बचपन बचाओ

        सूर्य अपने पूरे सबाब पर था। दोपहर कि चिलचिलाती धूप सतीश को कहां रोक पा रही थी। वह तो दोस्तों के साथ दौड़-धूप और बचपन कि मस्ती में मग्न था। तभी अचानक मनू सतीश से – यार भूख लग गई है। मैं घर जा हूं। सतीश को लगता है वह ठिक कह रहा, उसे भी भूख लग गई है। वह दौड़ता हुआ अपने घर कि ओर उन सर्द गलियों में टूटे-फूटे नालो से बचते आगे बढ़ता है। उसके मन मे उमंग है। वह पूरे रास्ते सोचते रहता है एक और दांव मैं मनू को हरा दूंगा। सतीश का पैर अचानक रूक जाता है। उसके कानों में जोर-जोर से चीखें सूनाई देती है। तू मर क्यों नहीं जाता? जब तुम्हारी हड्डियों में ताकत ही नहीं थी कि तू अपनी लुगाई और बच्चों को न खिला सको तो क्यों शादी की थी? सतीश सहम जाता है। उसे समझते देर नही लगता कि मां-बापू झगड़ा कर रहे है। वह सोचने लगता है क्यों न वापस जाकर खेलने लगूं? तभी उसका पिता उसके मां के सर का बाल पकड़ के खिंचता हुआ उस झोपड़ी से बाहर निकलता है और वह अपनी पत्नी से कहता है तू घून है घून जो मुझे धिरे-धिरे खा रही है। जा कुलटा मर जाकर तू डायन है डायन। पहले मेरी मां को खा गई और अब मुझे खाने पर पड़ी है।
             सतीश की मां जिसके बाल खुले है गरीबी ने उसे वक्त से पहले बुढ़ी कर दिया है। वह धसी-धसी आँखों से अपने पति को घूरती और उसे गालियाँ देती है। उसका पति लाते और  घूसो से मारने लगता है। सतीश यह सब देख कर रोने लगता है और चिल्लाने लगता है। आस-पास के लोग हिट फिल्म कि तरह मज़ा लेते रहते है। सतीश गुस्से में एक पत्थर उठाता है और  बाप के सर पर दे मारता है। भीड़ में खलबली मच जाती है, अरे! मार दिया! मार दिया! मार दिया! अब तक उसकी पत्नी जो भगवान से मरने कि प्राथर्नां कर रही थी, उसका सिर अपने सिने से लगाकर अपने बेटे को श्रापने लगती है। मेरी कोख में क्यों नहीं मर गया। सांप कहीं का मेरे पति को डसने चला। तू मर जाएगा तो मैं दूसरा बचवा कर लुंगी। सतीश वहां से डरकर भाग जाता है। वहां के सारे लोगों में जो एक हिट फिल्म कि तरह देखते रहते है अचानक से एक गति आ जाती है और सभी के ज़ुबान पर सतीश! सतीश! सतीश! ही रहता है। हर एक व्यक्ति सतीश कि बुराई करता है। कैसा लड़का है बाप को मारता है। किसी दिन गुण्डा ही बनेगा, दुसरा व्यक्ति हां वह गुण्डा  ही है। सतीश की माँ रोते-बिलखते अपने पति को अस्पताल ले जाती है। डॉक्टर साहब – ये तो तुमलोगों का रोज़ का हो गया है। तभी एक महिला – नहीं! नहीं! साहब इसके बेटे ने सर फोड़ दिया है। डॉक्टर साहब – कभी तुम्हारा बेटा सर फोड़ता है, कभी पत्नी सर फोड़ती है। तुमलोग सुधरने वाले नहीं हो। सतीश का बाप गुस्से में न डॉक्टर साहब उसका आज गोड़-हाथ तोड़ देंगे। यही कलमूंही के चलते इतना बिगड़ल है। डॉक्टर साहब – तुमलोगों को जो करना है करो लेकिन मेरी नींद मत खराब करना।
