मरता गर्भ
मरता गर्भ
सोनल-आज बहुत अच्छा लग रहा है न ! एक अजीब-सी खुशी महसूस हो रही है। काश! हम ये बच्चा पहले ही प्लान किए होते। साहिल (अपनी टाई ठिक करते हुए) -क्या बात कर रही हो? हमने कितने मजे किए हैं। सोनल- तुम नही समझ सकते एक माँ बनना क्या होता है? ओह! हो! मेरी जान क्या तुम समझ सकती हो एक बाप बनना क्या होता है? साहिल कि माँ (इंद्रावती शर्मा)-तुम दोनों समझ सकते हो एक दादी बनना क्या होता है? मैं तो कब से कह रही हूँ कि एक मुन्ना कर लो। पहले के ज़माने में तो भगवान से झोली भरने कि दुआंए कि जाती थी, अब के जमाने मे तो बच्चों का दिमाग ठिकाने आ जाए इसकी दुआंए करनी पड़ती हैं। चलो! जो हुआ सो हुआ अब अपना ख्याल रखों। अब तुम अकेली नहीं हो, तुम्हारे अंदर कोई है। हमारे खानदान की शान। जो हमारी पीढ़ी को आगे बढ़ाएगा। सोनल साहिल को मुंह चढ़ाते हुए इशारे करती है। साहिल-माँ तुम रहने भी दो तुम बात को कहां से कहां ले जाती हो। इंद्रावती -हां भाई हां तुम दोनों ही सही, अब तुम दोनों सही कर। साहिल – OK mom love you. Bye.
सोनल पिछे से – सूनो ना ! कल डॉक्टर के यहां जाना है। याद है तुम्हें! हां याद है कल नहीं आज जाना है। इंद्रावती शर्मा -लो! किसी को कुछ होश ही नहीं है किसको कहाँ जाना है। बहु को what’s app और facebook चलाने से फुर्सत मिले तो न मुआ फोन भी बड़ा खराब चीज़ है, पता नहीं लोग क्या से क्या देखते रहते हैं और बेटे को ऑफिस से फुर्सत मिले तो न। तुम दोनों एक बात कान खोलकर सुन लो, अब तुम दोनों अकेले नहीं हो, अब तुम दोनों आदते बदल लो। सोनल मुंह चिढ़ाते हुए-हूंह! इनका तो काम ही है। जब देखो सुनाने लगती हैं, बच्चे पर क्या असर पड़ेगा। साहिल(सोनल कि बात का समर्थन करते हुए) माँ से-माँ तुम्हें भी समझना चाहिए, सोनल अकेले नही है, अब उसके अंदर कोई है। पहले तुम अपनी आदत सुधारो। जब देखो सोनल को सुनाने लगती हो। बच्चे पर क्या असर पड़ेगा। पुजा-पाठ पर ध्यान दो ताकि बच्चा हंसी-खुशी हो जाए। माँ (हताश) – मैं भी तो यही चाहती हूँ न कि लल्ले का लल्ला देख लूं। सोनल (गर्व मुद्रा में जैसे उसकी जीत हो गई हो और वह जीत से संतुष्ट नही है।) बैठ कर रोने लगती है। साहिल-तुम अब बता माँ बच्चे पर क्या असर पड़ेगा? बैठ कर रो रही है। मुझे लगता है मुझे इसको अपने साथ ही ले जाना होगा। इंद्रावती (भर्रायी हुई आवाज़ मे) -मुझसे गलती हो गई सौ जूते मार ले, बहु को न ले जा। कौन रखेगा इसका ख्याल? तेरे से न होगा। जो कभी पानी नहीं पिया एक गलास लेकर वो कैसे ख्याल रख सकता है? सोनल- आपको क्या पता? इनहोंने मुझे आज तक एक गलास पानी भी ले के पीने नहीं दिया। यहाँ आकर मुझे काम!काम!