अभी ठीक कर देती हूँ। सक्षम-माँ लगता है इसको खाना बनाने नही आता, कल से तुम ही खाना बनाना। फूलमती चौंक जाती है – बहू के होते हुए, मैं खाना बनाऊं! केदारनाथ – तुमको शरम् नही आती ऐसी बाते बोलते हुए, अब इसकी उम्र रह गई है खाना बनाने की। सूहाना-आप तो बोलते थे भाभी को अच्छा खाना बनाने आता है। श्वेता और फूट-फूट कर रोने लगती है। श्वेता को लगता है सूहाना उस पर तंज कस रही है। माँ सबको शांत कराते हुए चुपचाप रसोईघर मे चली जाती है।
सक्षम आए दिन अपनी पत्नी की शिकायत कि पोटली अपनी माँ और बहन के सामने खोलते रहता है। एक दिन फूलमती गुस्से मे – दिन-रात मुझे क्या सूनाते रहता है, तेरी बीवी है तू क्यों नहीं समझाता? श्वेता मुंह चमकाते हुए – जब देखो ई बूढ़ी बकर-बकर करते रहती है। फूलमती क्रोधित हो जाती है देख रहा है अपनी बीवी को कोई काम तो आता नहीं है इसको, खाली जबान चार फिट लंबी हो गई है इसकी। श्वेता – क्यों नहीं चार फिट लंबी होगी? मेरा पति कमाता है और आप लोग बैठकर खाते है। सक्षम यह सब चुपचाप देखता रहता है और मुंह से कुछ नही कहता। फूलमती सक्षम कि खामोशी बर्दाश्त नही कर पाती और फूट-फूट कर रोने लगती है और बोलती है – हां-हां ये तेरा ही पति है, मेरा तो बेटा रहा नही। अपने जीवन का हर खुशी इसे दे दी। इसकी पढ़ाई-लिखाई के चक्कर मे अपने सारे गहने बेच दिये। ढंग का कपड़ा न खुद पहना न कभी अपनी बेटी को पहनने दिया। पति कि सारी कमाई इसमे लगा दी। ये नालायक घुट-घुट अपनी बीवी कि बात सून रहा है और एक शब्द मुंह से नही निकालता। ये नही जानती पर तू तो जानता है मैंने तुझे कितने कष्ट से पढ़ाया-लिखाया। सक्षम – तुम दोनों तो मेरा दिमाग खराब कर के रख दी हो। इसको रोने से और तुमको ताना मारने से फुर्सत कहां है। केदारनाथ फूलमती से – तुमको कितनी बार समझाया वो जो करती है करने दो, तुम्हें क्या पड़ी है बोलने कि। सूहाना – पापा ठीक कहते है तुमको क्या जरूरत है बोलने कि। फूलमती को लगता है अब उसका घर उसका नही रह गया है।
कुछ दिन ऐसे ही सबकुछ चलता रहा। एक दिन श्वेता आकर फूलमती से – मैं जारी हूँ। फूलमती – कहाँ ? श्वेता – अपने घर। फूलमती – क्यों? सक्षम – जाने भी दो न कितने सवाल करेगी, जब देखो बकर-बकर करते रहती है। फूलमती को धक्का-सा लगा, सोचते है अच्छा है ये डायन चली जाए। श्वेता और सक्षम घर से चले जाते है। कहने के लिए श्वेता अपने मायके चली गई थी लेकिन सक्षम अपना घर छोड़कर चला गया था।
फूलमती, केदारनाथ और सूहाना को लगता है जैसे सक्षम ने उनहे ठग लिया हो। दिन पर दिन फूलमती कि सेहत गिरने लगी। इसी चिंता मे दिन-रात बिमार रहने लगी। सूहाना के हंसी-खुशी के दिन चले गये थे। घर के काम-काज और माँ की सेवा मे पूरा दिन लगे रहती। केदारनाथ इन सब चीज़ों को देखकर दुःखी होते रहते है और एक दिन सक्षम को फोन करते है – तुमको शर्म नही आती। क्या अब तुम्हारी माँ कि उम्र रह गई है खाना बनाने की। अब यही बाकी रह गया था कि मैं इस उम्र मे बर्तन धोऊँ? सक्षम तपाक से – सूहाना कहाँ है? केदारनाथ – तुमसे यही उम्मीद थी और केदारनाथ ने फोन काट दिया। फूलमती – जरूरत क्या थी उस नालायक को फोन करने की? केदारनाथ – घर कैसे चलेगा? सूहाना – जैसे पहले चलता था। फूलमती – ठीक कहती है, मेरी बेटी। केदारनाथ - हां ! मैं जब तक ज़िंदा हूँ, तब तक तो ये घर मैं ही चलाउंगा। (सूहाना कि तरफ देखते हुए) तू चिंता मत कर सब ठीक हो जाएगा।