               सतीश वहां से भाग कर अपने दोस्त के पास आ जाता है और फूट-फूट के रोने लगता है। रोते-रोते अपने दोस्त से कहता है – यार आज तो मैने अपने बापू का सर फोड़ दिया। मनु – क्यों? मनु थोड़े आश्चर्य में और थोड़ा-सा सकपकाया हुआ – क्या बात करते हो? तुमने? मुझे नहीं लगता! नहीं यार सच है। मैने ही! हां! मैने ही! क्यों? आज फिर मां को मार रहा था। साले सभी कमीने है। सब टूकूर-टूकूर देखते रहते है । कोई कुछ नहीं बोलता मैं चिख रहा था, चिल्ला रहा था, लेकिन किसी ने मेरी चिख और आवाज़ नहीं सूनी। जब मैने पत्थर उठाया और सर पर दे मारा तो सारे लोग मुझे ही चार बात सुनाने लगे - मार दिया! मार दिया! मार दिया! मैं गुण्डा हूँ। पता नहीं क्या – क्या? मेरी मां ने भी, मैने जिसके लिए ये सब किया, जिसे बचाने के लिए ये सब किया, आज वो भी मुझसे दुःखी है और कह रही है कि जा मर जा कहीं जा के, मैं सांप हूँ। कुछ समझ में नहीं आता ये दुनिया का कैसा चरित्र है? जिसके लिए कुछ करो वही लोग डसते है। मनु – अरे यार वो लोगों को जो करना है करने दे। तू अपने काम पे ध्यान दें। सतीश – थोड़ा आश्चर्य से – कौन सा काम? हमलोगों के ज़ीवन मे तो कुछ रहा ही नहीं। हमलोग पैदा ही गरीब हुए थे  और मरेंगे भी गरीब। क्या किस्मत है उन बच्चों का जिनके माँ-बाप स्कूल भेजते है? न हमारे स्कूल का ठिकाना है और ना ही हम बच्चे। हां – हां यार तू ठीक कह रहा है, क्या करें? कोई नौकरी – चाकरी हो जाती तो कर लेता फिर ज़िंदगी संवर जाती। मनु जैसे वहां से अचानक कुछ सोचता हुआ खड़ा हो जाता है। सतीश – क्या हुआ कहीं जा रहे हो? मनु – तुम्हारी बातें सुनकर मेरे दिमाग में एक बात आई है। सतीश – क्या? मनु – मेरे मामा आए हुए हैं। आज ही तो उन्होंने बताया था कि शहर चलो कोई नौकरी दिला दूँगा। बात कर के देखता हूँ। सतीश बोलता है – अरे यार! बात करने से क्या होगा? हम छोटे-छोटे बच्चों को कौन नौकरी देगा? मनु – अरे यार वहां तो बच्चों से ही तो काम कराया जाता है, जादा कुछ नही ऐस है ऐस, दूकान है मिठाई का उसी में काम करना है, जब मन किया पलेट धो लिया नही मन किया तो आराम से दो मिठाईयाँ चुराकर खा लिया करेंगे और क्या? इनलोगो के ताने तो नहीं सुनने पड़ेंगे। यहां तो रोटियां भी मिलती है तो पहले गालियां सूननी पड़ती है। सतीश थोड़ा-सा डर जाता है वो बोलता है – नहीं यार! मैं अपनी मां को छोड़ के नही जाउंगा। मैने सुना है वहां पर लोग बच्चों को मारते भी है। हूंह! मनु थोड़े घमंड से – क्या बात करते हो यार? यहां कौन-सी हमलोगों कि आरती उतारी जाती है? तुझे क्या लगता है तेरा बाप आज तुझे छोड़ देगा? पता नहीं कितनी हड्डियाँ टूटेगी तेरी? याद है तुम्हें उस दिन जब तू खेल रहा था, साला कमिना कहीं का पढ़ने के तो पैसे नहीं