खुशी की तलाश
खुशी की तलाश
लोमड़ी और हिरण दोनो पक्के दोस्त थे। पूरे जंगल मे उनके दोस्ती कि चर्चा सबके जूबां पर थी। एक दिन लोमड़ी हिरण से-काश! उस दिन जंगल मे आग न लगी होती तो आज मैं अपने पूरे परिवार के साथ होता। हिरण-क्यों दुःखी होते हो लोमड़ी भाई मैं भी तो आपके साथ हूँ। लोमड़ी-परिवार कि बात ही अलग है। हिरण-मैं भी तो आपका परिवार ही हूँ। लोमड़ी-नहीं यार! परिवार उसको नहीं कहते तुम तो मेरे दोस्त हो। अभी मेरी माँ-बहन रहती तो कहां हूँ? कैसे हूँ? चिंता करती। अभी मैं आवारा कि तरह घूम रहा हूँ। हिरण दुःखी हो जाता है। लोमड़ी से-आपको क्या लगता है मैं आपकी परवाह नहीं करता? लोमड़ी-तू क्यों दु:खी होता है मैंने कब कहा तू मेरी परवाह नहीं करता। पूरे जंगल में तू ही तो मेरा अपना है। इसलिए तो मैं तुमसे अपने दिल की बात कह रहा हूँ। हिरण-जिस बात को लेकर आप इतने दुःखी हैं, आप सोचते है! परिवार कितना तंग करता है? ये मत करो, ऐसे मत करो, वहाँ मत जाओ, समय पर घर आओ। कितना तंग करता है! कितना अच्छा है लोमड़ी भाई आप अकेले है, जो मन करे वो आप कर सकते हैं, जहाँ मन करे वहाँ जा सकते हैं। क्या आपको अपनी आजादी पसंद नहीं? परिवार तो आजादी छिन लेता है, उसे बंदिशो मे रखता है। लोमड़ी-जिसे तुम बंदिश समझते हो वही परम् सूख है।
भालू उधर से गुजरते रहता है। भालू उनकी बाते सुनकर वहीं रुक जाता है। सारी बाते सुनने के बाद भालू लोमड़ी से-लोमड़ी तुम ऐसा क्यों नहीं करते कि शादी कर लो। लोमड़ी को यह विचार अच्छा लगता है। सोचता है ऐसे मेरा भी एक परिवार हो जाएगा। हिरण भी सहमति भरता है हां-हां एकदम सही कह रहे हैं आप । लोमड़ी कि शादी हो जाती है। कुछ सालों के बाद लोमड़ी हिरण से मिलता है। हिरण देखता है कि लोमड़ी बहुत उदास है। वह उदासी वैसी ही थी जैसी शादी से पहले थी। हिरण लोमड़ी से-क्या हुआ लोमड़ी भाई आप दुःखी है? लोमड़ी-क्या बताऊ यार बात-बात पर इतना रोकती है, इतना टोकती है मेरा जीना मुश्किल कर दी है और मेरे दो शैतान बच्चे मुझे जीने नहीं देते। हिरण-आप ही तो परिवार चाहते थे। लोमड़ी-हां पर ऐसा नहीं। हिरण-परिवार तो ऐसा ही होता है। लोमड़ी-इससे अच्छा तो मैं अकेला ही ठीक था। हिरण लोमड़ी से-क्यों न हमलोग भालू चाचा के पास चले और उनसे कोई सलाह ले। दोनों भालू के पास जाते है।
लोमड़ी अपनी सारी समस्या भालू से कहता है। भालू लोमड़ी से-अब जब तुम इतने ही दुःखी हो तो क्यों नहीं किसी दूसरे जंगल मे चले जाते हो। वहाँ अकेले ही रहना। लोमड़ी को यह सलाह अच्छी लगती है। वह उसी समय दूसरे जंगल मे चला जाता है। फिर कुछ समय बाद हिरण लोमड़ी से मिलता है। देखता है कि लोमड़ी उदास है। हिरण लोमड़ी से-लोमड़ी भाई आपने जो चाहा, जैसे चाहा करते रहे। फिर भी आप इस जीवन से क्यों दु:खी है? लोमड़ी-मुझे कभी सूख मिला ही नहीं। हिरण चौंक जाता है। वह समझ ही