सूहाना ये सब देखते हुए बहुत दुःखी होती है। उसे लगता है पता नही घर कि खुशियों को किसकी नज़र लग गई है। क्या भाई को दिखाई नही देता, उसकी बीवी गलत है। फिर वो सोचती है बदलते ज़माने मे यही सच्चाई है कि लोग सिर्फ भोग! भोग! और सिर्फ भोग करना चाहते है। किसी को किसी रिश्ते कि परवाह नही है। जब वो माँ का नही हुआ तो वो कभी किसी का नही हो सकता। उसके चंगुल मे फंस के उसकी बीवी कठपुतली बन गई है। सभी को लगता है कि उसकी बीवी गलत है लेकिन क्या सच मे उसकी बीवी गलत है! लेकिन वो खुद ही गलत है। केदारनाथ – क्या सोच रही हो मेरी बच्ची? सूहाना – कुछ नही पापा। केदारनाथ – तुम डरो मत! मैं तुम्हारे साथ हूँ। सूहाना – डरते तो वो है न जो गलत रहते है। मेरा भाई डरे, मैं क्यों? केदारनाथ के आँखों से आंसू छलक जाते है और बेटी का आत्मविश्वास देखकर उनका भी खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आ जाता है। केदारनाथ सुहाना से – तूम सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दो मेरी बच्ची, बाकी सब मैं देख लूंगा। फूलमती – जिसके लिए सबकुछ किया वही छोड़कर चला गया। अब किसके लिए क्या करू? केदारनाथ – बस करो! अब उससे कोई उम्मीद नही। बेटी मेरी है, जो करूंगा मैं करूंगा। फूलमती – सारी गाढ़ी कमाई तो उसपर खर्च कर दी। बेटी कि शादी करनी है, अब तो किसी से कुछ बोलते भी नही बनता, बोलो तो लोग कहते है – बेटा नौकरी करता है, क्या कमी है? केदारनाथ – किसी को कुछ बोलने कि जरुरत नही है, वो नौकरी करता है तो करे, हमको भी जो करना है करेंगे। फूलमती - क्या करेंगे हमलोग? केदारनाथ – उसने घर छोड़ दिया तो घरवाले उसकी चिंता क्यों करे? फूलमती – तुम कहना क्या चाहते हो? केदारनाथ – तुमने मेरी एक बात न सुनी कभी। बेटा को मालिक बना दिया और आज भी तूम सिर्फ बेटे के बारे मे सोचती हो। हमारी एक बेटी भी है, उसके बारे मे सोचो। फूलमती – उसके बारे मे तो सोच-सोच के दिन-रात मुझे चैन नही है। केदारनाथ – सोचने से कुछ नही होगा। हमें कुछ करना होगा। फूलमती – क्या करना चाहते हो? मैं समझ नही पा रही हूँ। सूहाना उनकी बातें सुनने रहती है। तभी केदारनाथ – बेटी तूम चिंता मत करो, हमलोग जो करेंगे सही करेंगे। सूहाना – ये तो मुझे हमेशा से लगता है कि आप जो करेंगे सही करेंगे लेकिन भाई के व्यवहार के कारण अब आप कुछ गलत करने जा रहे है। केदारनाथ - मेरी बच्ची तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? सूहाना – अगर आप चाहते है आपका बेटा वापस आ जाए..... केदारनाथ गुस्से मे तमतमा जाता है और बिच मे ही सूहाना कि बात काटते हुए – मुझे उस नालायक से कोई मतलब नही है। सूहाना – “यही बात तो है पिताजी अपने छूटे नहीं छूटते और अपने इसी का फायदा उठाते है।