है और पिट-पिट के कहता है पढ़ता नही है। कहा से पढ़ू न कोई किताब, न स्कूल न मास्टर। पता नही ये लोग क्या-क्या बातें करते है और क्या-क्या उम्मीदें करते है? हम क्यों उन उम्मीदें पर खरा उतरे? क्यों हम वो जो चाहते है वो करें? जब हमारे मान-सम्मान, कदर ही नहीं है उनलोगों कि नजरों में और मैं और तुम कब तक इन सब चीजों को ढोते रहेंगें? सतीश बोलता है – नही! नही यार! मुझसे न होगा। मेरी मां ने मुझे बहुत दुःख से पाला है। मेरा बाप तू तो जानता है कितना कमिना है। रोज मां को मारता है मौका मिलता है तो मुझे भी मारता है। बेचारी मां चौका-बरतन करके जैसे-तैसे भी हो, मुझे दो टेम खिलाती तो सही है। मनु – किस किमत पे? तुझे पिट-पिट के दो टाइम का खाना खिलाती है। तुझे याद नही तुझे कितनी बार घसिट-घसिट कर ले जाती है और दूसरों के जूठे बरतन तुझसे भी धुलवाती है। आज हम इनके लिए काम कर रहे है, वहां जाकर अपने लिए करेंगे। जा तेरे को जो ठीक लगता है तू कर, अगर तूम्हे लगता है चलना चाहिए तो आ जाना मेरे घर पे, मैं मामा से बात करा दुंगा। सतीश वहां से उठ कर अपने घर कि ओर बढ़ता रहता है तभी वो सोचता है शायद मनु ठीक ही कह रहा है। मैं क्यूं इन सब झंझटों में पड़ा रहूं। शायद मां आज बहुत मारेगी। कैसे कह रही थी मर जा। दूसरा बच्चा हो जाएगा। इन्हीं सब विचारों में डूबा हुआ सतीश अपने घर के पास पहुंचता है। आस-पास के लोग उसे ताने मारते रहते है। क्यों रे? कहां घूम रहा था? बाप का सर फोड़ दिया। कल हो के क्या मां का जान लेगा? आ गया! आ गया! तुम्हारा गुण्डा बेटा आ गया। देख!देख! देख बहूरिया! गुण्डागर्दि करते चलता है। मैं पहले से ही जानती थी ये पाकिटमार है। उस दिन ई मेरे घर के तरफ देख रहा था किसी दिन किसी के घर डकैती करेगा ये लड़का। आज अपने बाप को मारता है, कल हो के पड़ोसियों को मारेगा। सतीश की अंर्तआत्मा उसे अंदर ही अंदर कोसते रहती है। क्यूं मैंने उस समय वो ईंटा उठाया और बापू के सर पर दे मारा? क्या  मैं अपने गुस्से को थोड़ा देर और नहीं सह सकता था? तभी उसकी मां बाहर आती है – आ गया! आ गया! अब क्या? अब क्या लेने आया है तू? क्या चाहिए? बाप को मारता है। कल हो के मुझे मारेगा। उ मर जाएगा तो तूमको बैठा के खिलाएगा कौन? कौन पैदा किया है तूमको? उ नहीं होता तो तू इस दुनियां में नहीं आता। इ छोकरा को जब बुखार लगा हुआ था, तब मेरा मरद! मेरा मरद! मेरा मरद जो है, दिन-रात इसकी सेवा में लगा रहता था। आज तनिक बड़ा का हो गया मेरे मरद को मारता है। मेरे मरद को! जा-जा जिसके पास जाना है तू जा। यहां तेरा कोई नहीं है। ये बातें सुनते हुए सतीश का बाप बाहर आ जाता है और वहां पड़े डंटे से सतीश को पिटना शुरू कर देता है। उसे इतना मारता है कि सतीश अधमरा-सा हो जाता है। सतीश रोता-बिलखता, कोई उसकी मदद नही