नहीं पाता कि सूख का मतलब क्या होता है? सभी कहते है जो जीवन मे चाहा वही किया वैसे प्राणी सूखी होते है और लोमड़ी भाई कहते है मुझे जीवन मे कभी सूख ही नही मिला। ये तो अजीब बात है। लोमड़ी-हां ये सच है। हिरण-क्यों न हमलोग भालू चाचा के पास चलते हैं और उनसे पुछते है कि सूख क्या है? कैसे कोई प्राणी सूखी रह सकता है। दोनों भालू के पास जाते हैं। भालू को अपनी सारी कथा सुनातेहै।
भालू बोलता है-देखो बच्चों! मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। मेरा अनुभव कहता है जो प्राणी अपनी समस्याओं से भागता फिरता है वह क्षणिक सूख का तो भागी हो सकता है पर परमसूख का नहीं। जो प्राणी कभी त्याग न किया हो, कभी अपनी खुशियों से समझौता न किया हो, कभी किसी कि परवाह न किया हो वह कैसे कभी सूखी रह सकता है। लोमड़ी ने कभी किसी कि परवाह नही कि जब वह तुम्हारे साथ था तो उसने तुम्हारी परवाह नहीं की, जब परिवार के साथ था तो परिवार कि परवाह नहीं की। यह सिर्फ अपने बारे में सोचता रहा। कोई भी रिश्ता अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य से भी जूड़ा होता है। जब आप कर्तव्य भूल जाते है उसी क्षण आप दुःख को अपनी संगिनी बना लेते है।
लोमड़ी अपने बुरे व्यवहार के लिए हिरण और भालू से माफी मांगता है और अपने परिवार के पास वापस लौट जाता है।
लोमड़ी और हिरण दोनो पक्के दोस्त थे। पूरे जंगल मे उनके दोस्ती कि चर्चा सबके जूबां पर थी। एक दिन लोमड़ी हिरण से-काश! उस दिन जंगल मे आग न लगी होती तो आज मैं अपने पूरे परिवार के साथ होता। हिरण-क्यों दुःखी होते हो लोमड़ी भाई मैं भी तो आपके साथ हूँ। लोमड़ी-परिवार कि बात ही अलग है। हिरण-मैं भी तो आपका परिवार ही हूँ। लोमड़ी-नहीं यार! परिवार उसको नहीं कहते तुम तो मेरे दोस्त हो। अभी मेरी माँ-बहन रहती तो कहां हूँ? कैसे हूँ? चिंता करती। अभी मैं आवारा कि तरह घूम रहा हूँ। हिरण दुःखी हो जाता है। लोमड़ी से-आपको क्या लगता है मैं आपकी परवाह नहीं करता? लोमड़ी-तू क्यों दु:खी होता है मैंने कब कहा तू मेरी परवाह नहीं करता। पूरे जंगल में तू ही तो मेरा अपना है। इसलिए तो मैं तुमसे अपने दिल की बात कह रहा हूँ। हिरण-जिस बात को लेकर आप इतने दुःखी हैं, आप सोचते है! परिवार कितना तंग करता है? ये मत करो, ऐसे मत करो, वहाँ मत जाओ, समय पर घर आओ। कितना तंग करता है! कितना अच्छा है लोमड़ी भाई आप अकेले है, जो मन करे वो आप कर सकते हैं, जहाँ मन करे वहाँ जा सकते हैं। क्या आपको अपनी आजादी पसंद नहीं? परिवार तो आजादी छिन लेता है, उसे बंदिशो मे रखता है। लोमड़ी-जिसे तुम बंदिश समझते हो वही परम् सूख है।