“ कल हो के भाई को कोई problem होगा और वो यहाँ आ जाएगा तो सभी हंसी-खुशी अपना लेंगे। फूलमती गुस्से मे-तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? मैं कभी उसे अपना नही सकती। सूहाना – आप लोगों को यही लगता हैकि अपनी बेटी कि शादी कर दूं और फिर सबकुछ ठीक हो जाएगा। ये तब तक ठीक नही होगा जब तक उसे हमारी जरुरत न होगी। वो भी तो यही चाहता है की मेरी शादी कैसे भी कर दीजिए। वो भी तो अपने कर्तव्य से भाग रहा है। आज मेरी शादी का, कल बूढ़े माँ-बाप को खिलाने-पिलाने का। आप कब तक ये सब सहते रहेंगे? केदारनाथ कुछ समझ नही पाता – मेरी बच्ची तेरी एक-एक बात मे सच्चाई है पर तू कहना क्या चाहती है? सूहाना – बात साफ है पिताजी बस मैं लड़की हूँ इसलिए समझ नही पा रहें है। फूलमती – तू कहना क्या चाहती है? साफ-साफ क्यों नही बोलती? पहेलियाँ क्या बुझा रही है? सूहाना – मैं आपके सम्मान को वापस लाना चाहती हूँ। एक मौका तो देकर देखिए। मैं बता दूंगी कि मैं भाई से बेहतर हूँ। केदारनाथ को समझते देर न लगी कि मेरी बच्ची कहना क्या चाहती है। केदारनाथ अपनी बच्ची को गले लगा लेते है और बोलते हैं – तुम सक्षम से अच्छी नौकरी करेगी। हम सब मिलकर घर चलाएंगे और यही सक्षम के मुँह पर सही तमाचा होगा। तुमने मेरी आँखें खोल दी। शादी तो मैं तुम्हारी कैसे भी कर देता, पर वो कभी भी हमारी कमजोरी, बेबसी और लाचारी को न समझता, लेकिन अगर हमलोग मिलकर घर चलाए और तुम्हें एक सही मौका दे जो सक्षम को दिया। फूलमती - अब हमें यही करना है। सूहाना - रोने का वक्त गया काम शुरू करे और तीनों हँसना लगते है।
अगले दिन काम कि तलाश मे केदारनाथ अपने पुराने मालिक के पास जाता है। मालिक – आओ कदारनाथ! कैसे हो? केदारनाथ – कुछ ठीक नही है। मालिक – बचवा तो नौकरी करने लगा है, अब किस बात की दिक्कत? केदारनाथ – अच्छा होता मालिक कि नौकरी नही होता। नौकरी के ही घमंड मे तो हमलोगो को छोड़कर चला गया। मेरे लिए वो मर गया। मालिक – पगला गए हो का? बेटी जवान हो गई है, गोड़-हाथ पकड़ के बूला ले उसको। बेटी कि शादी करनी है कि नही? तू अकेली जान क्या करेगा? बेटी का ब्याह करना मज़ाक नहीं है। कितनी बार समझाया तूझे कि कुछ पैसे बेटी के लिए भी रख, लेकिन तू नालायक सारी कमाई बेटे को दे दी। अब देख क्या दशा हो गई है तुम्हारी। केदारनाथ – जो दशा होनी थी वो तो हो गयी मालिक, एक बात तो अपने ठीक कहा कुछ पैसे तो बेटी के लिए बचा के रखना चाहिए था। मेरी बिटिया पढ़ने मे तेज है मालिक, देखिएगा उ सक्षमओ से अच्छी नौकरी करेगी। मालिक – तूम बूढ़ारी मे पगला गए हो केदार, लड़की नौकरी करेगी? मेरी बात मान, एक-दो है मेरी नज़र मे। किसी के हाथ धरा दे, लड़का कमाता-खाता है, खुद का टेम्पू है। लड़की को खाने-पिने कि दिक्कत नही रहेगी। लड़की हाथ से निकल जाएगी तो क्या इज्ज़त रह जाएगी? केदारनाथ – यही सोच-सोच के तो अपनी बेटी को कभी आजादी नही दी, जो आजादी सक्षम को दी। “बेटा हाथ से निकल गया तो क्या इज्ज़त रही मेरी।