करता। कोई नही कहता उसे छोड़ दो। सभी कहते है – मारो! मारो इसे! साला ये बिगड़ गया है। इसे देखते-देखते सारे मोहल्ले के बच्चे बिगड़ जाएंगे। बाप को मारता है। सतीश सोचता है मैं क्यों वापस आया? उस मां के लिए जिसकी मुझे परवाह नहीं। उस बाप के लिए जो मुझे मार-मार कर मेरा जान ही मार देना चाहता है। वो बहुत देर तक ऐसे ही रोता हुआ सोचता रहता है। फिर जब सभी अपने-अपने झोपड़ियों में चलें जाते है और उसका पिता उसे वहीं पर छोड़कर सड़क पर चला जाता है। अब! अब कभी वापस नहीं आऊंगा और वह वहां से किसी तरह खुद को घसिटता वहां से चला जाता है।
                जब वह मनु के पास पहुंचता है। मनु थोड़े आश्चर्य और व्यंग से – कितनी हड्डियां टुटी यार? सतीश – क्या करूं यार मुझे जाना ही नही चाहिए था। मनु - तुझे नहीं पता तेरा बाप कितना कमीना है? तुझे कितनी बार समझाया? तू सुनता है मेरी बात। चल अब मामा से बात करता हूं। सतीश – तू ठीक कहता है। दोनों दरवाजे के अंदर चले जाते हैं। मनु अपने मामा से – मामा मैंने बताया था न यही लड़का है काम करेगा। मामा – देख सतीश मैं इधर-उधर कि बात नहीं करता। तुझे काम करना है तू कर नही करना है मत कर। तू दो पैसे कमाएगा तो मुझे भी दो पैसे चाहिए। यार आदमी काम करता है किसके लिए? पैसों के लिए ही तो करता है। सतीश अपना सर हिलाता हुआ - जी मामा! आप जो कहिए। मामा बात बढ़ाता हुआ आगे कहता है – देख रोज़ के दो सौ रुपए मिलेंगे मुझे उसमें से पचास चाहिए, बाकी के तेरे डेढ़ सौ, तेरे डेढ़ सौ। तू जो कर उसके साथ। सतीश हां में हां मिला देता है और फिर मामा से पुछता है मामा वहां क्या काम करना होगा? मामा – काम कुछो नही है। बिड़ी कि फैक्ट्री है, बिड़ी भरनी है बस, सुबह आठ बजे से लेकर रात के आठ बजे तक। वहीं काम है तुम्हारा। मन किया तो एक-दो चढ़ा लेना तू भी। सतीश सोचता है, चलो ज़िन्दगी अच्छी है, चले जाते है। सतीश ख़ुश। सतीश और मनु मामा के साथ चले जाते है।
             जब सतीश वहां पहुंचता है तो देखता है उसकी उम्र के बच्चे काम कर रहे है। वह भी काम पर लग जाता है। सतीश को रोज़ाना डेढ़ सौ रुपए मिलने लगते है। सौ रुपए तो उसके खाने-पिने पर ख़र्च हो जाते। मगर फिर भी हर रोज़ पचास रुपए बचा लेता है‌। एक दिन वह सोचता है (जब उसके पास कुछ पैसे इकट्ठे हो जाते है) – काश! मैं घर जाता। मां मां होती है। उसने जो किया उस समय वह सही ही था। मुझे भी अपने बाप का सर नहीं फोड़ना चाहिए था। फिर वह सोचता है क्या मूंह लेकर जाऊंगा? नहीं! मैं नही जाऊंगा। यही रहूंगा। उसने ही तो कहा था जा तू मर जा। मैं उसके लिए मर ही गया हूं। एक दिन काम करते-करते जब जब सतीश बहुत थक जाता है, उसका मालिक आता है – ओ कमीना कहीं का उठ सारा दिन सोता रहता है। सतीश – सुबह से ही तो उठकर काम में लग जाता हूं