भालू उधर से गुजरते रहता है। भालू उनकी बाते सुनकर वहीं रुक जाता है। सारी बाते सुनने के बाद भालू लोमड़ी से-लोमड़ी तुम ऐसा क्यों नहीं करते कि शादी कर लो। लोमड़ी को यह विचार अच्छा लगता है। सोचता है ऐसे मेरा भी एक परिवार हो जाएगा। हिरण भी सहमति भरता है हां-हां एकदम सही कह रहे हैं आप । लोमड़ी कि शादी हो जाती है। कुछ सालों के बाद लोमड़ी हिरण से मिलता है। हिरण देखता है कि लोमड़ी बहुत उदास है। वह उदासी वैसी ही थी जैसी शादी से पहले थी। हिरण लोमड़ी से-क्या हुआ लोमड़ी भाई आप दुःखी है? लोमड़ी-क्या बताऊ यार बात-बात पर इतना रोकती है, इतना टोकती है मेरा जीना मुश्किल कर दी है और मेरे दो शैतान बच्चे मुझे जीने नहीं देते। हिरण-आप ही तो परिवार चाहते थे। लोमड़ी-हां पर ऐसा नहीं। हिरण-परिवार तो ऐसा ही होता है। लोमड़ी-इससे अच्छा तो मैं अकेला ही ठीक था। हिरण लोमड़ी से-क्यों न हमलोग भालू चाचा के पास चले और उनसे कोई सलाह ले। दोनों भालू के पास जाते है।
लोमड़ी अपनी सारी समस्या भालू से कहता है। भालू लोमड़ी से-अब जब तुम इतने ही दुःखी हो तो क्यों नहीं किसी दूसरे जंगल मे चले जाते हो। वहाँ अकेले ही रहना। लोमड़ी को यह सलाह अच्छी लगती है। वह उसी समय दूसरे जंगल मे चला जाता है। फिर कुछ समय बाद हिरण लोमड़ी से मिलता है। देखता है कि लोमड़ी उदास है। हिरण लोमड़ी से-लोमड़ी भाई आपने जो चाहा, जैसे चाहा करते रहे। फिर भी आप इस जीवन से क्यों दु:खी है? लोमड़ी-मुझे कभी सूख मिला ही नहीं। हिरण चौंक जाता है। वह समझ ही नहीं पाता कि सूख का मतलब क्या होता है? सभी कहते है जो जीवन मे चाहा वही किया वैसे प्राणी सूखी होते है और लोमड़ी भाई कहते है मुझे जीवन मे कभी सूख ही नही मिला। ये तो अजीब बात है। लोमड़ी-हां ये सच है। हिरण-क्यों न हमलोग भालू चाचा के पास चलते हैं और उनसे पुछते है कि सूख क्या है? कैसे कोई प्राणी सूखी रह सकता है। दोनों भालू के पास जाते हैं। भालू को अपनी सारी कथा सुनातेहै।
भालू बोलता है-देखो बच्चों! मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। मेरा अनुभव कहता है जो प्राणी अपनी समस्याओं से भागता फिरता है वह क्षणिक सूख का तो भागी हो सकता है पर परमसूख का नहीं। जो प्राणी कभी त्याग न किया हो, कभी अपनी खुशियों से समझौता न किया हो, कभी किसी कि परवाह न किया हो वह कैसे कभी सूखी रह सकता है। लोमड़ी ने कभी किसी कि परवाह नही कि जब वह तुम्हारे साथ था तो उसने तुम्हारी परवाह नहीं की, जब परिवार के साथ था तो परिवार कि परवाह नहीं की। यह सिर्फ अपने बारे में सोचता रहा। कोई भी रिश्ता अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य से भी जूड़ा होता है। जब आप कर्तव्य भूल जाते है उसी क्षण आप दुःख को अपनी संगिनी बना लेते है।
लोमड़ी अपने बुरे व्यवहार के लिए हिरण और भालू से माफी मांगता है और अपने परिवार के पास वापस लौट जाता है।
सच मे काफी प्रेरणादायक कहानी है।
ReplyDeleteजो सुख जिम्मेदारी उठाकर पुरा करने में है, वैसा सुख कहीं नहीं। मेहनत और त्याग का फल ही मीठा होता है।
ReplyDelete