नारी कि आवाज़

             नारी कि आवाज़
खुद को ढूंढती हूँ मैं या
ढूंढती है दुनिया मुझमें खुद को
अगर मैं न रहूँ तो ये दुनिया ही न रहे
ये दुनिया है तो इस दुनिया में
मेरा अस्तित्व ही खो गया है कहीं
जो माँ कभी दूलारती थी मुझे
आज वही आँख दिखाने लगी है
इस यौवन पे कदम क्या रखा मैंने
बदलते बचपन कि तरह
बदल गयी दुनिया मेरी
सपनों भरी आँखें मेरी
निल गगन को छूने चली
बाँधती पैरों मे जंजीरे मेरी मर्यादा
आई थी अकेली इस दुनिया मे
जाऊँगी भी अकेली
मुझे क्या खबर थी की
मेरे जन्म से पहले ही
मर्यादा कि माला ये दुनिया
पहना देगी मुझे
एक दर्द है मेरे सीने मे
एक हूक सी उठती है
कुछ ख़्वाहिशे है
जो दम तोड़ रही है
एक आह! निकल रही दिल से
कोई तो आकर बचा ले मुझे
हिना की तरह पिस जाना ही है
मेरी जिंदगी
कहती है दुनिया
इसलिए रिति-रिवाज़ो मे
बाँधती है दुनिया
मैं खुद को मिटा दूं या
मिटा दूं दुनिया के
रस्म – रिवाज़ो को
झकझोरती है मेरी आत्मा मुझे
चल उठ खड़ा हो
टूट नहीं सकती
तू बिखर नहीं सकती
तुने बनायी है ये दुनिया
इस दुनिया ने
तुम्हें नहीं बनाया
तुम्हें चलते रहना है
कर्म पथ पर
एक दिन झुकेगी दुनिया
तेरे ही कदमों पे
नारी तुममे करुणा है
माया है, ममता है
है नहीं ये तेरी कमज़ोरीयां
तुममे ताप है
बल है ज्वाला है
जो जला सकती है
इस दुनिया को
तू पार्वती है
तू काली भी
उठ जाग अपनी
प्रतिभा को पहचान
और बदल दे ये दुनिया।



Comments

  1. Wonderful poem. This is voice of female. Congratulations Mrs. Mansi.

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  2. लेखिका ने नारी का सच्चा स्वरूप पेश किया, न समाज बल्कि परिवार के डर से मौन हो जाती है, नर हो या नारी हो पहली शक्ति परिवार से मिलती है।

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