काम! करना पड़ता है। (इंद्रावती चौंक जाती है।) क्या काम? सारा काम तो नौकर करते हैं। जो थोड़ा बहुत होता है मैं कर लेती हूँ। मेरी क्या मति मारी गई है जो तुमसे काम कराऊंगी? मुझे लगता है जरूर इसकी माँ ने सिखाया है। साहिल(चिल्लाते हुए) -माँ बहुत हो गया। दिन-रात इतने ताने मारोगी तो बच्चे का क्या होगा? सोनल चुप रहो अब तुमको यहां नही रहना है। चलो चुपचाप! दिन-रात रोओगी तो बच्चे का क्या होगा? मेरा तो इन दोनों औरतों ने दिमाग खराब कर के रख दिया है। इसकी सुनो तो वो ताना मारती है और उसकी सुनो तो ये ताना मारती है। इंद्रावती हताश हो जाती है -ठीक है तुमको जो करना है कर, मैं कुछ नहीं बोलती लेकिन बच्चे को कुछ हुआ तो मैं तुम दोनों को नहीं छोडु़गी। सोनल- फिर उल्टी बात। ये मेरा बच्चा है। किसी और का नहीं। इसपे सिर्फ मेरा हक है। मैं कैसे भी जन्म दूं। साहिल समर्थन करते हुए – हां चलो! तुम्हारा ही है। इंद्रावती के लिए कुछ कहने के लिए नहीं रह जाता है। वह अपने कमरे में चली जाती है। सोनल और साहिल बाहर चले जाते हैं।(सोनल बहुत खुश है उसको लगता है कि साहिल सिर्फ और सिर्फ मेरा है। मेरा पति है। उसको जो कहूंगी वही करेगा। साहिल भी वही करता है जो सोनल चाहती है। वे दोनों वापस अपने फ्लैट मे आ जाते है।)
सोनल के पेट में पल रहे गर्भ को बहुत मान होता है। उसे लगता है मेरे आने पर सब कितने खुश हैं। ये दुनिया कितनी रंगीन है और ये कितने प्यारे-प्यारे लोग हैं जो मेरे लिए और मेरी खुशियों के लिए लड़ रहे हैं। मेरी माँ, मेरे पापा और मेरी दादी सब कितना प्यार करते है और उसका मन करता है कि अभी के अभी पेट से बाहर आ जाए। उस प्यार को वो महसूस करे जो प्यार उसके लिए सभी दिखा रहे है।
साहिल (सोनल से) - पता हैं तुमको चार महीने हो गए हैं। हमे पता चल जाएगा हमारे घर कौन आने वाला है – लक्ष्मी या गणेश? सोनल- इसमे पता क्या करना है? मेरे खानदान में आज तक किसी को पहला बच्चा लड़की हुई है भला जो मुझे होगी? मेरे बड़े वाले भईया के दो बेटे हैं। मेरी बहन के दो बेटे हैं। हां-हां पता है मुझे लेकिन एक बार दिखा लेते तो अच्छा होता। सोनल-मुझे बार-बार डॉक्टर के पास जाने से डर लगता है। तुम्हें क्या पता वो क्या-क्या करता है? वो मशीने देखकर मुझे डर लगता है। मुझे नहीं जाना। साहिल(सोनल को अपनी बाहों मे भरते हुए)-क्या बोल रही हो जान! मैं तो तुम्हारे साथ रहता हूँ। कहां कुछ करता है? अभी अपने से ज्यादा बच्चे के बारे मे सोचो। अलर्टासाउण्ड कराने से हमें पता चलेगा बेबी कैसा है? और अभी हमें सिर्फ उसी के बारे मे सोचना चाहिए और कुछ नहीं। इसका मतलब ये थोड़े है कि मुझे तुम्हारी बात पे भरोसा नहीं। सोनल तैयार हो जाती है डॉक्टर के पास जाने के लिए।