“ आज दर-दर कि ठोकरें खाने पर मज़बूर हो गया हूँ, लेकिन उसी बच्ची के कारण हिम्मत हुई है। अब मैं उसकी आजादी नही छिनूंगा। उसे पढ़ा-लिखा कर बड़ा अफसर बनाउंगा ताकि कल हो के उसके बच्चे उसे छोड़कर चले भी जाए तो उसे वो दुःख न झेलना पड़े जो मुझे झेलना पड़ रहा है। माँ-बाप तो बच्चों का खुशी ही चाहते है। मालिक – तुझे समझाने का कोई फायदा नही, तू है बड़ा ढीठ कल भी तू मेरी बात नही सूना था, आज भी नही सून रहा है। तुझे देखकर दया आती है, आ! लग जा काम पे।
फूलमती अपनी बेटी से – पता नही उनको नौकरी पर रखेगा भी कि नही उनका मालिक, लेकिन है अच्छा आदमी रख ही लेगा। सूहाना – चिंता मत करो माँ, सब ठीक हो जाएगा, नही भी रखेंगे तो मैं घर चला लुंगी। फूलमती – तू कैसे चला लेगी? सूहाना – मैंने अपने कुछ दोस्तों से बात कि है, घर पर विद्यार्थी आ जाएंगे। मैं उनको पढ़ाऊंगी। फूलमती – छोटे-छोटे बच्चों को पढा़ कर कितने पैसे कमा लोगी? सूहाना – नहीं माँ, वो M.A के विद्यार्थी है, एक-एक नोट्स बनाने के दो-दो हजार रुपये मिलते है। फूलमती – ये तेरे से हो जाएगा? मैंने तुम्हें कोचिंग नही पढा़या, सक्षम कि तरह कभी बाहर रहकर नही पढ़ी। सूहाना – मैं कॉलेज मे टॉपर रही हूँ माँ, भूल गई? सभी Junior चाहते थे कि मैं उनलोगो को पढ़ाऊ। फूलमती फूट-फूट कर रोने लगती है – हां-हां ! याद है मुझे। मैंने ही तुमपे कभी ध्यान नही दिया। तू क्या बोलती थी, क्या बनेगी? कलेक्टर? तू उसी पे ध्यान दे। मैं बिल्कुल ठीक हो गयी हूँ। घर का कोई काम नही करना है तुमको, मैं जिंदा हूँ अभी।
केदारनाथ, सूहाना और फूलमती तीनों अपने-अपने तरीके से घर को चलाने और खुद को व्यवस्थित करने मे लग जाते है। अब केदारनाथ को तो याद भी नही रहता कि उनका कोई बेटा भी है। फूलमती कभी-कभी सक्षम को कोस लिया करती थी, कोसते-कोसते उनकी आँखे छलक जाती थी और सूहाना सिर्फ इसी धून मे रहती थी कि वह अपने भाई से खुद को बेहतर साबित करे। वह अपनी पढ़ाई पर वापस लौट गई थी। “घृणा मे एक शक्ति है और वही शक्ति सूहाना को मिल रही थी।“ वह अपना पूरा ध्यान ‘UPSC' कि तैयारी मे लगा दी थी। पहले तो फूलमती को विश्वास नही रहता है कि वो कुछ करेगी या नही, लेकिन सूहाना के ट्यूशन पढा़ने से खुश रहती है।
जब सूहाना का PT का परिणाम आता है तब केदारनाथ और फूलमती पूरी ताकत से सूहाना के साथ खड़े हो जाते है। केदारनाथ दिन-रात मेहनत करते है। “पता नहीं कहाँ से उन बूढ़ी हड्डियों मे इतनी ताकत आ गयी थी कि इतना काम करने के बावजूद भी उनके चेहरे पर तेज दिखता था।