साहब। बिड़ी मालिक – अच्छा! सुबह से ही काम पर लग गया है? तेरे बाप कि फैक्ट्री है? चार पैसे मुझे मिलेंगे तभी न दो पैसे तुझे दुंगा? हरामी का बच्चा कहीं का और मुझसे ज़बान लड़ाता है। सतीश सोचता ही रहता है कि वो कोई जवाब दे उससे पहले ही उसका मालिक उसे दो ज़ोरदार थपड़ तड़ाक-तड़ाक रसीद कर देता है। सतीश कुछ नही बोलता है क्योंकि वह जानता था कि यह सब यहां रोज़ का है, मार खाना, गालीयां सुनना यह तो दिन-रात हर बच्चों के साथ होते रहता है। सतीश अपनी अंतरात्मा को कोसते हुए क्या मिला मुझे यहां आकर मेरे घर जो बातें मुझे घर पर सुनना पड़ता था वह बातें मुझे यहां पर भी आकर सुनना पड़ रहा है सतीश कुछ नहीं बोलता चुपचाप अपने काम में जुट जाता है। तभी मनु उसके पास आता है। क्या हुआ? क्यों इतने खामोश हो? बहुत खामोश हो सतीश क्या बताऊं यार लगता है भगवान ने हमारी किस्मत ही ऐसी लिखी है। चाहे कुछ भी कर हो घर हो या बाहर हर तरफ अपमान ही अपमान सहना है। इस जिंदगी ने कभी कुछ नहीं दिया मैं कभी-कभी सोचता हूं काश मैं पैदा ही ना होता। इतनी गुरबत भरी जिंदगी जी के अब तो जिंदगी से भी निराश हो चुका हूं। मौत ही आ जाती तो अच्छा होता दिन रात यहां बैल की तरह खटता हूं, काम करता हूं मिलते भी हैं तो कितने दिन के पूरे दिन के डेढ़ सौ रुपए। और उसमें होता भी क्या है अब समझ में नहीं आता कहां जाएगी जिंदगी? मनु - चिंता मत कर यार जब रात खूब हो तो समझ लेना सुबह जल्दी ही आने वाली है। आज हमारे जिंदगी में कुछ नहीं है सिर्फ अंधेरा और अंधेरा ही है। अब सवेरा होने ही वाला होगा। इन दोनों की बातें ध्यान से एक बुड्ढा सुनते रहता है। उनके बातें सुनने के बाद बुड्ढा बोलता है तुम लोग को पता है दो-तीन दिन के बाद बाल दिवस आने वाला है। दोनों  एक स्वर में - बाल दिवस यह क्या होता है चचा? बुड्ढा अरे तुम लोग को बाल दिवस नहीं पता वह बच्चों के लिए ही होता है। दोनों हंसने लगते हैं बच्चों के लिए हम तो बच्चे हैं ही नहीं। मेरे लिए तो कहीं नहीं चाचा अरे तुम लोग नहीं जानते? नेहरु चाचा थे जिन्होंने बच्चों के लिए बाल दिवस बनाया था, ताकि सभी बच्चों को सम्मान मिल सके। सतीश हमें क्या पता चाचा। यह भी कोई काम है सब को सम्मान मिल सके क्या सम्मान देते हैं ये लोग। चाचा – सम्मान देते है, मिठाइयां देते हैं और तो और बच्चों को स्कूल भी भेजते हैं। सतीश – अच्छा मिठाइयां मिलती है और बच्चों को स्कूल भी भेजा जाता है। यह कौन सा शहर है जहां यह सब होता है। चाचा अरे इसी शहर में होता है यह सब। तुम्हें नहीं पता हां हां तुम लोगों को कैसे पता होगा कभी स्कूल ही नहीं गए। इसके बारे में तुम कैसे जानोगे। ठीक ही कहते हैं आप हम लोगों को कैसे पता यही है स्कूल यही फैक्ट्री यही जिंदगी यह किस्मत है हमारी। नहीं नहीं मुझे समझ नहीं