साहिल और सोनल डॉक्टर के पास जाते है। डॉक्टर चन्द्रा-हाय सोनल-साहिल कैसे हो? साहिल-मैं ठीक हूँ। सोनल भी। डॉक्टरचन्द्रा-हां वो देखकर ही लग रहा है। आपकी माँ अक्सर फोन कर पुछते रहती है। क्या आपलोग अभी उनके साथ नहीं है? सोनल-क्या बताएं डॉक्टर साहब दिन-रात चैन नही लेने देती थी। हमेशा ताना मारते रहती थी। हमे तो खुद ही लगता था पहला बच्चा है उनका अनुभव काम आएगा। लेकिन वो तो मेरा जीना ही हराम कर दी थी। डॉक्टर-ठीक किया नहीं तो बच्चे पे बुरा असर पड़ता। साहिल-लोग कुछ भी कहें लेकिन मैं कभी-कभार आता-जाता रहता हूँ। डॉक्टर-हां-हां आपकी माँ बता रही थी। ऐसे उनकी भी बहुत इच्छा है जानने कि की घर में कौन आने वाला है? वो तो अब पंडितो के चक्कर मे भी पड़ गईं है। सोनल- इन्ही बातों से मेरा जी जलता है। साहिल-बस करो! अब शुरू करे! डॉक्टर-हां-हां अंदर चलिए। अलर्टासाउण्ड कराते ही जब उन्हें पता चलता है कि बेटा नहीं बेटी है सोनल- और साहिल के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। सोनल रोने लगती है। साहिल से कहती है-मेरी किस्मत ही खराब है। मेरी जिंदगी में कुछ अच्छा नही मिला न तो मुझे बेटे का मुंह देखने को न मिलता ! साहिल – अच्छा कोई बात नही जो हुआ सो हुआ अब घर चलते हैं। डॉक्टर-अपलोग तो पढ़े-लिखे लोग हैं,फिर दु:खी क्यों होते हैं। बेटा और बेटी में क्या फर्क है? साहिल-फर्क तो आप भी जानते हैं सर मैं क्या कहुँ। डॉक्टर-हां, आपको अपनी माँ का अनुभव लेना चाहिए था। साहिल-हां घर ही जा रहें हैं, गलती हो गई। अब जो माँ कहेगी वैसा ही करना होगा। सोनल(खामोश,धिरे से)-घर जा रहे हैं। साहिल-अब तो तुम कुछ बोलो ही मत। सोनल-मैं बोलने लायक रही कहां? दोनों अपने घर चले जाते हैं।
इंद्रावती शर्मा-डॉक्टर साहब ने बताया मुझे फोन करके। साहिल-माँ अब तुम बोलो क्या करें? इंद्रावती-मैं तो पहले से ही बोल रही थी कि बहु को क्या करना है क्या नहीं करना है? मैं बैठी बूढ़ी कर्र-कर्र करुंगी मर जाउंगी,सब तो यही सोचते है। मैं शुभ-अशुभ सब जानती हूँ, लेकिन मेरी कोई सुने तो न। सोनल(चिढ़ती हुई)-इसमें किसी का बस है भला! साहिल गुस्से में तमतमा जाता है। मायके से यही सिख के आई हो मेरी माँ से बोलने कि तमीज़ है तुम्हें? इंद्रावती-मायके वालों में तमीज़ रहेगी तो न इसमें होगी। सोनल फुट-फुट कर रोने लगती है। इंद्रावती-शुरू हो गया इसका ड्रामा,यही तो करते आयी है। साहिल-चुप होती हो कि दो थपड़ लगाऊं तुम्हें? सबकुछ किया इसके लिए, लेकिन इसने मुझे मेरी माँ से दुर कर दिया। क्या कुछ नहीं किया माँ इसके लिए। माँ-तिरियाचरितर देवो न जाने,पति मार सती कहला़वे। साहिल-तुम ठीक कहती हो एक दिन हम मर जाएंगे और यी खुश हो जाएगी। इंद्रावती-नहीं बेटा! ऐसा नहीं बोलते,यी डायन मरे तू क्यों मरेगा?(सोनल कि सत्ता जाते रहती है और इंद्रावती कि सत्ता आते रहती है।)