“ फूलमती कि भी काया पलट हो गयी थी और सूहाना तो अपने सपनो को पंख देने मे जूटी रहती है। जब उसके ‘MAINS’ का Result आता है केदारनाथ अपनी बच्ची सूहाना से बोलते है – तू न होती तो आज मुझे इतना घमंड न होता, जितने लोगों ने मुझे ताने मारे है और सवाल पूछा है, उस हर सवाल का जवाब है तू, मेरी बच्ची। सूहाना गर्व से-हां पापा! फूलमती -भगवान करे कैसे भी इसकी नौकरी हो जाए। केदारनाथ – तू चिंता काहे करती है पगली! हमही लोगो को कभी नही दिखा, सूहाना शुरू से ही सक्षम से ज्यादा बेहतर थी। अगर शुरू से ध्यान दिया होता तो आज ये दिन नही देखना पड़ता। सूहाना – जो हुआ सो हुआ अब हमे आगे ओर देखना है। जब सूहाना ‘Interview' देने जाती है तो आस-पास के सभी लोग केदारनाथ कि तारिफ़ करते रहते है और सूहाना को स्टेशन तक छोड़ने जाते है।
कुछ महीने बाद सक्षम पेपर मे देखता है कि सूहाना की तस्वीर छपी है। थोड़ा आश्चर्य और ख़ुशी मिली रहती है उसके चेहरे पर। सक्षम थोड़ा चीखते हुए -श्वेता! श्वेता! श्वेता – क्या हुआ? सक्षम – सूहाना कि फोटो छपी है अखबार मे। श्वेता – क्या कर दिया उस डायन ने? मुझे तो पहले से ही पता था कि एक न एक दिन कोई गुल खिलाएगी। सक्षम गुस्से मे – तुम्हारा तो दिमाग ही खराब है, बुरे लोगो को बुरी बात ही समझ मे आती है। मेरी बहन UPSC मे टॉप की है। मोटी बुद्धि मे कुछ गया? श्वेता के चेहरे का रंग ही उड़ जाता है। क्या बात करते हो? सक्षम – सच बोल रहा हूँ, देखो अखबार। श्वेता – हमलोगो को घर चलना चाहिए। सक्षम – किस मुंह से जाऊँ घर। श्वेता – भाई हो तुम उसके। सक्षम मम्मी –पापा मुझे नहीं माफ करेंगे। सक्षम के ससुराल वाले – क्या बात करते है दामाद जी, घर मे तो छोटे-मोटे झगड़े होते ही है। आपको जाना चाहिए, बधाई देना चाहिए। कोई कुछ भी कहें, है तो आपकी ही बहन! श्वेता – हां-हां गलती हो गयी है, माफी मांग लेंगे हम।
सक्षम और श्वेता अपने बेटे के साथ घर वापस लौटते है। सक्षम – कहाँ हो मेरी प्यारी बहन? केदारनाथ – अब आया है? फूलमती – क्यों आया है? श्वेता फूट-फूट कर रोने लगती है – मुझे माफ अर दीजिए माँ जी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी। फूलमती – गलती नही थी, वो पाप था, जो तुने किया डायन। सक्षम माँ के हां मे हां मिलाते हुए – इसी के चक्कर मे मैंने सबको भूला दिया, मुझे माफ कर दो माँ। सूहाना – 'मैंने कहा था न माँ मैं तुम्हारा बेटा वापस ला दूंगी।' केदारनाथ – अपने पोते को गोद मे उठा लेते है।
हर माता-पिता को सुहाना जैसी ही बेटी चाहिए। जो अपने परिवार की ही नहीं समाज के लिए आर्दश है। अति सुन्दर कहानी, जो आज का हाल बताती है, ये समाज को आईना दिखाती है
ReplyDeleteThnx
ReplyDeleteहर परिवार को सिर्फ अपने बेटे को ही मौका नही देना चाहिए बल्कि उसकी कोख से जन्मे अपनी बेटी को भी बराबर का मौका देना चाहिए। जब भी बराबर का मौका मिला है, वह कभी सूहाना, कभी इंदिरा, कभी कल्पना चावला, कभी किरण बेदी जैसी ही हस्तियाँ बनकर उभरी है हमारी बेटियाँ। लेखिका सही मायने में नारी कि आवाज़ समझती है।
ReplyDeleteThnx
DeleteVery deep story . I really like the way of your writing skills.... And this sotry really touched my heart ... ����
ReplyDeleteThnx
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