आता तुम लोग इतने निराश क्यों हो गए हो। वैसे मैंने एक बात सुनी है दोनों बच्चे क्या क्या सुनी है चाचा दोनों बच्चे आश्चर्य से नहीं नहीं मैं जा रहा हूं यहां से। अरे सुनिए तो सही जा कहां रहे हैं। नहीं नहीं मैं यहां कुछ नहीं कह सकता। मालिक ने सुन लिया तो मेरी नौकरी चली जाएगी मैं तुम लोगों को कुछ नहीं बता सकता दोनों ऐसे क्या बात है जो मुझे नहीं पता और इसे पता है। इसीलिए दोनों दौड़ के चाचा आप मुझे बता दीजिए ना। क्या चाहते हैं जिंदगी भर इस फैक्ट्री में मार खाता रहूं। मेरा भला हो जाएगा तो भगवान भी आपका भला करेगा। कौन ऐसा जगह है जहां खाने के लिए मिठाइयां पढ़ने के लिए स्कूल मिलता हैं। मुझे भी स्कूल जाना है हम लोग उस शहर में चले जाएंगे। अच्छा यहां तो मैं कुछ नहीं कह सकता दोपहर में तुम लोग मुझसे मिलना और वाह बूढा आदमी वहां से चला जाता है।
               दोपहर में दोनों बच्चे काफी उत्साहित रहते हैं एक नई जिंदगी मिलेगी। पता नहीं कैसा होगा स्कूल होगा, ड्रेस होगा, किताबें होंगी। फिर हम लोग पहले बहुत बड़े आदमी बन जाएंगे, तब जो भी बच्चे रोड पर मिलेंगे ना उन सब को अपने घर पर रख लेंगे और फिर उन लोगों को पढ़ायेंगे-लिखाएंगे और फिर अपनी तरह बड़ा आदमी बनाएंगे। ‌ दोनों इसी उधेड़बुन में चाचा के पास पहुंचते हैं। दोनों पूछते हैं चाचा बताइए ना ऐसा कौन सा शहर है जहां ऐसा सब कुछ होता है। यह वही शहर है बचवन मैं क्या बताऊं लेकिन अगर मालिक जानेंगे तो मुझे जीने नहीं देंगे। दोनों खामोश। क्या आप अभी भी नहीं बताइएगा। दोनों मासूम बच्चों का चेहरा देखकर वह बूढ़ा व्यक्ति तैयार हो जाता है। हां वैसे ही मेरी जिंदगी है कितनी एक पैर तो कब्र में लटका है। नौकरी से निकाल भी देगा तो क्या फर्क पड़ता है कितनी जिंदगी है भीख मांग कर गुजर-बसर कर लूंगा। लेकिन तुम लोगों की खातिर यह काम जरूर करूंगा। सुना है कोई है कैलाश सत्यार्थी नाम का आदमी। जो बचपन बचाओ अभियान चला रहा है छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाता है लिखाता है सब सुख-सुविधाएं देता है। तुम लोग भी वहां जा सकते हो अच्छा यह आदमी कहां मिलेगा। पता नहीं कभी-कभी ना यहां भी छापा पड़ता है। बच्चों को पकड़ के ले जाते हैं कुछ को तो मालिक पैसे देकर छुड़ा लेते हैं। लेकिन वह एनजीओ वाले आ जाते हैं तो फिर मालिक भी नहीं छुड़ा पाते हैं। वह सभी बच्चों को लेकर चले जाते हैं। अच्छा चाचा ऐसा होता है।‌ आप कोई उपाय कीजिए ना यह छापामारी अभी हो जाए। ‌ हम लोगों को भी उ एनजीओ वाले लेकर चले जाएं। मुझे तो इतना नहीं पता बचवा लेकिन करता हूं कुछ उपाय।