साहिल-माँ अब तुम जो कहोगी,वही होगा,इस डायन की एक भी बात नहीं मानुंगा। मैं तुम्हारा ही बेटा हूँ माँ। इंद्रावती-तु चिन्ता मत कर सभी के उपाय होते हैं। जवान है अभी तू दुसरा बच्चा हो जाएगा। बिना मतलब मे पांच साल बर्बाद कर दिए। एक लल्ला हो जाता फिर घूमते रहता तुम। उसकी माँ आगे बोलती है-कुछ नहीं अर्बाशन करा देंगे। सोनल सकपका जाती है बोलती है-डर लगता है मुझे,कहीं मुझे कुछ हो गया तो! इंद्रावती-तु नहीं मरेगी डायन,मेरा बेटा मर जाएगा। तुझे पता है लड़की बोझ होती है बोझ! सोनल खामोशी से तैयार हो जाती है।
सोनल के पेट में पल रहा गर्भ समझ ही नही पाता बाहर क्या चल रहा है-लड़का! लड़की! सोनल का अर्बाशन हो जाता है और गर्भ मर जाता है। गर्भ-भगवान से आप मुझे ऊपर क्यों बुला लिए? मुझे नीचे ही रहना था! भगवान वे लोग तुम्हें पसंद नहीं करते थे। उनलोगों ने तुम्हें भेज दिया है जबरदस्ती। गर्भ-क्यों? भगवान-तुम लड़की हो। गर्भ-लड़की खराब होती है? भगवान के भी आँखो मे आँसू आ जाते है उस नन्हीं-सी बच्ची का सवाल सून के। बोलते हैं-नहीं। अगर तुम न रहो तो सृष्टि ही खत्म हो जाएगी। गर्भ-तो फिर क्यों मार देते हैं लोग मुझे? भगवान-क्योंकि उन्हें अपने विज्ञान का घमंड हो गया है,वो जो चाहें कर सकते हैं। गर्भ-तो मैं क्या करू? इसमें मेरी क्या गलती है? भगवान-तू मान कर खुद पर। गर्भ-कैसा मान? जब मुझे कोई पुछता ही नहीं है। भगवान-मैं तो चाहता हूँ कि धरती पर से एक-एक लड़की ऊपर आ जाए और मैं तुम्हारी एक अलग ही दुनिया बना दूं। गर्भ-जो नीचे है? भगवान-वो खुद ही समाप्त हो जाएंगे।
बूंद-बूंद से तुने मुझे सिंचा है।
क्या गलती थी मेरी जो तूने मुझे छीना है।।
सोनल-आज बहुत अच्छा लग रहा है न ! एक अजीब-सी खुशी महसूस हो रही है। काश! हम ये बच्चा पहले ही प्लान किए होते। साहिल (अपनी टाई ठिक करते हुए) -क्या बात कर रही हो? हमने कितने मजे किए हैं। सोनल- तुम नही समझ सकते एक माँ बनना क्या होता है? ओह! हो! मेरी जान क्या तुम समझ सकती हो एक बाप बनना क्या होता है? साहिल कि माँ (इंद्रावती शर्मा)-तुम दोनों समझ सकते हो एक दादी बनना क्या होता है? मैं तो कब से कह रही हूँ कि एक मुन्ना कर लो। पहले के ज़माने में तो भगवान से झोली भरने कि दुआंए कि जाती थी, अब के जमाने मे तो बच्चों का दिमाग ठिकाने आ जाए इसकी दुआंए करनी पड़ती हैं। चलो! जो हुआ सो हुआ अब अपना ख्याल रखों। अब तुम अकेली नहीं हो, तुम्हारे अंदर कोई है। हमारे खानदान की शान। जो हमारी पीढ़ी को आगे बढ़ाएगा। सोनल साहिल को मुंह चढ़ाते हुए इशारे करती है। साहिल-माँ तुम रहने भी दो तुम बात को कहां से कहां ले जाती हो। इंद्रावती -हां भाई हां तुम दोनों ही सही, अब तुम दोनों सही कर। साहिल – OK mom love you. Bye.
सोनल पिछे से – सूनो ना ! कल डॉक्टर के यहां जाना है। याद है तुम्हें! हां याद है कल नहीं आज जाना है। इंद्रावती शर्मा -लो! किसी को कुछ होश ही नहीं है किसको कहाँ जाना है। बहु को what’s app और facebook चलाने से फुर्सत मिले तो न मुआ फोन भी बड़ा खराब चीज़ है, पता नहीं लोग क्या से क्या देखते रहते हैं और बेटे को ऑफिस से फुर्सत मिले तो न। तुम दोनों एक बात कान खोलकर सुन लो, अब तुम दोनों अकेले नहीं हो, अब तुम दोनों आदते बदल लो। सोनल मुंह चिढ़ाते हुए-हूंह! इनका तो काम ही है। जब देखो सुनाने लगती हैं, बच्चे पर क्या असर पड़ेगा। साहिल(सोनल कि बात का समर्थन करते हुए) माँ से-माँ तुम्हें भी समझना चाहिए, सोनल अकेले नही है, अब उसके अंदर कोई है। पहले तुम अपनी आदत सुधारो। जब देखो सोनल को सुनाने लगती हो। बच्चे पर क्या असर पड़ेगा। पुजा-पाठ पर ध्यान दो ताकि बच्चा हंसी-खुशी हो जाए। माँ (हताश) – मैं भी तो यही चाहती हूँ न कि लल्ले का लल्ला देख लूं। सोनल (गर्व मुद्रा में जैसे उसकी जीत हो गई हो और वह जीत से संतुष्ट नही है।) बैठ कर रोने लगती है। साहिल-तुम अब बता माँ बच्चे पर क्या असर पड़ेगा? बैठ कर रो रही है। मुझे लगता है मुझे इसको अपने साथ ही ले जाना होगा। इंद्रावती (भर्रायी हुई आवाज़ मे) -मुझसे गलती हो गई सौ जूते मार ले, बहु को न ले जा। कौन रखेगा इसका ख्याल? तेरे से न होगा। जो कभी पानी नहीं पिया एक गलास लेकर वो कैसे ख्याल रख सकता है? सोनल- आपको क्या पता? इनहोंने मुझे आज तक एक गलास पानी भी ले के पीने नहीं दिया। यहाँ आकर मुझे काम!काम!काम! करना पड़ता है। (इंद्रावती चौंक जाती है।) क्या काम? सारा काम तो नौकर करते हैं। जो थोड़ा बहुत होता है मैं कर लेती हूँ। मेरी क्या मति मारी गई है जो तुमसे काम कराऊंगी? मुझे लगता है जरूर इसकी माँ ने सिखाया है। साहिल(चिल्लाते हुए) -माँ बहुत हो गया। दिन-रात इतने ताने मारोगी तो बच्चे का क्या होगा? सोनल चुप रहो अब तुमको यहां नही रहना है। चलो चुपचाप! दिन-रात रोओगी तो बच्चे का क्या होगा? मेरा तो इन दोनों औरतों ने दिमाग खराब कर के रख दिया है। इसकी सुनो तो वो ताना मारती है और उसकी सुनो तो ये ताना मारती है। इंद्रावती हताश हो जाती है -ठीक है तुमको जो करना है कर, मैं कुछ नहीं बोलती लेकिन बच्चे को कुछ हुआ तो मैं तुम दोनों को नहीं छोडु़गी। सोनल- फिर उल्टी बात। ये मेरा बच्चा है। किसी और का नहीं। इसपे सिर्फ मेरा हक है। मैं कैसे भी जन्म दूं। साहिल समर्थन करते हुए – हां चलो! तुम्हारा ही है। इंद्रावती के लिए कुछ कहने के लिए नहीं रह जाता है। वह अपने कमरे में चली जाती है। सोनल और साहिल बाहर चले जाते हैं।(सोनल बहुत खुश है उसको लगता है कि साहिल सिर्फ और सिर्फ मेरा है। मेरा पति है। उसको जो कहूंगी वही करेगा। साहिल भी वही करता है जो सोनल चाहती है। वे दोनों वापस अपने फ्लैट मे आ जाते है।)
सोनल के पेट में पल रहे गर्भ को बहुत मान होता है। उसे लगता है मेरे आने पर सब कितने खुश हैं। ये दुनिया कितनी रंगीन है और ये कितने प्यारे-प्यारे लोग हैं जो मेरे लिए और मेरी खुशियों के लिए लड़ रहे हैं। मेरी माँ, मेरे पापा और मेरी दादी सब कितना प्यार करते है और उसका मन करता है कि अभी के अभी पेट से बाहर आ जाए। उस प्यार को वो महसूस करे जो प्यार उसके लिए सभी दिखा रहे है।