               बुड्ढा आदमी अपनी पूरी ताकत से छानबीन में लग जाता है। तभी उसे पता चलता है 14 नवंबर के दिन कुछ अभियान चलने वाला है। बात सिर्फ दो-तीन दिनों की है वह पूरी कोशिश के साथ लग जाता है। वह जाता है एक इंस्पेक्टर से मिलने। सुना है कोई बचपन बचाओ अभियान चल रहा है। इंस्पेक्टर – तू क्या पगला गया है। मैं पगला गया हूं मतलब क्या है आपका। मतलब साफ है तू तो कहीं से बच्चा दिखाई देता नहीं है।‌ तुम्हें क्या मतलब है उससे। देखो तो साला कमाता धमाका तो कुछ है नहीं। अपने बच्चों को तो पढ़ाना है नहीं सीधे अनाथ आश्रम में डाल देना। ताकत नहीं है तो फिर पैदा ही क्यों किया? मालिक मैं अपने बचवन के बात नहीं कर रहा उ फैक्ट्रियां में ना ढेर बचवन रहता है। उ लोग से काम कराया जाता है। आपको तो कुछ मिलता ही नहीं है, सरकार को तो कुछ पता ही नहीं है। इसीलिए पूछ रहा था शायद मालिक आपको कुछ दे दे। अच्छा यी बात है। अब ना तुम कोई ढंग का बात किया। ठीक बात बोलते हो तुम। कौन एनजीओ के बारे में बोल रहा था बताओ? वही बचपन बचाओ वाला। अरे जो भी दस-पांच मिलने वाला है उ हो नहीं मिलेगा।  कहां! कहां! इस सब झंझट में पड़ रहे हो। मालिक हम तो यही चाहते हैं कि उ दो बचपन को कैसहू वहां भेज देते। बड़े छोटे-छोटे मासूम है मालिक। पढ़-लिख के कुछो बन जाएगा। अच्छा अइसन बात है, तो ठीक है करते हैं कुछ उपाय। है ना वह मोटा माल कमाए हुए तेरा मालिक। हां-हां महाराज सही बात बोल रहे हैं हम। झूठ बोलेंगे तो गरदन उतार लिजियेगा हमार। हमको लगता है दू सौ से कम बचवन नहीं होगा। आप एक काम कीजिए दो बचपन को एक दिन पहिलही पकड़ लीजिएगा और कइसहू उ दोनों को कैलाश जी के पास पहुंचा दीजिएगा। ठीक है देखते हैं करते हैं कुछ हम भी। बुड्ढा आदमी वहां से चला जाता है। दोनों बच्चे असमंजस और कातर भरी नजरों से उसे देखते हुए – चाचा! कुछ हुआ बताइए ना? क्या बताऊं बचपन दुनिया खराब है मैं अपनी तरफ से जो कर सकता था किया। भगवान मालिक है तुम लोगों के साथ कुछ अच्छा होना होगा तो हो जाएगा।
             अगले दिन इंस्पेक्टर फैक्ट्री में पहुंचता है, देखता है बच्चे काम कर रहे हैं। वह मालिक को धमकाने लगता है। अरे! तू बच्चों से काम कराता है 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराने का नियम नहीं जानता जेल हो जाती है और जुर्माना भी भरना पड़ता हैं? चलो चलो यहां से सब को पकड़ा जाएगा। वहां का मालिक डर जाता है और बोलता है क्या बात कर रहे हैं माई-बाप? काम नहीं करेंगे तो खाएंगे कहां से? इसके लिए तो काम करना ही पड़ता है पेट ऐसा चीज है? ओ! हो! तुम्हारा क्या पेट है और हमारा नहीं है? हमारे लिए भी कुछ उपाय करो। हां-हां मालिक। क्या बात करते हैं मालिक हम तो पहले से ही सोच रहे थे कि महाराज को जाकर कुछ दान दक्षिणा चढ़ा दें। अच्छा क्या चढ़ाने वाले थे तुम? आए तो झूठ-झूठ बोल रहे हो। नहीं-नहीं मालिक हम तो दान दक्षिणा देने जाने ही वाले थे। ठीक है दान दक्षिणा जो देना है दे दो। अच्छा दो गो बचवन हमको चाहिए। आपको बच्चा काहे के लिए चाहिए मालिक? अरे कह दिया ना चाहिए तो चाहिए। कौन बचपन चाहिए? कोई है मनु और सतीश। उसी का काम है हमको। ठीक है मालिक। आप जो कहिए सो तो हम करबे करेंगे।  