साहिल (सोनल से) - पता हैं तुमको चार महीने हो गए हैं। हमे पता चल जाएगा हमारे घर कौन आने वाला है – लक्ष्मी या गणेश? सोनल- इसमे पता क्या करना है? मेरे खानदान में आज तक किसी को पहला बच्चा लड़की हुई है भला जो मुझे होगी? मेरे बड़े वाले भईया के दो बेटे हैं। मेरी बहन के दो बेटे हैं। हां-हां पता है मुझे लेकिन एक बार दिखा लेते तो अच्छा होता। सोनल-मुझे बार-बार डॉक्टर के पास जाने से डर लगता है। तुम्हें क्या पता वो क्या-क्या करता है? वो मशीने देखकर मुझे डर लगता है। मुझे नहीं जाना। साहिल(सोनल को अपनी बाहों मे भरते हुए)-क्या बोल रही हो जान! मैं तो तुम्हारे साथ रहता हूँ। कहां कुछ करता है? अभी अपने से ज्यादा बच्चे के बारे मे सोचो। अलर्टासाउण्ड कराने से हमें पता चलेगा बेबी कैसा है? और अभी हमें सिर्फ उसी के बारे मे सोचना चाहिए और कुछ नहीं। इसका मतलब ये थोड़े है कि मुझे तुम्हारी बात पे भरोसा नहीं। सोनल तैयार हो जाती है डॉक्टर के पास जाने के लिए।
साहिल और सोनल डॉक्टर के पास जाते है। डॉक्टर चन्द्रा-हाय सोनल-साहिल कैसे हो? साहिल-मैं ठीक हूँ। सोनल भी। डॉक्टरचन्द्रा-हां वो देखकर ही लग रहा है। आपकी माँ अक्सर फोन कर पुछते रहती है। क्या आपलोग अभी उनके साथ नहीं है? सोनल-क्या बताएं डॉक्टर साहब दिन-रात चैन नही लेने देती थी। हमेशा ताना मारते रहती थी। हमे तो खुद ही लगता था पहला बच्चा है उनका अनुभव काम आएगा। लेकिन वो तो मेरा जीना ही हराम कर दी थी। डॉक्टर-ठीक किया नहीं तो बच्चे पे बुरा असर पड़ता। साहिल-लोग कुछ भी कहें लेकिन मैं कभी-कभार आता-जाता रहता हूँ। डॉक्टर-हां-हां आपकी माँ बता रही थी। ऐसे उनकी भी बहुत इच्छा है जानने कि की घर में कौन आने वाला है? वो तो अब पंडितो के चक्कर मे भी पड़ गईं है। सोनल- इन्ही बातों से मेरा जी जलता है। साहिल-बस करो! अब शुरू करे! डॉक्टर-हां-हां अंदर चलिए। अलर्टासाउण्ड कराते ही जब उन्हें पता चलता है कि बेटा नहीं बेटी है सोनल- और साहिल के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। सोनल रोने लगती है। साहिल से कहती है-मेरी किस्मत ही खराब है। मेरी जिंदगी में कुछ अच्छा नही मिला न तो मुझे बेटे का मुंह देखने को न मिलता ! साहिल – अच्छा कोई बात नही जो हुआ सो हुआ अब घर चलते हैं। डॉक्टर-अपलोग तो पढ़े-लिखे लोग हैं,फिर दु:खी क्यों होते हैं। बेटा और बेटी में क्या फर्क है? साहिल-फर्क तो आप भी जानते हैं सर मैं क्या कहुँ। डॉक्टर-हां, आपको अपनी माँ का अनुभव लेना चाहिए था। साहिल-हां घर ही जा रहें हैं, गलती हो गई। अब जो माँ कहेगी वैसा ही करना होगा। सोनल(खामोश,धिरे से)-घर जा रहे हैं। साहिल-अब तो तुम कुछ बोलो ही मत। सोनल-मैं बोलने लायक रही कहां? दोनों अपने घर चले जाते हैं।