बुलाते हैं अइसे किया क्या है दूनों कमीनवन ने? रहता यहां तो ठीक से ही है। किया कुछ नहीं है। बस हमको उसकी जरूरत है। ठीक है मालिक ले जाइए हमारा का। सतीश और मनु दोनों पहले डर जाते हैं सोचते हैं पुलिस उन लोगों को पकड़ कर कहां ले जा रही है? फिर सोचते हैं चाचा तो बोले थे अच्छा-अच्छा होगा। हमारी किस्मत ही खराब है इसलिए ये बुरा-बुरा हो रहा है। दोनों एक दूसरे से बातें करते हुए और हिम्मत बढ़ाते हुए - रहने दो जो हो इससे तो अच्छा ही होगा। चाचा बोले थे मिठाईयां मिलेंगे, कपड़े मिलेंगे, स्कूल भी मिल जाए तो अच्छा होगा। फिर दोनों इंस्पेक्टर के साथ उसके गाड़ी में बैठ जाते हैं।
                इंस्पेक्टर बोलता है - तुम दोनों की किस्मत अच्छी है उस बुड्ढे ने तुम दोनों की तक़दीर खोल दी। मुझे तो इन सब कामों को करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। कितने भी लोग कर ले कुछ भी तुम लोगों का कुछ होना नहीं है। लेकिन चलो तुम दोनों का भला मेरे ही हाथों होना था। एक कैलाश सत्यार्थी हैं तुम लोगों को उनके पास भेज देते हैं। इंस्पेक्टर फोन घुमाता है आप बचपन बचाओ अभियान से बोल रहे हैं दो बच्चे को पकड़ कर लाए हैं अगर चाहिए तो ले जाइए। कैलाश सत्यार्थी के कार्यालय से एक व्यक्ति आता है और उन दोनों बच्चों को ले जाता है अपने साथ। बच्चे कुछ समझ तो नहीं पाते हैं बस इतना ही सोचते हैं उनके जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। जब वह वहां जाते हैं और वहां का माहौल देखते हैं तो खुशी-खुशी नाचने लगते हैं और अपने जीवन का एक अजीब बदलाव-सा देखते हैं। सारे बच्चे सजे-धजे ऐसे कपड़ों में और बस्ते टांगे हुए किसी को काम का कोई बोझ नहीं है, बस पढ़ाई के बोझ सबके पीठ पर दिखाई देता है। वह लोग खुशी से अपने जीवन में कुछ करने की इच्छा लेकर आगे बढ़ने लगते हैं।

Comments

  1. काफ़ी सुंदर कहानी है। लेखिका ने बाल मन बखुबी दर्शाया है।
    अगर हम भी अपने स्तर से प्रयास करेंगे तो जल्द ही बालश्रम खत्म हो जाएगा। मानसी जी आपने समाज के ऐसे मुद्दे को उठाया है जिसे अक्सरहा नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इसके लिए आप धन्यवाद कि पात्र हैं।

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  2. लेखिका मानसी से बाल मनोभाव और समाज का सही चित्रण किया है। बदलते वक्त मे भी नहीं बदली है समाज कि सोच। उन्होने कहानी के माध्यम से हमें सोचने पर मज़बूर कर दिया है कि बालश्रम कि सच्चाई क्या है?

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