इंद्रावती शर्मा-डॉक्टर साहब ने बताया मुझे फोन करके। साहिल-माँ अब तुम बोलो क्या करें? इंद्रावती-मैं तो पहले से ही बोल रही थी कि बहु को क्या करना है क्या नहीं करना है? मैं बैठी बूढ़ी कर्र-कर्र करुंगी मर जाउंगी,सब तो यही सोचते है। मैं शुभ-अशुभ सब जानती हूँ, लेकिन मेरी कोई सुने तो न। सोनल(चिढ़ती हुई)-इसमें किसी का बस है भला! साहिल गुस्से में तमतमा जाता है। मायके से यही सिख के आई हो मेरी माँ से बोलने कि तमीज़ है तुम्हें? इंद्रावती-मायके वालों में तमीज़ रहेगी तो न इसमें होगी। सोनल फुट-फुट कर रोने लगती है। इंद्रावती-शुरू हो गया इसका ड्रामा,यही तो करते आयी है। साहिल-चुप होती हो कि दो थपड़ लगाऊं तुम्हें? सबकुछ किया इसके लिए, लेकिन इसने मुझे मेरी माँ से दुर कर दिया। क्या कुछ नहीं किया माँ इसके लिए। माँ-तिरियाचरितर देवो न जाने,पति मार सती कहला़वे। साहिल-तुम ठीक कहती हो एक दिन हम मर जाएंगे और यी खुश हो जाएगी। इंद्रावती-नहीं बेटा! ऐसा नहीं बोलते,यी डायन मरे तू क्यों मरेगा?(सोनल कि सत्ता जाते रहती है और इंद्रावती कि सत्ता आते रहती है।)
साहिल-माँ अब तुम जो कहोगी,वही होगा,इस डायन की एक भी बात नहीं मानुंगा। मैं तुम्हारा ही बेटा हूँ माँ। इंद्रावती-तु चिन्ता मत कर सभी के उपाय होते हैं। जवान है अभी तू दुसरा बच्चा हो जाएगा। बिना मतलब मे पांच साल बर्बाद कर दिए। एक लल्ला हो जाता फिर घूमते रहता तुम। उसकी माँ आगे बोलती है-कुछ नहीं अर्बाशन करा देंगे। सोनल सकपका जाती है बोलती है-डर लगता है मुझे,कहीं मुझे कुछ हो गया तो! इंद्रावती-तु नहीं मरेगी डायन,मेरा बेटा मर जाएगा। तुझे पता है लड़की बोझ होती है बोझ! सोनल खामोशी से तैयार हो जाती है।
सोनल के पेट में पल रहा गर्भ समझ ही नही पाता बाहर क्या चल रहा है-लड़का! लड़की! सोनल का अर्बाशन हो जाता है और गर्भ मर जाता है। गर्भ-भगवान से आप मुझे ऊपर क्यों बुला लिए? मुझे नीचे ही रहना था! भगवान वे लोग तुम्हें पसंद नहीं करते थे। उनलोगों ने तुम्हें भेज दिया है जबरदस्ती। गर्भ-क्यों? भगवान-तुम लड़की हो। गर्भ-लड़की खराब होती है? भगवान के भी आँखो मे आँसू आ जाते है उस नन्हीं-सी बच्ची का सवाल सून के। बोलते हैं-नहीं। अगर तुम न रहो तो सृष्टि ही खत्म हो जाएगी। गर्भ-तो फिर क्यों मार देते हैं लोग मुझे? भगवान-क्योंकि उन्हें अपने विज्ञान का घमंड हो गया है,वो जो चाहें कर सकते हैं। गर्भ-तो मैं क्या करू? इसमें मेरी क्या गलती है? भगवान-तू मान कर खुद पर। गर्भ-कैसा मान? जब मुझे कोई पुछता ही नहीं है। भगवान-मैं तो चाहता हूँ कि धरती पर से एक-एक लड़की ऊपर आ जाए और मैं तुम्हारी एक अलग ही दुनिया बना दूं। गर्भ-जो नीचे है? भगवान-वो खुद ही समाप्त हो जाएंगे।
बूंद-बूंद से तुने मुझे सिंचा है।
क्या गलती थी मेरी जो तूने मुझे छीना है।।
Great piece of writing highlighting the plight of girl child in embryo. This discrimination will throw the society in gender imbalance. Mankind will never know the intelligence, bravery & understanding that girls bring with them. THIS SHOWS RED LIGHT TO SOCIETY - BEWARE.
ReplyDeleteIt's a big cause of gender gap. Now it's time to change our mentally. Really you selected a burning topic of our society....
ReplyDeleteमाँ , बहन, बीबी तो सबको चाहिये मगर बेटी ......दुर्भाग्य है इस देश और समाज का
ReplyDeleteआज और कल, हर युग में नारी के प्रति उदासीनता जैसे समाज की पहचान होती जा रही है, लेखिका ने समाज के इस दर्द को सही रूप में आवाज दी है
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